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"},"link":[{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#feed","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/posts\/default"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/-\/environment?alt=json-in-script\u0026max-results=100"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/search\/label\/environment"},{"rel":"hub","href":"http://pubsubhubbub.appspot.com/"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh 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है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eवायुमंडलीय दबाव, जिसे वायु दबाव या बैरोमीटर के दबाव के रूप में भी जाना जाता है, पृथ्वी के वायुमंडल के भीतर का दबाव है। मानक वायुमंडल (प्रतीक: एटीएम) दबाव की एक इकाई है जिसे 101,325 Pa के रूप में परिभाषित किया गया है, जो 1,013.25 मिलीबार, 760 मिमी Hg, 29.9212 इंच Hg, या 14.696 psi के बराबर है। एटीएम इकाई मोटे तौर पर पृथ्वी पर औसत समुद्र-स्तरीय वायुमंडलीय दबाव के बराबर है. अर्थात् समुद्र तल पर पृथ्वी का वायुमंडलीय दबाव लगभग 1 एटीएम है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअधिकांश परिस्थितियों में, माप बिंदु के ऊपर हवा के भार के कारण होने वाले हाइड्रोस्टेटिक दबाव से वायुमंडलीय दबाव का बारीकी से अनुमान लगाया जाता है। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, ऊपरी वायुमंडलीय द्रव्यमान कम होता है, इसलिए बढ़ती ऊंचाई के साथ वायुमंडलीय दबाव कम हो जाता है। क्योंकि वायुमंडल पृथ्वी की त्रिज्या के सापेक्ष पतला है - विशेष रूप से कम ऊंचाई पर घनी वायुमंडलीय परत - ऊंचाई के कार्य के रूप में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण त्वरण को स्थिर माना जा सकता है और इस गिरावट में बहुत कम योगदान देता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदबाव प्रति इकाई क्षेत्र में बल को मापता है, पास्कल की एसआई इकाइयों के साथ। औसतन, 1 वर्ग सेंटीमीटर के क्रॉस-सेक्शनल क्षेत्र वाले हवा के एक स्तंभ, जिसे औसत समुद्र तल से पृथ्वी के वायुमंडल के शीर्ष तक मापा जाता है, का द्रव्यमान लगभग 1.03 किलोग्राम होता है और यह एक बल लगाता है या \" वजन\" लगभग 10.1 न्यूटन, जिसके परिणामस्वरूप 10.1 N\/cm2 या 101 kN\/m2 का दबाव होता है। 1 इंच2 के क्रॉस-सेक्शनल क्षेत्र वाले हवा के एक स्तंभ का वजन लगभग 14.7 lbf होगा, जिसके परिणामस्वरूप 14.7 lbf\/in2 का दबाव होगा।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/354971453116854716\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/12\/blog-post_58.html#comment-form","title":"0 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प्रदान करता है कि हवा कितनी स्वच्छ या प्रदूषित है और इससे जुड़े स्वास्थ्य प्रभाव सामान्य आबादी के लिए चिंता का विषय हो सकते हैं। AQI की गणना आमतौर पर कई प्रमुख वायु प्रदूषकों की सांद्रता के आधार पर की जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003EAQI की गणना में शामिल सामान्य प्रदूषक हैं:\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. ग्राउंड-लेवल ओजोन (O₃): स्मॉग का एक प्रमुख घटक, ओजोन श्वसन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. पार्टिकुलेट मैटर (पीएम10 और पीएम2.5): हवा में निलंबित महीन कण, जो सांस लेने पर स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3. कार्बन मोनोऑक्साइड (सीओ): जीवाश्म ईंधन के अधूरे दहन से उत्पन्न एक रंगहीन, गंधहीन गैस।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E4. सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂): सल्फर युक्त जीवाश्म ईंधन के जलने से उत्पन्न एक गैस, जो श्वसन संबंधी समस्याओं में योगदान करती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E5. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂): दहन प्रक्रियाओं द्वारा उत्पादित गैस, विशेष रूप से वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों में।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003EAQI को अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिनमें से प्रत्येक स्वास्थ्य चिंता के एक अलग स्तर के अनुरूप है। श्रेणियों में अक्सर शामिल होते हैं:\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E- अच्छा (0-50): वायु गुणवत्ता संतोषजनक मानी जाती है, और वायु प्रदूषण से बहुत कम या कोई खतरा नहीं होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E- मध्यम (51-100): वायु गुणवत्ता स्वीकार्य है; हालाँकि, वायु प्रदूषण के प्रति असामान्य रूप से संवेदनशील कुछ लोगों के लिए मध्यम स्वास्थ्य चिंता हो सकती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E- संवेदनशील समूहों के लिए अस्वास्थ्यकर (101-150): संवेदनशील समूहों के सदस्य (उदाहरण के लिए, श्वसन या हृदय की स्थिति वाले व्यक्ति, बच्चे, बड़े वयस्क) स्वास्थ्य प्रभावों का अनुभव कर सकते हैं। आम जनता के प्रभावित होने की संभावना कम है.\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E- अस्वस्थ (151-200): हर किसी को प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों का अनुभव होना शुरू हो सकता है, और संवेदनशील समूहों के सदस्यों को अधिक गंभीर प्रभावों का अनुभव हो सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E- बहुत अस्वस्थ (201-300): स्वास्थ्य चेतावनी: हर किसी को अधिक गंभीर स्वास्थ्य प्रभावों का अनुभव हो सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E- खतरनाक (301 और अधिक): आपातकालीन स्थितियों की स्वास्थ्य चेतावनियाँ; पूरी आबादी के प्रभावित होने की अधिक संभावना है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003EAQI की निगरानी से व्यक्तियों, समुदायों और अधिकारियों को बाहरी गतिविधियों के बारे में सूचित निर्णय लेने में मदद मिलती है, खासकर श्वसन या हृदय संबंधी समस्याओं वाले लोगों के लिए। AQI आमतौर पर पर्यावरण एजेंसियों और मौसम विज्ञान सेवाओं द्वारा जनता को उनके क्षेत्र में वायु गुणवत्ता की स्थिति के बारे में सूचित रखने के लिए रिपोर्ट किया जाता है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/1092713517011042147\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/12\/blog-post_15.html#comment-form","title":"0 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सतह पर एक विशिष्ट बिंदु पर हवा द्वारा उस बिंदु के ऊपर हवा के अणुओं पर गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के कारण लगाया गया दबाव है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवायुदाब के बारे में मुख्य बिंदुओं में शामिल हैं:\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. ऊंचाई के साथ परिवर्तनशीलता: ऊंचाई बढ़ने के साथ हवा का दबाव कम हो जाता है। जैसे-जैसे कोई वायुमंडल में ऊपर जाता है, ऊपर हवा के अणु कम होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप हवा का दबाव कम होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. मानक वायुमंडलीय दबाव: समुद्र तल पर, मानक वायुमंडलीय परिस्थितियों में, औसत वायु दबाव लगभग 101.3 किलोपास्कल (केपीए) या 14.7 पाउंड प्रति वर्ग इंच (पीएसआई) होता है। इस मानक दबाव का उपयोग अक्सर वायुमंडलीय दबाव माप में संदर्भ बिंदु के रूप में किया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3. माप की इकाइयाँ: वायु दाब को विभिन्न इकाइयों में मापा जा सकता है, जिसमें पास्कल (Pa), किलोपास्कल (kPa), पारा के मिलीमीटर (mmHg), और पारा के इंच (inHg) शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E4. बैरोमेट्रिक दबाव: बैरोमेट्रिक दबाव एक शब्द है जिसका उपयोग आमतौर पर वायुमंडलीय दबाव को संदर्भित करने के लिए किया जाता है। बैरोमीटर वायुमंडलीय दबाव को मापने के लिए डिज़ाइन किए गए उपकरण हैं, और बैरोमीटर के दबाव में परिवर्तन अक्सर मौसम की स्थिति में बदलाव से जुड़े होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E5. उच्च और निम्न दबाव प्रणालियाँ: मौसम प्रणालियों में, उच्च और निम्न वायुमंडलीय दबाव के क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उच्च दबाव प्रणालियाँ नीचे की ओर आती हवा और आम तौर पर साफ मौसम से जुड़ी होती हैं, जबकि कम दबाव वाली प्रणालियाँ ऊपर की ओर बढ़ती हवा से जुड़ी होती हैं और अक्सर बादल या तूफानी मौसम से जुड़ी होती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E6. मौसम पर प्रभाव: हवा के दबाव में अंतर हवाओं के विकास में योगदान देता है क्योंकि हवा उच्च दबाव वाले क्षेत्रों से कम दबाव वाले क्षेत्रों की ओर चलती है। ये दबाव अंतर मौसम पैटर्न के निर्माण में एक महत्वपूर्ण कारक हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E7. मानक वायुमंडल: मानक वायुमंडल एक मॉडल है जो परिभाषित करता है कि मानक परिस्थितियों में ऊंचाई के साथ दबाव, तापमान, घनत्व और अन्य वायुमंडलीय गुण कैसे बदलते हैं। यह विभिन्न ऊंचाई पर वायुमंडलीय स्थितियों की तुलना करने के लिए एक संदर्भ प्रदान करता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमौसम विज्ञान, विमानन और विभिन्न वैज्ञानिक विषयों में वायुदाब को समझना महत्वपूर्ण है। यह मौसम के मिजाज को प्रभावित करता है, वायुमंडल में गैसों के व्यवहार को प्रभावित करता है और पृथ्वी की जलवायु प्रणाली की गतिशीलता में भूमिका निभाता है। मौसम की भविष्यवाणी और वायुमंडलीय घटनाओं को समझने के लिए वायुदाब का माप और अवलोकन महत्वपूर्ण हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/4261238720565417237\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/12\/blog-post_72.html#comment-form","title":"0 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जानना जरुरी हैं। वह भूमि जो पेड़ों, झाड़ियों और अन्य वनस्पतियों से आच्छादित होता है। उसे वन कहा जाता हैं। वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके और ऑक्सीजन जारी करके पृथ्वी के वातावरण के संतुलन को बनाए रखने में मदद करते हैं, वन्य जीवों के लिए यह घर प्रदान करता हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eआरक्षित वन किसे कहते हैं\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003Eआरक्षित वन एक \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/06\/blog-post.html\"\u003Eकानूनी \u003C\/a\u003Eरूप से संरक्षित वन क्षेत्र होता है। इसका उद्देश्य\u0026nbsp;जैव विविधता और प्राकृतिक \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/sansadhan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eसंसाधनों \u003C\/a\u003Eको संरक्षण देना है। इन वनों को किसी भी मानवीय गतिविधियों से दूर रखा जाता है जिससे \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/ecosystem-in-hindi.html\"\u003Eपारिस्थितिकी तंत्र\u003C\/a\u003E को नुकसान न हो।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eआरक्षित वनों का देख रेख वन विभाग द्वारा किया जाता है। वन विभाग आरक्षित वनों और उनके संसाधनों की सुरक्षा, प्रबंधन और संरक्षण के लिए जिम्मेदार होता है। आरक्षित वन जैव विविधता के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eआरक्षित वनों में पर्यटक प्रकृति की सुंदरता और वन्य जीवन का आनंद ले सकते हैं, लेकिन वन पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए वन विभाग द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना महत्वपूर्ण होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eभारत में आरक्षित वनों का प्रतिशत\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2021 तक भारत में आरक्षित वनों का प्रतिशत लगभग 4.95% है। इंडिया स्टेट ऑफ़ फ़ॉरेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल वन आरक्षित क्षेत्र 712,249 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 21.67% है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभारत सरकार वन संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए विभिन्न पहल कर रही है और नीतियों को लागू कर रही है। इन प्रयासों में राष्ट्रीय वन नीति, 1988 और वन संरक्षण अधिनियम, 1980 शामिल हैं, जिनका उद्देश्य वनों और वन्यजीवों की रक्षा करना और स्थायी वन प्रबंधन को समर्थन करना है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/9078307190579340647\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/patra-lekhan-in-hindi.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/9078307190579340647"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/9078307190579340647"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/patra-lekhan-in-hindi.html","title":"आरक्षित वन किसे कहते हैं?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-8985145980423216737"},"published":{"$t":"2022-11-14T23:07:00.008+05:30"},"updated":{"$t":"2023-08-05T07:06:25.598+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"संसाधन किसे कहते हैं?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/prithvi-kise-kahate-hain.html\"\u003Eपृथ्वी \u003C\/a\u003Eपर अनगिनत खनिज पदार्थ व\u0026nbsp;जीव जंतु पाए जाते हैं। जिनका हम अपनी आवश्यकता\n  अनुसार उपयोग करते हैं। उसे संसाधन कहा जाता हैं। प्रकृति ने हमें जंगल, पानी, पहाड़, \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mandan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eमैदान \u003C\/a\u003Eऔर हवा प्रदान किया हैं। ये सभी\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/natural-resources-in-hindi.html\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन\u003C\/a\u003E\n  हमारे दैनिक जीवन का आधार हैं।\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eसंसाधन किसे कहते हैं\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  संसाधन\u0026nbsp;कुछ भी हो सकता\u0026nbsp;है जिसका उपयोग मनुष्य द्वारा किया जाता है। हवा\n  से लेकर सोने की आभूषण तक सब कुछ संसाधन है। संसाधन का उपयोग \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/v.html\"\u003Eलाभ \u003C\/a\u003Eप्राप्त और जीवन\n  की गुणवत्ता में सुधार के लिए किया जाता हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  संसाधन मानव के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैसे हम लकड़ी का उपयोग\n  घर निर्माण में करते हैं। और प्रकाश का उपयोग ऊर्जा के रूप में करते हैं। अतः यह\n  सभी संसाधन हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  संसाधन व्यवसाय का एक आवश्यक तत्व होता हैं। जिसमें भूमि, पूंजी, सामग्री, मशीन,\n  समय, ऊर्जा, जनशक्ति, प्रबंधन, ज्ञान, विशेषज्ञता और सूचना शामिल होती हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  संसाधन एक वस्तु होती है जिसका उपयोग हम मानव अपनी आवश्यकता अनुशार करते है इन वस्तुओं का एक\u0026nbsp;मूल्य होता है। जैसे धातु, पदार्थ और वन आदि।\n  संसाधन को नवीकरणीय और गैर-नवीकरणीय संसाधनों में बंटा गया है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  नवीकरणीय संसाधन का\u0026nbsp;उपयोग बार बार किया जा सकता हैं। इनमें पेड़-पौधे, पवन और सूर्य प्रकाश, पानी शामिल हैं। जबकि एक गैर-नवीकरणीय\n  संसाधन की मात्रा सीमित होती है। इन संसाधनों में कोयला और प्राकृतिक गैस आते हैं।\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eसंसाधन की परिभाषा\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  संसाधन वह है जो हमारे जीवन में मूल्य जोड़ता है। हवा, पानी, भोजन, पौधे, जानवर,\n  खनिज, धातु और बाकी सब कुछ जो प्रकृति में मौजूद है। उसे संसाधन कहते है। ऐसे\n  प्रत्येक संसाधन का मूल्य उसकी उपयोगिता और अन्य कारकों पर निर्भर करता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  उदाहरण के लिए सोना, चांदी, तांबा या कांस्य का आर्थिक मूल्य अलग होता है। यानी\n  उन्हें पैसे के लिए बदला जा सकता है। हालाँकि पहाड़, नदियाँ, समुद्र या जंगल भी\n  संसाधन हैं लेकिन उनका आर्थिक मूल्य नहीं है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  व्यवसाय में संसाधनों का उपयोग करके नया उत्पाद बनाया जाता हैं। किसी देश के\n  संसाधन, जैसे कि खनिज संपदा, बुनियादी ढांचा, श्रम शक्ति और सशस्त्र बल, लोगों की\n  भलाई के साथ-साथ आर्थिक और राजनीतिक विकास के लिए उपयोग किए जाते हैं। संसाधन\n  की अवधारणा को अर्थशास्त्र, वाणिज्य,\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण \u003C\/a\u003Eऔर मानव समाज में लागू किया गया है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cb\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eसंसाधनों की विशेषताएं\u003C\/span\u003E\u003C\/b\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003Eपर्यावरण में उपलब्ध कोई भी वस्तु जिसका उपयोग हमारी आवश्यकताओं को पूरा\n  करने के लिए किया जा सकता है और तकनीकी और आर्थिक रूप से स्वीकार्य होता है। उसे संसाधन कहते है। इसकी विशेषताएं इस प्रकार हैं -\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003E1.उपयोगिता \u003C\/b\u003E- उपयोगिता सभी संसाधनों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से\n  एक है। सभी संसाधन उपयोगी होते हैं। उदाहरण के लिए धन एक\u0026nbsp;भौतिक संसाधन है\n  जिसका उपयोग परिवार की प्रत्येक आवश्यकता को पूरा करने के लिए किया जाता\n  है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  यह विनिमय का एक माध्यम होता है। मुख्य रूप से अर्थव्यवस्था में पैसा एक\n  महत्वपूर्ण संसाधन है क्योंकि इसका आदान-प्रदान समुदायों, सेवाओं और प्रत्येक\n  परिवार या व्यक्ति द्वारा उपयोग की जाने वाली यांत्रिक शक्ति के लिए किया जाता\n  है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  मानव संसाधन जैसे \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/who-is-skill.html\"\u003Eकौशल\u003C\/a\u003E, ज्ञान आदि बहुत महत्वपूर्ण हैं। कई बार हम इन संसाधनों से\n  अवगत नहीं होते हैं। संसाधनों का यह समूह हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि\n  वे न केवल वांछित लक्ष्यों को पूरा करने के साधन हैं, बल्कि उनका अच्छी तरह से\n  उपयोग करने से किसी भी लक्ष्य को\u0026nbsp;प्राप्त किया जा सकता\u0026nbsp;हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003E2.सीमितता\u003C\/b\u003E - संसाधन सीमित हैं। समय में सभी के लिए मात्रा में स्थिर एक\n  संसाधन होने की अनूठी विशेषता है। यह सीमित आपूर्ति के साथ\u0026nbsp;निश्चित अवधि के\n  लिए होते\u0026nbsp;है। संसाधन की सीमितता दो प्रकार की होती है, गुणात्मक और\n  मात्रात्मक। मानव संसाधन गुणात्मक रूप से सीमित हैं जबकि गैर-मानव संसाधन\n  मात्रात्मक रूप से सीमित होते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  विभिन्न संसाधन अपनी सीमाओं और सटीकता में भिन्न होते हैं जिसके साथ इन अंतरों को\n  मापा जा सकता है। गुणात्मक रूप से समय एक\u0026nbsp;सीमित संसाधन है, क्योंकि किसी भी\n  दिन में 24 घंटे से अधिक नहीं हो सकते हैं, न ही इनमें से किसी भी घंटे को बचाया\n  जा सकता है। सीमा सभी के लिए समान है, हालांकि इसकी मांग व्यक्तियों के बीच भिन्न\n  होती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  ऊर्जा भी एक सीमित संसाधन है, जो समय-समय पर अलग-अलग होता है क्योंकि उपलब्ध\n  ऊर्जा की मात्रा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में बहुत भिन्न होती है। किसी भी\n  प्रकार का शारीरिक या मानसिक कार्य करने के बाद हमें थकावट महसूस होती है। एक ही\n  काम को कुछ आराम की अवधि के साथ जारी रखने के बाद, हम उस विशेष कार्य को एक\n  निश्चित समय में पूरा करने के लिए ऊर्जावान महसूस करते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  गैर मानव संसाधन सीमित हैं। पैसा सीमित संसाधनों में से एक है और पैसे के बिना\n  चीजों का प्रबंधन करना मुश्किल है। भौतिक वस्तुएं - खाद्यान्न, सब्जियां, अन्य\n  चीजें जिनका हम उपभोग करते हैं, वे महंगी हैं और यही कारण है कि हम इसका सावधानी\n  से उपयोग करते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003E3.\u0026nbsp;परस्पर संबंध -\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eसंसाधनों की परस्पर संबद्धता संसाधनों की\n  महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। मानव के साथ-साथ मानव और गैर-मानव संसाधन\n  परस्पर जुड़े हुए हैं। एक संसाधन का उपयोग दूसरे संसाधन के उपयोग पर निर्भर करता\n  है। संसाधनों के संयोजन के अभाव में अपने लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003E4.\u0026nbsp;संसाधनों की\u0026nbsp;प्रबंधकीय प्रक्रिया\u003C\/b\u003E - संसाधनों का उपयोग उन पर\n  प्रबंधकीय प्रक्रिया लागू करके लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है।\n  प्रबंधकीय प्रक्रिया में तीन चरणों की योजना, नियंत्रण-कार्यान्वयन और\n  मूल्यांकन-मूल्यांकन प्रतिक्रिया शामिल है। यह प्रक्रिया मानव संसाधनों जैसे समय,\n  ऊर्जा और गैर-मानव संसाधनों जैसे धन, भौतिक सामान आदि पर लागू होती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E\n  5.\u0026nbsp;जीवन की गुणवत्ता\u003C\/b\u003E - शायद सभी संसाधनों के उपयोग में सबसे महत्वपूर्ण\n  समानता यह है कि जीवन का पूरा ताना-बाना उनके द्वारा निर्धारित किया जाता है।\n  चाहे कोई इस समग्र परिणाम के प्रति सचेत हो या न हो। निश्चित रूप से यदि किसी\n  व्यक्ति को उसके संसाधनों के प्रबंधन के आधार पर दूसरों द्वारा आंका जाना है, तो\n  उनका उपयोग सावधानीपूर्वक और सोच-समझकर निर्धारित किया जाना चाहिए।\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/8985145980423216737\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/sansadhan-kise-kahate-hain.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/8985145980423216737"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/8985145980423216737"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/sansadhan-kise-kahate-hain.html","title":"संसाधन किसे कहते हैं?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-1570963349916437376"},"published":{"$t":"2022-11-02T08:51:00.008+05:30"},"updated":{"$t":"2023-05-16T22:54:05.320+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"जैव भू रासायनिक चक्र क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eजैव भू-रासायनिक चक्र जीवित जीवों, वायुमंडल, जल निकायों और पृथ्वी की पपड़ी के बीच आवश्यक तत्वों और यौगिकों के संचलन और विनिमय को संदर्भित करता है। इन चक्रों में विभिन्न जैविक, भूगर्भीय और रासायनिक प्रक्रियाएं शामिल हैं जो हमारे ग्रह के पारिस्थितिक तंत्र के समग्र संतुलन और स्थिरता में योगदान करती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकई प्रमुख जैवभूरासायनिक चक्र हैं जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं:\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. कार्बन चक्र: इस चक्र में वातावरण, पौधों (प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से), जानवरों, मिट्टी और समुद्र के बीच कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का आदान-प्रदान शामिल है। यह वातावरण में CO2 की सांद्रता को नियंत्रित करता है, जलवायु और वैश्विक तापमान को प्रभावित करता है।\u003C\/p\u003E\u003Cdiv style=\"text-align: center;\"\u003E\u003Ca href=\"https:\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEg7uoJbVnlwDdfok0ptJBgZZHlH3uYHoP6y2uVYq0flxQMFoT_mNEY6xE5jjD8SHTix3QgF3-Xoj8r8HPhweIO0u-Dalo5wPw9afpzRFxCGOj1L9KIW7GlXPB6a-DftAf1o8SYM_7bd6BjpV5tnamVSAtgkQOp1bgwK_RYBynpUFU6t48UMzMq9XYhL7Q\/s600\/20210802_231232.webp\" style=\"text-align: center;\"\u003E\u003Cimg alt=\"जैव भू रासायनिक चक्र क्या है - what is the biogeochemical cycle\" border=\"0\" data-original-height=\"336\" data-original-width=\"600\" height=\"179\" src=\"https:\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEg7uoJbVnlwDdfok0ptJBgZZHlH3uYHoP6y2uVYq0flxQMFoT_mNEY6xE5jjD8SHTix3QgF3-Xoj8r8HPhweIO0u-Dalo5wPw9afpzRFxCGOj1L9KIW7GlXPB6a-DftAf1o8SYM_7bd6BjpV5tnamVSAtgkQOp1bgwK_RYBynpUFU6t48UMzMq9XYhL7Q\/w320-h179\/20210802_231232.webp\" title=\"जैव भू रासायनिक चक्र क्या है - what is the biogeochemical cycle\" width=\"320\" \/\u003E\u003C\/a\u003E\u003C\/div\u003E\u003Cp\u003E2. नाइट्रोजन चक्र: नाइट्रोजन प्रोटीन और डीएनए का एक अनिवार्य घटक है। इस चक्र में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रोजन निर्धारण के माध्यम से पौधों द्वारा प्रयोग करने योग्य रूप में परिवर्तित करना शामिल है, इसके बाद जीवित जीवों में इसका समावेश, अपघटन, और विमुद्रीकरण के माध्यम से वातावरण में वापस आ जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3. फास्फोरस चक्र: डीएनए, आरएनए और ऊर्जा हस्तांतरण प्रक्रियाओं में फास्फोरस एक प्रमुख तत्व है। यह चट्टानों, मिट्टी, पानी और जीवित जीवों के माध्यम से चक्रित होता है। अपक्षय और अपरदन से चट्टानों से फॉस्फोरस निकलता है, जिसे बाद में पौधों द्वारा ग्रहण किया जाता है और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से पारित किया जाता है। फास्फोरस अपघटन और उत्सर्जन के माध्यम से मिट्टी और पानी में वापस आ जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E4. जल चक्र: जल विज्ञान चक्र के रूप में भी जाना जाता है, इसमें वातावरण, भूमि और पानी के निकायों के बीच पानी की निरंतर गति शामिल होती है। विभिन्न जैविक और भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करते हुए, वाष्पीकरण, संघनन, वर्षा, घुसपैठ और अपवाह जैसी प्रक्रियाएं इस चक्र में योगदान करती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E5. ऑक्सीजन चक्र: ऑक्सीजन पृथ्वी के वायुमंडल का एक महत्वपूर्ण घटक है और श्वसन के लिए महत्वपूर्ण है। यह प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से पौधों द्वारा निर्मित होता है और जीवों द्वारा श्वसन और अन्य चयापचय प्रक्रियाओं के दौरान सेवन किया जाता है। ऑक्सीजन का चक्र कार्बन और नाइट्रोजन चक्रों से जुड़ा हुआ है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eये चक्र आपस में जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। वे पारिस्थितिक तंत्र के कामकाज और पर्यावरण संतुलन के रखरखाव के लिए आवश्यक हैं। मानवीय गतिविधियाँ, जैसे कि जीवाश्म ईंधन को जलाना और वनों की कटाई, इन चक्रों को बाधित कर सकती हैं, जिससे पर्यावरण असंतुलन और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दे पैदा हो सकते हैं। इसलिए, हमारे ग्रह के संसाधनों के सतत प्रबंधन के लिए इन चक्रों को समझना और संरक्षित करना महत्वपूर्ण है।\u003C\/p\u003E\u003Cdiv\u003E\u003Cdiv style=\"text-align: justify;\"\u003E\n  \u003C\/div\u003E\n\u003C\/div\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/1570963349916437376\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/blog-post_785.html#comment-form","title":"0 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"media$thumbnail":{"xmlns$media":"http://search.yahoo.com/mrss/","url":"https:\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEg7uoJbVnlwDdfok0ptJBgZZHlH3uYHoP6y2uVYq0flxQMFoT_mNEY6xE5jjD8SHTix3QgF3-Xoj8r8HPhweIO0u-Dalo5wPw9afpzRFxCGOj1L9KIW7GlXPB6a-DftAf1o8SYM_7bd6BjpV5tnamVSAtgkQOp1bgwK_RYBynpUFU6t48UMzMq9XYhL7Q\/s72-w320-h179-c\/20210802_231232.webp","height":"72","width":"72"},"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-323728395272531987"},"published":{"$t":"2022-10-30T07:50:00.004+05:30"},"updated":{"$t":"2023-12-13T14:07:07.186+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"जनसंख्या घनत्व किसे कहते हैं? "},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eजनसंख्या घनत्व एक निश्चित क्षेत्र में रहने वाले लोगो की संख्या हैं। इसे आम तौर पर प्रति वर्ग किलोमीटर में रहने वाले लोगों की संख्या को मापा जाता है। उच्च जनसंख्या घनत्व अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र में रहने वाले लोगों की बड़ी संख्या को संदर्भित करता है, जबकि कम जनसंख्या घनत्व बड़े क्षेत्र में रहने वाले कम लोगों को संदर्भित करता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजनसंख्या घनत्व एक क्षेत्र की सामाजिक और आर्थिक विशेषताओं के साथ-साथ संसाधनों और सेवाओं की उपलब्धता का निर्धारण करने में एक महत्वपूर्ण कारक हो सकता है। जनसंख्या घनत्व स्थान के आधार पर भिन्न होती हैं। भारत मे सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व बिहार मे हैं जबकि केंदशासित प्रदेशों मे दिल्ली मे सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/323728395272531987\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/jansankhya-ghanatv.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/323728395272531987"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/323728395272531987"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/jansankhya-ghanatv.html","title":"जनसंख्या घनत्व किसे कहते हैं? 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प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं। जिसमें पेड़-पौधे, झाड़ियाँ, घास आदि हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्राकृतिक वनस्पति धरातल की बनावट, जलवायु की दशाओं, अपवाह तथा मिट्टी के गहनतम रूप से प्रभावित होती है। प्रकृति ने भारत को विविध प्रकार की वनस्पति प्रदान कर अमूल्य वरदान दिया है, भारत में पेड़-पौधे की लगभग 47,000 प्रजातियाँ पाई जाती है जिनमें से 35 प्रतिशत प्रजातियाँ भारतीय है जो विश्व में और कहीं नहीं पाई जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभारत के क्षेत्रफल को देखते हुए यहाँ पाए जाने वाले पेड़-पौधों की किस्मों की यह संख्या बहुत अधिक है। हमारे देश की प्राकृतिक वनस्पति में काफी विविधता पाई जाती है। कहीं सदाहरित वन हैं तो कहीं कटीली झाड़ियाँ पाई जाती हैं, कहीं फूलों वाले पौधे देखने को मिलते हैं तो कहीं बिना फलों वाले पौधे हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयहाँ फर्न, शैवाल, कवक तथा बिना फूलवाले पौधे भी पाए जाते हैं, वनस्पति की यह विविधता देश के विविध धरातलीय स्वरूप, जलवायु, मिट्टी तथा अपवाह तंत्र की विविधता के कारण है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक वनस्पति का वर्गीकरण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eप्राकृतिक वनस्पति को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया गया है\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. वन\u003C\/b\u003E - जिन क्षेत्रों में घास तथा झाड़ियों की तुलना में वृक्षों तथा पौधों की प्रधानता होती है, उन्हें वन कहते हैं, यह 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले भाग में उगते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. झाड़ियाँ\u003C\/b\u003E - जिन भागों में वर्षा 100 से.मी. से कम होती है, वहाँ जल की कमी के कारण वृक्ष न तो अधिक ऊँचे होते हैं और न अधिक हरे-भरे, इनकी ऊँचाई सामान्यतया 6 से 10 मीटर तक होती है, इनमें कांटे पाए जाते हैं, इस तरह की वनस्पति पंजाब, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश तथा दक्षिण के पठार के शुष्क भागों में पाई जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. घास-भूमियाँ\u003C\/b\u003E– जिन क्षेत्रों में शुष्क ऋतु की अवधि ढाई महीने से अधिक होती है वहाँ वृक्षों का स्थान घास ले लेती है। वर्षा की कमी से इन क्षेत्रों में वृक्षों की अपेक्षा घास की प्रधानता पाई जाती है। इन पर ज्यादतर \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/blog-post_33.html\"\u003Eकृषि\u003C\/a\u003E कार्य किया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eवनस्पति के प्रकार\u0026nbsp;\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eभारत में मुख्यतः छः प्रकार के वन पाए जाते हैं-\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eउष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वनस्पति\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eउष्ण कटिबन्धीय आर्द्रमानसूनी या पतझड़ वाले वन\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eउष्ण कटिबन्धीय शुष्क मानूसनी वनस्पति\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eमरूस्थलीय और अर्ध- मरूस्थलीय कटीले वनस्पति\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eज्वारीय अथवा डेल्टाई वनस्पति\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eपर्वतीय वनस्पति अब हम इन पर विस्तार से चर्चा करेंगे\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E\u003Cb\u003E1. उष्ण कटिबन्धीय सदाबहार वन\u003C\/b\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eइन वनों को विषुवत रेखीय उष्ण व आर्द्र वन अथवा कठोर लकड़ी के सदापर्णी वन या उष्ण कटिबन्धीय वन भी कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eविस्तार एवं क्षेत्र\u003C\/b\u003E - ये वन 10° उत्तरी अक्षांश से 10° दक्षिणी अक्षांश के मध्य एक पेटी के रूप में संपूर्ण विश्व में फैले हैं। भारतवर्ष में इन वनों का विस्तार पूर्वी हिमालय प्रदेश, असम, मेघालय, तराई प्रदेश, पश्चिमी घाट एवं अंडमान निकोबार द्वीप समूहों में मिलते हैं। इनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है-\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eजिन क्षेत्रों में औसत वार्षिक तापमान 27° से. ग्रे और औसत वार्षिक वर्षा 200 से.मी. तथा इससे अधिक होती है उन्हीं क्षेत्रों में ये वन पाए जाते हैं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eवर्षा की अधिकता के कारण ये वन सदैव हरे-भरे बने रहते हैं। पतझड़ कभी भी एक साथ नहीं होता।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eये वन बहुत सघन होते हैं। यहाँ वृक्षों के नीचे अनेक छोटे-छोटे वृक्ष, झाड़ियाँ और लताएँ उगी रहती है, अतः वे बहुत ही दुर्गम होते हैं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eएक ही स्थान पर एक प्रकार के अनेक वृक्ष बहुत कम मिलते हैं ।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eवृक्षों की ऊँचाई 60 से 100 मीटर तक होती है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eवृक्ष एक-दूसरे के निकट घने झुरमुटों में मिलते हैं। लताएँ एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक फैल जाती है, जिससे नीचे भूमि तक सूर्य का प्रकाश नहीं पहुँच पाता है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003E\u0026nbsp;इन वनों में जंगली जानवर बहुत मिलते हैं।\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रमुख वृक्ष–\u003C\/b\u003E एबोनी, महोगनी, आबनूस, रबर, बाँस, बेंत, ताड़, नारियल, सिनकोना, चंदन व लौह-काष्ठ आदि।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eआर्थिक महत्व\u003C\/b\u003E- ये वन आर्थिक दृष्टि से उतने महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि,\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eलकड़ी कठोर तथा अनुपयोगी होती है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eसघन वन होने से यातायात अनुपयोगी होती है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eएक ही स्थान पर एक प्रकार के वृक्ष बड़ी संख्या में उपलब्ध नहीं होते हैं । अतः एक प्रकार की लकड़ी एकत्रित करना कठिन है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eभूमि दलदली तथा उबड़-खाबड़ है, जिससे परिवहन साधनों का विकास नहीं हुआ।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eजलवायु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E2. उष्ण कटिबंधीय आर्द्र मानसूनी अथवा पतझड़ वाले वन\u003C\/b\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eये चौड़ी पत्ती वाले वन शुष्क ऋतु में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, इसलिए इन्हें पतझड़ या पर्णपाती वन कहते हैं। इन वनों का विस्तार मानसूनी प्रदेशों में अधिक होता है, इसलिए इन्हें मानसूनी वन कहते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eविस्तार एवं क्षेत्र\u003C\/b\u003E - ये वन उन प्रदेशों में पाए जाते हैं, जहाँ वर्षा की मात्रा 100 से 200 से.मी. तथा औसत तापमान 25° से.ग्रे. के लगभग रहता है। ये वन मुख्यतः उप हिमालय प्रदेश, पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल एवं दक्षिण पठार के उत्तरी–पूर्वी भाग में अधिक फैले हुए हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदूसरे शब्दों में इसका विस्तार मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडू आन्ध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश में पाया जाता है। इनकी प्रमख विशेषताएँ निम्नलिखित है-\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eये वन सदाबहार वनों की भाँति अधिक सघन नहीं होते हैं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eआर्द्रता की कमी के कारण इन वृक्षों की ऊँचाई 30 से 50 मीटर तक ही होती है।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eशुष्क ऋतु में ये वृक्ष सभी पत्तियाँ एक साथ गिरा देते हैं, जिससे वाष्पीकरण कम होता है और शुष्कता का सामना ये आसानी कर लेते हैं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eआर्थिक दृष्टि से उपयोगी वृक्ष होते हैं।\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रमुख वृक्ष\u003C\/b\u003E— यहाँ के मुख्य वृक्ष साल, सागौन, साखू, शीशम, चंदन, कुसुम, पलास, बहेडा, आँवला, बाँस, शहतूत, गूलर, महुआ और हल्दू आदि है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eआर्थिक महत्व\u003C\/b\u003E - आर्थिक दृष्टि से ये वन अधिक उपयोगी है -\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003E\u0026nbsp;वनों से आर्थिक दृष्टि से उपयोगी लकड़ी उपलब्ध होती है। जैसे- सागौन, शीशम, साल, बीजा आदि।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eएक स्थान पर ही एक ही प्रकार के बहुत से वृक्ष मिलते हैं जिससे लकड़ी एकत्रित करना सरल होता है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eसघन वन होने के कारण परिवहन साधनों का विकास कम हुआ है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों से अनेक प्रकार के उपयोगी फल, गोंद, बीज आदि प्राप्त होते हैं।\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E3. उष्ण कटिबन्धीय शुष्क मानसूनी वन\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eये वन मुख्यतः उन भागों में पाए जाते हैं, जहाँ वर्षा 50 से 100 सेमी तक होती है। सामान्यतः ये वन आर्द्र मानसूनी वनों के पश्चिम की ओर पाए जाते हैं, क्योंकि हमारे देश में वर्षा की मात्रा पूरब से पश्चिम की ओर कम हो जाती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअतः इन वनों का विस्तार दक्षिणी तथा पश्चिमी उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पूर्वी राजस्थान, पश्चिम मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश तथा कर्नाटक के अधिकांश भागों में पाया जाता है। इन वनों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित है\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eवर्षा की कमी के कारण इन वृक्षों की ऊँचाई कम होती है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वृक्षों की जड़ें लंबी, पत्तियाँ छोटी, चिकनी तथा रोएंदार होती है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वृक्षों के तनों पर मोटी, खुरदरी छाल होती है, जिससे वृक्ष तीव्र वाष्पीकरण से बच सकें।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों के वृक्ष ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ ही अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, ताकि शुष्क ग्रीष्म ऋतु का सामना किया जा सके।\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रमुख वृक्ष\u003C\/b\u003E- शीशम, हल्दू, सिरस, महुआ, आम, पीपल, नीम, बरगद तथा जामुन आदि।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eआर्थिक महत्व\u003C\/b\u003E - ये वन आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइन वनों की भूमि कृषि योग्य होती है, अतः कृषि कार्य करने के लिए वनों की भूमि को साफ कर दिया गया है। यही कारण है कि ये वन विस्तृत रूप से किसी भी क्षेत्र में नहीं पाए जाते।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eपंजाब व हरियाणा में तो 9 प्रतिशत से भी कम भूमि पर यह वन शेष रह गए हैं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eसघन वन होने के कारण इस क्षेत्र में परिवहन साधनों का विकास कम हुआ है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों की लकड़ी फर्नीचर बनाने के लिए उपयोगी\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों से अनेक प्रकार की उपयोगी कंदमूल प्राप्त होते हैं\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E4. मरूस्थलीय व अर्द्ध मरूस्थलीय कंटीले वन\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजिन भागों में वर्षा की मात्रा 25 सेमी है, वहाँ मरूस्थलीय वन तथा जहाँ वर्षा 25 से 50 से.मी. तक होती है वहाँ अर्द्ध मरूस्थलीय वन पाए जाते हैं। ये वन मुख्यतः राजस्थान, दक्षिणी हरियाणा, पश्चिमी पंजाब, उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडू कम होती हैं। व कर्नाटक के शुष्क भागों में पाए जाते हैं। इन वनों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eवर्षा की कमी के कारण इन वनों में छोटे-छोटे कांटेदार वृक्ष तथा झाड़ियाँ ही पैदा होती है।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eयहाँ की वनस्पति आर्द्रता की कमी को अन्य प्रकार से पूरा करती है।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों में वृक्ष छोटे और दूर-दूर होते हैं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eयहाँ के वृक्ष लंबी और मोटी जड़ों वाले होते हैं, जिससे वे भूगर्भ से जल प्राप्त करते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों के कुछ वृक्षों की छाल व पत्ते मोटे होते हैं, जिनसे उनकी भीतरी नमी अधिक नष्ट नहीं हो पाती। अधिकांश वृक्ष और झाड़ियों पर पत्ते कम होते हैं, परंतु वे कांटेदार होते हैं। जिससे पशु उनको हानि नहीं पहुँचा सकते।\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रमुख वृक्ष\u003C\/b\u003E - बेर, बबूल, नागफनी, झाउ, खजूर, कीकर, खैर, रामबाँस व करील यहाँ के प्रमुख है। यहाँ कैक्टस की प्रधानता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eआर्थिक महत्व\u003C\/b\u003E - 1. इन वनों में इमारती लकड़ी का अभाव है, किन्तु ईंधन के लिए पर्याप्त लकड़ी मिल जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. यहाँ खैर, बबूल आदि वृक्षों से उपयोगी छाल और बबूल से इमारती लकड़ी प्राप्त होती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E5. ज्वारीय अथवा डेल्टाई वन\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eसमुद्र तट से समीप नदियों के डेल्टाई भागों में इस प्रकार के वन मिलते हैं। डेल्टाई भूमि नीची और समतल होती है। ज्वार के समय डेल्टाओं के नीच के भागों में समुद्र का नमकीन पानी भर जाता है, इस कारण ये भाग सदैव दलदली होते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइन दलदली भागों में घने जंगल पाए जाते हैं। यहाँ वृक्ष सदैव हरे-भरे रहते हैं और ऊँचाई 30 मीटर के लगभग होती है, गंगा और ब्रम्हापुत्र के डेल्टाओं में सुंदरी नामक वृक्ष अधिक पाया जाता है, इसलिए इनको यहाँ सुंदर वन कहा जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमहानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टाओं में भी इस प्रकार के वन मिलते हैं। इन वनों की विशेषताएँ निम्नलिखित\u003C\/p\u003E\u003Cdiv style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eये वन सदैव हरे-भरे रहते हैं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eये वन सघन एवं दुर्गम होते हैं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों के वृक्षों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अधिक नमी के कारण जड़ें भूमि के अंदर न जाकर भूमि के बाहर निकली होती है।\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003C\/div\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रमुख वृक्ष\u003C\/b\u003E - मैनग्रोव, गारने, ताड़, कैसूरिया, नारियल, बेंत, सुंदरी तथा केवड़ा प्रमुख वृक्ष हैं। कहीं-कहीं पतझड़ व सदाबहार जाति के वृक्ष भी मिलते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eआर्थिक महत्व\u003C\/b\u003E - 1. इन वनों से मजबूत व कठोर लकड़ी मिलती है जो जलाने के काम आती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. इन वनों की लकड़ी फर्नीचर बनाने के लिए उपयुक्त है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E6. पर्वतीय वन\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eये वन हिमालय के ऊँचे ढालों पर मिलते हैं । हिमालय की विभिन्न ऊँचाईयों पर तापमान और वर्षा में बड़ा अंतर रहता है । इस अंतर के अनुसार ही भिन्न-भिन्न ऊँचाईयों पर भिन्न-भिन्न प्रकार की वनस्पति पैदा होती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहिमालय के पूर्वी भाग, पश्चिमी हिमालय की अपेक्षा अधिक वर्षा प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि पूर्वी हिमालय पर अपेक्षाकृत सघन एवं विविध प्रकार की वनस्पति मिलती है। विभिन्नता के आधार पर हिमालय की वनस्पति का अध्ययन दो भागों में रखकर किया जा सकता है\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E1. पूर्वी हिमालय के वन\u003C\/span\u003E\u003C\/b\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपूर्वी हिमालय में देश के उत्तर-पूर्वी राज्य के पर्वतीय भाग सम्मिलित हैं। यहाँ वार्षिक वर्षा का औसत 200 से.मी. से अधिक रहता है। पूर्वी हिमालय में ऊँचाई के अनुसार वनस्पति में विभिन्नता निम्न प्रकार से मिलती है -\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. 1,200 मीटर की ऊँचाई तक घास, छोटे-छोटे वृक्ष तथा झाड़ियों की अधिकता मिलती है। साल, शीशम, खैर, दिलेनिया आदि उष्ण कटिबंधीय वृक्ष यहाँ की प्रमुख वनस्पति है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. 1,200 मीटर से 2,400 मीटर तक की ऊँचाई पर शीत कटिबंध सदाबहार वन मिलते हैं। ओक, बर्च, लारेल तथा एल्डर इस क्षेत्र के प्रमुख वृक्ष हैं । मैपिल,\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3. 2,400 मीटर से 3,600 मीटर तक ऊँचाई वाले पर्वतीय क्षेत्र शीत- शीतोष्ण कटिबंधीय वन मिलते हैं। इनमें पाइन, फर, स्प्रूस तथा देवदार प्रमुख वृक्ष हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E4. 3,600 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले भागों में एल्पाइन वनस्पति की प्रमुखता है जिनमें विलोफर, फर, जुनीफर, रोडेडोन्ड्रस के बौने तथा लाइकेन नामक काई व छोटी-छोटी घासें सर्वप्रमुख है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E5. 4,500 मीटर ऊँचाई पर टुण्ड्रा वनस्पति मिलती है। जिसमें काई व लिचेन नामक घास उगती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E6. 6,000 मीटर की ऊँचाई से ऊपर सदैव हिम जमा रहता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E2. पश्चिम हिमालय के वन\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपश्चिम हिमालय की वनस्पति भी पूर्वी हिमालय की वनस्पति की भाँति ऊँचाई के साथ बदलती जाती है। लेकिन पूर्वी हिमालय की अपेक्षा पश्चिम हिमालय की वनस्पति कम सघन है, क्योंकि यहाँ पूर्वी हिमालय की अपेक्षा कम वर्षा होती है। यही कारण है कि सघनता के कम होने के साथ-साथ यहाँ के वृक्षों की ऊँचाई भी अपेक्षाकृत कम है। इन वनों की विशेषताएँ हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. इन वनों में विभिन्न प्रकार के वृक्ष मिलते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. बहुत अधिक ऊँचाई पर होने के कारण इनसे लकड़ी प्राप्त करना कठिन होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eआर्थिक महत्व\u003C\/b\u003E- वे वन आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों में बहुमूल्य इमारती लकड़ी मिलती है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों पर कई उद्योग निर्भर है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eइन वनों से कागज - लुगदी का निर्माण होता है।\u003C\/li\u003E\u003C\/ul\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eवनों का प्रशासकीय वर्गीकरण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eप्रशासनिक दृष्टि से वनों को निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बाँटा गया है रोक लगी हुई होती है, ऐसा भूमि के कटाव तथा बाढ़ों को रखने के लिए किया जाता है। इन वनों के अंतर्गत 52.7 प्रतिशत वन क्षेत्र आता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. आरक्षित वन\u003C\/b\u003E– इन वनों में वृक्षों को काटने और पशुओं के चराने पर सरकार की ओर से पूरी तरह रोकने तथा जलवायु एवं पर्यावरण संतुलन को बनाए\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. रक्षित वन\u003C\/b\u003E– ये वन भी सरकारी होते हैं, किन्तु जनता को इन वनों में पशुओं को चराने एवं लकड़ी काटने की सुविधा दी जाती है। इन वनों के अंतर्गत 29 प्रतिशत वन क्षेत्र आते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. अवर्गीकृत वन\u003C\/b\u003E– इन वनों में लकड़ी काटने और पशुओं के चराने पर कोई प्रतिबंध नहीं होता है। ये सभी के लिए खुले होते हैं इनका क्षेत्र 18.3 प्रतिशत है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eवनों के स्वामित्व के आधार पर वर्गीकरण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. राजकीय वन\u003C\/b\u003E– यह वन पूर्णतः सरकारी नियंत्रण में होते हैं, कुल वनों का 93.8 प्रतिशत क्षेत्र इन वनों के अंतर्गत आते हैं ।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. सामुदायिक वन\u003C\/b\u003E - इन वनों पर जिला परिक्षेत्र का स्वामित्व होता है। ऐसे वनों का क्षेत्रफल कुल वन क्षेत्रफल का 4.9 प्रतिशत है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. निजी वन\u003C\/b\u003E- इन वनों पर व्यक्तिगत लोगों का स्वामित्व होता है। कुल वन क्षेत्र का 1.3 प्रतिशत भाग इन वनों के अंतर्गत आता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eभारत में वनों का वितरण\u003C\/span\u003E\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eभारत में लगभग 752.3 लाख हेक्टेयर भूमि पर वनों का विस्तार है, जो प्रति व्यक्ति वनों का औसत देखें तो मात्र 0.2 हेक्टेयर आता है। भारत में वनों का वितरण असमान रूप से हैं, जिन्हें चार भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. पर्याप्त वन भूमि वाले राज्य\u003C\/b\u003E- इसके अंतर्गत वह राज्य आते हैं जहाँ कुल भूमि का 50 प्रतिशत से अधिक भाग वनों का है। इसमें अंडमान निकोबार द्वीप, मणिपुर, अरूणाचल, त्रिपुरा, मिजोरम और उत्तरांचल आते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. आवश्यकता के अनुरूप वन वाले राज्य\u003C\/b\u003E- पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने के लिए कम से कम 30 प्रतिशत भूमि पर वनों का होना आवश्यक होता है, भारत में 30 से 50 प्रतिशत वन भूमि वाले राज्यों में छत्तीसगढ़, मेघालय, दादर और नागर हवेली,\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/blog-post_3.html\"\u003Eअसम\u003C\/a\u003E, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम तथा मध्यप्रदेश आते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. आवश्यकता से कम वन वाले राज्य\u003C\/b\u003E - कई ऐसे राज्य है जहाँ बीस प्रतिशत से तीस प्रतिशत भूमि पर ही वन है, जिनमें केरल, गोआ, दमन द्वीप, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक आते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E4. अल्पवन भूमि वाले राज्य\u003C\/b\u003E- इसमें वह राज्य आतें हैं जहाँ वन बीस प्रतिशत से भी कम है, उत्तरप्रदेश, नागालैण्ड,\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/tamil-nadu-ki-rajdhani-kya-hai.html\"\u003Eतमिलनाडु\u003C\/a\u003E, बिहार, गुजरात, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर, राजस्थान और हरियाणा ऐसे ही राज्य है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदेश के 50 प्रतिशत वन प्रायद्वीपीय पठार और पहाड़ियों में बीस प्रतिशत हिमालय पर्वतीय प्रदेश में बारह प्रतिशत पूर्वी घाट और तटीय प्रदेश में 10.5 प्रतिशत पश्चिमी घाट तथा तटीय प्रदेश में 7.5 प्रतिशत उत्तरी मैदान में पाए जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eछत्तीसगढ़ में प्राकृतिक वनस्पति\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eछत्तीसगढ़ अंचल वनों की दृष्टि से समृद्ध प्रदेश माना जाता है, इसका 46 प्रतिशत भाग वनों से आच्छादित है। बस्तर, सरगुजा, रायगढ़, रायपुर और बिलासपुर जिले में वन संपदा भरपूर है। यहाँ के वनों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. आरक्षित वन\u003C\/b\u003E - इन वनों में मवेशियों को चराना मना होता है, छत्तीसगढ़ का कुल वन क्षेत्र का 38. 67 प्रतिशत आरक्षित है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. संरक्षित वन\u003C\/b\u003E - इन वनों में निकटवर्ती अथवा स्थानीय निवासियों को आवश्यकतानुसार लकड़ी काटने तथा मवेशी चराने की सुविधा नियंत्रित रूप से दी जाती है, प्रदेश का कुल 50.70 प्रतिशत भाग संरक्षित वनों का है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. अवर्गीकृत वन\u003C\/b\u003E- आरक्षित तथा संरक्षित वनों के अतिरिक्त शेष वन अवर्गीकृत है, जहाँ मवेशी स्वतंत्रतापूर्वक चराए जाते हैं, यह प्रदेश के कुल वन का 10.63 प्रतिशत भाग है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eछत्तीसगढ़ राज्य में साल के वृक्ष बहुत अधिक पाए जाते हैं जो पूरे देश में प्रसिद्ध है, इसके अतिरिक्त और भी कई प्रकार के मिश्रित वनों की प्रजातियाँ हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eछत्तीसगढ़ में वन लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार से रोजगार उपलब्ध कराने का प्रमुख स्रोत है। यहाँ के वनों में प्रमुखतः निम्न वृक्षों की प्रजातियाँ पाई जाती है -\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. साल\u003C\/b\u003E - साल के वन बस्तर में पाये जाते है, साल की लकड़ी का उपयोग भी इमारती लकड़ी तथा रेल्वे स्लीपर बनाने में होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. सागौन\u003C\/b\u003E- इसका उपयोग भी इमारती लकड़ी के रूप में होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. बाँस\u003C\/b\u003E - छत्तीसगढ़ के वन बाँस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है । बाँस की लुगदी से कागज बनाया जाता है। छत्तीसगढ़ के कमार जन-जाति के लोगों का जीवन बाँस के वनों पर ही आश्रित है, ये लोग बाँस के बर्तन, टोकरी और सजावटी वस्तुएँ बनाकर अपना जीवन यापन करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E4. तेन्दूपत्ता\u003C\/b\u003E - तेन्दूपत्ता छत्तीसगढ़ की प्रमुख उपज है जो यहाँ के बीड़ी उद्योग का आधार है। इसके अतिरिक्त यहाँ साजा, हर्रा, कर्रा, अर्जुन, महुआ, आँवला, शीशम, खैर, हल्दू, कुसुम, चार, कहवा, तेन्दू आदि के वृक्ष भी मिलते हैं। यहाँ की गौण उपजों में साल, बीज, आँवला, हर्रा, कोसम, बहेड़ा, आम, जामुन, सीताफल, बेर, भिलावा, सिंघाड़ा, कत्था, गोंद, शहद तथा मोम व रेशम आदि है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/755385948890520252\/comments\/default","title":"Post 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"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/15517691135806317871"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEjeVgKQytCUGzVtHR8Wy4zFDDEV9IeK7YK1RjUaNewWzYR-VSYmozeVzsKlM6CiXbKnC2vg_-gBK1BsfaiXZofGleBDezmhcXE5V_fzKgIxC2wQhCpIb_5Kt_CS3DnMdA\/s220\/26cb1c537c21f79a953214103b93c686.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-3980810973464445150"},"published":{"$t":"2022-09-18T21:03:00.005+05:30"},"updated":{"$t":"2023-05-20T23:18:14.339+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"जैव विविधता का संरक्षण क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eप्राकृतिक वनस्पति किसी भी क्षेत्र के धरातल का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो वन, घास एवं झाड़ियों के रूप में पाए जाते हैं किन्तु इसमें वनों का विशेष महत्व है। आदिकाल से वनों का मानव के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयह हमारी राष्ट्रीय संपदा है, वस्तुतः यह हमारे लिए प्रकृति का वरदान है। भारत में प्राचीन काल से ही वनों की संस्कृति रही है, पेड़ों को वन देवता के रूप में पूजा करने का विधान रहा है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपेड़ लगाना सदैव बड़ा धार्मिक कृत्य समझा गया है क्योंकि वनों से ही क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है इसलिए प्राचीन समय में हमारे देश में वनों की प्रचुरता थी किन्तु सभ्यता के विकास के साथ मानव ने \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/blog-post_33.html\"\u003Eकृषि\u003C\/a\u003E, परिवहन के साधनों, उद्योग धंधों एवं बस्तियों के लिए वनों का दोहन आरंभ कर वनों को नष्ट करना शुरू कर दिया है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eवनों के विनाश के कारण\u0026nbsp;\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवनों के विनाश के कई कारण हैं जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. कृषि कार्य के लिए\u003C\/b\u003E- देश में लगातार जनसंख्या में वृद्धि होती जा रही है जिससे कृषि उत्पादन में भी वृद्धि की जरूरत बढ़ती जा रही है अतः खाद्य की पूर्ति हेतु वनों की कटाई कर उसे कृषि योग्य भूमि में परिवर्तित किया जा रहा है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. रेल मार्ग बनाने के लिए\u003C\/b\u003E - ब्रिटिशकाल में रेल मार्गों के निर्माण हेतु लकड़ी की स्लीपर बनाए जाते थे किन्तु अब रेलवे बोर्ड ने लकड़ी के स्थान पर कांक्रीट के स्लीपरों का प्रयोग करना शुरू कर दिया है जिससे वनों का विनाश कम हुआ है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. प्राकृतिक विनाश\u003C\/b\u003E- वर्षा काल में अधिक बाढ़ होने से भूमि के कटाव के कारण वृक्षों का विनाश होता है। कई बार वृक्षों में कीड़े आदि लगने एवं दावाग्नि ( जंगल की आग ) फैलने के कारण भी वनों का विनाश होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E4. अनियंत्रित चराई व्यवस्था\u003C\/b\u003E - वन प्रदेशों में ग्रामीणों द्वारा पशुओं की अनियंत्रित चराई के कारण भी वनों का विनाश होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E5. जलाऊ लकड़ी की प्राप्ति हेतु\u003C\/b\u003E- जलाऊ लकड़ी की प्राप्ति हेतु भी वनों की कटाई करने के कारण वनों की संख्या की कमी आती जा रही है। इस प्रकार से वनों का निरंतर विनाश होता जा रहा है, जिसके अनेक दुष्प्रभाव होते हैं, जैसे वर्षा की कमी, शुष्क जलवायु पशुओं के लिए चारे की कमी, भूमि क्षरण की गति तेज हो जाती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअतः वनों की कटाई रोकना, वृक्षारोपण करना वर्तमान मे हमारे लिए अत्यंत आवश्यक हो गया है क्योंकि वन हमारे जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है उनसे हमें कई प्रकार के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं, जो निम्नानुसार है\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E\u0026nbsp;वनों से होने वाले प्रत्यक्ष लाभ\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. वनों से प्राप्त उपज\u003C\/b\u003E - वन से प्राप्त होने वाली प्रमुख उपज लकड़ी है, वनों से प्राप्त होने वाली आय का 75% भाग लकड़ियों से प्राप्त होता है- सागौन, चीड़, देवदार, शीशम, साल, पाइन आदि वृक्षों से उत्तम कठोर एवं टिकाऊ लकड़ी प्राप्त होती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजिन्हें अनेक प्रकार के सुन्दर, कलात्मक और टिकाऊ फर्नीचर बनाया जाता है, चंदन के वृक्ष की लकड़ी से सुगंधित तेल निकाला जाता है एवं सुंदरी वृक्षों की लकड़ी से टिकाऊ और मजबूत नावें बनाई जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. गौण उपज\u003C\/b\u003E - वनों से हमें कई प्रकार के उपयोगी पदार्थ मिलते हैं, भारत में 75% लाख़ उत्पन्न किया जाता है, बबूल, चीड़, नीम, पीपल आदि वृक्षों से गोद प्राप्त होता है तथा खैर वृक्ष की लकड़ी को पानी में उबालकर और सुखाकर कत्था प्राप्त किया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. उत्तम चारागाह\u003C\/b\u003E- वनों में उगी हुई हरी घास पशुओं के लिए उत्तम चारागाह है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E4. चमड़ा रंगने तथा पकाने के पदार्थ\u003C\/b\u003E- सुंदरी, खैर, हरड़, बबूल, बहेड़ा आदि वृक्षों की छाले एवं । पत्तियाँ चमड़ा रंगने और साफ करने में सहायक होती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E5. उद्योग धंधे\u003C\/b\u003E- कई प्रकार के उद्योग धंधे भी वनों पर आधारित है, दियासलाई उद्योग, फर्नीचर उद्योग, जड़ी-बूटियाँ एवं सिनकोना आदि औषधि, रबर, रीठा, शहद आदि वनों पर आधारित उद्योग है, जिनसे लाखों लोगों को आजीविका प्राप्त होती है, इसके अलावा जंगली जानवरों से प्राप्त मांस, हड्डी और पंख आदि भी कई प्रकार के उपयोगी होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E6. पर्यटक स्थल\u003C\/b\u003E - वनों की उपयोगिता के प्रति लोगों में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए सरकार कई प्रकार के कार्य कर रही है, वनों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है जो न सिर्फ पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं वरन् राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: x-large;\"\u003Eवनों से होने वाले अप्रत्यक्ष लाभ\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E1. वन जलवायु को प्रभावित करते हैं ये तापमान को नियंत्रित भी करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. मृदा अपरदन को रोकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3. रेल लाइनों के किनारे वृक्षारोपण से धूल व ध्वनि प्रदूषण कम होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E4. वन मरूस्थल के प्रसार को रोकते हैं, वृक्षो से वायु की गति मंद हो जाती है, एवं तेज आँधियों से होने वाली हानि को कम करती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E5. वन देश के प्राकृतिक सौंदर्य में भी वृद्धि करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E6. वनों में रेशम के कीड़े और मधुमक्खी पालने का काम सुविधापूर्वक किया जा सकता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E7. वन अनेक प्रकार के पशु पक्षियों के लिए शरण स्थली होते हैं, मानव इसका शिकार कर भोजन व अन्य सामग्री प्राप्त करते हैं ।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E8. वनों से भूमि में जल का रिसाव अधिक होता है जिससे भूमिगत जल का भंडार बढ़ता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E9 वनों में कृषि की पूरक वस्तुएँ भी उपलब्ध होती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E10. कालिस के अनुसार वृक्ष पर्वतों को थामे रहते हैं, तूफानी वर्षा को नियंत्रित करते हैं। नदियों को अनुशासित रखते हैं। जल प्रपातों को बनाए रखते हैं और पक्षियों का पोषण करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस तरह हम समझ सकते हैं कि वन हमारी राष्ट्रीय सम्पत्ति है, पारिस्थितिक संतुलन एवं प्राकृतिक परितंत्र को बनाए रखने के लिए जहाँ एक ओर वनों का संरक्षण आवश्यक है, वहीं वृक्षारोपण कर वनों के क्षेत्र में वृद्धि\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकरना भी आवश्यक है, वन राष्ट्र की अमूल्य निधि है, यह प्रकृति द्वारा प्रदत्त निःशुल्क उपहारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, पं. जवाहरलाल नेहरू के अनुसार- उगता हुआ वृक्ष प्रगतिशील राष्ट्र का जीवंत प्रतिक है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवन महोत्सव के जनक ऐ. एम. मुंशी के अनुसार- वृक्षों का अर्थ है जल, जल का अर्थ है रोटी और रोटी ही जीवन है।' अतः वनों का संरक्षण आज की परम आवश्यकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवन संरक्षण- वन किसी भी देश के लिए उसके जीवन का आधार है यह एक आपूर्ति संसाधन है जो एक बार कट जाए या समाप्त हो जाए तो फिर उसे उगने में बहुत समय लगता है, पौधों का उगना तथा मिट्टी का बनना बहुत से \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/blog-post_63.html\"\u003Eतत्वों\u003C\/a\u003E का लम्बे काल तक एक साथ अतः प्रक्रिया का अंतिम फल है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअतः इन्हें बहुत ही बुद्धिमानी के साथ उपयोग किया जाना चाहिए । वर्तमान में हमारी सरकार ने भी इस ओर ध्यान दिया है तथा राष्ट्रीय वन नीति की भी घोषणा की है, जिसके तहत भूमि के 33% भाग पर वन होना अनिवार्य है। इस नीति के दो उद्देश्य हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. वन संसाधनों का दीर्घकालीन विकास सुनिश्चित करना।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. निकट भविष्य में निर्माण कार्य हेतु बढ़ती माँग की पूर्ति करना ।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसरकार ने 1998 में नवीन राष्ट्रीय वन नीति लागू की है जिसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. पर्यावरण स्थिरता एवं सुधार।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. वन क्षेत्र के जीव-जन्तु एवं वनस्पति जैसे प्राकृतिक धरोहर की सुरक्षा।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3. मृदा संरक्षण।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E4. बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E5. सामाजिक वानिकी एवं वृक्षारोपण कार्यक्रमों का विस्तार।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस राष्ट्रीय वन नीति को क्रियाशील बनाने के लिए अगस्त 1999 में एक 20 वर्ष की दीर्घ अवधि वाली राष्ट्रीय वानिकी कार्य योजना लागू की गई है जिसका उद्देश्य वनों की कटाई को रोकना एवं देश के एक तिहाई भाग को वृक्षों और वनों से ढकना है। सरकार ने प्रति वर्ष जुलाई, अगस्त माह में वन महोत्सव मनाना आरंभ किया है, जिसके तहत देश के विभिन्न भागों में वृक्ष लगाए जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eथार मरूस्थल के विस्तार को रोकने के लिए पाकिस्तान की सीमा के साथ वृक्ष लगाए गए हैं। एक सामाजिक कार्यक्रम सुंदरलाल बहुगुणा के द्वारा चिपको आंदोलन आरंभ किया गया है, जिसमें वृक्षों की कटाई पर प्रतिबंध लगाया गया। वन संरक्षण हेतु वर्तमान में निम्नलिखित उपाय किए गए हैं—\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. शासन ने राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारणों की स्थापना कर वहाँ पूर्ण संरक्षण प्रदान किया है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2. वनों की अंधाधुंध कटाई पर प्रतिबंध लगाया है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3. वनों के बाहर खाली पड़ी भूमि पर चारागाह विकास तथा ईंधन के लिए रोपण करना आवश्यक है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E4. वन ग्रामों में खेती के उन्नत तरीकों को अपनाना, वन ग्राम एवं वनों के आस-पास के ग्रामों में खेती को उन्नत करके उसके लिए स्थानीय नदी, नालों से सिंचाई की व्यवस्था, चारागाह विकास करना आवश्यक है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E5. वनों में सुरक्षा उपाय अपनाना आवयक ताकि आग लगने जैसी घटनाएँ कम हो सके।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E6. वनों को कीड़े-मकोड़ों एवं बीमारियों से बचाने के लिए रसायनों का उपयोग आवश्यक है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E7. आरा कारखानों में लकड़ी के दुरूपयोग पर प्रतिबंध लगाना।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E8. वनों को सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E9. लकड़ी तथा इसके उत्पादों का अधिकतम उपयोग करना।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E10. लकड़ी की प्रतिस्थानापन्न वस्तुओं की खोज कर लकड़ी पर मानव की निर्भरता को कम किया जाए।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E11. जनता में वनों के संरक्षण की प्रति जागरूकता पैदा करने के कार्यक्रम आयोजित किए जाए।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E12. खेतों में मेड़ तथा खाली भूमि पर सार्वजनिक जल स्रोतों पर ग्रामवासियों द्वारा वृक्षारोपण आदि वन संरक्षण में सहयोग प्रदान करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E13. उपयोगी एवं शीघ्र विकसित होने वाले वृक्षों का रोपण किया जाए।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E14. वन ग्रामों में पशुओं की नस्ल सुधारने तथा पशु शिविरों के माध्यम से गोबर एकत्रित कर सार्वजनिक बायोगैस संयंत्र लगाकर ईंधन की पूर्ति करने एवं पेड़ों की पत्तियों और सूखी टहनियों को उन्नत चूल्हों में ईंधन के रूप में उपयोग लाना था ऊर्जा बचत के लिए अन्य सामान विशेषकर सूर्य ऊर्जा का उपयोग करना ।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E15. नवीन वन संरक्षण नीति बनाई जाई और इसे तोड़ने वाले को कठोर दण्ड दिया जाए।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस तरह हम कह सकते हैं कि वन का संरक्षण देश के विकास, आर्थिक प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि वन देश की समृद्धि का मूलाधार तो है ही पर्यावरण संतुलन स्थापित करने के लिए भी आवश्यक है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eवन्य जीव संरक्षण, वन्य जीव अभयारण्य योजना\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eकिसी क्षेत्र के पौधे एवं जीव-जन्तु परस्पर इतने घुल-मिल जाते हैं तथा एक-दूसरे पर इतने आश्रित हो जाते हैं कि एक के बिना दूसरे के अस्तित्व की कल्पना तक नहीं की जा सकती है। जितनी विविधता हमारे देश की वनस्पति में है उतनी ही विविधता हमारे दश के जीव-जन्तुओं में भी है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदेश में जीव-जन्तुओं की लगभग 75,000 जातियाँ पाई जाती हैं, खारे और ताजे पानी की 2,500 जाति की मछलियाँ पाई जाती है, यहाँ पर लगभग 2,000 प्रकार के पक्षियों की भी जातियाँ हैं। इनके अतिरिक्त उभयचर, सरीसृप, स्तनपायी और छोटे कीट पाए जाते हैं, हमारे देश में मुख्यतः पाए जाने वाली जीव-जन्तु निम्नलिखित हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. हाथी\u003C\/b\u003E– यह स्तनपायी राजसी ठाट-बाट वाला पशु है यह विषुवतीय उष्ण-आर्द्र वनों का जीव है, हाथी हमारे देश में\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/blog-post_3.html\"\u003Eअसम\u003C\/a\u003E, केरल और कर्नाटक के जंगलों में पाए जाते हैं ।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. सिंह\u003C\/b\u003E - शिकारी पशुओं में भारतीय सिंह का विशेष स्थान है जो अफ्रीका और भारत में ही पाया जाता है, सिंह का प्राकृतिक आवास गुजरात में सौराष्ट्र के गिर वनों में है। इस तरह की जलवायु में सिंहों के संरक्षण और संवर्धन के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। सिंह एक राजसी और शक्तिशाली पशु है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. ऊँट और जंगली गधे\u003C\/b\u003E- ऊँट और जंगली गधे गर्म और शुष्क मरूस्थली स्थानों पर ही मिलते हैं, ऊँट थार मरूस्थल में सामान्य रूप से पाया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E4. शेर\u003C\/b\u003E - शेर जंगली पशुओं में सबसे ज्यादा शक्तिशाली पशु है, प्रसिद्ध बंगाल टाइगर तथा प्राकृतिक निवास गंगा के डेल्टा में सुन्दरवन में पाए जाते हैं। टाइगर देश का राष्ट्रीय पशु है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E5. हिरण\u003C\/b\u003E- हिरण भारतीय जीव जगत का सुंदर और कोमल पशु है, भारत में हिरण की अनेक प्रकार की जातियाँ है जिनमें चौसिंघा, काला हिरण, चिकारा, कश्मीरी बारह सिंघा, दलदली मृग, चित्तीदार मृग, कस्तूरी मृग और मूषक मृग उल्लेखनीय है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E6. तामचिता और हिमतेन्दुआ\u003C\/b\u003E- यह हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों में पाए जाते हैं, यह बिल्ली की जाति के जन्तु हैं। इनके अतिरिक्त हिमालय की श्रृंखलाओं में और कई आकर्षक जन्तु रहते हैं जिसमें जंगली और भी कई आकर्षक जन्तु रहते हैं जिनमें जंगली भेड़, पहाड़ी बकरियाँ, साकिन ( लंबे सींग वाली बकरी), टैपीर आदि हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E7. बंदर\u003C\/b\u003E - भारत में बंदरों की अनेक जातियाँ पाई जाती है, लंगुर सामान्य रूप से पाया जाने वाला बंदर है, पूँछ वाला बंदर (मकाक) बड़ा विचित्र जीव है, इसके मुँह पर चारों ओर बाल उगे होते हैं जिससे चेहरे पर एक प्रभामंडल दिखाई देता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E8. पक्षी\u003C\/b\u003E - भारत में कई प्रकार के रंग-बिरंगे पक्षी मिलते हैं जिनमें मोर अत्यन्त आकर्षक पक्षी है, इसे देश का राष्ट्रीय पक्षी होने का गौरव प्राप्त है। हंस, बतख, मैना, टइपा, तोता, कबूतर, बगुले, धनेष (हाईबिल) शकर, खोटा आदि भारत के जंगलों और झीलों में रहने वाले पक्षी हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eवन्य जीवों की दशा में हास के कारण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. लगातार वनों की कटाई\u003C\/b\u003E- बढ़ती जनसंख्या के कारण वनों की अंधाधुंध कटाई से वन्य जीवों के लिए आवास की समस्या उत्पन्न हो गई।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. इलाज की व्यवस्था\u003C\/b\u003E - पशुओं के रहने की जगह गंदी होने पर कई प्रकार के रोग हो जाते हैं। और समय पर उनके समुचित इलाज की व्यवस्था नहीं हो पाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. पौष्टिक चारे का अभाव\u003C\/b\u003E- शाकाहारी पशुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में चारागाह उपलब्ध नहीं हो पाते हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E4. भोजन चक्र में बाधा\u003C\/b\u003E - भोजन चक्र में बाधा आने पर वन्य जीव आबादी की ओर भागने लगते हैं जिससे वन जीव व भोजन दोनों की ही हानि होती है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E\u003Cb\u003Eवन्य जीवों का आर्थिक महत्व\u003C\/b\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण प्रदूषण पर रोक लगाने के लिए वन्यजीवों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि इनके द्वारा पर्यावरण में बहुत से प्रदूषित पदार्थों को नष्ट कर दिया जाता है। वन्य जीवों के आर्थिक महत्व निम्नलिखित हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1. पशुओं तथा वन्य जीवों से प्राप्त मांस, हड्डी, खाल व परत से कई उपयोगी वस्तुओं का निर्माण होता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2 वन्य जीव प्राकृतिक परितन्त्र में सन्तुलन स्थापित करते हैं तथा खाद्य श्रृंखला को नियमित और पूर्ण करते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3. कई वन्य जीव अपघटक का कार्य करते हैं, मृत जीवों के शरीर को लोमड़ी गिद्ध द्वारा नष्ट कर पर्यावरण को दूषित होने से बचाया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E4. मधुमक्ख्यिों द्वारा प्राप्त शहद, रेशम कीट पालन आदि कई वन्य जीव आर्थिक महत्व के लिए पाले जाते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E5. परिवहन व्यवस्था में बैल, ऊँट, घोड़े का अत्यधिक महत्व है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E6. गाय, भैंस, बकरी आदि का दुग्ध उत्पादन में विशेष महत्व है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E\u003Cb\u003Eवन्य जीव संरक्षण\u003C\/b\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u0026nbsp;वन्य प्राणियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है वनों की अंधाधुंध कटाई, पर्यावरण का प्रदूषण है जिनसे देश के कई विशिष्ट प्रकार जीवों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। काला हिरण, सफेद शेर, सिंह आदि कई ऐसे पशु है जिनकी स्थिति समाप्तप्राय - सी होती जा रही है। अतः वन्य जीवों को संरक्षण प्रदान करने के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस संबंध में नवीनतम स्थिति तथा प्रवृत्तियों की जानकारी के लिए पशु-पक्षियों की गणना की जाती है देश में बाघ परियोजना काफी सफल हुई है। वर्तमान में देश में बाघों के लिए 20 प्रतिशत आरक्षित क्षेत्र है। गिरसिंह योजना एशिया में एकमात्र आवास परियोजना है। गैंडो के संरक्षण हेतु असम में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना की गई है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइसके अतिरिक्त घड़ियाल प्रजनन परियोजना, सिंह, तेंदुआ परियोजना, हाथी परियोजना, असम, अरूणाचल, मेघालय में चालू की गई है। मालवा और राजस्थान में पाई जाने वाली सोन चिड़िया के भी विलुप्त हो जाने की आशंका है अतः इसके संरक्षण हेतु भी परियोजना आरंभ की गई है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E\u003Cb\u003Eवन जीव अभ्यारण्य योजना\u003C\/b\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eदेश में जैव की सुरक्षा एवं संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं। इस योजना के अंतर्गत भारत का प्रथम जीवन आरक्षित क्षेत्र जैवमण्डल रिजर्व स्थापित किया गया है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयह कर्नाटक,\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/tamil-nadu-ki-rajdhani-kya-hai.html\"\u003Eतमिलनाडु\u003C\/a\u003E, केरल के सीमावर्ती क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसकी स्थापना 1956 में हुई थी। इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक जन्तु तथा पौधों का संरक्षण अनिवार्य है। यह प्राकृतिक धरोहर भावी पीढ़ियों की है जिसे हमें ज्यों का हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eत्यों उन्हें सौंपता है यहाँ जैव विविधता के रक्षण के लिए 14 आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए गए\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eनीलगिरी नदी के पश्चात् उत्तरांचल के हिमालय क्षेत्र में नन्दा देवी जीवन आरक्षित क्षेत्र 1955 में आरंभ किया गया। इसी वर्ष मेघालय राज्य में भी जैवमंडल स्थापित किया गया।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअण्डमान निकोबार द्वीप समूह में अनेक मिश्रित और विविध प्रकार के जीव-जन्तु पाए जाते हैं। इनके संरक्षण हेतु भी जीव आरक्षित क्षेत्र की स्थापना की गई है। इस योजना में भारत के विविध वनस्पति वाले क्षेत्रों को शामिल किया जा रहा है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवर्तमान में देश में 86 राष्ट्रीय उद्यान, 480 वन्य जीव अभ्यारण्य तथा 200 से अधिक प्राणी उद्यान हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/3980810973464445150\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/what-is-biodiversity-conservation.html#comment-form","title":"0 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"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eएक कवि ने एक बार कहा था। हजारों लोग बिना प्यार के जीते हैं, लेकिन कोई भी पानी के बिना नहीं जी सकता हैं। हम सभी जानते हैं कि पानी जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदुनिया के लगभग 80 प्रतिशत अपशिष्ट जल को ऐसे ही फेंक दिया जाता है। जो बड़े पैमाने पर नदियों, \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/what-is-lake-in-hindi.html\"\u003Eझीलों\u003C\/a\u003E और \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/what-is-ocean-in-hindi.html\"\u003Eमहासागरों\u003C\/a\u003E को प्रदूषित करता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल प्रदूषण क्या है\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003Eजल प्रदूषण रसायनों और अपशिस्ट पदार्थो का जल में मिलने से होता है। जो पानी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले तत्व को नुकसान पहुंचते है। मानव स्वास्थ्य और \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u003C\/a\u003E के लिए जल प्रदूषण खतरा पैदा कर सकता है। इसके अतिरिक्त, जल प्रदूषण में विभिन्न मानवीय गतिविधियों के परिणामस्वरूप जल में रसायन शामिल हो सकते हैं। उन रसायनों की कोई भी मात्रा पानी को प्रदूषित करती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजल प्रदूषण तब होता है जब हानिकारक पदार्थ-अक्सर रसायन या सूक्ष्मजीव-धारा,\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/nadi-kise-kahate-hain.html\"\u003E नदी,\u003C\/a\u003E झील, महासागर, जलभृत, या पानी के अन्य शरीर को दूषित करते हैं, पानी की गुणवत्ता को खराब करते हैं और इसे मनुष्यों या पर्यावरण के लिए विषाक्त बनाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजल प्रदूषण की यह व्यापक समस्या हमारे स्वास्थ्य को खतरे में डाल रही है। असुरक्षित पानी हर साल युद्ध और अन्य सभी प्रकार की हिंसा की तुलना में अधिक लोगों की जान लेता है। इस बीच, हमारे पीने योग्य जल स्रोत सीमित हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी में 1 प्रतिशत से भी कम मीठे पानी उपलब्ध है। चुनौतियां 2050 तक और बढ़ेंगी, जब मीठे पानी की वैश्विक मांग अब की तुलना में एक तिहाई अधिक होने की उम्मीद है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहम साफ पानी के खतरे के प्रति निराश नहीं हैं। समस्या को बेहतर ढंग से समझने के लिए और हम इसके बारे में क्या कर सकते हैं, यहां जल प्रदूषण क्या है, इसका क्या कारण है, और हम अपनी सुरक्षा कैसे कर सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल प्रदूषण के कारण क्या है\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजल विशिष्ट रूप से प्रदूषण की चपेट में है। जल को एक सार्वभौमिक विलायक के रूप में जाना जाता है, पानी पृथ्वी पर किसी भी अन्य तरल की तुलना में सबसे अधिक है। यही कारण है कि हमारे पास शानदार नीले झरने हैं। यही कारण है कि पानी इतनी आसानी से प्रदूषित हो जाता है। खेतों, कस्बों और कारखानों से जहरीले पदार्थ आसानी से जल में घुल जाते हैं और उसमें मिल जाते हैं, जिससे जल प्रदूषण होता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल प्रदूषण के प्रकार\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eभूजल\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजब बारिश होती है और पानी का एक भूमिगत भंडार दरारों और छिद्रपूर्ण स्थानों को भरकर पृथ्वी की गहराई तक रिसती है, तो यह भूजल बन जाता है। हमें सबसे कम दिखाई देने वाले लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक हैं। लगभग 40 प्रतिशत पानी पृथ्वी की सतह पर पंप किए गए भूजल पर निर्भर हैं। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के लिए मीठे पानी का एकमात्र स्रोत है। भूजल प्रदूषित हो जाता है जब प्रदूषक-कीटनाशकों और उर्वरकों से लेकर लैंडफिल और सेप्टिक सिस्टम से निकलने वाले कचरे भूजल में मिल जाते हैं, जिससे यह मानव उपयोग के लिए असुरक्षित हो जाता है। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदूषित पदार्थों के भूजल को मुक्त करना मुश्किल या असंभव हो सकता है, साथ ही महंगा भी होता है। एक बार प्रदूषित हो जाने के बाद, भूजल दशकों या हजारों वर्षों तक अनुपयोगी हो सकता है। भूजल प्रदूषण फैला सकता है क्योंकि यह धाराओं, झीलों और महासागरों में रिसता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eसतही जल\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजल पृथ्वी के लगभग 70 प्रतिशत हिस्से को कवर करता हैं। सतही जल वह है जो हमारे महासागरों, झीलों, नदियों और दुनिया के अन्य सभी नीले टुकड़ों को दुनिया के नक्शे पर भर देता है। मीठे पानी के स्रोतों अर्थात समुद्र के अलावा अन्य स्रोत सतही जल हैं। सतही जल घरों तक पहुँचाए जाने वाले पानी का 60 प्रतिशत से अधिक है। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eराष्ट्रीय जल गुणवत्ता सर्वेक्षणों के अनुसार, हमारी लगभग आधी नदियाँ और हमारी एक तिहाई से अधिक झीलें प्रदूषित हो चुकी हैं। यह मछली पकड़ने और पीने के लिए अनुपयुक्त हैं। जिसमें नाइट्रेट और फॉस्फेट शामिल होते हैं, यह मीठे पानी के स्रोतों में प्रमुख प्रकार का प्रदूषक है। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजबकि पौधों और जानवरों को बढ़ने के लिए इन पोषक \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/blog-post_63.html\"\u003Eतत्वों\u003C\/a\u003E की आवश्यकता होती है, वे \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/blog-post_33.html\"\u003Eकृषि\u003C\/a\u003E अपशिष्ट और उर्वरक के कारण एक प्रमुख प्रदूषक बन गए हैं। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eनगर निगम और औद्योगिक अपशिष्ट निर्वहन भी विषाक्त पदार्थों प्रदूषण में योगदान करते हैं। सभी उद्योग और व्यक्ति कचड़े को सीधे जलमार्ग में फेंक देते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eसमुद्र का पानी\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसमुद्र के प्रदूषण का अस्सी प्रतिशत भूमि पर उत्पन्न होता है-चाहे तट के किनारे या दूर। रसायनों, पोषक तत्वों, और भारी धातुओं जैसे प्रदूषकों को खेतों, कारखानों और शहरों से नदियों द्वारा हमारे खाड़ियों और मुहल्लों में ले जाया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवहाँ से ये अपशिष्ट पदार्थ समुद्र की यात्रा करते हैं। इस बीच, समुद्री मलबा विशेष रूप से प्लास्टिक हवा या तूफान के माध्यम से समुद्र में मिल जाते है। समुद्र भी कभी-कभी तेल रिसाव से खराब हो जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमहासागर मानव निर्मित कार्बन उत्सर्जन का एक चौथाई जितना अवशोषित करता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eकृषि\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकृषि क्षेत्र न केवल वैश्विक मीठे पानी के संसाधनों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जिसमें खेती और पशुधन उत्पादन पृथ्वी की सतही जल आपूर्ति का लगभग 70 प्रतिशत उपयोग करता है , बल्कि यह एक गंभीर जल प्रदूषक भी है। दुनिया भर में, कृषि जल क्षरण का प्रमुख कारण है। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकृषि प्रदूषण नदियों और नालों को अधिक प्रदूषित करता है, आर्द्रभूमि, झीलों यह तक मुहल्लों और भूजल को दूषित करने में एक प्रमुख योगदानकर्ता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहर बार जब बारिश होती है, उर्वरक, कीटनाशक, और पशु अपशिष्ट खेतों से हमारे जलमार्गों में पोषक तत्वों और रोगजनकों-जैसे बैक्टीरिया और वायरस पहुंच जाते हैं। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपोषक तत्व प्रदूषण, पानी या हवा में अतिरिक्त नाइट्रोजन और फास्फोरस के कारण, दुनिया भर में पानी की गुणवत्ता के लिए नंबर वन खतरा है और यह शैवाल खिलने का कारण बन सकता है , नीले-हरे शैवाल लोगों और वन्यजीवों के लिए हानिकारक हो सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eअपशिष्ट जल\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयह हमारे सिंक, शावर और शौचालय और वाणिज्यिक, औद्योगिक और कृषि गतिविधियों से आता है। जब वर्षा सड़क लवण, तेल, ग्रीस, रसायन, और मलबे को सतहों से हमारे जलमार्गों में ले जाती है। इससे जल प्रदूषण होता हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदुनिया का 80 प्रतिशत से अधिक अपशिष्ट जल बिना उपचारित या पुन: उपयोग किए पर्यावरण में वापस चला जाता है। कुछ कम विकसित देशों में, यह आंकड़ा 95 प्रतिशत से ऊपर है। संयुक्त राज्य अमेरिका में, अपशिष्ट जल उपचार सुविधाएं प्रति दिन लगभग 34 बिलियन गैलन अपशिष्ट जल को संसाधित करती हैं। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eये सुविधाएं सीवेज में रोगजनकों, फास्फोरस, और नाइट्रोजन जैसे प्रदूषकों की मात्रा को कम करती हैं, साथ ही औद्योगिक कचरे में भारी धातुओं और जहरीले रसायनों को उपचारित जल को वापस जलमार्ग में छोड़ने से पहले कम करती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eतैलीय प्रदूषण\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहमारे समुद्र में तेल और गैसोलीन सहित कई तरल पदार्थ मिल जाते हैं, जो हर दिन लाखों कारों और ट्रकों से टपकता है। इसके अलावा, अनुमानित 1 मिलियन टन तेल का लगभग आधा जो हर साल समुद्र मे मिल जाता है। और इसका मुख्य श्रोत कारखानों, खेतों और शहरों से आता है। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदुनिया भर के समुद्र में तेल के लगभग 10 प्रतिशत शिपिंग उद्योग और अवैध निर्वहन दोनों के माध्यम से होत हैं। तेल भी प्राकृतिक रूप से समुद्र तल के नीचे से रिसाव के रूप में जाना जाने वाले फ्रैक्चर के माध्यम से जारी किया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eरेडियोधर्मी पदार्थ\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eरेडियोधर्मी कचरा वह प्रदूषण है जो पर्यावरण द्वारा स्वाभाविक रूप से जारी किए गए विकिरण से परे विकिरण का उत्सर्जन करता है। यह यूरेनियम खनन, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, और सैन्य हथियारों के उत्पादन और परीक्षण द्वारा उत्पन्न होता है जो अनुसंधान और चिकित्सा के लिए रेडियोधर्मी सामग्री का उपयोग करते हैं। रेडियोधर्मी कचरा पर्यावरण में हजारों वर्षों तक बना रह सकता है, जिससे निपटान एक बड़ी चुनौती बन जाता है। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवाशिंगटन में हनफोर्ड परमाणु हथियार उत्पादन स्थल पर 56 मिलियन गैलन रेडियोधर्मी कचरे की सफाई में 100 अरब डॉलर से अधिक की लागत और 2060 तक चलने की उम्मीद है। आकस्मिक रूप से जारी या अनुचित तरीके से दूषित पदार्थों का निपटान भूजल, सतही जल और समुद्री संसाधनों के लिए खतरा है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल प्रदूषण के प्रभाव क्या हैं\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eमानव स्वास्थ्य पर\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eएक अध्ययन के अनुसार, जल प्रदूषण के कारण 2015 में 1.8 मिलियन लोगों की मौत हुई थी। दूषित पानी आपको बीमार भी कर सकता है। हर साल, असुरक्षित पानी लगभग 1 अरब लोगों को बीमार करता है। और कम आय वाले समुदाय अनुपातहीन रूप से जोखिम में हैं क्योंकि उनके घर अक्सर सबसे अधिक प्रदूषणकारी उद्योगों के सबसे करीब होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजलजनित रोगजनक, रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया और वायरस है। जो दूषित पेयजल को पीने से होता हैं। असुरक्षित पानी से फैलने वाली बीमारियों में हैजा, जिआर्डिया और टाइफाइड शामिल हैं। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयहां तक कि धनी देशों में भी, सीवेज उपचार सुविधाओं के साथ-साथ खेतों और शहरी क्षेत्रों से आकस्मिक या अवैध रिलीज जलमार्गों मे हानिकारक रोगजनकों का योगदान करते हैं। भारत में हजारों लोग हर साल टाइफाइड से बीमार होते है। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eपर्यावरण पर\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eस्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र जानवरों, पौधों, बैक्टीरिया और कवक के लिए अति आवश्यक होता है। ये सभी एक दूसरे के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संबधित हैं। इनमें से किसी भी जीव को नुकसान पहुंचाने से एक श्रृंखला प्रभाव पैदा हो सकता है, जो पूरे जलीय वातावरण को खतरे में डाल सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजब जल प्रदूषण के कारण \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/what-is-lake-in-hindi.html\"\u003Eझील\u003C\/a\u003E या समुद्री वातावरण में शैवाल खिलते हैं, तो नए पोषक तत्वों का प्रसार पौधे और शैवाल के विकास को उत्तेजित करता है। जो बदले में पानी में ऑक्सीजन के स्तर को कम करता है। ऑक्सीजन की कमी से पौधों और जलीय जीवों का दम घुटने लगता है जिससे वह रहने वाले जीवों का खत्मा हो जाता हैं। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eऔद्योगिक और नगरपालिका द्वारा छोड़े गए अपशिष्ट जल जलमार्ग को भी दूषित करते हैं। ये संदूषक जलीय जीवन के लिए जहरीले होते हैं। अक्सर जीव के जीवन काल और पुनरुत्पादन की क्षमता को कम करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल प्रदूषण को रोकने के उपाय\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजल प्रदूषण समस्या के लिए हम सभी कुछ हद तक जवाबदेह हैं। सौभाग्य से, कुछ सरल तरीके हैं जिनसे आप जल प्रदूषण को रोक सकते हैं या कम से कम इसमें अपना योगदान कर सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eआप जहां रहते हैं वहां पानी के अनूठे गुणों के बारे में जानें। आपका पानी कहाँ से आता है? क्या आपके घर के अपशिष्ट जल का उपचार किया जाता है?  क्या आपका क्षेत्र सूखे में है? स्थिति की एक तस्वीर बनाना शुरू करें ताकि आप यह जान सकें कि आपके कार्यों का सबसे अधिक प्रभाव कहाँ पड़ेगा।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपने प्लास्टिक की खपत को कम करें और प्लास्टिक का पुन: उपयोग या पुनर्चक्रण करें।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eनाले में जाने से रोकने के लिए रासायनिक क्लीनर, तेल और गैर-बायोडिग्रेडेबल वस्तुओं का उचित निपटान करें।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपनी कार का रखरखाव करें ताकि उसमें तेल या शीतलक का रिसाव न हो।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपनी पुरानी दवाओं को फ्लश न करें! स्थानीय जलमार्गों में प्रवेश करने से रोकने के लिए उन्हें कूड़ेदान में फेंक दें।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहमारे जल के लिए खड़े होने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक स्वच्छ जल अधिनियम के समर्थन में बोलना है, जिसने पांच दशकों तक प्रदूषकों को जवाबदेह ठहराने में मदद की है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eलेकिन हमें ऐसे नियमों की भी आवश्यकता है जो आधुनिक समय की चुनौतियों के साथ तालमेल बिठाएं, जिनमें माइक्रोप्लास्टिक्स, पीएफएएस , फार्मास्यूटिकल्स और अन्य संदूषक शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसाथ ही, जानें कि आप और आपके आस-पास के लोग नीति निर्माण प्रक्रिया में कैसे शामिल हो सकते हैं। हमारे सार्वजनिक जलमार्ग हम सभी की सेवा करते हैं। हम सभी को यह सोचना चाहिए कि वे कैसे सुरक्षित होगा।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/3059596271490934809\/comments\/default","title":"Post 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href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u003C\/a\u003E के अंतर्गत आते हैं। चाहे वे जमीन पर रहते हों या पानी पर, वे पर्यावरण का\n  हिस्सा हैं। पर्यावरण में हवा, पानी, धूप, पौधे, जानवर आदि भी शामिल हैं। इसके\n  अलावा, पृथ्वी को ब्रह्मांड का एकमात्र ऐसा ग्रह माना जाता है जो जीवन का समर्थन करता है। पर्यावरण को एक कंबल के रूप में समझा\n  जा सकता है जो ऋषि और ध्वनि ग्रह पर जीवन रखता है।\n\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण प्रदूषण के कारण और उपाय\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eरूपरेखा -\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#1\"\u003Eप्रस्तावना \u003C\/a\u003E\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#2\"\u003Eप्रदूषण का अर्थ \u003C\/a\u003E\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#3\"\u003Eप्रदूषण के कारण \u003C\/a\u003E\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#4\"\u003Eवायु प्रदूषण\u003C\/a\u003E \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#5\"\u003Eजल प्रदूषण\u003C\/a\u003E \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#6\"\u003Eरासायनिक प्रदूषण \u003C\/a\u003E\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#7\"\u003Eध्वनि प्रदूषण \u003C\/a\u003E\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#8\"\u003Eपर्यावरण प्रदूषण को रोकने के उपाय\u003C\/a\u003E\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\u003Ca href=\"#9\"\u003Eउपसंहार \u003C\/a\u003E\u003C\/li\u003E\n\u003C\/ol\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 id=\"1\" style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्रस्तावना \u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इस प्रदूषण शब्द से कोई अछूता नहीं है इसकी वजह से आज हमें अनेक प्रकार की\n  बीमारियों से और प्राकृतिक आपदाओं से भी जूझना पड़ रहा है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  विश्व में व्याप्त गंभीर समस्या का नाम ही पर्यावरण प्रदूषण है। मानव का जीवन\n  पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। जहाँ जीवन मरण का प्रश्न है, वहाँ इसे रोकने के लिए\n  प्रयत्न करना चाहिए अन्यथा आगे वाले वर्षों में विषाक्त वातावरण में मानव जाति\n  विनाश निश्चित है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  सुख-सुविधाओं की लालसा से ही मानव आज प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन कर रहा है। बिना\n  सोचे-विचारे उपयोग में लेने से एक समय ऐसा आएगा जब इन वस्तुओं का भण्डार नष्ट हो\n  जावेगा। इसी अविवेकपूर्ण दोहन से ही प्रदूषण की समस्या का जन्म होता है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 id=\"2\" style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्रदूषण का अर्थ\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष  रूप से मानव के स्वास्थ्य और संस्थानों को\n  क्षति पहुँचाने हैं, उन्हें प्रदूषण कहा जाता है। पर्यावरण हमें अनगिनत लाभ देता\n  है जिसे हम जीवन भर चुका नहीं सकते। चूंकि वे जंगल, पेड़, जानवर, पानी और हवा से\n  जुड़े हुए हैं। जंगल और पेड़ हवा को फिल्टर करते हैं और हानिकारक गैसों को\n  अवशोषित करते हैं। पौधे पानी को शुद्ध करते हैं, बाढ़ की संभावना को कम करते हैं,\n  प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 id=\"3\" style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्रदूषण के कारण \u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003Eजनसंख्या वृद्धि ही प्रदूषण का मुख्य कारण है। औद्योगीकरण में प्रगति से\n    कारखानों की संख्या में वृद्धि हुई है। इनसे वातावरण सर्वदा धूलयुक्त रहता है।\n    वातावरण में व्याप्त हानिकारक तत्व स्वस्थ्य पर प्रतिकूल असर डालते हैं। चौबीस\n    घंटों में एक भी पल ऐसा नहीं होता है कि हमें शुद्ध वायु साँस लेने के लिए मिल\n    सके। प्रदूषण का मुख्य कारण सरकार की औद्योगीकरण की नीति है। \u003C\/span\u003E\u003Cbr \/\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cspan\u003Eप्रदूषण के मुख्य कारण निम्नांकित हैं -\u003C\/span\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Ch4 id=\"4\" style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan\u003E1. वायु प्रदूषण \u003C\/span\u003E\u003C\/h4\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003Eकारखानों की चिमनियों, हलवाइयों की भट्टियों, हर समय एक स्थान से दूसरे स्थान\n    पर जाने वाले वाहनों, घरों में जलने वाली सिगड़ियों आदि से निकलने वाले धुंएँ और\n    अन्य विषाक्त गैसों से वातावरण प्रदूषित होता है। नगरों का वातावरण दमघोंटू हो\n    जाता है। कारखानों से गैस के रिसाव का भी डर रहता है। \u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003Eइसका उदाहरण सर्वविदित है कि भोपाल के यूनियन कार्बन के गैस रिसाव से जनहानि\n    के साथ-साथ स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ा है। परमाणु ऊर्जा और परमाणु\n    विस्फोटों से वायुमंडल में विपुल रेडियोधर्मिता का प्रसारण हो रहा है, जिससे\n    वायुमंडल प्रदूषित होने से अनेक रोग फैलते हैं, पशु-पक्षी मरते हैं और\n    वनस्पतियाँ नष्ट हो जाती हैं। \u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch4 id=\"5\" style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan\u003E2. जल प्रदूषण \u003C\/span\u003E\u003C\/h4\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003Eजल प्रदूषण के कारण परम्परागत और आधुनिक दोनों ही है। व्यर्थ और वाहित मल,\n    नगरों का गंदा पानी, कारखानों से निकलने वाली गंदगी, नदियों में बहा दी जाती है\n    और इन नदियों के जल को पीने के लिए उपयोग में लिया जाता है। जिससे हैजा, पेचिश,\n    पीलिया आदि रोग हो जाते हैं। गंगा अब तेरा जल अमृत कहावत विपरीत हो गई है। यह\n    दूषित जल मानव, पशु-पक्षी और \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/blog-post_33.html\"\u003Eकृषि\u003C\/a\u003E सभी के लिए अनुपयोगी है। \u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch4 id=\"6\" style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan\u003E3. रासायनिक प्रदूषण\u003C\/span\u003E\u003C\/h4\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जब रसायन हमारे पर्यावरण में छोड़े जाते हैं और हमारे पारिस्थितिक तंत्र के\n  संतुलन को बाधित करते हैं, हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करते हैं, जिस हवा\n  में हम सांस लेते हैं उसे प्रदूषित करते हैं और हमारे भोजन को दूषित करते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  रासायनिक प्रदूषण के कई स्रोत हैं। हमारे तकनीकी विकास ने हमें एक ऐसी प्रजाति\n  बना दिया है जो काफी हद तक रसायनों पर निर्भर है और ये रसायन जीवन और हमारे\n  पर्यावरण के लिए जहरीले हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  हमारी कृषि प्रक्रियाओं में रसायनों और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। अपनी\n  फसलों की रक्षा के लिए हम उन पर कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं। अपने पशुओं के\n  स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए, वाणिज्यिक किसान कलमों पर रसायनों का\n  छिड़काव करते हैं। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग जल प्रदूषण का एक अन्य स्रोत है। ये सभी जमीन में रिस\n  सकते हैं और हमारी मिट्टी को दूषित कर सकते हैं, और अंततः, ये रसायन इसे हमारे जल\n  आपूर्ति, जल निकायों और हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन में बना देंगे। ये\n  जहरीले तत्व हमारे वातावरण में भी प्रवेश कर जाते हैं, और हमारे पर्यावरण के\n  क्षरण को बढ़ाते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch4 id=\"7\" style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan\u003E4. ध्वनि प्रदूषण \u003C\/span\u003E\u003C\/h4\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003Eऔद्योगीकरण और मशीनीकरण के परिणामस्वरूप जो ध्वनि उत्पन्न होती है। वह शोरगुल\n    स्नायुमण्डल के संतुलन को बिगाड़ देता है। ज्ञानेन्द्रियाँ तनावग्रस्त होने से\n    नींद में खलल पड़ता है। \u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003Eपर्यावरण प्रदूषण रोकने के उपाय - वैसे तो प्रदूषण की समस्या विश्वव्यापी है,\n    किन्तु भारतीय प्रदूषण के अंतर्गत विशेष समस्याएँ हैं। भारत वर्ष में प्रदूषण\n    का दायित्व वैज्ञानिक प्रयोगों पर नहीं, अपितु देश में व्याप्त अशिक्षा, गरीबी\n    और उससे उत्पन्न होने वाली अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों और आदतों पर\n    हैं। \u003C\/span\u003Eएक ही घर में मनुष्य और मवेशी एक साथ रहते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  ध्वनि प्रदूषण एक अदृश्य खतरा है। इसे देखा नहीं जा सकता है, लेकिन फिर भी यह\n  जमीन पर और समुद्र के नीचे मौजूद है। ध्वनि प्रदूषण को किसी भी अवांछित या परेशान\n  करने वाली ध्वनि माना जाता है जो मनुष्यों और अन्य जीवों के स्वास्थ्य और कल्याण\n  को प्रभावित करती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  ध्वनि को डेसिबल में मापा जाता है। पर्यावरण में कई आवाजें होती हैं, सरसराहट के\n  पत्तों 20 से 30 डेसिबल वज्रपात 120 डेसिबल तक होती हैं। 85 डेसिबल या इससे अधिक\n  की ध्वनि किसी व्यक्ति के कानों को नुकसान पहुंचा सकती है। इस सीमा को पार करने\n  वाले ध्वनि स्रोतों में परिचित चीजें शामिल हैं, जैसे पावर लॉन मोवर 90 डेसिबल,\n  मेट्रो ट्रेन 90 से 115 डेसिबल, और लाउड रॉक कॉन्सर्ट 110 से 120 डेसिबल तक होता\n  हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  ध्वनि प्रदूषण प्रतिदिन लाखों लोगों को प्रभावित करता है। इसके कारण होने वाली\n  सबसे आम स्वास्थ्य समस्या शोर प्रेरित श्रवण हानि है। तेज आवाज के संपर्क में आने\n  से उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, नींद में खलल और तनाव भी हो सकता है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  ये स्वास्थ्य समस्याएं सभी आयु समूहों, विशेषकर बच्चों को प्रभावित कर सकती हैं।\n  कई बच्चे जो शोरगुल वाले हवाई अड्डों या सड़कों के पास रहते हैं, वे तनाव और अन्य\n  समस्याओं से पीड़ित पाए गए हैं, जैसे कि याददाश्त में कमी, ध्यान का स्तर और\n  पढ़ने का \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/who-is-skill.html\"\u003Eकौशल\u003C\/a\u003E मे कमी आदि।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 id=\"8\" style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण प्रदूषण को रोकने के उपाय\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003Eवायु प्रदूषण को रोकने के लिए चिमनियों में इस तरह के फ़िल्टर लगाने चाहिए कि\n      वे प्रदूषणकारी तत्वों को वायुमण्डल में प्रविष्ट नहीं होने दें। घरों और\n      कारखानों से निकलने वाले गंदे जल को भूमिगत किया जाना चाहिए। रेडियोधर्मी\n      प्रदूषण को रोकने ले लिए अंतर्राष्ट्रीय, ऊर्जा संघ द्वारा निर्मित नियमों का\n      कड़ाई से पालन करना चाहिए।\u003C\/span\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003Eपर्यावरण संरक्षण हेतु वन संरक्षण पर विशेष बल देने चाहिए। वृक्ष पर्यावरण\n        का सर्वश्रेष्ठ साधन है, क्योंकि वे अशुद्ध वायु को अवशोषित कर मानव के लिए\n        शुद्ध वायु प्रदान करते हैं, अतः हम सभी का यह दायित्व है कि हम अधिक से\n        अधिक वृक्ष लगायें, ताकि पर्यावरण का संतुलन बनाये रख सकें। \u003C\/span\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 id=\"9\" style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eउपसंहार\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003Eपर्यावरण में प्रदूषण की समस्या मानव और विज्ञान की स्वार्थलिप्सा की\n          देन है। यह मानव को मरण की ओर धकेलने का प्रयास है, प्राणिमात्र के अमंगल\n          का सूचक है। मानव की दीर्घायु और उसके जीवन को सुरक्षित रखने हेतु इस\n          समस्या को नियंत्रित करना परमावश्यक है। \u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003E\u003Cspan\u003Eमानव के अस्तित्व पर प्रश्न लग सकता है। पर्यावरण की रक्षा और प्रदूषण\n          पर नियंत्रण समाज के निवासियों का सम्मिलित दायित्व है, अतः देश के\n          प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह यह समस्या के निराकरण में अपना\n          सक्रिय योगदान प्रदान करे। \u003C\/span\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/4035319094897532400\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/paryavaran-pradushan-ke-karan.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/4035319094897532400"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/4035319094897532400"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/paryavaran-pradushan-ke-karan.html","title":"पर्यावरण प्रदूषण के कारण और उपाय"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh 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"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u003C\/a\u003E सभी जीवित और निर्जीव \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/05\/blog-post_63.html\"\u003Eतत्वों\u003C\/a\u003E और उनके प्रभावों का योग है जो मानव\n  जीवन को प्रभावित करते हैं।पर्यावरण संरक्षण संगठनों और सरकारों द्वारा प्राकृतिक\n  की रक्षा करने का प्रयास है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और मौजूदा\n  प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करना है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण संरक्षण क्या है\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पर्यावरण संरक्षण व्यक्तियों, संगठनों और सरकारों द्वारा पर्यावरण की रक्षा करने\n  की प्रथा है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों और मौजूदा प्राकृतिक पर्यावरण का\n  संरक्षण करना और जहां संभव हो, क्षति की मरम्मत करना है। अत्यधिक खपत, जनसंख्या\n  वृद्धि और प्रौद्योगिकी के दबावों के कारण पर्यावरण का क्षरण हो रहा है। इसे\n  स्वीकार कर लिया गया है, और सरकारों ने उन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर\n  दिया है जो पर्यावरण को नुकसान पहुचाती हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण संरक्षण के उपाय\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि और प्रौद्योगिकी के दबावों के कारण संसाधन में\n  कमी आ रही है। और जिसके कारण पर्यवरण पर खतरा बढ़ता जा रहा है। सरकारों\n  ने उन गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया है जो पर्यावरण को नुकशान\n  पंहुचा रही हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E1. औद्योगिक कचरे का नियंत्रण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अपशिष्ट प्रबंधन के तरीकों के बारे में सोचना पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी हैं।\n  औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन के सबसे प्रभावी तरीके वे हैं जिनका उद्देश्य अपशिष्ट\n  को कम करना और पुनर्चक्रण करना है, इससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होगा।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eपुनर्चक्रण \u003C\/b\u003E- यदि शिपिंग और पैकेजिंग की जरूरतों से उत्पन्न होने\n  वाला अधिकांश कचरा पुन: उपयोग या खाद योग्य नहीं है। तो उसका पुनर्चक्रण किया जा\n  सकता है। औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन कार्यक्रम में पहला कदम यह पहचानना है कि किन\n  वस्तुओं को पुनर्नवीनीकरण किया जा सकता है। अधिकांश रीसाइक्लिंग केंद्र में कांच,\n  कागज और प्लास्टिक का रीसाइक्लिंग किया जाता हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eखाद का निर्माण\u003C\/b\u003E - खाद बनाने की प्रक्रिया जैविक कचरे को उर्वरक में\n  बदल देती है जिसका उपयोग पौधों को पोषण देने के लिए किया जा सकता है। अधिकांश\n  खाद्य अपशिष्ट से खाद बनाई जा सकती है, और यहां तक ​​कि असुरक्षित जैविक वस्तुओं\n  को भी सुरक्षित खाद में बदला जा सकता है। आप खाद्य अपशिष्ट, पत्ते, समाचार पत्र,\n  गत्ते के बहुत छोटे टुकड़े को खाद बना सकते हैं। कचरे का पुन: उपयोग और\n  पुनर्चक्रण करने के लिए खाद बनाना सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E2. प्रदूषण की रोकथाम\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  विभिन्न गैसों जैसे नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, हीलियम, हाइड्रोजन, आर्गन आदि के मिश्रण\n  को वायु के रूप में जाना जाता है। वायुमंडलीय गतियाँ इन गैसों की एकरूपता बनाए\n  रखती हैं। अपशिष्ट और जीवाश्म ईंधन, वाहन उत्सर्जन, निर्माण और विध्वंस, अपशिष्ट,\n  लैंडफिल, और कई अन्य कारक हवा की एकरूपता में बाधा डाल सकते हैं। जब इन गैसों का\n  स्तर वांछित सीमा से अधिक हो जाता है, तो वायु प्रदूषित हो जाती है और इसे वायु\n  प्रदूषण के रूप में जाना जाता है।  \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eसार्वजनिक परिवहन का उपयोग\u003C\/b\u003E - वायु प्रदूषण को कम करने के लिए\n  सार्वजनिक परिवहन का प्रयोग करें। हमारे परिवहन की जरूरत सभी कार्बन डाइऑक्साइड\n  गैस उत्सर्जन का 30% उत्पादन करती है। हम निजी कारों या वाहनों का उपयोग करने के\n  बजाय सार्वजनिक बसों का उपयोग कर सकते हैं। मान लीजिए कि एक बस एक बार में 40\n  यात्रियों को ले जा सकती है; ये 40 यात्री इसके बजाय एक सार्वजनिक वाहन का उपयोग\n  करके 40 निजी वाहनों के उत्सर्जन को कम कर सकते हैं। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eप्लास्टिक बैग का उपयोग न करे\u003C\/b\u003E - प्लास्टिक को विघटित करना बहुत\n  कठिन होता है। प्लास्टिक बैग नॉन बायोडिग्रेडेबल होते हैं। इसका मतलब है कि वे\n  समय के साथ आसानी से ख़राब नहीं हो सकते। प्लास्टिक कचरे को जलाशयों में डालने से\n  विभिन्न जलीय जंतुओं को खतरा होता है। इन जानवरों में समुद्री कछुए, मछली आदि\n  शामिल हो सकते हैं। ये जलीय जानवर प्लास्टिक के कचरे को खाते हैं जिससे घुटन हो\n  सकती है या उनके पाचन तंत्र में प्रवेश कर सकते हैं। प्लास्टिक की थैलियों को\n  पचाना आसान नहीं है; वे जहरीले होते हैं और समुद्री जीवन की मौत का कारण बन सकते\n  हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E3.ऊर्जा सुरक्षा के उपाय\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत आयात करता है और पूरी दुनिया में तीसरा सबसे\n  बड़ा तेल उपभोक्ता है। भारत की ऊर्जा खपत अगले 25 वर्षों तक हर साल 4.5 प्रतिशत\n  बढ़ने की उम्मीद है। हाल ही में उच्च अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के\n  कारण, तेल आयात की उच्च लागत के कारण सीएडी बढ़ गया, जिससे भारत में दीर्घकालिक\n  आर्थिक स्थिरता के बारे में चिंता बढ़ गई हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा आर्थिक विकास और पर्यावरणीय जरूरतों के अनुरूप ऊर्जा की\n  आपूर्ति करने से है। अल्पकालिक ऊर्जा सुरक्षा आपूर्ति-मांग संतुलन में अचानक\n  परिवर्तन के लिए किया जाता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  भारत का लक्ष्य वैश्विक आर्थिक शक्ति बनना है जिसके लिए मानव \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/who-is-skill.html\"\u003Eकौशल\u003C\/a\u003E विकसित करने,\n  रोजगार सृजन और विनिर्माण क्षमताओं के साथ साथ ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करना भी\n  सामील हैं। भारत की आर्थिक किस्मत तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी से\n  उतार-चढ़ाव से जुड़ी हुई है। इसलिए ऊर्जा का सुरक्षा करना अति आवश्यक हैं। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  1960 के दशक के बाद से वैज्ञानिकों ने कई पर्यावरणीय समस्याओं के बारे में\n  जागरूकता फ़ैलाने का प्रयास किया है। जैसे ग्लोबल वार्मिंग मानव गतिविधि\n  पर्यावरण को अधिक प्रभावित करते है। मानव पूरी तरह से पर्यावरण पर निर्भर करता\n  है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पर्यावरण हवा, पानी और भोजन के साथ साथ कई प्राकृतिक संसाधन प्रदान करता हैं।\n  जिसे हम अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए करते हैं। प्रकृति ने हमें बहुत कुछ\n  दिया हैं। जो मानव के विकास में अहम् भूमिका निभाते हैं। अतः इसका संरक्षण हमारी\n  जिम्मेदारी हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  औद्योगिक कंपनियों को ऐसे उन्नत तकनीक का उपयोग करना चाहिए जिससे कार्बन का कम\n  उत्पादन होता हैं। आज ग्लोबल वार्मिंग एक गंभीर समस्या हैं। जिसका नियंत्रण\n  पर्यावरण का संरक्षण करके ही किया जा सकता हैं। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  भारत में पर्यावरण सुधार संस्था 1998 से पर्यावरण और वन संरक्षण के लिए काम कर\n  रहा है। विकासशील देशों, जैसे लैटिन अमेरिका में इन समझौतों का उपयोग आमतौर पर\n  गैर-अनुपालन के महत्वपूर्ण स्तरों को दूर करने के लिए किया जाता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण संरक्षण की शुरुआत \u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  मानव जाति हमेशा से ही पर्यावरण को लेकर चिंतित रही है। प्राचीन यूनानियों ने\n  पर्यावरण दर्शन को विकसित करने में मत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं। उनके बाद भारत और\n  चीन जैसी अन्य प्रमुख सभ्यताओं ने इसका पालन किया गया। हाल के दिनों में\n  पारिस्थितिक संकट के बारे में बढ़ती जागरूकता के कारण पर्यावरण के लिए चिंता बढ़\n  गई है।1972 में दुनिया को अति जनसंख्या और प्रदूषण के खतरों के बारे में चेतावनी\n  दी गयी थी।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  शुरुआती दिनों में लोगों ने सोचा कि प्रकृति की रक्षा करने का सबसे अच्छा तरीका\n  उन क्षेत्रों को अलग करना है जहां मनुष्य पर्यावरण को परेशान नहीं करेंगे। इस\n  दृष्टिकोण को संरक्षण के रूप में जाना जाता है। भारत में इस तरह के क्षेत्र\n  को अभ्यारण्य कहा जाता हैं। जिसे उसके प्राकृतिक रूप में छोड़ दिया जाता\n  हैं। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  1960 के दशक में पर्यावरण पर मनुष्यों के नकारात्मक प्रभाव के बारे में चिंताएं\n  बढ़ने लगीं। इन चिंताओं के जवाब में दुनिया भर की सरकारों ने पर्यावरण की रक्षा\n  के लिए\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/06\/blog-post.html\"\u003Eकानून\u003C\/a\u003E\u0026nbsp;पारित करना शुरू कर दिया। भारत सरकार ने 1976 में संविधान में दो\n  संशोधन किये जिसमे पर्यावरण की सुरक्षा और उसमें सुधार सुनिश्चित करने की बात कही\n  गयी हैं। स्वतंत्रता के पश्चात बढते औद्योगिकरण, शहरीकरण से पर्यावरण बुरा प्रभाव\n  पड़ रहा है। पर्यावरण प्रदूषण पर सरकार ने समय-समय पर अनेक कानून व नियम बनाए हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eअंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण समझौते\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पृथ्वी के कई संसाधन विरल हैं क्योंकि वे मानव प्रभावों से प्रभावित हैं।\n  प्राकृतिक संसाधनों पर मानव गतिविधि के कारण के नुकसान होता हैं। पर्यावरण\n  को बचाने के लिए अंतरास्ट्रीय समझौते बनाये गए हैं जो जलवायु, \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/what-is-ocean-in-hindi.html\"\u003Eमहासागरों\u003C\/a\u003E,\n  नदियों और वायु प्रदूषण जैसे कारकों को प्रभावित करते हैं। ये अंतरराष्ट्रीय\n  पर्यावरण समझौते कभी-कभी कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जब उनका पालन नहीं किया जाता है और अन्य समय में सिद्धांत रूप में अधिक समझौते\n  होते हैं या आचार संहिता के रूप में उपयोग के लिए होते हैं। इन समझौतों का एक\n  लंबा इतिहास रहा है और कुछ बहुराष्ट्रीय समझौते यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका में\n  1910 से ही चल रहे थे।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eभारत मे पर्यावरण संरक्षण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  भारत के संविधान में पर्यावरण संरक्षण के प्रति केंद्र और राज्य सरकारों की\n  जिम्मेदारी का निर्धारण करने वाले कई प्रावधान हैं। पर्यावरण संरक्षण के संबंध\n  में राज्य की जिम्मेदारी हमारे संविधान के अनुच्छेद 48-ए के तहत निर्धारित की गई\n  है जिसमें कहा गया है कि \"राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने और देश के वन और\n  वन्य जीवन की रक्षा करने का प्रयास करेंगे।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  संविधान के अनुच्छेद 51-ए के तहत पर्यावरण संरक्षण को भारत के प्रत्येक नागरिक का\n  एक मौलिक कर्तव्य बनाया गया है जो कहता है कि भारत के प्रत्येक नागरिक का यह\n  कर्तव्य होगा कि वह जंगलों, \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/what-is-lake-in-hindi.html\"\u003Eझीलों\u003C\/a\u003E, नदियों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और\n  सुधार करे। और वन्य जीवन और जीवित प्राणियों के लिए दया रखे।\n\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/279435345610092989\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/importance-of-environmental-protection.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/279435345610092989"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/279435345610092989"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/importance-of-environmental-protection.html","title":"पर्यावरण संरक्षण क्या है? 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"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\n  पृथ्वी की सतह पर आन्तरिक शक्तियों एवं बाह्य शक्तियों का प्रभाव बना हुआ है।\n  आन्तरिक शक्तियों के प्रभाव से भूमि का ऊपर उठना, नीचे धंसना, \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/08\/blog-post.html\"\u003Eवलन\u003C\/a\u003E एवं भ्रंशन\n  जैसी क्रियाएँ होती रहती हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eअपरदन चक्र किसे कहते हैं\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इससे पृथ्वी पर पर्वत, पठार,\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mandan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eमैदान\u003C\/a\u003E, घाटियाँ, भ्रंश, गहरी खाइयाँ आदि अनेक प्रकार की भू-आकृतियों का विकास होता\n  रहता है। दूसरी ओर बाह्य शक्तियाँ अनेक प्रकार से उपर्युक्त भू-आकृतियों को,\n  विविध कारकों एवं उनको प्रभावित करने वाले तत्वों के साथ मिलकर समतल करती रहती\n  हैं। इसी क्रिया को\u0026nbsp;अपरदन चक्र कहा जाता हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अर्थात् ऊपर उठी हुई भू-आकृतियाँ या विशेष संरचनाओं वाली भू-आकृतियाँ इस क्रिया\n  मे समतल अवस्थाओं मे आ जाती हैं एवं निम्नतम आधार तल तक पहुँचने का प्रयास करती\n  हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इसे ही आज विभिन्न विद्वानों ने साधारण अपरदन चक्र का आधार माना है क्योंकि\n  भू-आकृतियों को समतल करने वाली प्रक्रियाओं में भी एक प्रकार से चक्रीय\u0026nbsp;\n  व्यवस्था पाई जाती है। इस तथ्य पर सबसे पहले अठारहवीं सदी में जेम्स हटन ने\n  प्रकाश डाला था।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  सन् 1785 में अपने भू-वैज्ञानिक परीक्षणों के दौरान उसका ध्यान इस ओर गया तथा\n  उन्होंने एकरूपता वाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। भू-आकृतियों एवं उन पर\n  प्रभाव डालने वाले क्रियाओं की चक्रीय-व्यवस्था के बारे में विस्तार से सबसे\n  विलियम मोरिस डेविस ने समझाया था।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eअपरदन चक्र की व्याख्या\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  डेविस ने विश्व के सभी भागों एवं विविध प्रकार के धरातल तथा विविध जलवायु की\n  दशाओं में विकसित भू-आकृतियों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उसने धरातल पर\n  भू-आकृतियों के विकास में अपरदन चक्र की अवस्था की विचार को विस्तार से समझाया\n  था। इसे उन्होंने भौगोलिक चक्र भी कहा है। उन्होंने भौगोलिक चक्र की संकल्पना का\n  प्रतिपादन सन् 1889 में किया था ।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  डेविस कहते हैं कि जब भी कोई नया भू-भाग समुद्र से आंतरिक क्रिया से बाहर आता है\n  तभी से अपरदन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। डेविस ने इसे स्पष्ट करके आगे बताया\n  अपरदन चक्र समय की वह अवधि है। जिसके द्वारा एक नया भूखण्ड का अपरदन होता है। ऐसा\n  क्षेत्र अन्तिम स्थिति में समतल मैदान में बदल जाता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पहली बार विस्तार से कारण सहित विश्व के विभिन्न क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए\n  स्पष्ट किया कि किसी भी क्षेत्र के अपरदन के प्रकार एवं उसकी व्यवस्था पर वहाँ पर\n  पाई जाने वाली\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/chattan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eचट्टानों \u003C\/a\u003Eकी संरचना, उन प्रक्रिया का वहाँ की संरचना को बदलते रहने से विकसित होने वाली\n  आकृतियों को उसने उस क्षेत्र की अवस्था पर विशेष प्रक्रिया का जलवायु की\n  क्षेत्रवार बदलती हुई स्थिति के अनुसार प्रभाव एवं ऐसी विशेष के रूप में दिखाई\n  देने वाला बताया।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अतः डेविस के ही अनुसार, 'स्थलाकृति संरचना, प्रक्रिया एवं अर्थों में यह भी कहा\n  जा सकता है कि किसी भी क्षेत्र की भू-वैज्ञानिक संरचना अवस्था का परिणाम\n  है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  दूसरे वहाँ पर विकसित अवस्था अथवा विशेष भू-आकृति पर दिखाई देने वाली अवस्था या\n  विविध आकृतियों से कहीं पुरानी है (थॉर्नबरी)।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E1. संरचना\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  संरचना से अर्थ पृथ्वी की सतह पर पाई जाने वाली चट्टानों की आकृति उनकी बनावट व\n  व्यवस्था एवं उसमें पाये जाने वाले तत्वों की कटान सहने की क्षमता आदि से मुख्यतः\n  है। सरल शब्दों में, संरचना से आशय किसी प्रदेश की कुल भू-तात्विक रचना से होता\n  है ।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अतः संरचना बलुई या अवसादी मिट्टी जैसी मुलायम एवं आसान कटने वाली से लेकर\n  ग्रेनाइट, गेब्रो व अन्य कठोर चट्टानों की भाँति अपरदन को दृढ़ता से सहने वाली\n  अथवा उनके बीच की कोई भी हो सकती है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  डेविस के अनुसार संरचनाएँ निम्न प्रकार के चार वर्गों या समूहों में रखी जा सकती\n  हैं : हुई, मोड़दार एवं मिश्रित या\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cb\u003Eअवसादी संरचना -\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eइसमें समतलप्रायः, हल्की झुकी हुई, मोड़दार एवं\n  मिश्रित याजटिल वलन व भ्रंश वाली संरचनाएं एवं उनकी बनावट की सभी व्यवस्थाएँ आ\n  जाती हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cb\u003Eस्थायी संरचना -\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eइसमें कायान्तरित अथवा समान कठोरता वाली तथा समरूपी\n  संरचनाएँ आती हैं अत: अनेक प्रकार की आग्नेय चट्टाने एवं अधिकांश कायान्तरित\n  चट्टानें इसी वर्ग में आती हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cb\u003Eमिश्रित संरचना -\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eइसमें मुख्यतः वही संरचनाएँ या भू-आकृतियाँ आती हैं\n  जो कि एक से अधिक प्रकार की अर्थात् पूरी तरह भिन्न-भिन्न चट्टानों के मिश्रण से\n  बनी हों । अतः ऐसी संरचना में अवसादी, आग्नेय तथा कायान्तरित मिश्रण किसी भी स्तर\n  पर धरातल की क्षेत्रीय व्यवस्था में किसी भी रूप में पाया जा सकता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cb\u003Eज्वालामुखी संरचना -\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eडेविस ने ज्वालामुखी पर्वत एवं अन्य स्वतन्त्र\n  रूप से ज्वालामुखी से बनी व क्षेत्र में फैली चट्टानों को अलग से समझाया है। ऐसी\n  संरचना पर सामान्यतः प्रक्रिया एवं अवस्था का अलग ही प्रकार से प्रभाव पड़ता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इस प्रकार भू-आकृतियों के विकास एवं उनके निर्माण में संरचना आधारभूत तथा प्रथम\n  महत्वपूर्ण घटक है। इसी कारण भू-आकृतियों का वर्गीकरण एवं उनको निश्चित करने का\n  आधार संरचना के प्रकार से ही जुड़ा है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cscript async=\"\" crossorigin=\"anonymous\" src=\"https:\/\/pagead2.googlesyndication.com\/pagead\/js\/adsbygoogle.js?client=ca-pub-6795074321060305\"\u003E\u003C\/script\u003E\n\u003C!--responsive ad--\u003E\n\u003Cins class=\"adsbygoogle\" data-ad-client=\"ca-pub-6795074321060305\" data-ad-format=\"auto\" data-ad-slot=\"6636788511\" data-full-width-responsive=\"true\" style=\"display: block;\"\u003E\u003C\/ins\u003E\n\u003Cscript\u003E\n     (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});\n\u003C\/script\u003E\n\u003Cp\u003E\n  यही नहीं, वहाँ पर कार्यरत प्रक्रिया (अपरदन करने वाले कारक) का पूरा स्वरूप जो\n  कि जलवायु से भी नियन्त्रित है, अपना असर संरचना की व्यवस्था के अनुसार ही दिखा\n  सकेगा। अतः अपरदन चक्र की व्यवस्था में संरचना का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E2. प्रक्रिया\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जब किसी विशेष प्राकृतिक माध्यम से संरचना पर प्रभाव पड़ता है या प्रभाव की कोशिश\n  होती रहती है तो ऐसी सारी विधि या व्यवस्था को प्रक्रिया कहते हैं। स्थल की\n  मूलाकृति के परिवर्तन में प्रक्रम का प्रमुख हाथ रहता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  भू-आकृतियों के निरन्तर विकास में प्रक्रिया का ही सर्वत्र अमिट एवं सर्वव्यापी\n  प्रभाव बना रहता है। प्रक्रिया का विकास जलवायु के अनुसार होगा प्रक्रिया के\n  अन्तर्गत सम्पूर्ण अनाच्छादन की शक्तियाँ आ जाती हैं। इनमें अपक्षय एवं अपरदन के\n  अभिकर्ता (नदी, भूमिगत जल, पवन, हिमानी एवं लहरें) सभी सम्मिलित हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पृथ्वी की संरचना कहीं भी बड़े क्षेत्र में अपवाद-स्वरूप ही समरूपी है। उनमें\n  बनावट, कठोरता, झुकाव, आयु आदि के हिसाब से प्रायः सभी भागों में विविधताएँ पायी\n  जाती हैं। इसके साथ-साथ जलवायु के किसी भी एक तत्व के प्रभाव में अन्तर आने पर\n  प्रक्रिया का सारा स्वरूप ही भू-आकृति पर अलग ही प्रकार से प्रभाव डालने लगता\n  है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अत: दो भू-आकृतियों पर अथवा दो क्षेत्रों की समरूपी भू-आकृतियों पर भी प्रक्रिया\n  का प्रभाव ठीक उसी प्रकार से भिन्न-भिन्न होगा जिस प्रकार से दो व्यक्तियों की\n  लिखने की लिपि में । एक क्षेत्र विशेष को सतह की संरचना के कटाव के पश्चात् अथवा\n  उस क्षेत्र के ही अन्य भाग में किसी भी दिशा या समय के अन्तर पर संरचना में\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E3. अवस्था\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  स्वभाव भी बदल सकता है । अत: प्रक्रिया सर्वप्रभावी एवं कार्यरत होते हुए भी\n  विशेष नाजुक या तत्काल अनेक प्रकार से प्रभावित होने वाली व्यवस्था है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अतः इसे समझते समय प्रत्येक क्षेत्र की संरचना, उसका बदलता फेर-बदल या भिन्नता\n  आने पर भी प्रक्रिया या प्रभाव एवं उसके काम करने का चाहिए। स्वरूप, वहा पर\n  प्रभावित जलवायु एवं अनाच्छादन की व्यवस्था आदि सभी तथ्यों को ध्यान में रखा जाना\n  चहिए।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  प्रक्रिया के माध्यम से होता रहता है। अतः ऐसे विकास से सम्बन्धित भू-आकृति का जो\n  नवीन स्वरूप बनता (Stage) -किसी भी क्षेत्र की भू-आकृति का विकास ऊपर बतायी गई\n  संरचना एवं जाता है, जिस विधि से वे बदलते रहते हैं; इसकी पहचान एवं उनकी\n  व्याख्या अवस्था के अन्तर्गत आती है । हम यह भी कह सकते हैं कि प्रक्रम किस सीमा\n  तक कार्य कर चुका है,यह अवस्था से ही ज्ञात होता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इस प्रकार अवस्था में मुख्यतः संरचना पर प्रक्रिया के द्वारा जो परिणामी प्रभाव\n  पड़ता है, उसी को अनेक प्रकार से समझाया जाता है। अवस्था को सरलता से समझाने के\n  लिए डेविस ने अवस्था क्रम को मानव आयु स्वरूप की भाँति चार उपभागों में बाँटा गया\n  हैं। - (i) बाल्यावस्था,(ii) युवावस्था, (iii) प्रौढ़ावस्था, एव (iv)\n  वृद्धावस्था।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अत: यद्यपि वर्तमान में मोटे तौर पर अवस्थाएँ तीन (युवा, प्रौढ़ एवं वृद्ध) बतायी\n  गयी हैं, किन्तु प्रौढ़ बाद के विद्वानों ने प्रारम्भिक या बाल्यावस्था (Initial\n  or Adolesence) एवं युवावस्था को एक ही मान अवस्था को लम्बी होने से\n  पूर्व-प्रौढ़ावस्था एवं\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  तेज बाँट दिया गया प्रत्येक अवस्था के स्व-लक्षण होते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में\n  भू-आकृति नवीन होने से ऊँची-नीची होते हुए भी कम लक्षणों वाली होती है, किन्तु\n  युवावस्था में सारे प्रदेश में तेजी से विकास होने से वहाँ गहरी घाटिया। ढाल,\n  घुमावदार नदी-घाटियाँ, उनमें झरने व झीलें, अन्य शुष्क प्रदेशों में बजाड़ा, बालू\n  के टीले, पथरीली अधिक होती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u0026nbsp;डेविस के अनुसार प्रारम्भिक अवस्था में उत्थान की क्रिया कटाव की क्रिया की\n  तुलना से विशेष महत्वपूर्ण बनी रहती है, जबकि युवावस्था में अपरदन की क्रिया सबसे\n  महत्वपूर्ण बनी रहती युवावस्था से धीरे-धीरे या निरन्तर प्रौढावस्था का विशेषताएं\n  प्राप्त करता जाती है। इसमें ढाल क्रम धीमा एवं नियमित होने लगता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u0026nbsp;कटाव एवीबहावदानी विशेषताएं प्राप्त महत्वपूर्ण रहते हैं। भू-आकृति के\n  लक्षणों में नुकीलापन अर्थात् तेज मोड़,तेज कटाव गहरी घाटी एवं सका विभाजक, झरने,\n  झीलें जैसे लक्षण घिस-घिसकर या कटाव-जमाव की सम्मिलित क्रिया से घाटी को सम\n  लक्षणीय बनाने लगते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अतः प्रौढ़ावस्था का काल विशेष रूप से लम्बा होता है। अतः डेविस के अनुसार इस\n  व्यवस्था क्रम में उत्थान अपेक्षतया कम समय वाला अपरदन चक्र का अवस्थावार विकास\n  (सबसे अधिक लम्बा समय वाला) एवं चक्र की अन्तिम अवस्था का विकास होता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अपरदन चक्र की सरल एवं सार्थक व्याख्या प्रस्तुत करने में देविस अपने समय के\n  अग्रदूत माने जाते हैं। यही नहीं, अमेरिका में तो उन्हे अपरदन चक्र विचारधारा का\n  पिता भी माना जाता है ।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  डेविस ने आगे दर्शाए गये सरल रेखा माफ द्वारा अपरदन चक्र को व्यवस्था को समझाने\n  का प्रयास किया है। उसने सर्वप्रथम यह माना कि व्यवहार में अपरदन चक्र का\n  प्रारम्भ किसी भी स्थलाखण्ड के उत्थान की अवधि के बाद ही होता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  सम्भवतः वह ऐसा कहते समय वास्तविक तथ्य कि उत्थान एवं कटाव साथ साथ होते रहे हैं,\n  को नजरअन्दाज कर गया। इस कारण भी वर्तमान में कई विद्वान उसके विचार को अस्पष्ट\n  या धान्तिपूर्ण भी मानते हैं क्योंकि प्रकृति में अनाच्छादन की क्रिया उत्थान की\n  समाप्ति का पूर्णता का इन्तजार नहीं करती।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  डेविस के अनुसार प्रारम्भ में भूखण्ड को ऊपर उठने में (घाटी के या भू-आकृति के\n  अपरदन की तुलना में) काफी कम समय लगता है। अतः उसके अनुसार ऊपर दिए वर्णन के आधार\n  पर\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  उत्थान अपरदन चक्र का अवस्थावार विकास अपरदन चक्र की विशेष लम्बा समय अन्तिम\n  अवस्था डेविस ने अपरदन चक्र के प्रारू में क्षैतिज अक्ष पर समद को एवं लम्बवत्\n  अक्ष पर ऊँचाई को चित्रित किया। इसमें दोहरे चक्र को चित्रित किया गया है। ऊपरी\n  वक्र क अ स एवं निचला वन है।\n\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/6111528560666133606\/comments\/default","title":"Post 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mrida sanrakshan ke upay\" border=\"0\" data-original-height=\"960\" data-original-width=\"1280\" height=\"240\" src=\"https:\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEhhtFWa1hAf2vJMANT-dgISxYIX_ADiZCBCH2GiZMSAk2U_EH2uufNqXT__WuEqJhBbcYSJa68UBOAYowYqn2GEHHDU54lczeq5qh5CqmJKo5DqxSTC_WuiPtRYujtlq5QijLqun2TX2obEnT_r_U8IWLipr7t9oPtfW6vWgvXS_1uj-3X55jBTNemblA\/w320-h240\/20230220_114404.webp\" title=\"मृदा संरक्षण किसे कहते हैं - mrida sanrakshan ke upay\" width=\"320\" \/\u003E\u003C\/a\u003E\u003C\/div\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: small;\"\u003E\u003Cb\u003E1. भूमि क्षरण\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003Eतेज वर्षा, आँधी तूफान से मिट्टी की ऊपरी सतह कुछ ही दिनों में बह जाती है। जबकि इसके बनने में बहुत अधिक समय लगता है। अतः मिट्टी की रक्षा करना बहुत आवश्यक है। भूमि का क्षरण जल और हवा दोनों से होता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eजल द्वारा भूमि क्षरण -\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eजहाँ वनस्पति क्षेत्र विरल तथा अपर्याप्त होता है और आस-पास भी सघन पेड़ नहीं होते, वहाँ की भूमि सतह धीर धीर क्षय होती जाती है। भूमि की मिट्टी में कटाव होता है और वर्षा जल बहने के साथ ही मिट्टी भी बह जाता है। यदि तेज वर्षा होती है तो यह कटाव और भूमि क्षय शीघ्र तथा अधिक होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eउपाय\u003C\/b\u003E - जल द्वारा भूमि क्षरण को रोकने के निम्न उपाय हो सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eभूमि की जुताई पानी की व्यवस्था के लम्बवत् करने से मिट्टी का कटाव और भूमि-क्षरण कम हो जाता है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eखेतों के आस पास धने वृक्ष लगाए जाएँ क्योंकि वर्षा की तेज बूंदों को वृक्ष अपने ऊपर लेकर बूंदों की तेजी को कम करता है तथा फिर पानी को मिटठी में धीमे-धीमे जाने देता है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eखेतो अथवा भूमि भाग के ऊपरी हिस्सों में, जहाँ से वर्षा के पानी की आवक है, छोट-छोटे एनीकट बनाए जाएँ जिससे कि पानी उस एनीकट में रूक जाए तथा बाद में इस जल का पुनः उपयोग हो सके।\u003C\/li\u003E\u003C\/ul\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eवायु द्वारा भूमि\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E\u003Cb\u003Eक्षरण\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E\u003Cb\u003E-\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eवायु के तेज प्रवाह से भी भूमि-क्षरण होता है। तेज हवा अपने साथ मिट्टी के छोटे-छोटे कणों को भूमि से उठाकर बहुत दूर ले जाती है तथा वहाँ से पुनः वायु वेग के साथ यह मिट्टी कण एक तूफान के रूप में बहुत दूर उड़ जाते हैं जिससे भूमि का क्षरण हो जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eउपाय \u003C\/b\u003E- वायु द्वारा भूमि क्षरण बचाव से बचाव के निम्न उपाय हैं\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eवायु के प्रवाह के विरूद्ध रक्षा पेटियों की व्यवस्था करना।\u0026nbsp;\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eवायु की नमी बनाए रखना, जिससे मिट्टी सहज ही उड़ने न पाए।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eखेतों के आस-पास सघन वृक्ष लगाकर ।\u003C\/li\u003E\u003C\/ul\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E2. भूमि प्रदूषण\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभूमि के भौतिक, रासायनिक या जैविक गुणों में ऐसा कोई भी अवांछित परिवर्तन जिसका प्रभाव मनुष्य तथा अन्य जीवों पर पड़े अथवा भूमि की प्राकृतिक गुणवत्ता नष्ट हो, भूमि प्रदूषण कहलाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवर्तमान समय में उत्पादन बढ़ाने के लिए खेतों में रासायनिक खादों, कीटनाशक, रोगनाशी एवं कवकनाशक रसायनों का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। जिससे भूमि में हानिकारक तत्वों की मात्रा बढ़ने से भूमि प्रदूषित हो रही है। उदाहरण के लिए अमोनियम सल्फेट उर्वरक का खेतों में लगातार प्रयोग करने से भूमि में \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/who-is-called-acid.html\"\u003Eअम्ल \u003C\/a\u003Eकी मात्रा बढ़ जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहानिकारक कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से भूमि में इन रसायनों का अंश कई वर्षों तक रहता है, जिससे मृदा प्रदूषित होने के साथ ही इन कीटनाशकों का अंश अनाजों में आने से मानव में नए-नए रोग व बीमारियां फैल रही है, जो मानव समाज के लिए अभिशाप है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eउपाय \u003C\/b\u003E- भूमि प्रदूषण से बचाव के निम्न उपाय है\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eभूमि क्षरण को नियन्त्रण करने के उपाय किए जाए।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eकृषि में रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों का उपयोग कम से कम किया जाए।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eरासायनिक खादों के स्थान पर जैविक खाद को प्राथमिकता दी जाए।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003E\u0026nbsp;डी डी.टी. तथा बी एच सी का उपयोग कम से कम किया जाए।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003E\u0026nbsp;नगरीय तथा औद्योगिक अपशिष्ट को समुचित उपचार के बाद ही प्रवाहित किया जाए।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003E\u0026nbsp;भूमि का उपयोग फसल प्रबंधन के अनुसार किया जाए।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003E\u0026nbsp;किसानों को भूमि-प्रदूषण की जानकारी भी देनी चाहिए।\u003C\/li\u003E\u003C\/ul\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eमृदा संरक्षण के उपाय\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eमृदा संरक्षण के विधियों को दो भागों में विभक्त किया गया है -\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eजैविक विधियाँ\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eयान्त्रिक विधियाँ\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003Eजैविक विधियाँ -\u0026nbsp;\u003C\/h4\u003E\u003Cp\u003Eये विधियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1.\u0026nbsp;फसल चक्र\u003C\/b\u003E - मृदा संरक्षण का यह एक महत्वपूर्ण उपाय है। प्रत्येक बर्ष यदि मृदा में एक ही प्रकार की फसल उगाई जाए, तो मृदा की उर्वरा शक्ति समाप्त होने लगती है। आवश्यक है कि मृदा की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए प्रत्येक वर्ष फसलों में परिवर्तन किया जाए। इसे फसल चक्र कहते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजैसे एक बार मृदा में गेहूँ, कपास, मक्का, आलू आदि के बाद दूसरी फसल दलहन के पौधों की होनी चाहिए। इन पौधों की जड़ों में गॉठे पाई जाती है जिससे उसमें उपस्थित जीवाणु द्वारा वायुमण्डल के नाइट्रोजन का यौगिकीकरण होता है। इससे मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. मल्च बनाना\u003C\/b\u003E - फसल काटने के पश्चात् पौधों के ठूँठ मिट्टी के अन्दर रह जाती है, जो एक संरक्षक परत की भाँति कार्य करते हैं। इस कारण हवा तथा जल द्वारा होने वाला मृदा अपरदन रूक जाता है तथा वाष्पन कम होने के कारण मिट्टी में जल की अधिक मात्रा एकत्रित रहती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. कण्टूर कृषि \u003C\/b\u003E- इस प्रकार की कृषि पहाड़ों की ढलानों पर अधिक उपयोगी है। खेतों में या ढलान वाले क्षेत्रों में खाँचे बनाए जाते हैं। जिससे पानी इसमें रुक जाता है तथा मृदा का अपरदन नहीं होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E4. पट्टीदार खेती\u003C\/b\u003E - यह एक प्रकार की होती है। इसमें खेत को पट्टियों में विभाजित कर दिया जाता है। प्रत्येक पट्टी पर बड़े पौधों के बीच के स्थान में छोटे पौधों वाली फसल गेहूँ, उड़द आदि बोई जाती है। इस प्रकार की फसलें मिट्टी से बंधी रहती है। इससे वायु एवं जल द्वारा होने वाला अपरदन रुक जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E5. ड्राई खेती\u003C\/b\u003E - जिन क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है। उसमें बहुत कम फसले ही उग पाती हैं। अतः इन स्थानों पर पशुओं को चरने के लिए घास उगाई जाती है जिससे मृदा का अपरदन नहीं हो पाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E8. वनारोपण\u003C\/b\u003E - जंगली वृक्षों का रोपण वनारोपण कहलाता हैं। शुरु में वृक्षों की वृद्धि धीमी रहती है परन्तु कुछ समय बाद इनकी वृद्धि तथा विकास में तेजी आने पर ये मृदा अपरदन को रोकने में सहायक होते हैं। वृक्षों की पत्तियाँ भूमि पर गिरती हैं जिससे ह्यूमस बनता है तथा भूमि की उर्वरा शक्ति भी बढ़ जाती है। इन वृक्षों के नीचे अनेक वनस्पतियाँ भी उगाई जा सकती हैं। यह मिट्टी के कणों को बाँधने में सहायक होती है तथा मृदा अपरदन रुकता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003Eयान्त्रिक विधियाँ -\u003C\/h4\u003E\u003Cp\u003Eमृदा अपरदन को रोकने के लिये मुख्य यान्त्रिक विधियाँ निम्न है -\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. वेदिका लगाना \u003C\/b\u003E- पहाड़ों पर ढलान वाले क्षेत्रों में छोटे-छोटे बाँध बना दिए जाते हैं तथा खेतों को बेंचनुमा क्षेत्रों में विभक्त किया जाता है। जिसे वेदिका कहते हैं। इससे जल प्रवाह की गति कम हो जाती है तथा मृदा अपरदन रुक जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. बाँध बनाना\u003C\/b\u003E - नदियों में बाढ़ को नियन्त्रित करने के लिए बाँध बनाए जाते हैं। इससे वर्षा का पानी एकत्रित कर लिया जाता है, जिसका उपयोग सिंचाई तथा विद्युत उत्पादन में किया जाता है। बाँध बनाने से मृदा अपरदन एवं भूमि कटाव में कमी आती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. जैव उर्वरकों का उपयोग \u003C\/b\u003E- जैव उर्वरक वास्तव में उर्वरक नहीं है। ये सूक्ष्म जीवाणु होते हैं जो वातावरण से नाइट्रोजन स्थिर करके भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं। ये रासायनिक उर्वरक के विकल्प हो सकते हैं तथा पर्यावरण की दृष्टि से भी सुरक्षित माने जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eये उर्वरक पौधें को अधिक सक्षम बनाते है। भूमि में स्थिर तत्वों जैसे फास्फोरस की कमी वाले भूमि में इसका उपयोग लाभदायी पाया गया है। इसी प्रकार जैव कीटनाशकों का प्रयोग भी रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर किया जा रहा है इससे मृदा एवं जल प्रदूषित नही होते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभविष्य में जैव उर्वरकों एवं जैव कीटनाशकों के उपयोग की प्रबल संभावनाएं है जिससे रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक का उपयोग कम किया जा सकता हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/6988831143098460038\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mrida-sansadhan.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/6988831143098460038"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/6988831143098460038"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mrida-sansadhan.html","title":"मृदा संरक्षण किसे कहते हैं? "}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"media$thumbnail":{"xmlns$media":"http://search.yahoo.com/mrss/","url":"https:\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEhhtFWa1hAf2vJMANT-dgISxYIX_ADiZCBCH2GiZMSAk2U_EH2uufNqXT__WuEqJhBbcYSJa68UBOAYowYqn2GEHHDU54lczeq5qh5CqmJKo5DqxSTC_WuiPtRYujtlq5QijLqun2TX2obEnT_r_U8IWLipr7t9oPtfW6vWgvXS_1uj-3X55jBTNemblA\/s72-w320-h240-c\/20230220_114404.webp","height":"72","width":"72"},"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-3066964443969526348"},"published":{"$t":"2021-11-30T08:31:00.045+05:30"},"updated":{"$t":"2023-12-13T14:05:23.580+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"पर्यावरण किसे कहते हैं? "},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eपृथ्वी पर पायी जाने वाली सभी प्राकृतिक चीजें को पर्यावरण के अंतर्गत आता हैं। जैसे - जल, वायु, सूर्य का प्रकाश, भूमि, अग्नि, जंगल, जीव जंतु आदि। हमारे सौर मंडल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन युक्त पर्यावरण है। पर्यावरण के बिना हम यहाँ जीवन का कल्पना भी नहीं कर सकते हैं इसलिए हमारे भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए पर्यावरण को सुरक्षित रखना जरूरी हैं। यह पृथ्वी पर रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण किसे कहते हैं\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003Eहमारे चारो और पाए जाने वाले वातवरण को पर्यावण कहा जाता हैं। जैसे पेड़-पौधे, जिव-जंतु और पहाड़ और नदिया पर्यावण के अंग हैं। पर्यावरण में वे सभी जीवित और निर्जीव चीजों को शामिल किया जाता है। जो कृत्रिम नहीं है। पर्यावरण में सभी जीवित प्रजातियों, जलवायु, मौसम और प्राकृतिक संसाधनों को शामिल किया जाता है, जो मानव अस्तित्व को प्रभावित करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहम सभी पर्यावरण से अच्छी तरह परिचित हैं। वह सब कुछ है जो हमें प्राकृतिक रूप से घेरे हुए है और पृथ्वी पर हमारे दैनिक जीवन को प्रभावित करते है। पर्यावण कहलाते हैं। हवा जिसमें हम हर पल सांस लेते हैं, वह पानी जो हम अपनी दिनचर्या के लिए उपयोग करते हैं, पौधे, जानवर और अन्य जीवित चीजें पर्यावण के अंतर्गत आती हैं। जब प्राकृतिक चक्र बिना किसी व्यवधान के चलता रहता है तो उसे स्वस्थ पर्यावरण कहा जाता है। प्रकृति के संतुलन में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पर्यावरण को पूरी तरह से प्रभावित करती है जो मानव जीवन को बर्बाद कर सकती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eपर्यावरण की परिभाषा\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E-\u0026nbsp;पर्यावरण में सभी जीवित और निर्जीव तत्वों को शामिल किया जाता हैं। जो मानव जीवन को प्रभावित करते हैं।\u0026nbsp;पर्यावरण शब्द का उपयोग अधिकतर अपने चारों ओर से घेरे हुए प्रकृति को संदर्भित करने के लिए किया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण से आप क्या समझते हैं\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण एक प्राकृतिक परिवेश है जो पृथ्वी पर जीवन को पोषित और नष्ट करने में मदद करता है। प्राकृतिक पर्यावरण पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व में एक बड़ी भूमिका निभाता है और यह मनुष्य सहित जीव जंतुओं और अन्य जीवित चीजों को विकसित होने में मदद करता है। लेकिन मनुष्य की स्वार्थी गतिविधियों के कारण हमारा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। यह सबसे महत्वपूर्ण विषय है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण के प्रकार\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण दो प्रकार के होते हैं। जो निम्नलिखित हैं -\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eभौगोलिक पर्यावरण\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eमानव निर्मित पर्यावरण\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. भौगोलिक पर्यावरण\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;- प्रकृति द्वारा प्रदान किए गए सभी वस्तुओं से बना होता है और यह मानव नियंत्रण से बाहर होता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभौगोलिक पर्यावरण को प्राकृतिक पर्यावरण भी कहा जाता है, यह प्राकृतिक परिस्थितियों से बना एक वातावरण होता है। जिसमे प्राकृतिक संसाधन जैसे जलवायु, नदियाँ, पहाड़, रेगिस्तान, भूमि, जल, महासागर, ज्वालामुखी आदि शामिल हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभौगोलिक पर्यावरण का संबंध जलवायु विज्ञान, भूविज्ञान और जैव भूगोल से है। भौगोलिक पर्यावरण किसी देश की अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं। क्योंकि यह कई बहुमूल्य संसाधन पाया जाता हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. मानव निर्मित पर्यावरण \u003C\/b\u003E- मानव द्वारा बनाए गए वातावरण को मानव निर्मित पर्यावरण कहा जाता है। इसमें इंसान इमारतों, सड़कों और पुलों जैसी चीजों को शामिल किया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eटेक्नोलॉजी के विकास से पहले मनुष्य ने अपने आप को प्राकृतिक के अनुकूल बना लिया था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं के अनुसार प्राकृतिक वस्तुवों का इतेमाल अपने जरूरतों के लिए करने लगा। जिससे एक मानव निर्मित पर्यावण कर निर्माण हो गया हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण की विशेषताएं\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण जीवन के लिए वरदान हैं। जब प्रकृति अपने आप को ठीक करने के लिए परिवर्तित करता हैं तो वह जीवन के अनुकूल हो सकते हैं। हालाँकि, कई दशकों से मनुष्य पर्यावरण को अपने फायदे के लिए नुकसान पंहुचा रहा हैं। जिसके कारण कई जानवरों के आवास कम हो गए हैं, और कई प्रजातियां विलुप्त हो गईं हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण एक जटिल प्रणाली है जिसमें सभी एक दूसरे संबंधित होते हैं।\u0026nbsp;पर्यावरण में निम्नलिखित विशेषताएं पायी जाती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E1. जीव -\u003C\/b\u003E जीवित वस्तुवों का वह समूह है जो पर्यावरण में रहते हैं। पर्यावरण में सभी पौधे और जानवर दोनों शामिल हैं। सभी जीव पर्यावरण को प्रभावित करता है और इससे प्रभावित होते है। उदाहरण के लिए, मवेशियों की बड़ी आबादी घास के मैदान को साफ कर सकती है, जिससे पूरा पर्यावरण प्रभावित होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E2. वायु\u0026nbsp; \u003C\/b\u003E- पर्यावरण के तत्वों में से एक है। वायु सूक्ष्मजीव जैसे वायरस और बैक्टीरिया जो पर्यावरण में फैला देते हैं। पराग या बीज भी हवा के साथ कई किलोमीटर की दुरी तय करते हैं। जिसके कारण जैव विवधता संबह हो पता हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E3. पानी\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;- जीवों के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। जल प्रदूषकों का वायु और मृदा प्रदूषकों से गहरा संबंध है। पानी की उपस्थिति या अनुपस्थिति जीवित प्राणियों, जानवरों और पौधों दोनों की आबादी को प्रभावित करती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E4.\u0026nbsp;तापमान\u003C\/b\u003E - पर्यावरण के अजैविक कारकों में से एक है और इसने हाल के दशकों में ग्लोबल वार्मिंग की घटना के कारण वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है। विश्व का औसत तापमान में वृद्धि वायु प्रदूषण और वनों की कटाई जैसे कई पर्यावरणीय कारकों का परिणाम है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E5. भौगोलिक संरचना -\u003C\/b\u003E पर्यावरण में भू-आकृतियाँ महत्वपूर्ण होती हैं। जैसे नदियों के पास बसे शहर पानी लाभान्वित होते हैं। इसके विपरीत, पहाड़ वहाँ के लोगो को शुद्ध हवा और बारिश प्रदान करती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण का महत्व\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण हमारे व अन्य जंतुओं के लिए अति आवश्यक है। इससे हमें भोजन और पानी प्राप्त होता हैं। अनुकूल वातावरण एक ग्रह को जीवन प्रदान करता हैं। इसमें सामान्य तापमान शुद्ध हवा और पानी की आवश्यकता होती हैं। जो हमारे ग्रह पृथ्वी पर पाया जाता हैं। यह हमारे लिए मत्वपूर्ण हैं इसकी रक्षा करना हमारा प्रथम कर्तव्य हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयदि आप एक कार्यालय में काम करते हैं, तो आपको लगता होगा की पर्यावरण लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करता है। अरबों लोग पर्यावरण पर निर्भर हैं। 1.5 बिलियन से अधिक लोग भोजन, आवास और दवा के लिए जंगलों पर निर्भर होते हैं। 2 बिलियन यानि दुनिया की आबादी का लगभग 27% लोग कृषि पर निर्भर हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण लाखों नई नौकरियां पैदा कर सकती हैं और इससे गरीबी को कम करने में मदद मिल सकती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया हैं की ग्रीन र्थव्यवस्थाओं में स्थानांतरित होने से 2030 तक 24 मिलियन नई नौकरियां पैदा हो सकती हैं। कई लोगो को डर लगता है कि ग्रीन ऊर्जा पर स्विच होने से लोग गरीब हो जायेंगे लेकिन ऐसा नहीं हैं इससे कई नयी नौकरिया उत्पन्न होंगी।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003Eपर्यावरण की अवधारणा\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवातावरण शब्द का अर्थ वह सब कुछ जो हमें घेरता है। इसे भौतिक, रासायनिक और जैविक रूप में परिभाषित किया गया है जो एक जीव या पारिस्थितिक समुदाय के लिए आवश्यक हैं और यह इसके अस्तित्व को निर्धारित करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण की भौतिक, जैविक और सांस्कृतिक तत्वों के साथ परस्पर संबंधित है। अंतरिक्ष, भू-आकृतियाँ, जलवायु, मिट्टी, चट्टानें और खनिज ऐसे भौतिक तत्व हैं जो मानव आवास की सीमाओं को निर्धारित करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजैविक पर्यावरण में वनस्पति और जीव शामिल हैं। सभी जीव कई स्तरों पर अपने समूह और संगठन का निर्माण कर सामाजिक वातावरण बनाते है। इस सामाजिक वातावरण में, जीव अपने भरण-पोषण और विकास के लिए भौतिक पर्यावरण से संसाधन प्राप्त करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्रश्न 1. प्राकृतिक पर्यावरण किसे कहते हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eउत्तर -\u0026nbsp;प्राकृतिक पर्यावरण में प्राकृतिक रूप से पायी जाने वाली सभी जीवित और निर्जीव चीजों को समाहित किया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्रश्न 2. भौतिक पर्यावरण किसे कहते हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eउत्तर -\u0026nbsp;भौतिक वातावरण वह है जहाँ व्यक्ति रहते हैं। लोग अपने भौतिक वातावरण में सभी कार्य करते हैं जो उनके जीवन के लिए आवश्यक होता हैं। जैसे खाना, रहना, सोना आदि। खराब भौतिक वातावरण हमारी और हमारे परिवारों की लंबी और स्वस्थ जीवन जीने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/3066964443969526348\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/3066964443969526348"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/3066964443969526348"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html","title":"पर्यावरण किसे कहते हैं? 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"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\n  बायोगैस एक ज्वलनशील गैसीय मिश्रण है। मिश्रण में मुख्यतया मीथेन तथा को CO2 होती\n  है। बल गैस दस उत्पादन ऐसा पशुओँ तथा मनुष्यो दस मल मूत्र का उपयोग होती\n  है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इसमें एक पाचन प्रक्रिया किया जाता है जिसके द्वारा मवेशियों का गोबर मानव\n  मलमूत्र अन्य जानवरों व पक्षियों का मलमूत्र एवं कुछ प्रकार की वनस्पतियो को\n  सड़ाने किण्वन से ज्वलनशील मीथेन गैस एवं उच्च कोटि का खाद दोनों ही वस्तुए एक साथ\n  प्राप्त कि जा सकती है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इस सयंत्र में मुख्य रूप से मवेशियों का गोबर उपयोग में लाया जाता है। अतः इसे\n  गोबर गैस सयंत्र भी कहते है , परन्तु आजकल गोबर के अलावा अन्य पदार्थ भी उपयोग\n  में लाए जाते है इसलिए इसे अब बायोगैस सयंत्र खा जाने लगा है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eबायोगैस के गुण\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    1. बायोगैस मिश्रण में 55-65 % मीथेन तथा 35-40 % CO2 होती है | बांकी अन्य\n    गैसे जैसे हाइड्रोजन सल्फाइड अमोनिया, हाइड्रोजन वाष्प होती है।\n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E2. गैस का अपेक्षित घनत्व 0.9 होता है।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E3. गैस उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त तापक्रम 32-42 C होती है।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E4. गोबर गैस प्लांट में गोबर तथा जल 1 :1 में डाला जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E5. इसके लिए सबसे उचित PH मान 7-8 तक होती है।\u003C\/li\u003E\n\u003C\/ul\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eबायोगैस के लाभ\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003E1. बायोगैस एक नवीनीकरण स्त्रोत है।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    2. बायोगैस एक पप्रदूषणरहित ईंधन है क्योंकि यह वातावरण में कार्बन डाई ऑक्साइड\n    को उतसर्जित नहीं करता।\n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E3. बायोमास \/ बायोगैस में उच्च ऊर्जा दक्षता है।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    4. यह एक मुख्य ऊर्जा स्रोत है जो की सम्पूर्ण आर्थिक विकास में मुख्य भूमिका\n    निभा सकती है।\n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E5. बायोगैस से वनो की\u0026nbsp; कटाई रोकने में सहायता मिलती है।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\n\u003C\/ul\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/1995088643236614470\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/biogas-kise-kahate-hain.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/1995088643236614470"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/1995088643236614470"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/biogas-kise-kahate-hain.html","title":"बायोगैस किसे कहते है? 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"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eबारिश बूंदों के रूप में गिरती है जो वायुमंडलीय जल वाष्प से संघनित होता है और फिर \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/blog-post_498.html\"\u003Eगुरुत्वाकर्षण \u003C\/a\u003Eके कारण पानी की बूँद के रूप मे गिरता है। वर्षा \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/water-cycle-in-hindi.html\"\u003Eजल चक्र\u003C\/a\u003E का एक प्रमुख घटक है और \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/prithvi-kise-kahate-hain.html\"\u003Eपृथ्वी \u003C\/a\u003Eपर अधिकांश ताजे पानी को जमा करने के लिए जिम्मेदार है। जिसे वर्षा या रैन के नाम से जाना जाता हैं। अम्लीय वर्षा क्या है इस पर आगे चर्चा होगी?\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eअम्लीय वर्षा किसे कहते हैं\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003E\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/08\/atmosphere-in-hindi.html\"\u003Eवायुमंडल \u003C\/a\u003Eमें संचित कार्बन-डाइऑक्साइड, सल्फर-डाइऑक्साइड और नाइट्रिक ऑक्साइड\n  वर्षा के दौरान जल से क्रिया करते है। और वर्षा जल को\n  अम्लीय जल में परिवर्तित कर देते है। जिसे \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/who-is-called-acid.html\"\u003Eअम्लीय \u003C\/a\u003Eवर्षा कहा जाता हैं। वर्षा जल के\n  साथ मुख्यतया सल्फर और नाइट्रोजन ऑक्साइड के अवक्षेपण को अम्लीय वर्षा कहा जाता हैं।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003Eसाधारणतया वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड गैस विद्यमान रहती है। यह\nगैस बड़ी सरलता से जल में घुलकर कार्बोनिक अम्ल का निर्माण करती है। इस कारण वर्षा\nजल का पी. एच. मन सामान्य से कुछ कम 6.5 रहती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपरन्तु सल्फर-डाइऑक्साइड,\nसक्फर-ट्राइऑक्साइड तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड गैसें जो वायु प्रदुषण के फलस्वरूप\nवायुमंडल में रहती है। वर्षा जल में अवशोषित होकर उसके पि एच मान में कमी लाती है।\nइस कारण वर्षा जल अम्ल वर्षा में परिवर्तित हो जाता है।\n\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eअम्ल वर्षा का क्या कारण है\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eअम्लीय वर्षा तब होता है जब सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOX) वायुमंडल में उत्सर्जित होते हैं और हवा और वायु धाराओं द्वारा ले जाया जाता है। SO2 और NOX पानी, ऑक्सीजन और अन्य रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करके सल्फ्यूरिक और नाइट्रिक एसिड बनाते हैं। फिर ये जमीन पर गिरने से पहले पानी और अन्य सामग्री के साथ मिल जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजबकि अम्ल वर्षा का कारण बनने वाले SO2 और NOX का एक छोटा हिस्सा ज्वालामुखी जैसे प्राकृतिक स्रोतों से होता है, इसका अधिकांश भाग जीवाश्म ईंधन के जलने से आता है। वायुमंडल में SO2 और NOX के प्रमुख स्रोत हैं:\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eबिजली पैदा करने के लिए जीवाश्म ईंधन को जलाना।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eवायुमंडल में दो तिहाई SO2 और NOX का एक चौथाई विद्युत ऊर्जा जनरेटर से आता है।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eवाहन और भारी उपकरण।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eविनिर्माण, तेल रिफाइनरी और अन्य उद्योग।\u003C\/li\u003E\u003C\/ul\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहवाएँ SO2 और NOX को लंबी दूरी और सीमाओं के पार उड़ा सकती हैं, जिससे अम्लीय वर्षा सभी के लिए एक समस्या बन जाती है, न कि केवल उन लोगों के लिए जो इन स्रोतों के करीब रहते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eअम्लीय वर्षा का पीएच मान\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eअम्लता और क्षारीयता को पीएच पैमाने का उपयोग करके मापा जाता है जिसके लिए 7.0 तटस्थ है। किसी पदार्थ का pH जितना कम (7 से कम), उतना ही अधिक अम्लीय होता है। किसी पदार्थ का pH जितना अधिक (7 से अधिक), उतना ही अधिक क्षारीय होता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसामान्य वर्षा का pH लगभग 5.6 होता है। यह थोड़ा अम्लीय है क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) इसमें घुलकर कमजोर कार्बोनिक एसिड बनाता है। अम्लीय वर्षा का पीएच आमतौर पर 4.2 और 4.4 के बीच होता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eअम्लीय वर्षा के प्रभाव\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eजलीय जीवों पर प्रभाव\u003C\/b\u003E - पारिस्थितिकी तंत्र पौधों, जानवरों और अन्य जीवों के साथ-साथ हवा, पानी और मिट्टी सहित \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u003C\/a\u003E का एक समूह है। पारिस्थितिकी तंत्र में सब कुछ जुड़ा हुआ है। अगर कोई चीज किसी पारिस्थितिकी तंत्र के एक हिस्से को नुकसान पहुंचाती है। तो इसका असर बाकी सभी चीजों पर पड़ता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअम्लीय वर्षा का प्रभाव जलीय जीवों में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। जैसे कि नदी, झीलें और दलदल जहाँ मछली और अन्य वन्यजीव रहते है। जैसे ही अम्लीय वर्षा मिट्टी से बहता हुआ इन जल भागों मे मिलता हैं तो जलीय जीवों की मृत्यु हो जाती हैं। तथा जलीय पौधों को भी नुकसान होता हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eपेड़ों पर प्रभाव \u003C\/b\u003E- अम्लीय वर्षा से प्रभावित क्षेत्रों में मृत पेड़ एक आम दृश्य होता हैं। क्योंकि अम्लीय वर्षा मिट्टी से एल्युमिनियम का रिसाव होता है। वह एल्युमीनियम पौधों के साथ-साथ जानवरों के लिए भी हानिकारक हो सकता है। अम्लीय वर्षा मिट्टी से खनिजों और पोषक तत्वों को भी नस्ट कर देती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअधिक ऊंचाई पर, अम्लीय कोहरे और बादल पेड़ों के पत्ते से पोषक तत्व छीन सकते हैं, जिससे पत्तियां भूरे या मृत हो जाते हैं। पेड़ तब सूरज की रोशनी को कम अवशोषित कर पाते हैं, जिससे वे कमजोर हो जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eमानव स्वास्थ्य पर प्रभाव \u003C\/b\u003E- अम्लीय वर्षा में चलना या अम्लीय वर्षा से प्रभावित \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/what-is-lake-in-hindi.html\"\u003Eझील\u003C\/a\u003E में तैरना से कोई हानिकारक प्रभाव नहीं देखा गया है। हालांकि जब अम्लीय वर्षा का कारण बनने वाले प्रदूषक-SO2 और NO X, साथ ही सल्फेट और नाइट्रेट कण हवा में होते हैं, तो वे मनुष्यों के लिए हानिकारक हो सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003ESO 2 और NO X वातावरण में प्रतिक्रिया करके महीन सल्फेट और नाइट्रेट कण बनाते हैं. जिन्हें लोग अपने सांस लेकर फेफड़ों में ले जाते हैं। कई वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है की ये कण हृदय के कार्य पर प्रभाव डालते है। जैसे कि दिल का दौरा, जिसके परिणामस्वरूप हृदय रोग के जोखिम वाले लोगों की मृत्यु हो जाती है। इससे फेफड़ों के कार्य पर प्रभाव पड़ता हैं। जैसे अस्थमा से पीड़ित लोगों को सांस लेने में कठिनाई होती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cdiv\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003C\/div\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/6100147613542343585\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/acid-rain-kiya-hai.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/6100147613542343585"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/6100147613542343585"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/acid-rain-kiya-hai.html","title":"अम्लीय वर्षा किसे कहते हैं? 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हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eआसान भाषा में कहा जाये तो बंजर भूमि वह भूमि है जिस पर खेती नहीं की जा सकती है। खेती योग्य बंजर भूमि वे बंजर भूमि हैं जो 5 वर्षों से अधिक समय तक बिना खेती के छोड़ दी जाती हैं, और बाद में उसे कृषि उपयोग में लाया जा सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/7863085733937985256\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/banjar-bhumi-kise-kahate-hain.html#comment-form","title":"0 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-4846615323985707779"},"published":{"$t":"2021-10-26T15:39:00.010+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:29:15.734+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"जलमंडल क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eजलमंडल एक ग्रह पर पानी की कुल मात्रा है। जलमंडल में पानी शामिल है जो ग्रह की सतह पर, भूमिगत और हवा में है। किसी ग्रह का जलमंडल तरल, वाष्प या \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/what-is-ice.html\"\u003Eबर्फ\u003C\/a\u003E हो सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी पर, तरल जल सतह पर महासागरों, झीलों और नदियों के रूप में मौजूद है। यह जमीन के नीचे भी मौजूद है - भूजल के रूप में, कुओं और एक्वीफर्स में। जल वाष्प सबसे अधिक बादलों और कोहरे के रूप में दिखाई देता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी के जलमंडल का जमे हुए भाग बर्फ से बना है: हिमनद, बर्फ की टोपी और हिमखंड। जलमंडल के जमे हुए हिस्से का अपना नाम क्रायोस्फीयर है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजल एक चक्र में जलमंडल से होकर गुजरता है। पानी बादलों में इकट्ठा हो जाता है, फिर बारिश या बर्फ के रूप में पृथ्वी पर गिर जाता है। यह पानी नदियों, झीलों और महासागरों में इकट्ठा होता है। फिर यह चक्र फिर से शुरू करने के लिए वायुमंडल में वाष्पित हो जाता है। इसे पानी चक्र कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/antriksh-kise-kahate-hain.html\"\u003Eअंतरिक्ष\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eमें जलमंडल - कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरोपा, बृहस्पति के चंद्रमा पर एक जलमंडल मौजूद है, जिसमें एक जमी हुई बाहरी परत और उसके नीचे एक विशाल, तरल महासागर होता है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/4846615323985707779\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/what-is-hydrosphere.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/4846615323985707779"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/4846615323985707779"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/what-is-hydrosphere.html","title":"जलमंडल क्या है?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh 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एस्थेनोस्फीयर से घिरा है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहालांकि स्थलमंडल की चट्टानों को अभी भी लोचदार माना जाता है, लेकिन वे चिपचिपी नहीं होती हैं। एस्थेनोस्फीयर चिपचिपा है, और लिथोस्फीयर-एस्टेनोस्फीयर सीमा वह बिंदु है जहां भूवैज्ञानिक और रियोलॉजिस्ट- वैज्ञानिक जो पदार्थ के प्रवाह का अध्ययन करते हैं- ऊपरी मेंटल की दो परतों के बीच लचीलापन में अंतर को चिह्नित करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eलचीलापन एक ठोस सामग्री की तनाव के तहत विकृत या खिंचाव की क्षमता को मापता है। लिथोस्फीयर, एस्थेनोस्फीयर की तुलना में बहुत कम नमनीय है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eस्थलमंडल दो प्रकार के होते हैं: महासागरीय स्थलमंडल और महाद्वीपीय स्थलमंडल। महासागरीय स्थलमंडल महासागरीय क्रस्ट से जुड़ा है, और महाद्वीपीय स्थलमंडल की तुलना में थोड़ा सघन है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्लेट टेक्टोनिक्स\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी के स्थलमंडल से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध विशेषता विवर्तनिक गतिविधि है। टेक्टोनिक गतिविधि स्थलमंडल के विशाल स्लैबों की परस्पर क्रिया का वर्णन करती है जिन्हें \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/10\/blog-post_27.html\"\u003Eटेक्टोनिक प्लेट\u003C\/a\u003E कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eलिथोस्फीयर को उत्तरी अमेरिकी, कैरिबियन, दक्षिण अमेरिकी, स्कोटिया, अंटार्कटिक, यूरेशियन, अरब, अफ्रीकी, भारतीय, फिलीपीन, ऑस्ट्रेलियाई, प्रशांत, जुआन डी फूका, कोकोस और नाज़का सहित टेक्टोनिक प्लेटों में विभाजित किया गया है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअधिकांश टेक्टोनिक गतिविधि इन प्लेटों की सीमाओं पर होती है, जहां वे टकरा सकती हैं, फट सकती हैं या एक-दूसरे से टकरा सकती हैं। स्थलमंडल के मेंटल भाग से तापीय ऊर्जा द्वारा टेक्टोनिक प्लेटों की गति संभव होती है। तापीय ऊर्जा स्थलमंडल की चट्टानों को अधिक लोचदार बनाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी की कुछ सबसे नाटकीय भूगर्भीय घटनाओं के लिए टेक्टोनिक गतिविधि जिम्मेदार है: भूकंप, ज्वालामुखी, ऑरोजेनी, और गहरे समुद्र की खाइयां सभी स्थलमंडल में विवर्तनिक गतिविधि द्वारा बनाई जा सकती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eटेक्टोनिक गतिविधि लिथोस्फीयर को ही आकार दे सकती है: समुद्री और महाद्वीपीय लिथोस्फीयर दोनों रिफ्ट घाटियों और महासागर की लकीरों पर सबसे पतले होते हैं, जहां टेक्टोनिक प्लेट्स एक दूसरे से अलग हो रहे हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/3579596928928443957\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/what-is-lithosphere.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/3579596928928443957"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/3579596928928443957"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/what-is-lithosphere.html","title":"स्थलमंडल क्या है?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh 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किया गया है जहां जीवन मौजूद है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल पृथ्वी की सतह पर एक संकीर्ण क्षेत्र है जहां जीवन को बनाए रखने के लिए मिट्टी, पानी और हवा मिलती है। जीवन केवल इसी क्षेत्र में घटित हो सकता है। कवक और बैक्टीरिया से लेकर बड़े जानवरों तक, कई अलग-अलग प्रकार के जीवन होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में जाना जाता है जिसमें सभी जीवित जीव और उनकी गतिविधियों के उत्पाद शामिल हैं। नतीजतन, यह पारिस्थितिक तंत्र के रखरखाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यानी प्रजातियों के अस्तित्व और उनकी पारस्परिक बातचीत। और जीवमंडल जलवायु नियमन के लिए महत्वपूर्ण है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल संसाधन\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल महत्वपूर्ण संसाधन प्रदान करता है। बहुत से लोग भोजन, दवा, निर्माण सामग्री और ईंधन सहित मूलभूत आवश्यकताओं के लिए जीवमंडल पर निर्भर हैं। विशेष रूप से स्वदेशी लोग। नमक को छोड़कर, सभी भोजन जीवमंडल से आता है, लेकिन स्थापित समाज चारा के बजाय खेती करना पसंद करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल पृथ्वी की सतह की एक अपेक्षाकृत पतली परत है जो जीवन का समर्थन करती है, कुछ किलोमीटर से वायुमंडल में गहरे समुद्र के छिद्रों तक पहुंचती है। जीवमंडल एक वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र है जो जीवित जीवों (बायोटा) और निर्जीव (अजैविक) कारकों से बना है जो उन्हें ऊर्जा और पोषक तत्व प्रदान करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल पृथ्वी की सतह पर एक संकीर्ण क्षेत्र है जहां जीवन को बनाए रखने के लिए मिट्टी, पानी और हवा मिलती है। जीवन केवल इसी क्षेत्र में घटित हो सकता है। कवक और बैक्टीरिया से लेकर बड़े जानवरों तक, कई अलग-अलग प्रकार के जीवन होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल का महत्व\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल जीवित रहने के लिए आवश्यक पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करता है। जीवों के लिए जीवमंडल की जलवायु के अनुकूलन की अपेक्षा की जाती है। पारिस्थितिक तंत्र के भीतर जैव विविधता पनपती है, और जीवमंडल पृथ्वी पर भोजन का एक विश्वसनीय स्रोत है। जैव विविधता वही है जो जैविक विविधता की तरह लगती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपौधों और जानवरों के संरक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्रों को बायोस्फीयर रिजर्व के रूप में जाना जाता है। यह क्षेत्र में आदिवासियों के जीवन के पारंपरिक तरीके को बहाल करने में भी मदद करता है। वे क्षेत्र की जैव विविधता की रक्षा करते हैं। जीवमंडल पारिस्थितिक संगठन का उच्चतम स्तर है। यह सभी प्रकार के जीवन के साथ-साथ पृथ्वी पर किसी भी बायोम को कवर करता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल ग्रह के जीवन समर्थन प्रणाली के रूप में कार्य करता है, वायुमंडलीय संरचना, मिट्टी के स्वास्थ्य और जल विज्ञान (जल) चक्र के नियंत्रण में सहायता करता है। पृथ्वी पर बायोम के योगदान का सूचक। जीवमंडल पृथ्वी की सतह पर एक संकीर्ण क्षेत्र है जहां जीवन को बनाए रखने के लिए मिट्टी, पानी और हवा मिलती है। जीवन केवल इसी क्षेत्र में घटित हो सकता है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/7522998544407205211\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/what-is-biosphere-in-hindi.html#comment-form","title":"0 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प्राकृतिक\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eकी स्थिति मानव गतिविधियों के परिणामस्वरूप संभावित हानिकारक पदार्थों से दूषित हो रही है। प्रदूषकों को संयुक्त रूप से संदूषक कहा जाता है क्योंकि वे प्राकृतिक वातावरण को दूषित और परिवर्तित करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण प्रदूषण के प्रकार होते हैं\u0026nbsp;\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003Eप्रदूषण के अधीन प्राकृतिक वातावरण में मुख्य रूप से जल, वायु और भूमि शामिल हैं। पदार्थों की उपस्थिति जैसे तरल, गैस, ठोस या ऊर्जा जैसे गर्मी, प्रकाश, विकिरण, शोर जिनके गुण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राकृतिक पर्यावरणीय प्रक्रिया को आंशिक रूप से या संपूर्ण रूप से बदलते हैं, और कारण या पैदा करने की क्षमता रखते हैं मनुष्यों, जानवरों या पौधों के स्वास्थ्य या कल्याण को नुकसान प्रदूषण को परिभाषित करता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E1. वायु प्रदूषण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवायु प्रदूषण हवा में हानिकारक पदार्थों की शुरूआत है जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरण और मानवता पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। वायु प्रदूषण केवल वायु को अशुद्ध या दूषित बनाता है। यह तब होता है जब हानिकारक पदार्थ जैसे विदेशी गैसें, गंध, धूल, या धुएं को हवा में ऐसे स्तरों पर छोड़ा जाता है जो जानवरों और मनुष्यों के आराम या स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं, या यहां तक कि पौधों के जीवन को भी नष्ट कर सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवायु प्रदूषकों (वायु को प्रदूषित करने वाले पदार्थ) के उदाहरणों में हाइड्रोकार्बन, कार्बनिक यौगिक, धूल के कण, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड शामिल हैं। वायु प्रदूषण मानव और प्राकृतिक दोनों गतिविधियों से होता है। बिजली संयंत्रों से उत्सर्जन वायु प्रदूषण में योगदान देने वाली मानवीय गतिविधियों का एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करता है जबकि ज्वालामुखी विस्फोट और जंगल की आग कुछ प्राकृतिक पहलू हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E2. जल प्रदूषण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजल प्रदूषण नदियों, महासागरों, झीलों, नदियों, जलभृतों और भूजल सहित जल निकायों को दूषित करने का कार्य है। यह तब होता है जब विदेशी हानिकारक पदार्थ जैसे रसायन, अपशिष्ट पदार्थ या दूषित पदार्थ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जल निकायों में छोड़े जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eरासायनिक, भौतिक, या जैविक जल गुणों में कोई भी परिवर्तन जल प्रदूषण के रूप में योग्य है। बहुत बार, जल प्रदूषण में प्राथमिक योगदानकर्ता मानवीय गतिविधियाँ होती हैं क्योंकि वे ऐसे पदार्थों का परिचय देते हैं जो पानी को हानिकारक रसायनों और विषाक्त पदार्थों से दूषित करते हैं। जल प्रदूषण को बिंदु स्रोत, गैर-बिंदु स्रोत और भूजल में वर्गीकृत किया गया है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eबिंदु स्रोत जल प्रदूषण तब होता है जब संदूषक एक ही पहचान योग्य स्रोत से जल निकाय में प्रवेश करते हैं जबकि गैर-बिंदु स्रोत विभिन्न मात्रा में दूषित पदार्थों के संचयी प्रभावों के परिणामस्वरूप होता है। भूजल प्रदूषण घुसपैठ के माध्यम से होता है और भूजल स्रोतों जैसे कुओं या जलभृतों को प्रभावित करता है। वायु प्रदूषण के बाद जल को दूसरा सबसे प्रदूषित पर्यावरण संसाधन माना जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E3. भूमि प्रदूषण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eभूमि प्रदूषण, उपयोग, परिदृश्य, और जीवन रूपों का समर्थन करने की क्षमता के मामले में पृथ्वी की भूमि की सतह की गुणवत्ता में विनाश या गिरावट है। कई बार यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मानवीय गतिविधियों और भूमि संसाधनों के दुरुपयोग के कारण होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभूमि प्रदूषण तब होता है जब कचरे और कचरे का सही तरीके से निपटान नहीं किया जाता है, जिससे भूमि पर विषाक्त पदार्थों और रसायनों का प्रवेश होता है। यह तब भी होता है जब लोग रासायनिक उत्पादों को जड़ी-बूटियों, उर्वरकों, कीटनाशकों, या उपभोक्ता उप-उत्पादों के किसी अन्य रूप के रूप में मिट्टी में फेंक देते हैं। खनिज दोहन से समान रूप से पृथ्वी की भूमि की सतह की गुणवत्ता में गिरावट आती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजैसे, मानव स्वास्थ्य, पौधों के जीवन और मिट्टी की गुणवत्ता के लिए इसके गंभीर परिणाम हैं। अम्लीय वर्षा, निर्माण स्थल, ठोस अपशिष्ट, खनिज दोहन और कृषि रसायन भूमि प्रदूषण के प्राथमिक कारण हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E4. मृदा प्रदूषण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eमृदा प्रदूषण तब होता है जब रासायनिक प्रदूषक मिट्टी को दूषित करते हैं या खनन, वनस्पति आवरण की निकासी, या ऊपरी मिट्टी के क्षरण जैसे कार्यों से खराब हो जाते हैं। आमतौर पर, यह तब होता है जब मानवीय गतिविधियाँ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विनाशकारी रसायनों, पदार्थों या वस्तुओं को मिट्टी में इस तरह से मिलाती हैं जिससे तत्काल सांसारिक पर्यावरण को नुकसान होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eनतीजतन, मिट्टी प्राकृतिक खनिजों और पोषक तत्वों की संरचना के अपने मूल्य को खो देती है। मृदा क्षरण भी मृदा प्रदूषण में योगदान देता है, और यह अति-चराई, अति-कृषि या खनन गतिविधियों के परिणामस्वरूप होता है। मृदा प्रदूषण के उल्लेखनीय कारणों में कृषि कृषि गतिविधियाँ, भूमि पर कचरा डंप करना, औद्योगिक गतिविधियाँ, खनन और \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/who-is-called-acid.html\"\u003Eअम्लीय \u003C\/a\u003Eवर्षा शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E5. ध्वनि प्रदूषण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eध्वनि प्रदूषण ज्यादातर एक अवांछनीय ध्वनि या ध्वनि है जो कानों पर भयानक असुविधा उत्पन्न करती है। ध्वनि प्रदूषण को अप्रिय और अवांछनीय ध्वनि स्तरों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो सभी जीवित चीजों के लिए गंभीर असुविधा का कारण बनते हैं। इसे डेसीबल (dB) में मापा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E100 डीबी से अधिक ध्वनि स्तर स्थायी सुनवाई हानि का कारण बन सकता है, और लगभग 90 डीबी का शोर श्रवण कमजोरी का कारण बनता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार औद्योगिक ध्वनि सीमा 75 डीबी है। समकालीन समाज में, परिवहन, औद्योगिक निर्माण और प्रौद्योगिकी जैसी दैनिक गतिविधियों के कारण शोर एक स्थायी पहलू बन गया है। अन्य प्रकार के प्रदूषणों के विपरीत, ध्वनि प्रदूषण में पर्यावरण में संचय के तत्व का अभाव होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयह केवल तब होता है जब तीव्र दबाव की ध्वनि तरंगें मानव कानों तक पहुँचती हैं और ध्वनि कंपन के कारण शरीर की मांसपेशियों को भी प्रभावित कर सकती हैं। ध्वनि प्रदूषण उसी तरह समुद्री और वन्यजीवों को प्रभावित करता है जिस तरह से यह मनुष्यों को प्रभावित करता है, और यहां तक कि उनकी मृत्यु का कारण भी बन सकता है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/7289261034675939332\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/paryavaran-pradushan-ke-prakar.html#comment-form","title":"0 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पदार्थों, या ऊर्जा जैसे शोर, गर्मी या प्रकाश के रूप में आ सकता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्रदूषक प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पदार्थ या ऊर्जा हो सकते हैं, लेकिन प्राकृतिक स्तर से अधिक होने पर उन्हें दूषित माना जाता है। पर्यावरण प्रदूषण तब होता है जब पर्यावरण अपने सिस्टम को बिना किसी संरचनात्मक या कार्यात्मक क्षति के मानव गतिविधियों के हानिकारक उप-उत्पादों को संसाधित और बेअसर नहीं कर सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्रदूषण होता है, एक ओर, क्योंकि प्राकृतिक पर्यावरण नहीं जानता कि अप्राकृतिक रूप से उत्पन्न तत्वों को कैसे विघटित किया जाए, और दूसरी ओर, मनुष्यों की ओर से इस बात की जानकारी का अभाव है कि कैसे विघटित किया जाए।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइन प्रदूषकों को कृत्रिम रूप से यह कई वर्षों तक चल सकता है जिसके दौरान प्रकृति प्रदूषकों को विघटित करने का प्रयास करेगी; सबसे खराब मामलों में से एक में - रेडियोधर्मी प्रदूषकों में - ऐसे प्रदूषकों के अपघटन को पूरा होने में हजारों साल तक का समय लग सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्रदूषण क्यों मायने रखता है\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003Eयह सबसे पहले और सबसे अधिक मायने रखता है क्योंकि इसका महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सेवाओं जैसे स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी के प्रावधान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है जिसके बिना पृथ्वी पर जीवन जैसा कि हम जानते हैं कि अस्तित्व में नहीं होगा। लोगों के कारण हमारे पास प्रदूषण है। प्रदूषण हमारे पर्यावरण को प्रभावित करता है क्योंकि जल प्रदूषण लोगों और पौधों की रहने की स्थिति को प्रभावित कर सकता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्रदूषण हमारे पर्यावरण के शुरू और गिरने का कारण बन सकता है। अगर हमारे पास पौधों और पेड़ों के लिए साफ पानी नहीं होगा तो हम लोगों के खाने के लिए कागज और सब्जियां कैसे उगाएंगे? यही कारण है कि बड़ा विचार पर्यावरण को प्रभावित करता है और लोग प्रदूषण का मुख्य कारण हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण प्रदूषण के प्रकार\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eसामान्यतया, पर्यावरण प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हैं:\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवायु प्रदूषण - सबसे उल्लेखनीय में से कुछ सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, ओजोन, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक और वायुजनित कण हैं, जिनमें रेडियोधर्मी प्रदूषक शायद सबसे विनाशकारी हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजल प्रदूषण - इसमें कीटनाशक और शाकनाशी, खाद्य प्रसंस्करण अपशिष्ट, पशुधन संचालन से प्रदूषक, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक, भारी धातु, रासायनिक अपशिष्ट और अन्य शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमृदा प्रदूषण - हाइड्रोकार्बन, सॉल्वैंट्स और भारी धातु आधुनिक औद्योगिक समाजों में, जीवाश्म ईंधन लगभग सभी कल्पनीय बाधाओं को पार कर गया और हमारे दैनिक जीवन में मजबूती से स्थापित हो गया।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/1844606676244918350\/comments\/default","title":"Post 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-3016246480824291568"},"published":{"$t":"2021-10-26T15:11:00.011+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:28:30.819+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"पर्यावरण का हमारे जीवन में क्या महत्व है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eपर्यावरण वह सब कुछ है जो हमारे चारों ओर है, जिसमें जीवित और निर्जीव दोनों चीजें शामिल हैं जैसे मिट्टी, पानी, जानवर और पौधे, जो खुद को अपने परिवेश के अनुकूल बनाते हैं। यह प्रकृति का उपहार है जो पृथ्वी पर जीवन को पोषित करने में मदद करता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण का हमारे जीवन में क्या महत्व है\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003Eविभिन्न प्रकार की मानवीय गतिविधियाँ हैं जो सीधे पर्यावरणीय आपदाओं के लिए जिम्मेदार हैं, जिनमें शामिल हैं- \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/acid-rain-kiya-hai.html\"\u003Eअम्ल वर्षा\u003C\/a\u003E, महासागरों का अम्लीकरण, जलवायु में परिवर्तन, वनों की कटाई, ओजोन परत का ह्रास, खतरनाक कचरे का निपटान, ग्लोबल वार्मिंग, अधिक जनसंख्या, प्रदूषण , आदि।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी ग्रह पर जीवन के अस्तित्व में\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eएक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पर्यावरण शब्द फ्रांसीसी शब्द \"एनवायरन\" से लिया गया है जिसका अर्थ है \"आसपास\"। एक पारिस्थितिकी तंत्र पर्यावरण में मौजूद सभी जीवित और निर्जीव चीजों को संदर्भित करता है और यह जीवमंडल की नींव है, जो पूरे ग्रह पृथ्वी के स्वास्थ्य को निर्धारित करता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपारिस्थितिकी और पर्यावरण विज्ञान जीवन विज्ञान की शाखाएं हैं, जो मुख्य रूप से जीवों के अध्ययन और जीवों और उनके पर्यावरण के बीच उनकी बातचीत से संबंधित हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपारिस्थितिकी तंत्र के प्रकार\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपारिस्थितिकी तंत्र के दो मुख्य प्रकार हैं। नीचे सूचीबद्ध पारिस्थितिक तंत्र के प्रकार और उदाहरण हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र - यह प्रकृति में पाया जाने वाला प्राकृतिक रूप से उत्पादित जैविक वातावरण है। इसमें रेगिस्तान, जंगल, घास के\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mandan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eमैदान\u003C\/a\u003E, झीलें, पहाड़, तालाब, नदियाँ, महासागर आदि शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकृत्रिम पारिस्थितिकी तंत्र - यह एक कृत्रिम वातावरण है जो मनुष्य द्वारा बनाया और बनाए रखा जाता है। इसमें एक्वेरियम, फसल के खेत, उद्यान, पार्क, चिड़ियाघर आदि शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपर्यावरण के घटकों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजैविक पर्यावरण- इसमें सभी जीवित जीव जैसे जानवर, पक्षी, जंगल, कीड़े, सरीसृप और सूक्ष्मजीव जैसे शैवाल, बैक्टीरिया, कवक, वायरस आदि शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअजैविक पर्यावरण- इसमें सभी निर्जीव घटक जैसे हवा, बादल, धूल, भूमि, पहाड़, नदियाँ, तापमान, आर्द्रता, जल, जल वाष्प, रेत आदि शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपर्यावरण का महत्व\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eस्वस्थ जीवन और ग्रह पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व में पर्यावरण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पृथ्वी विभिन्न जीवित प्रजातियों का घर है और हम सभी भोजन, हवा, पानी और अन्य जरूरतों के लिए पर्यावरण पर निर्भर हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने पर्यावरण को बचाना और उसकी रक्षा करना महत्वपूर्ण है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/3016246480824291568\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/paryavaran-ka-hamare-jeevan-mein-mahatva.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/3016246480824291568"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/3016246480824291568"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/paryavaran-ka-hamare-jeevan-mein-mahatva.html","title":"पर्यावरण का हमारे जीवन में क्या महत्व है?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-1056804865748122218"},"published":{"$t":"2021-10-26T15:06:00.004+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:28:22.453+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"प्राकृतिक पर्यावरण क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eप्राकृतिक पर्यावरण या प्राकृतिक दुनिया में प्राकृतिक रूप से होने वाली सभी जीवित और निर्जीव चीजें शामिल हैं। यह शब्द अक्सर पृथ्वी या पृथ्वी के कुछ हिस्सों पर लागू होता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस वातावरण में सभी जीवित प्रजातियों, जलवायु, मौसम और प्राकृतिक संसाधनों की परस्पर क्रिया शामिल है जो मानव अस्तित्व और आर्थिक गतिविधि को प्रभावित करते हैं। प्राकृतिक\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eकी अवधारणा को घटकों के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सकता है:\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपूर्ण पारिस्थितिक इकाइयाँ जो बड़े पैमाने पर सभ्य मानव हस्तक्षेप के बिना प्राकृतिक प्रणालियों के रूप में कार्य करती हैं, जिसमें सभी वनस्पति, सूक्ष्मजीव, मिट्टी, चट्टानें, वातावरण और प्राकृतिक घटनाएं शामिल हैं जो उनकी सीमाओं और उनकी प्रकृति के भीतर होती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसार्वभौमिक प्राकृतिक संसाधन और भौतिक घटनाएं जिनमें स्पष्ट सीमाओं का अभाव है, जैसे कि हवा, पानी और जलवायु, साथ ही ऊर्जा, विकिरण, विद्युत आवेश और चुंबकत्व, जो सभ्य मानव क्रियाओं से उत्पन्न नहीं होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्राकृतिक पर्यावरण के विपरीत निर्मित पर्यावरण है। ऐसे क्षेत्रों में जहां मानव ने मूल रूप से शहरी और कृषि मे को बदल दिया है, प्राकृतिक पर्यावरण बहुत ही सरल मानव पर्यावरण में बदल गया है। यहां तक कि ऐसे कार्य भी जो कम चरम लगते हैं, जैसे कि मिट्टी की झोपड़ी या रेगिस्तान में एक फोटोवोल्टिक प्रणाली का निर्माण, संशोधित वातावरण एक कृत्रिम वातावरण बन जाता है। हालांकि कई जानवर अपने लिए एक बेहतर वातावरण प्रदान करने के लिए चीजों का निर्माण करते हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/1056804865748122218\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/prakirtik-paryavaran-kya-hai.html#comment-form","title":"0 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-3706483662015471570"},"published":{"$t":"2021-10-24T10:31:00.006+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:28:16.048+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"हरित गृह प्रभाव क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan\u003E\u003Cspan style=\"font-weight: normal;\"\u003Eमानव की प्रकृति विरोधी कार्यों के कारण संतुलित जलवायु चक्र असंतुलित हो\n      गया है। पृथ्वी के वायुमंडल में कुछ विशेष गैसों की मात्रा बढ़ गई है की धरती\n      की गर्मी बाहर नहीं निकल नही पा रही है, इससे उत्पन्न प्रभाव को हरित गृह प्रभाव\n      कहते है।\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-weight: normal;\"\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cspan style=\"font-weight: normal;\"\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan\u003E\u003Cspan style=\"font-weight: normal;\"\u003Eवायुमंडल में मानव जनित कार्बन कार्बन\n        डाइऑक्साइड के आवरण प्रभाव के कारण पृथ्वी की सतह के ताप को हरित\n        गृह प्रभाव कहते है।\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    \u003Cspan\u003E\u003Cspan style=\"font-weight: normal;\"\u003Eहरित गृह प्रभाव उत्पन्न करने वाली गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस आक्साइड प्रमुख है। हैलोजनित गैसें तथा क्लोरो कार्बन (CFC ) भी हरित गृह\n        गैसों की श्रेणी में आती है। इनमे सबसे अधिक योगदान कार्बन डाइऑक्साइड का\n        रहता है।\u003C\/span\u003E\u003C\/span\u003E\u003C\/p\u003E\u003C\/span\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/3706483662015471570\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/green-house-effect.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/3706483662015471570"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/3706483662015471570"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/green-house-effect.html","title":"हरित गृह प्रभाव क्या 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large;\"\u003Eपारिस्थितिक तंत्र क्या है\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पारिस्थितिक तंत्र में प्रत्येक कारक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे पर\n  निर्भर होते है। उदाहरण के लिए, एक पारिस्थितिकी तंत्र के तापमान में बदलाव वहां\n  कौन से पौधे उगेंगे उसे\u0026nbsp;प्रभावित करते हैं। भोजन और आश्रय के लिए पौधों पर\n  निर्भर रहने वाले जानवरों को परिवर्तनों के अनुकूल होना होगा। जैसे\u0026nbsp; मौसम के\n  अनुसार ढलना होगा यह प्रवास करना होगा।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पारिस्थितिक तंत्र बहुत बड़े या बहुत छोटे हो सकते है। जैसे\u0026nbsp;ज्वार के तालाब\n  छोटे पारिस्थितिक तंत्र का\u0026nbsp;उदाहरण\u0026nbsp;हैं।\u0026nbsp;पृथ्वी की सतह जुड़े हुए\n  पारिस्थितिक तंत्र की एक श्रृंखला है। पारिस्थितिक तंत्र अक्सर एक बड़े बायोम में\n  जुड़े होते हैं। बायोम भूमि, समुद्र या वायुमंडल के बड़े हिस्से होते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  उदाहरण के लिए, वन, तालाब, चट्टान और टुंड्रा सभी प्रकार के बायोम हैं। वे आम तौर\n  पर उन पौधों और जानवरों के प्रकार के आधार पर व्यवस्थित होते हैं जो उनमें रहते\n  हैं। प्रत्येक जंगल, प्रत्येक तालाब, प्रत्येक चट्टान, या टुंड्रा के प्रत्येक\n  खंड में, आपको कई अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र मिलेंगे।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र जीवों का एक भूमि-आधारित समुदाय है और किसी क्षेत्र\n  में जैविक और अजैविक घटकों की परस्पर क्रिया है। स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र के\n  उदाहरणों में टुंड्रा, टैगा, समशीतोष्ण पर्णपाती वन, उष्णकटिबंधीय\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/10\/blog-post_88.htm\"\u003Eवर्षावन\u003C\/a\u003E, घास\n  के\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mandan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eमैदान \u003C\/a\u003Eऔर रेगिस्तान शामिल हैं। किसी विशेष स्थान पर पाए जाने वाले स्थलीय पारिस्थितिकी\n  तंत्र का प्रकार तापमान सीमा, प्राप्त वर्षा की औसत मात्रा, मिट्टी के प्रकार और\n  इसे प्राप्त होने वाले प्रकाश की मात्रा पर निर्भर करता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इन संसाधनों का उपयोग स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र में छात्रों की जिज्ञासा को जगाने\n  के लिए करें और यह पता लगाएं कि विभिन्न अजैविक और जैविक कारक किसी विशेष स्थान\n  पर पाए जाने वाले पौधों और जानवरों को कैसे निर्धारित करते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eमरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  उदाहरण के लिए, सहारा रेगिस्तान के बायोम में कई तरह के पारिस्थितिक तंत्र शामिल\n  हैं। शुष्क जलवायु और गर्म मौसम बायोम की विशेषता है। सहारा के भीतर नखलिस्तान\n  पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जिनमें खजूर के पेड़, मीठे पानी और मगरमच्छ जैसे जानवर\n  हैं। हवा द्वारा निर्धारित बदलते परिदृश्य के साथ सहारा में टिब्बा पारिस्थितिकी\n  तंत्र भी है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इन पारिस्थितिक तंत्रों में जीव, जैसे सांप या बिच्छू, लंबे समय तक रेत के टीलों\n  में जीवित रहने में सक्षम होते हैं। सहारा में एक समुद्री वातावरण भी शामिल है,\n  जहां\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/atlantic-ocean-in-hindi.html\"\u003Eअटलांटिक महासागर\u003C\/a\u003E\n  उत्तर पश्चिमी अफ्रीकी तट पर ठंडा कोहरा बनाता है। इस सहारा पारिस्थितिकी तंत्र\n  में झाड़ियाँ हैं जिसे छोटे जानवर अपने भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं, जैसे कि\n  बकरियाँ।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  यहां तक ​​कि समान ध्वनि वाले बायोम में पूरी तरह से अलग पारिस्थितिक तंत्र हो\n  सकते हैं। उदाहरण के लिए, सहारा रेगिस्तान का बायोम मंगोलिया और चीन में गोबी\n  रेगिस्तान के बायोम से बहुत अलग है। गोबी एक ठंडा रेगिस्तान है, जहां लगातार\n  बर्फबारी और ठंड का तापमान रहता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  सहारा के विपरीत, गोबी में रेत में नहीं, बल्कि चट्टान पर आधारित पारिस्थितिकी\n  तंत्र हैं। कुछ घासें ठंडी, शुष्क जलवायु में उगने में सक्षम होती हैं। नतीजतन,\n  इन गोबी पारिस्थितिक तंत्रों में चरने वाले जानवर हैं जैसे कि गज़ेल्स और यहां तक\n  ​​कि ताखी, जंगली घोड़े की एक लुप्तप्राय प्रजाति।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  यहां तक कि गोबी के ठंडे मरुस्थलीय पारितंत्र अंटार्कटिका के ठंडे मरुस्थलीय\n  पारितंत्रों से भिन्न हैं। अंटार्कटिका की मोटी बर्फ की चादर लगभग पूरी तरह से\n  सूखी, नंगी चट्टान से बने महाद्वीप को कवर करती है। इस रेगिस्तानी पारिस्थितिकी\n  तंत्र में केवल कुछ काई उगते हैं, केवल कुछ पक्षियों का समर्थन करते हैं, जैसे कि\n  स्कुआ।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजलीय पारिस्थितिकी तंत्र\u0026nbsp;\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जलीय पारिस्थितिकी तंत्र एक जल-आधारित वातावरण है, जिसमें जीवित जीव\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eकी भौतिक और रासायनिक दोनों विशेषताओं के साथ परस्पर क्रिया करते हैं। ये जीवित\n  प्राणी जिनका भोजन, आश्रय, प्रजनन और अन्य आवश्यक गतिविधियाँ जल-आधारित वातावरण\n  में निर्भर करती हैं, जलीय जीव कहलाते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u0026nbsp;सबसे आम जलीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्र निम्नलिखित हैं - झीलें, महासागर,\n  तालाब, नदियाँ, दलदल आदि हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cb\u003E\u003Cspan\u003Eजलीय पारिस्थितिकी तंत्र के प्रकार\u003C\/span\u003E\u003C\/b\u003E\n\u003C\/h4\u003E\n\u003Cp\u003E\n  सामान्य तौर पर, दो प्रकार के जलीय पारिस्थितिक तंत्र होते हैं समुद्री\n  पारिस्थितिक तंत्र और मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र। समुद्री और मीठे पानी के\n  पारिस्थितिक तंत्र दोनों को आगे विभिन्न जलीय पारिस्थितिक तंत्रों में विभाजित\n  किया गया है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cb\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eसमुद्री जल पारिस्थितिकी तंत्र\u003C\/span\u003E\u003C\/b\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  यह विशेष पारिस्थितिकी तंत्र सबसे बड़ा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र है और पृथ्वी की\n  कुल सतह के 70% से अधिक को कवर करता है। यह पारिस्थितिकी तंत्र लवणता की दृष्टि\n  से अपेक्षाकृत अधिक संकेंद्रित है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  खारे पानी के पारिस्थितिक तंत्र, जिन्हें समुद्री पारिस्थितिक तंत्र के रूप में\n  भी जाना जाता है, जलीय पारिस्थितिक तंत्र हैं जिनके पानी में महत्वपूर्ण मात्रा\n  में घुले हुए लवण होते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  वे दुनिया भर में विविध भौगोलिक स्थानों में पाए जाते हैं। फाइटोप्लांकटन और\n  जेलिफ़िश से लेकर समुद्री शैवाल और रेत तक पाए जाते हैं। अलग-अलग खारे पानी के\n  पारिस्थितिक तंत्र की विशिष्ट विशेषताएं काफी भिन्न होती हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  बहरहाल, जलीय जीवों का शरीर खारे पानी के साथ अच्छी तरह से समायोजित होते है, और\n  उन्हें मीठे पानी में जीवित रहना चुनौतीपूर्ण लग सकता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eउच्च जैव विविधता\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  खारे पानी का पारिस्थितिकी तंत्र ग्रह पर जीवित चीजों का सबसे विविध भंडार है। वे\n  पृथ्वी की सभी वर्तमान ज्ञात प्रजातियों में से लगभग आधे का समर्थन करते हैं,\n  संभवतः एक लाख से अधिक की खोज की जानी बाकी है। उन प्रजातियों के अलावा, जो अपना\n  स्थायी घर बनाती हैं, खारे पानी के पारिस्थितिक तंत्र अस्थायी रूप से भूमि-आधारित\n  जानवरों की मेजबानी भी करते हैं, जैसे कि मौसमी रूप से प्रवास करने वाले जलपक्षी।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cb\u003E\u003Cspan\u003Eमीठे पानी का पारिस्थितिकी तंत्र\u003C\/span\u003E\u003C\/b\u003E\n\u003C\/h4\u003E\n\u003Cp\u003E\n  यह जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पृथ्वी की सतह के 1% से भी कम को कवर करता\n  है।\u0026nbsp;इसमें तालाबों और झीलों जैसे जल निकाय शामिल हैं और इसमें तैरते\n  वाले\u0026nbsp;पौधों, शैवाल और अकशेरुकी दोनों का घर है। सैलामैंडर, मेंढक, पानी के\n  सांप और घड़ियाल आमतौर पर मीठे पानी का पारिस्थितिकी तंत्र\u0026nbsp;में पाए जाते\n  हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\n  \u003Cb\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eतालाब का\u0026nbsp;पारिस्थितिकी तंत्र\u0026nbsp;\u003C\/span\u003E\u003C\/b\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इन क्षेत्रों का आकार कुछ वर्ग मीटर से लेकर हजारों वर्ग किलोमीटर तक जो सकता है।\n  पूरी पृथ्वी पर बिखरे हुए, कई प्लेइस्टोसिन हिमनद के अवशेष हैं। कई तालाब मौसमी\n  होते हैं, जो केवल कुछ महीनों तक जलमग्न होते हैं।\u0026nbsp; जबकि झीलें सैकड़ों\n  वर्षों या उससे अधिक समय तक मौजूद रह सकती हैं। तालाबों और झीलों में सीमित\n  प्रजातियों की विविधता हो सकती है क्योंकि वे अक्सर एक दूसरे से और नदियों और\n  महासागरों जैसे अन्य जल स्रोतों से अलग-थलग होते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  किसी अधिक उचाईवाले भाग में स्थित\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/what-is-lake-in-hindi.html\"\u003Eझील\u003C\/a\u003E\n  या तालाब गर्म और उथले होते\u0026nbsp;है क्योकि सूर्य की अधिक गर्मी को अवशोषित करता\n  है। यह एक काफी विविध समुदाय को बनाए रखता है, जिसमें शैवाल की कई प्रजातियां जड़\n  वाले और तैरते जलीय पौधे, चरने वाले घोंघे, क्लैम, कीड़े, क्रस्टेशियन, मछलियां\n  और उभयचर शामिल हो सकते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eनदि का पारिस्थितिकी तंत्र\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  ये एक दिशा में बहने वाले बहते पानी धारा होती हैं। धाराएँ और नदियाँ हर जगह पाई\n  जा सकती हैं।\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/what-is-ice.html\"\u003Eबर्फ़\u003C\/a\u003E के\n  पिघलने या झीलें इसका निर्माण केंद होती हैं। आमतौर पर नदिया महासागर में मिल\n  जाती हैं। मुहाने तक की यात्रा के दौरान नदी अपना लक्षण बदल देते हैं। स्रोत पर\n  तापमान मुहाने की तुलना में ठंडा होता है। नदी के पानी में ऑक्सीजन का स्तर अधिक\n  होता है, और मीठे पानी की मछली जैसे ट्राउट और हेटरोट्रॉफ़ वहां पाए जा सकते हैं।\n  नदियों में जीवो की विविध प्रजातियां पायी जाती है - कई जलीय हरे पौधे और शैवाल\n  नदी में देखे जा सकते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  कोई भी चीज जो पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बदलने का प्रयास करती है, संभावित\n  रूप से उस पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य और अस्तित्व के लिए खतरा है। इनमें से\n  कुछ खतरे अत्यधिक चिंताजनक नहीं हैं क्योंकि प्राकृतिक परिस्थितियों को बहाल करने\n  पर उन्हें स्वाभाविक रूप से हल किया जा सकता है। अन्य कारक पारिस्थितिक तंत्र को\n  नष्ट कर सकते हैं और इसके सभी या कुछ जीवन को विलुप्त कर सकते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रदुषण\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जल, भूमि और वायु प्रदूषण सभी मिलकर पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य में\n  महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रदूषण प्राकृतिक या मानव-जनित हो सकता है, लेकिन\n  चाहे वे संभावित रूप से विनाशकारी रसायनों को जीवित चीजों के वातावरण में छोड़\n  देने से होता हैं। यदि यह प्रदूषक एक झील में चला जाये तो वहाँ के पारिस्थितिक\n  संतुलन को नस्ट कर सकती है और ऑक्सीजन की कमी के कारण दम घुटने के कारण मछलियों\n  की मृत्यु हो सकती है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eवनो की कटाई\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  लॉगिंग, खनन, खेती और निर्माण जैसी आर्थिक गतिविधियों में अक्सर प्राकृतिक\n  वनस्पति कवर वाले स्थानों को साफ करना शामिल होता है। बहुत बार, पारिस्थितिकी\n  तंत्र के एक कारक के साथ छेड़छाड़ का उस पर एक गहरा प्रभाव पड़ सकता है और उस\n  पारिस्थितिकी तंत्र के सभी कारकों को प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के लिए, लकड़ी\n  के लिए जंगल के एक टुकड़े को साफ करने से मिट्टी की ऊपरी परतें सूरज की गर्मी के\n  संपर्क में आ सकती हैं, जिससे क्षरण हो सकता है। यह बहुत सारे जानवरों और कीड़ों\n  का कारण बन सकता है जो पेड़ से छाया और नमी पर निर्भर होते हैं सभी नस्ट हो\n  जायेंगे।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eपराबैंगनी विकिरण\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जीवित चीजों में सूर्य की किरणें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यूवी किरणें तीन\n  मुख्य तरंग दैर्ध्य में आती हैं: यूवीए, यूवीबी और यूवीसी, और उनके अलग-अलग गुण\n  होते हैं। यूवीए की तरंग दैर्ध्य लंबी होती है और यह हर समय पृथ्वी की सतह पर\n  पहुंचती है। यह जीवित चीजों के लिए विटामिन डी उत्पन्न करने में मदद करता है।\n  यूवीबी और यूवीसी अधिक विनाशकारी हैं और जानवरों में डीएनए और सेल क्षति का कारण\n  बन सकते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  ओजोन परत के नेस्तोने से यूवीबी और यूवीसी सतह पर पहुंच सकती है और इससे होने\n  वाले नुकसान से बहुत सारी प्रजातियां नष्ट हो सकती हैं, और मनुष्यों सहित\n  पारिस्थितिक तंत्र के सदस्यों को प्रभावित कर सकती हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपारिस्थितिकी तंत्र के लाभ\u0026nbsp;\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  मानव समाज प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र से कई आवश्यक सामान प्राप्त करता है,\n  जिसमें समुद्री भोजन, खेल जानवर, चारा, ईंधन की लकड़ी, लकड़ी और दवा उत्पाद हैं।\n  ये सामान अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पारिस्थितिक तंत्र मौलिक जीवन-समर्थन सेवाएं प्रदान करते हैं। जिसके बिना मानव\n  सभ्यता का विकास रुक जाएगा। इनमें हवा और पानी का शुद्धिकरण, शामिल हैं। और कचरे\n  का अपघटन, जलवायु का विनियमन, मिट्टी की उर्वरता का पुनर्जनन, और उत्पादन और\n  रखरखाव\u0026nbsp;जैव विविधता\u0026nbsp;द्वारा ही संभव हैं। जिससे हमारे कृषि,\n  फार्मास्युटिकल और औद्योगिक उद्यमों के प्रमुख तत्व प्राप्त होते हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रावधान\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पारिस्थितिक तंत्र सभी खाद्य पदार्थों का स्रोत भी है, सभी ऊर्जा का भंडार,\n  फाइबर, आनुवंशिक संसाधन, दवाएं, ताजे पानी और खनिज। मानव जिन सभी प्राकृतिक\n  संसाधनों पर निर्भर है, उनका स्रोत पारिस्थितिक तंत्र है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eविनियमन\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का कार्य यह सुनिश्चित करता है कि जलवायु में\n  संतुलन और विनियमन हो, ताजे पानी, मिट्टी, चट्टानों और वातावरण में नियमन हो। वे\n  जानवरों और पौधों की बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए कार्य करते हैं और यह\n  सुनिश्चित करते हैं कि जैव विविधता संरक्षित है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eसहायक\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पारिस्थितिक तंत्र में सभी सदस्य एक दूसरे के लिए सहायक होते हैं। जीवित सदस्य\n  दूसरों के लिए भोजन के रूप में कार्य करते हैं, और उनकी उपज और पोषक तत्वों के\n  रूप में कार्य करते हैं। यह मिट्टी के पोषक चक्र, कार्बन और ऑक्सीजन चक्र और जल\n  चक्र को संभव बनाता है और जीवित चीजों के लिए भी प्रजनन जारी रखता है।\n\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/7567965704251185931\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/paristhitik-tantra-ki-paribhasha.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/7567965704251185931"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/7567965704251185931"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/paristhitik-tantra-ki-paribhasha.html","title":"पारिस्थितिक तंत्र क्या है?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh 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महत्वपूर्ण विषय है। इसका\n  सीधा सा मतलब है कि पानी का उचित और विवेकपूर्ण तरीके से उपयोग करना होगा। \u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eचूंकि हमारा\n  जीवन पूरी तरह से पानी पर निर्भर है, इसलिए जल संरक्षण के बारे में सोचना हमारा\n  कर्तव्य है और हम जल संरक्षण मे योगदान करना होगा।\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल संरक्षण\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  आपकी जानकारी के लिए बात दु की हमारे \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/what-is-planet-in-hindi.html\"\u003Eग्रह \u003C\/a\u003Eका 97% हिस्सा खारे पानी से ढका हुआ है। जिसे हम\n  पीने के लिए उपयोग नहीं कर सकते हैं। 3% पानी का बचा हिस्सा मीठा है लेकिन 2%\n  भी ग्लेशियरों और \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/what-is-ice.html\"\u003Eबर्फ\u003C\/a\u003E के रूप मे मौजूद हैं । तो, हमारे पास केवल 1% बचा\n  है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी के पास सीमित मात्रा में ताजा, प्रयोग करने योग्य पानी है। सौभाग्य से, जल चक्र के माध्यम से पानी को प्राकृतिक रूप से पुनर्नवीनीकरण किया जाता है। मनुष्य ने इस प्रक्रिया को गति देने के लिए तकनीक विकसित की है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहालांकि, विविध कारकों सूखा, बाढ़, जनसंख्या वृद्धि, प्रदूषण, आदि के कारण जल आपूर्ति समुदाय की जरूरतों को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं कर सकती है। जल संरक्षण यह सुनिश्चित कर सकता है कि आज और कल सभी के लिए स्वच्छ जल की आपूर्ति उपलब्ध हो।\u003C\/p\u003E\n\n\u003Cp\u003E\n  तो अब हमे महसूस होना चाहिए है कि जल संरक्षण हमारे लिए क्यों\n  महत्वपूर्ण है। हम केवल पानी के एक छोटे प्रतिशत पर निर्भर हैं, इसलिए यह हमारी\n  जिम्मेदारी है कि हम इसे प्रदूषित न करें और इसका दुरुपयोग न करें। हम में से\n  प्रत्येक को पता होना चाहिए कि पानी को कैसे बचाया जाए। आगे बढ़ने से पहले आइए\n  पहले उसके प्रकारों के बारे में जान लेते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल संरक्षण के उपाय\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजल संरक्षण में बदलती आदतें शामिल हैं। चूंकि इनमें से कई आदतें जीवन भर विकसित हुई हैं। इसलिए उन्हें बदलना मुश्किल साबित हो सकता है। लोग सरलता से शुरू करके, फिर धीरे-धीरे पानी की खपत को कम करने के लिए और अधिक उन्नत कदम उठाकर जल संरक्षण में सक्रिय हो सकते हैं।\u003C\/p\u003E\n\n\u003Cp\u003Eजब भी इसका उपयोग नहीं किया जा रहा हो तो सबसे सरल आदतों में पानी को बंद कर देना शामिल है। नीचे कुछ जल संरक्षण के उपाय बताइए गए हैं -\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eजल को प्रदूषण से बचाकर हम जल के संरक्षण में योगदान दे सकते हैं।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eपुनर्वितरण के लिए जल का उपयोग करके जल संरक्षण किया जा सकता है।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eभूजल के तर्कसंगत उपयोग पर विचार करें।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eपारंपरिक जल संसाधनों का नवीनीकरण करके, विशेष रूप से भारत जैसे देश में,\n    इसकी विधि जल संरक्षण में मदद कर सकती है।\n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eकृषि क्षेत्र में आधुनिक सिंचाई विधियों के उपयोग से पानी\n    बचाने में मदद मिल सकती है।\n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eकिसानों द्वारा जलवायु परिस्थितियों\n    में फसलें उगाई जाती हैं इसमे अतिरिक्त पानी की आवश्यकता नहीं होगी।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eबाढ़ प्रबंधन की मदद से पानी को भी बचाया जा सकता है।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eनगरपालिका एजेंसियों का मार्गदर्शन करके भी पानी की बचत की जा सकती है।\n  \u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\n\u003Cp\u003Eकम से कम वर्षा जल के संग्रह के माध्यम से जल का संरक्षण भी किया जा\n  सकता है। उदाहरण के लिए: पानी इकट्ठा करने के लिए झीलों, नहरों, तालाबों को खोदना\n  और फिर इसका उपयोग करने के लिए सिस्टम स्थापित करना जल संरक्षण के लिए एक बड़ी मदद हो सकती\n  है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003Eइस पानी का उपयोग बागवानी, सिंचाई या शौचालय के लिए आसानी से किया जा\n  सकता है। आप वर्षा जल संचयन के माध्यम से छोटे पैमाने की खेती के लिए भी संग्रहित\n  जल का उपयोग कर सकते हैं।\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल संरक्षण के आधुनिक तरीके\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003Eअपने दाँत को ब्रश करते समय नल बंद कर दें। इससे काफी पानी बचाया जा सकता है। इसके\n  अलावा, अपने बच्चों को भी ऐसा करने के लिए शिक्षित करें। इस अभ्यास का पालन करके,\n  आप हर महीने कम से कम 150 गैलन से अधिक पानी बचा सकते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003Eअपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए ऊर्जा दक्ष उपकरण जैसे बाथटब, सिंक सिस्टम,\n  डिशवॉशर आदि खरीदने का प्रयास करें।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003Eलीक की जांच करना जारी रखें। सिंक या शौचालय में एक छोटे से रिसाव के\n  परिणामस्वरूप अतिरिक्त पानी का उपयोग हो सकता है। साथ ही, यह आपके पानी के बिल\n  में भी जुड़ जाएगा। तो, अगली बार इस तरह के छोटे रिसाव से सावधान रहें क्योंकि\n  इससे पानी बचाने में मदद मिल सकती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003Eकपड़े और रसोई के उपकरण धोते समय, सुनिश्चित करें कि आप अपनी वॉशिंग मशीन या\n  डिशवॉशर को आधा चार्ज करके पानी बर्बाद न करें। धोने से पहले इन्हें भर कर रखें।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003Eआपको यह जानकर हैरानी होगी कि केवल छोटी-छोटी फुहारों से आप गैलन पानी बचाने\n  में मदद कर सकते हैं। अगली बार, थोड़े समय के लिए स्नान करने का वादा करें।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003Eघर या गाड़ी को पानी का उपयोग करने के बजाय साफ करने के लिए झाडू या कपड़े का उपयोग करना याद\n  रखें।\n\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजल संरक्षण के अन्य उपाय\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eफुटपाथ और ड्राइववे को साफ करने के लिए पानी के बजाय झाड़ू का प्रयोग करें।\u003Cspan style=\"white-space: pre;\"\u003E\t\u003C\/span\u003E\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eकार धोते समय, ऑन\/ऑफ नोजल वाली होज़ का उपयोग करें या पानी की बाल्टी का उपयोग करें।\u003Cspan style=\"white-space: pre;\"\u003E\t\u003C\/span\u003E\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eजब पानी जल्दी से वाष्पित नहीं होता सुबह या शाम को उस समय पौधों और फूलों में पानी दें।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eहाथ से बर्तन धोते समय, पानी को बहने देने के बजाय एक गड्ढे स्टोर काके रखे।\u003Cspan style=\"white-space: pre;\"\u003E\t\u003C\/span\u003E\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eपानी के लीक को ठीक करें!\u003Cspan style=\"white-space: pre;\"\u003E\t\u003C\/span\u003E\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eलो-फ्लो शावरहेड स्थापित करें।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eजब पानी उपयोग में न हो तो नल को बंद कर दें। दांतों को ब्रश करते समय नल को चालू न छोड़ें।\u0026nbsp;\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eडिशवॉशर या वॉशिंग मशीन को केवल पूरे लोड के साथ चलाएं।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eशॉवर का समय 5 मिनट या उससे कम तक सीमित करें।\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eनहाने के बजाय शावर लें।\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/7173662975497634226\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/jal-sanrakshan-ke-upay.html#comment-form","title":"0 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71 प्रतिशत भाग जल से ढका हुआ है। उसमें से 97 प्रतिशत सागरों और महासागरों में है। बाकि जमीन के अंदर और वायुमंडल में हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसदियों से वही पानी दुनिया भर में पुनर्चक्रण की मदद से चल रहा है। पानी के\n  पुनर्चक्रण की यह प्रक्रिया पृथ्वी के विकास में सहायक होती\u0026nbsp;है। पृथ्वी के\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/jal-sansadhan.html\"\u003Eजल\u003C\/a\u003E\u0026nbsp;को सतह\n  के ऊपर और नीचे ले जाने की इस प्रक्रिया को \u003Cb\u003Eजल चक्र\u003C\/b\u003E कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/814881424443532925\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/water-cycle-in-hindi.html#comment-form","title":"0 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-5676063409495714635"},"published":{"$t":"2021-10-06T18:39:00.006+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:27:49.843+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"ग्लोबल वार्मिंग किसे कहते हैं?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eग्लोबल वार्मिंग हमारे\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eपर एक खतरनाक प्रभाव है जिसका हम इन दिनों सामना कर रहे हैं। तीव्र औद्योगीकरण, जनसंख्या वृद्धि और प्रदूषण के कारण ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग का तात्पर्य पिछली शताब्दी के दौरान पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में वृद्धि से है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eग्लोबल वार्मिंग के खतरनाक होने का एक कारण यह है कि यह ग्रह की समग्र पारिस्थितिकी को परेशान करता है। इसका परिणाम बाढ़, अकाल, चक्रवात और अन्य मुद्दों में होता है। इस गर्मी के कई कारण और परिणाम हैं और यह पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए खतरा है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eग्लोबल वार्मिंग के संकेत पहले से ही दुनिया भर में होने वाली कई प्राकृतिक घटनाओं के साथ दिखाई दे रहे हैं, जो प्रत्येक जीवित प्रजाति को प्रभावित करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eग्लोबल वार्मिंग के सबसे स्पष्ट कारण औद्योगीकरण, शहरीकरण, वनों की कटाई, परिष्कृत मानवीय गतिविधियाँ हैं। इन मानवीय गतिविधियों ने ग्रीनहाउस के उत्सर्जन में वृद्धि की है, जिसमें CO₂, नाइट्रस ऑक्साइड, मीथेन और अन्य शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eग्लोबल वार्मिंग के कारण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eग्लोबल वार्मिंग निश्चित रूप से एक खतरनाक स्थिति है, जो जीवन के अस्तित्व पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल रही है। अत्यधिक ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाएँ आ रही हैं, जो कि चारों ओर स्पष्ट रूप से घटित हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग के पीछे के कारणों में से एक पृथ्वी की सतह पर फंसी ग्रीनहाउस गैसों की अत्यधिक रिहाई है, जिसके परिणामस्वरूप तापमान में वृद्धि होती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइसी तरह, ज्वालामुखी भी ग्लोबल वार्मिंग का नेतृत्व कर रहे हैं क्योंकि वे हवा में बहुत अधिक CO₂ उगलते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के पीछे महत्वपूर्ण कारणों में से एक जनसंख्या में वृद्धि है। जनसंख्या में इस वृद्धि से वायु प्रदूषण भी होता है। ऑटोमोबाइल बहुत सारे CO₂ छोड़ते हैं, जो पृथ्वी में अटका रहता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजनसंख्या में यह वृद्धि भी वनों की कटाई का कारण बन रही है, जिसके परिणामस्वरूप ग्लोबल वार्मिंग होती है। अधिक से अधिक पेड़ काटे जा रहे हैं, जिससे CO₂ की सांद्रता बढ़ रही है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eग्रीनहाउस एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जहां सूर्य का प्रकाश क्षेत्र से होकर गुजरता है, इस प्रकार पृथ्वी की सतह को गर्म करता है। पृथ्वी की सतह आने वाली ऊर्जा के साथ संतुलन बनाए रखते हुए वातावरण में ऊष्मा के रूप में ऊर्जा छोड़ती है। ग्लोबल वार्मिंग ओजोन परत को नष्ट कर देती है जो कयामत के दिन की ओर ले जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि से पृथ्वी की सतह से जीवन पूरी तरह से विलुप्त हो जाएगा।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eग्लोबल वार्मिंग का समाधान\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eयद्यपि हम ग्लोबल वार्मिंग दर को धीमा करने में लगभग देर कर चुके हैं, लेकिन सही समाधान खोजना महत्वपूर्ण है। व्यक्तियों से लेकर सरकारों तक, सभी को ग्लोबल वार्मिंग के समाधान पर काम करना होगा। प्रदूषण को नियंत्रित करना, जनसंख्या और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कुछ ऐसे कारक हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए। इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड कार पर स्विच करना कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने का सबसे अच्छा तरीका है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eएक नागरिक के रूप में, हाइब्रिड कार पर स्विच करना और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना सबसे अच्छा है। इससे प्रदूषण और भीड़भाड़ कम होगी। एक और महत्वपूर्ण योगदान जो आप कर सकते हैं वह है प्लास्टिक के उपयोग को कम करना। प्लास्टिक ग्लोबल वार्मिंग का प्राथमिक कारण है जिसे रीसायकल करने में वर्षों लग जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवनों की कटाई पर विचार करना एक और बात है जो ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने में मदद करेगी। पर्यावरण को हरा-भरा बनाने के लिए अधिक से अधिक वृक्षारोपण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eऔद्योगीकरण कुछ मानदंडों के तहत होना चाहिए। पौधों और प्रजातियों को प्रभावित करने वाले ग्रीन जोन में उद्योगों के निर्माण पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। ग्लोबल वार्मिंग में योगदान देने वाले ऐसे क्षेत्रों पर भारी जुर्माना लगाया जाना चाहिए।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eइस दशक में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव व्यापक रूप से देखा जा रहा है। ग्लेशियर पीछे हटना और आर्कटिक सिकुड़न दो सामान्य घटनाएं देखी जाती हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ये जलवायु परिवर्तन के शुद्ध उदाहरण हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसमुद्र के स्तर में वृद्धि ग्लोबल वार्मिंग का एक और महत्वपूर्ण प्रभाव है। समुद्र के स्तर में यह वृद्धि निचले इलाकों में बाढ़ का कारण बन रही है। कई देशों में चरम मौसम की स्थिति देखी जाती है। बेमौसम बारिश, अत्यधिक गर्मी और ठंड, जंगल की आग और अन्य हर साल आम हैं। इन मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह वास्तव में प्रजातियों के विलुप्त होने का परिणाम लाने वाले पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित करेगा।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइसी तरह, ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि के कारण समुद्री जीवन भी व्यापक रूप से प्रभावित हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप समुद्री प्रजातियों और अन्य मुद्दों की मृत्यु हो रही है। इसके अलावा, प्रवाल भित्तियों में बदलाव की उम्मीद है, जो आने वाले वर्षों में समाप्त होने वाले हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eआने वाले वर्षों में इन प्रभावों में भारी वृद्धि होगी, जिससे प्रजातियों का विस्तार रुक जाएगा। इसके अलावा, मनुष्य भी अंत में ग्लोबल वार्मिंग के नकारात्मक प्रभाव को देखेंगे।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/5676063409495714635\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/global-warming-in-hindi.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/5676063409495714635"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/5676063409495714635"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/global-warming-in-hindi.html","title":"ग्लोबल वार्मिंग किसे कहते हैं?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-7234007107863726276"},"published":{"$t":"2021-10-01T23:15:00.008+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:27:42.848+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"पारिस्थितिकी तंत्र के घटकों का वर्णन?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\n  जीवधारी जिस वातावरण में रहते हैं वह उसका पर्यावरण होता है।\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003E(Environment) शब्द का शाब्दिक अर्थ है चारों ओर होता हैं। इस प्रकार पर्यावरण\n  अनेक वस्तुओं या कारकों जैसे प्रकाश, ताप, मिटटी, जल वायु आदि जो किसी जीव को\n  घेरे रहते हैं। दूसरे शब्दों में प्रकृति के अंतर्गत हमें जो कुछ दिखाई देता है\n  वह पर्यावरण का एक अंग है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अर्थात वयु, जल, मृदा, पेड़-पीधे, समुद्र एवं जीव-जन्तु सम्मिलित रुप से पर्यावरण\n  की रचना करते हैं। पृथ्वी पर उपस्थित किसी भी जीव का जीवन इस पर्यावरण के बिना\n  संभव नहीं हो सकता तथा कोई भी जीव अपने पर्यावरण से अलग जीवन-यापन नहीं कर सकता\n  हैं। समस्त जीवधारियों को उसके वास स्थान या पारिस्थितिक तंत्र में उपस्थित\n  परिस्थितियों या अजैविक एवं जैविक घटकों के अनुसार अपना जीवन निर्यहन करना\n  पड़ता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  इस प्रकार\n  \u003Cb\u003E“किसी स्थान विशेष के भौतिक अथवा अजैविक तथा जैविक घटकों की परिस्थितियों का\n    योग पर्यावरण  कहलाता है।\"\u003C\/b\u003E\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eपारिस्थितिक कारक \u003C\/span\u003E\n\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  कोई भी बहरी बल पदार्थ या दशा जो जीवधारियों के चारों ओर उपरिथत होते हैं और\n  प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जीवधारियों के जीवन को प्रभावित करते हैं उसे\n  पारिस्थतिक या पर्यावरणीय कारक कहते हैं। अध्ययन की सुविधा के लिये किसी पर्यावरण\n  या पारिस्थितिक तंत्र के घटकों को दो समहो में बाँटा गया है -\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003Eअजैविक कारक\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eजैविक कारक\u003C\/li\u003E\n\u003C\/ol\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eअजैविक कारक\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  इसके अंतर्गत उन समस्त अजीवित कारकों को रखा गया है जो कि अपने भौतिक गुणों के\n  कारण पर्यावरण में उपस्थित जीवो को प्रभावित करते हैं। इन्हें जलवायुवीय कारक भी\n  कहते हैं। उदा. - वाय, जल, प्रकाश. तापक्रम, मदा, एस्थलाकति आदि। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजैविक कारक \u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  इसके अंतर्गत समस्त जीवधारियों को सम्मिलित किया गया है। उदाहरण - पेड़-पौधे, सभी\n  जन्तु आदि। हमे ज्ञात है कि पृथ्वी पर करोड़ों प्रकार के जीव निवास करते है और\n  अपनी समस्त जैविक क्रियायोंओं को पूर्ण करते हुए मुत्यु को प्राप्त करते है। इन\n  जीवों को अपनी जैविक कियाओं को पूर्ण करने के लिये ऊर्जा की आवश्यकता होती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  प्रकृति में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सूर्य है। हरे पौधे सौर ऊर्जा का अवशोषण करके\n  उसे भोजन में परिवर्तित करते हैं। इस प्रकार यही सौर ऊर्जा प्रत्यक्ष और अत्यक्ष\n  रुप से समस्त जीवधारियों की जैविक क्रियाओं के काम आती है। हरे पेड़-पौयों द्वारा\n  निर्मित भोजन साकाहारी जन्तुओं के काम आती है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  ये शाकाहारी जन्तु उच्चवर्गीय जन्तुओं का भोजन बनते है जिन्हें सर्वोच्च श्रेणी\n  के मांसाहारी खाते है। जीवधारियों की मुत्यु परश्चात उनके शरीर के कार्बनिक\n  पदार्थों का अपघटन कवकों एवं जीवाणुओं द्वारा किया जाता है। इस प्रकार सौर ऊर्जा\n  ही सभी जीवधारियों के द्वारा रासायनिक ऊर्जा के रुप में उपयोग की जाती है। अपघटक\n  जीवधारियों के शरीर का अपघटन करके उनके शरीर के अकार्बनिक तत्वों को पुननः भूमि\n  में मिला देते है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  इस प्रकार पारिस्थितिक तंत्र एवं प्रकृति में ऊर्जा के प्रवाह के साथ-साथ पोषक\n  पदार्थों का पुन चक्रण होता रहता है। ये पदार्थ पुनः जीवधारियों के काम आते\n  हैं। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E पारिरिस्थतिक तंत्र में  ऊर्जा  प्रवाह\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  पूर्व अध्यायों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि प्रत्येक पोषी स्तर पर आहार\n  के स्थानांतरण के साथ ही ऊर्जा का भी स्थानांतरण होता है। यह क्रम प्रत्येक\n  पारितंत्र से जीवमण्डल तक होता है। समस्त हरे पौधे जिनमें पर्णहरिम उपरिस्थित\n  होता है, में ही केवल यह क्षमता है कि सर्य की विकिरण ऊर्जा को ग्रहण कर सके।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  सूर्य की प्रकाश ऊर्जा के द्वारा पौधे प्रकाश-संश्लेषण क्रिया करके खाद्य\n  (कार्बोहाइड्रेट) का निर्माण करते हैं। सौर ऊर्जा पृथ्वी पर विकिरण ऊर्जा के रुप\n  में आती है जिसका 10 प्रतिशत ही पौधे उपयोग कर पाते हैं पौधे के अन्दर यह सौर\n  ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा के रूप में संग्रहित होती है। प्रत्येक पौधा अपने अंदर\n  संग्रहित ऊर्जा का 90 भाग अपनी जैविक क्रियाओं, जैसे श्वसन आदि अन्य क्रियाओं में\n  खर्च कर देते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  सूर्य की प्रकाश को ऊर्जा के द्वारा पौधे प्रकाश-संश्लेषण क्रिया करके खाद्य\n  (कार्बोहाइड्रेट) का निर्माण करते हैं। सौर ऊर्जा पृथ्वी पर विकिरण ऊर्जा के रुप\n  में आती है जिसका 10 प्रतिशत ही पौधे उपयोग कर पाते हैं पौधे के अन्दर यह सौर\n  ऊर्जा रासायनिक ऊर्जा के रूप में संग्रहित होती है। प्रत्येक पौधा अपने अंदर\n  संग्रहित ऊर्जा का 90 भाग अपनी जैविक क्रियाओं, जैसे श्वसन आदि अन्य क्रियाओं में\n  खर्च कर देते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  अपने अन्दर 10% ऊर्जा जी ही संग्रहित कर पाते हैं शाकाहारी जन्तु पौधों को\n  खाद्य के रुप में ग्रहण करते है। प्राप्त ऊर्जा का शाकाहारी जन्तु अपने\n  जैविक कार्यों में तथा कुछ ऊर्जा-वातावरण में उष्मा के रूप में त्यागते है शेप\n  ऊर्जा शाकाहारी के अन्दर संग्रहित रहती है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  इसी प्रकार मांसाहारी जन्तु भी शाकाहारी जन्तुओं को मारकर उनका माँस खाते हैं\n  ऊर्जा का अधिक भाग उनके जैविक कार्यों में प्रयुक्त होता है तथा कुछ ऊष्मा के रूप\n  में वातावरण में छोड़ते हैं जो ऊर्जा की हानि है। शेष ऊर्जा शरीर में संग्रहित\n  रहती है। उपयुक्त अध्ययन से स्पष्ट होता है कि उष्मागतिकी के प्रथम नियम के\n  अनुसार ऊर्जा न तो उत्पन्न होती है और न ही नष्ट होती है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  प्रकति में ऊर्जा में स्थानान्तरण के सम्बन्ध में निम्नलिखित तथ्य स्पष्ट होते\n  हैं -\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003E1. पादप परिवर्तक - \u003C\/b\u003Eऊर्जा न तो पैदा होती है और न ही नष्ट होती है केवल\n  ऊर्जा का रुपान्तरण एक से दूसरे रुप में होता है प्रकाश- संरश्लेषण क्रिया में\n  हरे पीधे सौर ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदल देते हैं। इस प्रकार यहाँ हरे पौधे\n  ऊर्जा के उत्पादक के साथ-साथ परिवर्तक कहे जा सकते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cdiv\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    \u003Cb\u003E2 ऊर्जा स्थानान्तरण\u003C\/b\u003E - आहार श्रृंखला के प्रत्येक पोषण स्तर पर नीचे से\n    ऊपर की ओर केवल ऊर्जा का स्थानान्तरण होता है . प्रत्येक पोषण स्तर पर जीव\n    ऊर्जा का उपयोग अपने जैविक कार्यों में खर्च करता है तथा अधिक भाग को ऊमा के\n    रूप में वातावरण में छोड़ता है | यदि छोड़ी हुई मुकक्त ऊर्जा की गणना की जाये\n    तो यह ऊर्जा की हानि अधिक मात्रा में होती है।\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    \u003Cb\u003E3. 10 प्रतिशत का नियम \u003C\/b\u003E- अध्ययन से स्पष्ट होता है कि ऊर्जा खाद्य के\n    रुप में एक पोषी स्तर से दूसररे पोपीषी स्तर पर बहुत कम मात्रा अर्थात 10% ही\n    आगे पहुँचती है। यही 10 प्रतिशत का नियम है। उदाहरण के लिए यदि गाय 10 किलो हरा\n    चारा खाती है तो उसका वजन 1 किलो ही बढेगा।\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    उपर्युक्त से स्पष्ट होता है कि ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट की\n    जा सकती है, केवल एक रूप से दूसरे रुप में बदलकर रुपान्तरित की जा सकती है। इस\n    रुपान्तरण क्रिया में ऊर्जा की हानि होती है। ऊर्जा का उपयोग न होकर ऊष्मा के\n    रूप में वातावरण में छोड़ दिया जाता है। \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    अतः ऊर्जा का प्रवाह एक दिशीय होता है। इस प्रक्रिया में ऊर्जा अजैव वातावरण से\n    आहार के द्वारा जैव वातावरण में प्रवेश करती है और ऊष्मा के रूप में छोड़ी जाती\n    है। यह छोड़ी गई उष्मा को हरे पादप भी प्रकाश-संश्लेषण क्रिया में प्रयुक्त\n    नहीं कर पाते हैं। यह स्पष्ट है कि ऊर्जा का वातावरण में स्थानान्तरण\n    उष्मागतिकी के निययोंमों के अनुसार होता है। \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n    \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E पारिरिथतिक तंत्र में पोषक पदाथों का चक़ण \u003C\/span\u003E\n  \u003C\/h3\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    पौधों की वृद्धि के लिये विभिन्न प्रकार के पोषकों की आवश्यकता होती है। \n    ये पोषक पदार्थ विभिन्न प्रकार के खनिज तत्व होते हैं। पौधे इन्हें खनिज लवणों\n    के रुप में भूमि से जल के साथ अवशोषित करते हैं तथा प्रकाश- संश्लेषण की क्रिया\n    में जल तथा खनिजों का उपयोग होता है। गहन अध्ययन से ज्ञात होता है कि\n    प्रकाश-संश्लेलेषण क्रिया में आधारभूत तत्त्व कार्बन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन,\n    हाइझेजन, सल्फर तथा फास्फोरस आदि मुख्य रूप से भाग लेते हैं।\u003C\/p\u003E\n\u003C\/div\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  एक संयुक्त यौगिक के रूप में यह पदार्थ परितंत्र के उत्पादक स्तर से प्रवेश करते\n  हैं और खाद्य के रूप में उपभोक्ता स्तर में स्थानानारित कर दिये जाते हैं। पुननः\n  यह पदार्थ जन्तु एवं पादपों के मृत शरीर, मल-मूत्र के रुप में जमीन पर लौट आते\n  हैं। इस प्रकार उक्त रसायनों का पारितंत्र तथा जीवमण्डल में पुन चक्रण को जैव\n  भू-रसायन चक्र (biogeochemical cycle) कहते हैं।  \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  स्पष्ट होता है कि यह रसायन भी ऊर्जा की तरह लुप्त नहीं होते है। बल्कि इन\n  पदार्थों का चक्रण चलता रहता है इस संपूर्ण प्रक्रिया में अपघटकों की मुख्य\n  भूमिका होती है, क्योंकि अपघटक (जीवाणु तथा कवक) जटिल कार्बनिक पदार्थों को\n  तोड़कर सरल अकार्बनिक पदार्थ में बदते है जो पुन: पादपों द्वारा जटिल में बदला\n  जाता है। यही क्रम निरन्तर चलता रहता है। सभी स्थलीय एवं जलीय पारिस्थतिक तंत्रों\n  में ये चक्र आवश्यक होते हैं तथा इनकी प्रक्रिया भी एकसमान होती है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजैव भू रासायनिक चक्र के प्रकार\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पौधे प्रकृति में उपस्थित पोषक पदाथों को गैसीय अथवा जलीय या अवसादों के रूप में\n  ग्रहण करते हैं। अत: पोषक पदार्थों का चक्रण तीन प्रकार का होता हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    गैसीय चक्रण - इसके अंतर्गत पोषक पदाथों का चक्रण गैसों के रूप में होता हैं।\n    उदाहरण - कार्बन चक्र, आक्सीजन चक्र, नाइट्रोजन चक्र आदि। \n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eजल चक्र - इसके अंतर्गत हाइड्रोजन का चक्रण होता है। \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    अवसादी चक्र - इसके अंतर्गत पोषक पदार्थों का चक्र अवसादों के रूप में होता है।\n    उदाहरण - कैल्सियम चक्र, फॉस्फोरस चक्र, सल्फार चक्र आदि। \n  \u003C\/li\u003E\n\u003C\/ol\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cdiv\u003E\n  \u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n    \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E नाइट्रोजन चक\u003C\/span\u003E\n  \u003C\/h3\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    वातावरण की स्वतंत्र वायु संगठन में 78 % नाइट्रोजन विद्यमान है लेकिन इस\n    स्वतंत्र नाइट्रोजन का सीधे उपयोग करने की क्षमता सजीयों में नहीं होती है। N2\n    का उपयोग शुक्ष्म जीवों (विवाणुओं) केमाध्यम से ही संभव होता है -\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cdiv\u003E\n    \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n       1.हरे पौधे नाइट्रोजन जमीन से नाइट्रेटे के रुप में ग्रहण करते हैं\n      जिससे अमीनों \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/who-is-called-acid.html\"\u003Eअम्ल \u003C\/a\u003Eतथा प्रोटीन बनती है।\n    \u003C\/p\u003E\n    \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n       2. यह प्रोटीन शाकाहारी से माँसाहारियों तक भोजन के द्वारा पहुँचती\n      है। \n    \u003C\/p\u003E\n    \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n       3. जन्तुओं के मल-मुत्रों में N2 अमोनिया के रूप में लौट कर मृदा मे\n      आती है जो अमोनियम नाइटेट बनाती है।\u003Cbr \/\u003E 4. वायुमण्डल की स्वतंत्र\n      नाइट्रेट को दाल वाले पौधे (मटर, चना, अरहर आदि) की जड़ों की गाँठो में\n      राइजोबियम नामक सहजीवी जीवाणु मिलते है जो स्वतंत्र N2, को नाइराइट में बदलते\n      हैं।\n    \u003C\/p\u003E\n    \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n       नाइट्रोसोमोनास जीवाणु अमोनिया को नाइट्राइट मे तथा नाइट्रोबैक्ट्री\n      जीवाणु नाइट्राइट को नाइट्रेट में बदलते है। यही नाइट्रेट पौधों द्वारा\n      अवशोबित होती है। \n    \u003C\/p\u003E\n    \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n       5. मुदा में विविनाइट्रीकारी जीवाणु स्यूडोमोनास (Pseudomonas)\n      नाइट्रेट को तोड़कर वायुमंडल में N2 को मुक्त करते हैं। \n    \u003C\/p\u003E\n    \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n       6. वायुमंडल N2 का कुछ अंश तड़ित विद्युत द्वारा नाइट्रिक अम्ल मे बदला\n      जाता है जो वर्षा के जल के साथ भूमि में पहुँचकर नाइट्रेट में बदलता है जिसे\n      पौधें सीधे ग्रहण करते हैं। \n    \u003C\/p\u003E\n  \u003C\/div\u003E\n\u003C\/div\u003E\n\u003Cdiv\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    इस प्रकार नइट्रोजन का चक्र निरंतर वातावरण, सजीवों तथा मृदा में होकर सन्तुलित\n    रुप में चलता रहा है। इसलिए यह एक आदर्श चक है। \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n     नाइरोजन स्थिरीकरण करने याले जीवाणओं के नाम है \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cdiv\u003E\n    \u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\n      \u003Cli\u003Eराइजोबियम \u003C\/li\u003E\n      \u003Cli\u003Eनीले हरे शैवाल या सायनोजीवाणु \u003C\/li\u003E\n    \u003C\/ul\u003E\n  \u003C\/div\u003E\u003Cbr \/\u003E\n  \u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003E2. अक्सीजन चक्र \u003C\/h4\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    वायुमण्डल में स्वतंत्र ऑक्सीजन 21% होती है इसका उपयोग सभी सजीव (जन्त एवं\n    वायुमण्डलीय पादप) श्वसन में करते है। किसी भी पदार्थ के जलने में O2 का प्रयोग\n    होता है। \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    पानी में भी O2 घुली रहती है हरे पौधे वायुमण्डल तथा जल में घुली हुयी\n    कार्बनडाई ऑक्साइड को लेकर प्रकाश-संरलेषण क्रिया करके CO2 की मात्रा को घटाते\n    रहते हैं तथा वातावरण में इतनी O2 छोड़ते है कि सभी के लिए पर्याप्त हो। साथ ही\n    यही ऑकक्सीजन कार्बन तथा हाइड़ोजन के साथ काबोहाइडेट तथा लवणों के ऑक्साइड के\n    रुप में पौधों में संग्रहित होकर जन्तुओं में आती है। हवा की O2 जल, वर्षा के\n    साथ जमीन में पहुँचती है। इस प्रकार ऑवक्सीजन का स्वतंत्र उपयोग होकर संयुक्त\n    रुप से चक्र पूरा करती है। \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003E3. कार्बन चक्र \u003C\/h4\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    कार्बन वातावरण में कार्बनड़ाइऑवसाइड के रुप में उपस्थित रहती है। इसकी प्रतिशत\n    0.003%होती हैं। स्वतंत्र तत्व के रुप में कार्बन का उपयोग कोई भी\n    नहीं कर सकता हैं। परन्तु कार्बनड़ाइऑवसाइड  में कार्बन को पौधे वायु से\n    प्राप्त कर सकते हैं। \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    जिसकेफलस्वरूप काबोहाइडेट के साथ-साथ वसा, प्रोटीन, केन्द्रक-अल आदि भी\n    बनते हैं। गैसीय रुप में कार्बन का मुख्य भण्डारवायुमण्डल है और जैव\n    कार्बन का भण्डार समुद्र है।\n  \u003C\/p\u003E\n\u003C\/div\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  जीवों के शरीर का निर्माण करने वाले सभी कार्बनिक पदार्थों का मुख्य भाग कार्बन\n  होता है यह चुने के पत्थरों,वायु (03%) जल (01%), कोयला और पेट्रोलियम पदार्थों\n  में पाया जाता है। जैविक घटक कार्बन आइ-आक्साइड को प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया\n  द्वारा काबंनिक पदार्थों में परिवर्तित कर देता है। ये कार्बनिक पदार्थ शरीर का\n  निर्माण करते हैं। शाकाहारी कुछ कार्बन को CO2 के रूप में त्याग देते है लेकि कुछ\n  कार्बन माँसाहारी जन्तुओं द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है।  \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  मांसाहारी जन्तुओं को सर्वोच्च माँसाहारी जी खाते है ये भी ककु को CO2 के रुप में\n  निकालते हैं। पदार्थों को जलाने में भीकार्बनडाई-ऑक्साइड मुक्त होती हैं। ये सभी\n  वायुमंडल में चले जाते हैं। इस प्रकार  जैविक कार्यो में भी कार्बनिक\n  पदार्थ हमारे लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003E4. हाइड्रोजन चक्र\u003C\/h4\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  हाइड्रोजन जल के रूप में चक पूरा करती है। जल ही जीवन है सभी सजीवों में 80-90%\n  तक जल है तथा यह जीवन का मुख्य आधार या माध्यम है। जैविक पदार्थ भी जल के साथ ही\n  चक्र पुरा करते है। जल वायुमण्डल में वाष्य के रुप में मिलता है। समुद्र, नदी,\n  तालाब, जीवों के शरीर से पानी निरन्तर वाष्प बनकर उड़ता रहता है और वायमुण्डल में\n  जाकर पुननः वर्षा या \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/what-is-ice.html\"\u003Eबर्फ\u003C\/a\u003E के रुप में लौटता है। यह छोटा चक्र है।  \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  सजीवों के माध्यम से जल लंबे चक्र द्वारा पृथ्वी तक आता है। पौधे जमीन से जल का\n  अवशोषण करते हैं खाद्य के साथ जन्तुओं में पहुंचता है। कुछ जल सीधे सजीव ग्राहण\n  करते है, जल की एक निश्चित मात्रा सजीवों की जेविक क्रियाओं के लिए जरुरी होती\n  है। पौधों में वाष्पीकरण, जंतुओं के स्वसन, वाष्पन, उत्सर्जन क्रिया से\n  उत्पन्न जल वातावरण में आता है। सजीवों की मृत्यु के बाद मृत शरीरों के अपघटन से\n  उत्पन्न जल वातावरण में आता है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  अतः जितना जल सजीव ग्रहण करते हैं उतना ही वातावरण में लौट आता है। इस प्रकार जल\n  चक्र संतुलित रूप में चलता रहता है। \n\u003C\/p\u003E\n\u003Cdiv\u003E\n  \u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n    \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E कुछ अन्य महत्वपूर्ण रासायनिक चक\u003C\/span\u003E\n  \u003C\/h3\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    कुछ अन्य रासायनिक पदार्थ जैसे - फास्फोरस,सल्फर, पोटेशियम भी जीवमण्डल में जैव\n    एवं अजैव घटको के माध्यम से चक्रण करते हैं। पोषण पदाथों के चक्रण के अध्ययन से\n    हमें निम्न बातों की जानकारी प्राप्त होती है। 1. उर्जा के विपरीत ये पदार्थ\n    जीवमण्डल के जैव एवं अजैव घटकों के मध्य चक्रण करते रहते हैं। 2. जीवमण्डल में\n    चक्रण करते हुए विभिन्न रासायनिक पदार्थों की मात्रा लगभगस्थिर बनी रहती है।\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003E\n    पोषक पदाथों  के चक्रण  को  बनाये रखना  \n  \u003C\/h4\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    कभी-कभी मानव द्वारा किए गए कुछ कार्यों के परिणाम स्वरूप पदार्थों के इस पुनः\n    चक्रण में कुछग तिरोध उत्पत्र हो जाते हैं। रसायनों का आवश्यकता से अधिक उपयोग\n    (उर्वरक तथा कीटनाशक) जीवाश्म इधनों का अत्यधिक उपयोग तथा ऐसी मशीनों का\n    प्रबंधन जिनमें पूर्ण दोहन नहीं होता आदि। \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    अनेक कार्यों के परिणामस्वरूप ये चक अचक्रीय हो सकते है। इसके परिणामामस्वप\n    आहार श्रृंखला में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। हमें आधुनिक कृषि पद्धतियों को\n    अपनाने तथा औद्योगिक विकास से संबंधित निर्णय लेने में पर्यावरण के स्वास्थ्य\n    का विशेष ध्यान रखना चाहिए।\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    पर्यावरण के प्रति बढ़ती अवमानना समस्त जीवधारियों के लिये संकट का आमंत्रण है।\n    प्रकृति में अनेक तत्वों को हम निरर्थक समझकर नष्ट कर रहे हैं, जबकि पर्यावरण\n    को सन्तुलित रखने में वह किसी न किसी रूप में महत्वपूर्ण होता है। पारिस्थितिक\n    तंत्रों के अध्ययन से स्पष्ट होता है। कि यदि आहार श्रृंखला की कोई कड़ी हटा दी\n    जाये तो आहार श्रृंखला छोटी हो जायेगी। साथ ही श्रृंखला छोटी होने से\n    पारिस्थितिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। जैसे - घास - हिरण - शेर।\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    उपर्युक्त आहार श्रृंखला में से यदि शेर को हटा दें या मार दें तो जंगल में\n    हिरणों की संख्या अधिक हो जायेगी तथा घास भी समाप्त हो सकती है। जिससे\n    रेगिस्तान बनने की संभावना होगी। यदि हिरण हटा दिये जायें तो भोजन के अभाव में\n    शेर भूखे मरेगे या पलायन कर जायेंगे तथा घास की मात्रा अधिक हो जाएगी। श्रृंखला\n    में से घास को हटा दें तो हिरण मरेंगे या शेर भी माँस के आभाव में नष्ट हो\n    जायेंगे। आज राजस्थान के अधिक भाग रेगिस्तान होने का यही कारण सही प्रतीत होता\n    है।\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    आहार श्रृंखला के 6 सोपान हैं - 1. सूर्य, 2. पादप, 3. शाकाहारी, 4. माँसाहारी,\n    5. उच्च माँसाहारी,6 अपघटक। इन्हीं सोपानों से आहार श्रृंखला पूरी हो जाती है।\n    इससे कम सोपान होने पर पारितंत्र का सन्तन्तुलन विगड ज़येगा।\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    आहार श्रृंखला के एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष का भी अध्ययन करने से ज्ञात होता है\n    कि कितने ही हानिकारक रसायन मानव शरीर में प्रवेश करते हैं। जैसे अधिक तथा\n    अच्छी फसल पाने के लिए अनेक कीटनाशक रसायनों  का छिडकाव किया जाता है। जो\n    पानी तथा हवा के साथ मिट्टी में मिल जाते हैं। जोपुनः पौधों के द्वारा उपयोग\n    किया जाता है। ये मृदा में मिलकर प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। इससे मृदा में\n    उपस्थित जीवाण, कवक, केचुए आदि नष्ट हो जाते हैं। \n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    मानव शरीर में उक्त रसायन मात्रा प्राथमिक स्तर के उत्पादको से अधिक है।\n    अतःप्रत्येक पोषी स्तर पर रससायनों की सान्द्रता बढ़ती जा रही है। जो मानव\n    स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रही है। \n  \u003C\/p\u003E\n\u003C\/div\u003E\n\u003Cdiv\u003E\n  \u003Cp style=\"background-color: red; text-align: center;\"\u003E\n    \u003Cspan style=\"color: white; font-size: large;\"\u003E\u003Cb\u003E प्रश्न अभ्यास\u003C\/b\u003E\u003C\/span\u003E\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E 1. पर्यावरण किसे कहते है ?\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    Ans - किसी स्थान विशेष के भौतिक अथवा अजैविक तथा जैविक घटकों की परिस्थितियों\n    का योग पर्यावरण  कहलाता है।\n  \u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E 2. पर्यावरण क़ारक क्या हैं ?\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n  \u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n    Ans - कोई भी बहरी बल पदार्थ या दशा जो जीवधारियों के चारों ओर उपरिथत होते हैं\n    और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जीवधारियों के जीवन को प्रभावित करते हैं\n    उसे पारिस्थतिक या पर्यावरणीय कारक कहते हैं। \n  \u003C\/p\u003E\n\u003C\/div\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/7234007107863726276\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/10\/ecosystem-in-hindi.html#comment-form","title":"0 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href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/blog-post_3.html\"\u003Eअसम राज्य\u003C\/a\u003E के गोलाघाट, कार्बी आंगलोंग और नागांव जिलों में स्थित एक राष्ट्रीय उद्यान है। यह अभयारण्य दुनिया के दो-तिहाई एक-सींग वाले गैंडों की मेजबानी करता है। एक विश्व धरोहर स्थल भी है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमार्च 2018 में हुई जनगणना के अनुसार, असम सरकार के वन विभाग और कुछ मान्यता प्राप्त वन्यजीव गैर सरकारी संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित की गई थी। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में गैंडों की आबादी 2,413 है। इसमें 1,641 वयस्क गैंडे शामिल हैं। 387 उप-वयस्क और 385 बछड़े हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2015 में, गैंडों की आबादी 2401 थी। काजीरंगा दुनिया में संरक्षित क्षेत्रों में बाघों के उच्चतम घनत्व का घर है। और 2006 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपार्क में हाथियों, जंगली भैंसों और हिरणों की बड़ी आबादी रहती है। काजीरंगा को पक्षी प्रजातियों के संरक्षण के लिए बर्डलाइफ इंटरनेशनल द्वारा एक महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र के रूप में मान्यता दी गई है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभारत में अन्य संरक्षित क्षेत्रों की तुलना में, काजीरंगा ने वन्यजीव संरक्षण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। पूर्वी हिमालय जैव विविधता हॉटस्पॉट के किनारे पर स्थित, पार्क उच्च प्रजातियों की विविधता वाला क्षेत्र है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003Eइतिहास\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eएक संरक्षित क्षेत्र के रूप में काजीरंगा के इतिहास का पता 1904 में लगाया जा सकता है। जब भारत के वायसराय की पत्नी केडलस्टन लॉर्ड कर्जन ने इस क्षेत्र का दौरा किया था।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवह उस समय एक भी गैंडे को देखने में विफल रही बाद में उसने अपने पति को घटती प्रजातियों की रक्षा के लिए तत्काल उपाय करने के लिए राजी किया। और उन्होंने उनकी सुरक्षा के लिए योजना शुरू किया था। 1 जून 1905 को, काजीरंगा प्रस्तावित आरक्षित वन 232 किमी 2 के क्षेत्र के साथ बनाया गया था।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअगले तीन वर्षों में, पार्क क्षेत्र को 152 किमी 2 तक ब्रह्मपुत्र नदी के तट तक बढ़ा दिया गया था। 1908 में, काजीरंगा को \"आरक्षित वन\" नामित किया गया था।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1916 में, इसे \"काजीरंगा खेल अभयारण्य\" के रूप में फिर से नामित किया गया और 1938 तक ऐसा ही रहा, जब शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया गया और टूरिस्ट को पार्क में प्रवेश करने की अनुमति दी गई। काजीरंगा खेल अभयारण्य का नाम बदलकर 1950 में \"काजीरंगा वन्यजीव अभयारण्य\" कर दिया गया।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1954 में, असम सरकार ने असम गैंडा विधेयक पारित किया, जिसमें गैंडे के अवैध शिकार पर भारी जुर्माना लगाया गया था। चौदह साल बाद, 1968 में, राज्य सरकार ने 1968 का असम राष्ट्रीय उद्यान अधिनियम पारित किया, जिसमें काजीरंगा को एक राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E430 किमी 2 में फैले पार्क को 11 फरवरी 1974 को केंद्र सरकार द्वारा आधिकारिक दर्जा दिया गया था। 1985 में, काजीरंगा को अपने अद्वितीय प्राकृतिक वातावरण के लिए यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकाजीरंगा हाल के दशकों में कई प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं का निशाना रहा है। \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/07\/brahmaputra-river-origin-in-hindi.html\"\u003Eब्रह्मपुत्र नदी\u003C\/a\u003E के उफान के कारण आई बाढ़ से पशु जीवन का काफी नुकसान हुआ है। लोगों द्वारा किए गए अतिक्रमण से वन क्षेत्र में भी कमी आई है और निवास स्थान का नुकसान हुआ है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअसम में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के नेतृत्व में चल रहे अलगाववादी आंदोलन ने इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया है। लेकिन काजीरंगा आंदोलन से अप्रभावित रहा है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/1723764278953221103\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/kaziranga-national-park-kahan-per-hai.html#comment-form","title":"0 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-8663842089613982726"},"published":{"$t":"2021-09-12T08:17:00.005+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:27:27.768+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"मवेशी किसे कहते हैं?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eमवेशी बड़े पालतू शाकाहारी जीव हैं। वे बोविना के एक प्रमुख सदस्य हैं, लिंग के आधार पर, उन्हें गाय या बैल कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमवेशियों को आमतौर पर मांस के लिए पशुधन के रूप में पाला जाता है, इसके अलावा इन्हे दूध और खाल के लिए, जिनका उपयोग चमड़ा बनाने के लिए किया जाता है। उनका उपयोग खेती करने के लिए भी किया जाता है। मवेशियों का एक अन्य उत्पाद उनका गोबर है, जिसका उपयोग खाद या ईंधन बनाने के लिए किया जा सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eलगभग 10,500 साल पहले भारतीय महाद्विप और पश्चिमी ईरान में कम से कम 80 पूर्वजों को पालतू बनाया गया था। खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार, 2018 तक दुनिया में लगभग 1.5 अरब मवेशी हैं, जो वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 9% के लिए जिम्मेदार हैं। 2009 में, मवेशी पूरी तरह से मैप किए गए जीनोम वाले पहले पशुधन जानवरों में से एक बन गए।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003Eगाय\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eगाय ऐसे जानवर हैं जो पूरी दुनिया में पाए जाते हैं। उन्हें 10,000 साल पहले मनुष्यों द्वारा काम, डेयरी, मांस के लिए पालतू बनाया गया था। हालांकि, वैज्ञानिक अभी भी उनके जटिल दिमाग और भावनाओं के बारे में बहुत कुछ सीख रहे हैं। ये 700 पाउंड से लेकर एक कार जितने बड़े होते हैं, जिनमें से कुछ में लंबे सींग होते हैं, उनकी पीठ पर कूबड़, रंगीन पैटर्न या अन्य शांत लक्षण होते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजबकि तकनीकी रूप से एक 'गाय' केवल एक मादा को संदर्भित करता है, इस शब्द का प्रयोग अक्सर लिंग की परवाह किए बिना प्रजातियों के किसी भी जानवर का वर्णन करने के लिए किया जाता है। इस प्रजाति के जानवरों के समूह के लिए तकनीकी रूप से सही शब्द 'मवेशी' है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cul style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eसबसे बड़ी गायें लगभग दो टन तक बढ़ती हैं, एक कार जितनी बड़ी!\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eसंख्या के हिसाब से गाय दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी प्रजाति है!\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eएक गाय प्रतिदिन सात गैलन से अधिक दूध का उत्पादन कर सकती है!\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eभारत में गायों को पवित्र माना जाता है और गाय का वध करने पर अक्सर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।\u003C\/li\u003E\u003C\/ul\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003Eगाय का वैज्ञानिक नाम\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eगाय का वैज्ञानिक नाम बोस टौरस है। बोस टॉरस गोजातीय की श्रेणी में सबसे बड़ा है। गाय की दो प्रमुख उप-प्रजातियां हैं इंडिकस और टौरस। इंडिकस अपनी जड़ें दक्षिणी एशिया, विशेष रूप से आधुनिक भारत में खोजता है। इस बीच, टौरसअपनी जड़ें यूरोप में खोजता है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/8663842089613982726\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/maveshi-kise-kahate-hain.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/8663842089613982726"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/8663842089613982726"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/maveshi-kise-kahate-hain.html","title":"मवेशी किसे कहते 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पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक चिंता का विषय बन गया है। इसके अलावा, ये जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पर जीवन को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eये जलवायु परिवर्तन पारिस्थितिकी तंत्र और पारिस्थितिकी पर विभिन्न प्रभाव डाल रहे हैं। इन परिवर्तनों के कारण, पौधों और जानवरों की कई प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमानव गतिविधियों के कारण बहुत समय पहले जलवायु बदलना शुरू हो गया था लेकिन हमें इसके बारे में पिछली शताब्दी में पता चला। पिछली शताब्दी के दौरान, हमने जलवायु परिवर्तन और मानव जीवन पर इसके प्रभाव को देखना शुरू किया।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहमने जलवायु परिवर्तन पर शोध करना शुरू किया और पता चला कि \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/green-house-effect-in-hindi.html\"\u003Eग्रीनहाउस प्रभाव\u003C\/a\u003E नामक एक घटना के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। पृथ्वी की सतह के गर्म होने से कई ओजोन रिक्तीकरण होते हैं, हमारी कृषि, जल आपूर्ति, परिवहन और कई अन्य समस्याएं प्रभावित होती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजलवायु परिवर्तन के कारण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eयद्यपि जलवायु परिवर्तन के सैकड़ों कारण हैं, हम केवल प्राकृतिक और मानव निर्मित कारणों पर चर्चा करने जा रहे हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक कारण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eइनमें ज्वालामुखी विस्फोट, सौर विकिरण, \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/10\/blog-post_27.html\"\u003Eटेक्टोनिक प्लेट\u003C\/a\u003E मूवमेंट, कक्षीय विविधताएं शामिल हैं। इन गतिविधियों के कारण किसी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति जीवन के लिए काफी हानिकारक हो जाती है। साथ ही, ये गतिविधियाँ पृथ्वी के तापमान को काफी हद तक बढ़ा देती हैं जिससे प्रकृति में असंतुलन पैदा हो जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमनुष्य ने अपनी आवश्यकता और लालच के कारण कई ऐसे कार्य किए हैं जो न केवल\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eको बल्कि स्वयं को भी नुकसान पहुंचाते हैं। मानव गतिविधि के कारण कई पौधे और पशु प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं। मानव गतिविधियाँ जो जलवायु को नुकसान पहुँचाती हैं।\u0026nbsp;\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eउनमें वनों की कटाई, जीवाश्म ईंधन का उपयोग, औद्योगिक अपशिष्ट, एक अलग प्रकार का प्रदूषण और बहुत कुछ शामिल हैं। ये सभी चीजें जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र को बहुत बुरी तरह से नुकसान पहुंचाती हैं। और जानवरों और पक्षियों की कई प्रजातियाँ शिकार के कारण विलुप्त या विलुप्त होने के कगार पर हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजलवायु परिवर्तन के प्रभाव\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eइन जलवायु परिवर्तनों का पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, हवा में CO2 बढ़ रही है, जंगल और वन्य जीवन घट रहे हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण जल जीवन भी अस्त-व्यस्त हो रहा है। इसके अलावा, यह गणना की जाती है कि यदि यह परिवर्तन जारी रहा तो पौधों और जानवरों की कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। और पर्यावरण को भारी नुकसान होगा।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअगर हम कुछ नहीं करते हैं और चीजें अभी की तरह चलती रहती हैं तो भविष्य में एक दिन आएगा जब मनुष्य पृथ्वी की सतह से विलुप्त हो जाएगा। लेकिन इन समस्याओं को नज़रअंदाज करने के बजाय हम इस पर काम करना शुरू कर देते हैं तभी हम पृथ्वी और अपने भविष्य को बचा सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहालांकि इंसान की गलती ने जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र को काफी नुकसान पहुंचाया है। लेकिन, फिर से शुरू करने और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए हमने अब तक जो किया है उसे पूर्ववत करने का प्रयास करने में देर नहीं हुई है। और अगर हर इंसान पर्यावरण में योगदान देना शुरू कर दे तो हम भविष्य में अपने अस्तित्व के बारे में सुनिश्चित हो सकते हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/4672323688037528674\/comments\/default","title":"Post 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-489929212365045864"},"published":{"$t":"2021-09-12T07:44:00.011+05:30"},"updated":{"$t":"2023-10-31T23:06:58.994+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"जैव विविधता क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eजैव विविधता पृथ्वी पर जीवन की जैविक विविधता और परिवर्तनशीलता को दर्शाता है। जैव विविधता आनुवंशिक, प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र के स्तर पर भिन्नता का एक उपाय है।\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजैव विविधता क्या है\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003Eस्थलीय जैव विविधता आमतौर पर भूमध्य रेखा के पास अधिक होती है, जो गर्म जलवायु और उच्च प्राथमिक उत्पादकता का परिणाम है। जैव विविधता पृथ्वी पर समान रूप से वितरित नहीं है, और उष्ण कटिबंध में समृद्ध है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eये उष्णकटिबंधीय वन पारिस्थितिकी तंत्र पृथ्वी की सतह के दस प्रतिशत से भी कम हिस्से को कवर करते हैं, और इसमें दुनिया की लगभग नब्बे प्रतिशत प्रजातियां शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसमुद्री जैव विविधता आमतौर पर पश्चिमी प्रशांत तटों में अधिक होती है, जहां समुद्र की सतह का तापमान सबसे अधिक होता है, और सभी महासागरों में मध्य अक्षांशीय बैंड में होता है। प्रजातियों की विविधता में अक्षांशीय प्रवणताएं हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजैव विविधता आमतौर पर हॉटस्पॉट में क्लस्टर होती है, और समय के साथ बढ़ रही है, लेकिन भविष्य में वनों की कटाई के परिणाम के रूप में धीमी गति से होने की संभावना है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइसमें विकासवादी, पारिस्थितिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाएं शामिल हैं जो जीवन को बनाए रखती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eतेजी से\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरणीय\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eपरिवर्तन आम तौर पर बड़े पैमाने पर जीवो की विलुप्त होने का कारण बनते हैं। 99.9 प्रतिशत से अधिक प्रजातियां जो कभी पृथ्वी पर रहती थीं, पांच अरब से अधिक प्रजातियों के विलुप्त होने का अनुमान है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी की वर्तमान प्रजातियों की संख्या का अनुमान 10 मिलियन से 14 मिलियन तक है, जिनमें से लगभग 1.2 मिलियन को रिकॉड किया गया है और 86 प्रतिशत से अधिक का अभी तक वर्णन नहीं किया गया है। पृथ्वी पर संबंधित डीएनए बेस जोड़े की कुल मात्रा का अनुमान 5.0 x 1037 है और इसका वजन 50 बिलियन टन है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइसकी तुलना में, जीवमंडल का कुल\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/blog-post_92.html\"\u003Eद्रव्यमान\u003C\/a\u003E\u0026nbsp;चार ट्रिलियन टन कार्बन के बराबर होने का अनुमान लगाया गया है। जुलाई 2016 में, वैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों के अंतिम सार्वभौमिक सामान्य पूर्वज से 355 जीनों के एक समूह की पहचान करने की सूचना दी हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी की आयु लगभग 4.54 अरब वर्ष है। पृथ्वी पर जीवन का सबसे पहला प्रमाण कम से कम 3.5 अरब साल पहले का है। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में खोजे गए 3.48 अरब साल पुराने बलुआ पत्थर में माइक्रोबियल मैट जीवाश्म पाए गए हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eबायोजेनिक पदार्थ के अन्य प्रारंभिक भौतिक प्रमाण पश्चिमी ग्रीनलैंड में खोजे गए 3.7 अरब वर्षीय मेटा-तलछटी चट्टानों में ग्रेफाइट हैं। हाल ही में, 2015 में, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में 4.1 अरब साल पुरानी चट्टानों में \"जैविक जीवन के अवशेष\" पाए गए थे।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eशोधकर्ताओं में से एक के अनुसार, \"यदि पृथ्वी पर जीवन अपेक्षाकृत तेजी से उत्पन्न हुआ हैं। तो यह ब्रह्मांड में सामान्य हो सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003Eवितरण\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजैव विविधता समान रूप से वितरित नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर में बहुत भिन्न है। अन्य कारकों में, सभी जीवित चीजों की विविधता तापमान, वर्षा, ऊंचाई, मिट्टी,\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/07\/geography.html\"\u003Eभूगोल\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eऔर अन्य प्रजातियों की उपस्थिति पर निर्भर करती है। जीवों, प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्र के स्थानिक वितरण का अध्ययन, जीव-भूगोल का अध्ययन क्षेत्र है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eविविधता लगातार उष्ण कटिबंध में और ध्रुवीय क्षेत्रों में कम है। इक्वाडोर में यासुनी नेशनल पार्क जैसे आर्द्र जलवायु वाले वर्षा वनों में विशेष रूप से उच्च जैव विविधता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003Eविकास\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजैव विविधता 3.5 अरब वर्षों के विकास का परिणाम है। जीवन की उत्पत्ति विज्ञान द्वारा स्थापित नहीं की गई है। हालांकि, कुछ सबूत बताते हैं कि पृथ्वी के गठन के कुछ सौ मिलियन वर्ष बाद ही जीवन अच्छी तरह से स्थापित हो गया होगा।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eलगभग 2.5 अरब साल पहले तक, सभी जीवन में सूक्ष्मजीव शामिल थे - आर्किया, बैक्टीरिया और एकल-कोशिका वाले प्रोटोजोआ और प्रोटिस्ट आदि।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eफ़ैनरोज़ोइक पिछले 540 मिलियन वर्ष के दौरान जैव विविधता का इतिहास, कैम्ब्रियन विस्फोट के बाद तेजी से विकास के साथ शुरू होता है - एक ऐसी अवधि जिसके दौरान बहुकोशिकीय जीवों का लगभग हर समूह पहली बार दिखाई दिया।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअगले 400 मिलियन वर्षों में, अकशेरुकी विविधता का विकास तेजी से दिखाई दिया। विविधता में इस नाटकीय वृद्धि को बड़े पैमाने पर विलुप्त होने की घटनाओं के रूप में वर्गीकृत किया जाता हैं। एक महत्वपूर्ण नुकसान हुआ जब\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2023\/10\/blog-post_88.htm\"\u003Eवर्षावन\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eकार्बोनिफेरस में ढह गए।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E251 मिलियन वर्ष पहले पर्मियन-ट्राइसिक विलुप्त होने की घटना सबसे खराब थी। इस घटना से उबरने में कशेरुकियों को 30 मिलियन वर्ष लगे।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/489929212365045864\/comments\/default","title":"Post 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-3964349671735985371"},"published":{"$t":"2021-09-11T11:06:00.010+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:27:08.555+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"जनसंख्या किसे कहते हैं?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\n  जनसंख्या आमतौर पर एक ही क्षेत्र में लोगों की संख्या को संदर्भित करती है चाहे\n  वह शहर, क्षेत्र, देश या दुनिया हो। सरकारें आम तौर पर एक जनगणना\u0026nbsp; की\n  प्रक्रिया द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में निवासी आबादी के आकार को मापती हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\n\u003Cp\u003E\n  भारत की वर्तमान जनसंख्या लगभग 135 करोड़ है। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, अगले कुछ\n  वर्षों में, भारत में जनसंख्या में ठोस वृद्धि होगी, और वैश्विक स्तर पर भी होगी।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजनसंख्या किसे कहते हैं\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जनसंख्या किसी शहर या देश में रहने वाले मनुष्यों की कुल संख्या है। यह जानने की\n  अनुमति देता है कि इस आबादी को पूरा करने के लिए कितने संसाधनों की आवश्यकता है\n  और अन्य योजनाओं की आवश्यकता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  साल दर साल जनसंख्या का विस्फोट हुआ है, जिससे देश में रहने वाले प्रत्येक\n  व्यक्ति को संसाधन उपलब्ध कराना मुश्किल हो रहा है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  कम साक्षरता, कम उम्र में शादी और परिवार की वृद्धि की मांग जनसंख्या के विस्फोट\n  के कुछ कारण हैं। भारत जनसंख्या विस्फोट का प्राथमिक आधार है। यह दुनिया की 17%\n  आबादी को कवर करता है और सबसे अधिक आबादी वाला देश है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजनसंख्या वृद्धि के कारण\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जनसंख्या वृद्धि के अनेक कारण हैं। कम साक्षरता दर इस विस्फोट का एक कारण है।\n  उदाहरण के लिए, भारत में, कई राज्यों में साक्षरता दर अपेक्षाकृत कम है। गांव में\n  रहने वाले बहुत से लोग शिक्षा पूरी करने में असफल होते हैं और जन्म नियंत्रण के\n  बारे में कम जानकारी रखते हैं। वे अपने परिवार का विस्तार करते रहते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इसके अलावा, वे जन्म नियंत्रण तकनीकों या दवा के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं\n  रखते हैं। समझ की यह कमी आगे जनसंख्या विस्फोट की ओर ले जाती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जनसंख्या वृद्धि के पीछे एक अन्य प्राथमिक कारण बाल विवाह है। देश के कई हिस्सों\n  में आज भी बाल विवाह की प्रथा का पालन किया जाता है। माता-पिता अपनी बेटी की कम\n  उम्र में शादी कर देते हैं और कम उम्र में ये लड़कियां गर्भवती हो जाती हैं। यह\n  प्रक्रिया लंबे समय तक चलती रहती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इस वृद्धि के पीछे एक कारण यह है कि अन्य देशों के विपरीत भारत में सख्त कानून\n  नहीं हैं। इससे नागरिकों के लिए संसाधनों का समान हिस्सा प्राप्त करना भी कठिन हो\n  जाता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजनसंख्या विस्फोट का प्रभाव\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जनसंख्या विस्फोट से न केवल देश के नागरिकों को बल्कि प्रकृति को भी नुकसान होता\n  है। जनसंख्या में वृद्धि का अर्थ है रहने के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता, जिसके\n  परिणामस्वरूप वनों की कटाई होती है। कई शहरों ने इसे शहरी जीवन से भरने के लिए\n  ग्रीन ज़ोन खो दिया है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  वनों की कटाई प्रजातियों और अन्य संसाधनों के विलुप्त होने का कारण बन रही है।\n  जानवर अपना घर खो रहे हैं, जिससे वे लोगों की जान लेने वाले शहरों पर कब्जा कर\n  लेते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इसके बाद, जनसंख्या में वृद्धि से जनसंख्या में भी वृद्धि हो रही है। अधिक से\n  अधिक लोग अपनी सुविधा के लिए वाहन खरीद रहे हैं, जिससे प्रदूषण बढ़ रहा है। बड़े\n  पैमाने पर यातायात, सड़कों पर भीड़भाड़ और अन्य नकारात्मक दृश्य शहरों में देखे\n  जा रहे हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जनसंख्या वृद्धि भी औद्योगीकरण की मांग करती है, जो सभी क्षेत्रों में प्रदूषण को\n  आमंत्रित करती है। भारत जैसा देश अब प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग की भारी समस्या\n  का सामना कर रहा है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  सभी आबादी को भोजन का अनियमित वितरण एक और महत्वपूर्ण प्रभाव है। ग्रामीण\n  क्षेत्रों में कई परिवारों को खाने के लिए उचित भोजन नहीं मिलता है। कई गरीब\n  बच्चे बिना खाना खाए ही सो जाते हैं। भोजन का यह अनियमित वितरण केवल भारत में ही\n  नहीं, बल्कि अन्य विकासशील देशों में परिदृश्य है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eजनसंख्या नियंत्रित\u0026nbsp;\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जनसंख्या को नियंत्रित करने का एक तरीका लोगों को देश के संसाधनों पर इसके बुरे\n  प्रभावों के बारे में शिक्षित करना है। सरकार, गैर सरकारी संगठनों के साथ, लोगों\n  को जनसंख्या नियंत्रण के बारे में सूचित करने के लिए देश के हर ग्रामीण क्षेत्र\n  का दौरा करने की आवश्यकता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जन्म नियंत्रण किट, बच्चों को शिक्षा और जन्म को प्रतिबंधित करने में सफल\n  परिवारों को मौद्रिक लाभ प्रदान करना जरूरतमंदों को कर सकता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003Eनिष्कर्ष\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  हम, मनुष्य, अक्सर यह भूल जाते हैं कि यदि जनसंख्या में विस्फोट होता रहा तो हमें\n  कितना नुकसान होगा। संख्या बढ़ती रही तो बचना मुश्किल हो जाएगा। नागरिकों को\n  जनसंख्या विस्फोट के नकारात्मक प्रभाव को समझने की जरूरत है। सही उपाय करने और\n  संसाधनों को ध्यान में रखने से जनसंख्या को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।\n\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/3964349671735985371\/comments\/default","title":"Post 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patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-8941901768900130326"},"published":{"$t":"2021-09-06T18:27:00.026+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:27:02.182+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"प्राकृतिक संसाधन क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\n  हमे जीवित रहने के लिए कई वस्तुओ की आवश्यकता होती हैं। जिसका हम अपने अनुशार\n  उपयोग करते हैं। जैसे पानी को पीने नहाने व अन्य कार्यों मे उपयोग करते\n  हैं। इस प्रकार जल एक संसाधन हैं। आगे\u0026nbsp;संसाधन के प्रकार और उसकी विशेषता के बारे\n  मे चर्चा किया गया हैं।\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन क्या है\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eप्राकृतिक संसाधन \u003C\/b\u003Eवे संसाधन हैं। जो पहले से प्रकृति में मौजूद हैं। इसमें\n  वाणिज्यिक और औद्योगिक उपयोग, सौंदर्य मूल्य, वैज्ञानिक रुचि और सांस्कृतिक मूल्य\n  जैसी मूल्यवान विशेषताओं के स्रोत शामिल होते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधन के कुछ उदाहरण में सूर्य का प्रकाश, वातावरण, जल,\n  भूमि, सभी खनिजों के साथ सभी वनस्पति और पशु शामिल होते हैं। प्राकृतिक\n  संसाधन हमारी प्राकृतिक विरासत का हिस्सा होते हैं या प्रकृति के भंडार में\n  संरक्षित होते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  प्राकृतिक संसाधनों को विभिन्न तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है। प्राकृतिक\n  संसाधन सामग्री और घटक के आधार पर\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eके भीतर पाया जाता है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\n  प्रत्येक मानव निर्मित वस्तुए प्राकृतिक संसाधनों से बना होता है। एक प्राकृतिक\n  संसाधन एक अलग इकाई के रूप में मौजूद हो सकता है जैसे कि पानी, हवा, मछली आदि। कई\n  संसाधन को प्राप्त करने के लिए वस्तुओं को संसोधित करना पड़ता है। जैसे कि धातु\n  अयस्क, दुर्लभ तत्व, पेट्रोलियम और ऊर्जा के अधिकांश रूप।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन के प्रकार\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eहोमो सेपियन्स पहली बार लगभग 200 हजार साल पहले पृथ्वी पर दिखाई दिए थे। और तब से, हम जीवित रहने के लिए आवश्यक चीजों के लिए प्रकृति माँ पर निर्भर हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमनुष्य को हवा, पानी, पौधों और जानवरों से भोजन, सूरज की रोशनी, खनिज, भूमि, मिट्टी और जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता होती है। इन सभी उपयोगी कच्चे माल को प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइन प्राकृतिक संसाधनों को वर्गीकृत करने के कई तरीके हैं। वे जैविक या अजैविक हो सकते हैं। संसाधनों के वर्गीकरण का एक अन्य तरीका मानव उपभोग के लिए उपलब्ध संसाधनों की मात्रा है। इसके माध्यम से संसाधनों को संपूर्ण और अटूट प्राकृतिक संसाधनों में वर्गीकृत किया जा सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E1. असीमित प्राकृतिक संसाधन\u003C\/b\u003E\u003C\/h4\u003E\u003Cp\u003Eप्रकृति ने हमें हवा, पानी और धूप जैसे संसाधनों की असीमित आपूर्ति का आशीर्वाद दिया है। इन संसाधनों को अक्षय संसाधन कहा जाता है। इन्हें नवीकरणीय संसाधन भी कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch4 style=\"text-align: left;\"\u003E2. सीमित प्राकृतिक संसाधन\u003C\/h4\u003E\u003Cp\u003Eजैसे-जैसे मानव आबादी तेजी से बढ़ रही है, हम आज 7.4 बिलियन की संख्या तक पहुंच गए हैं। स्वाभाविक रूप से, इसका मतलब है कि हम अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअगर हम इस दर से आगे बढ़ते हैं, तो हम जल्द ही एक ऐसे दिन पर पहुंच जाएंगे, जब प्रकृति हमें पौधे और पेड़, जानवर, खनिज अयस्क, जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे संसाधन उपलब्ध नहीं करा पाएगी। इस प्रकार, ये संसाधन सीमित हैं। इन संसाधनों को अनवीकरणीय संसाधन भी कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयदि इन संसाधनों के उपयोग की सावधानीपूर्वक नहीं किया गया, तो यह भविष्य मे समाप्त हो सकते हैं।। यही कारण है कि यह समझना महत्वपूर्ण है कि कौन से संसाधन समाप्त हो सकते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन का संरक्षण एवं प्रबंधन\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन प्राकृतिक संसाधनों जैसे भूमि, पानी, मिट्टी, पौधों और\n  जानवरों का प्रबंधन है। जिसमें इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाता है कि प्रबंधन\n  वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए जीवन की गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करता\n  है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन उस तरीके से संबंधित है जिसमें लोग और प्राकृतिक परस्पर\n  क्रिया करते हैं। यह प्राकृतिक विरासत प्रबंधन, भूमि उपयोग, जल प्रबंधन,\n  जैव-विविधता संरक्षण, और कृषि, खनन, पर्यटन, मत्स्य पालन और वानिकी जैसे उद्योगों\n  की भविष्य की स्थिरता को एक साथ लाता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  लोग और उनकी आजीविका स्वास्थ्य और उत्पादकता पर निर्भर करती है। स्वास्थ्य और\n  उत्पादकता को बनाए रखने में प्रकृति का प्रबंधन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।\n\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन की विशेषता\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eसभी संसाधनों में कुछ बुनियादी विशेषताएं होती हैं। सभी संसाधन उपयोगी होते हैं। कुछ विशेष स्थिति में एक संसाधन दूसरे की तुलना में अधिक उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन इन संसाधनों की कुछ बुनियादी विशेषताएं हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्राकृतिक संसाधन प्रकृति में पाई जाने वाली मूल्यवान चीजें हैं। यह अक्षय संसधान हो सकता है। जैसे हवा, धूप, लकड़ी या गैर-नवीकरणीय संसधान तेल, कोयला, सोना आदि।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसंसाधन विकास को बड़वा देता हैं। उदाहरण के लिए, खदानों या तेल के कुओं का निर्माण जहा होता हैं। वह आवश्यक बुनियादी ढांचे में सुधार भी किया जाता हैं, जैसे किसड़कों का निर्माण आदि।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्रौद्योगिकी ने प्राकृतिक संसाधनों के संचयन की क्षमता में वृद्धि की है। आर्थिक विकास ने प्राकृतिक संसाधनों की मांग में भारी वृद्धि की है और संसाधनों के लिए व्यापार और वितरण मार्ग भी प्रदान किए हैं।\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन के नाम\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eजैविक संसाधन\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003Eजनसंख्या\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eवानिकी\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eमछली\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eकोयला\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eतेल\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eप्राकृतिक गैस\u003C\/li\u003E\n\u003C\/ol\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eअजैविक संसाधन\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003Eसोना\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eतांबा\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eमैंगनीज\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eजस्ता\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eलौह अयस्क\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eक्रोमाइट\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eलिथियम\u003C\/li\u003E\n\u003C\/ol\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन का वर्गीकरण\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003Eसभी प्राकृतिक जैव-अजैव तत्व जिनका मानव उपयोग करता है, प्राकृतिक संसाधन कहलाते हैं। इस तरह की संसाधनों को सामान्यतः दो वर्गों में रखा जा सकता है\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col\u003E\u003Cli\u003Eजैविक संसाधन\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eअजैविक संसाधन\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eजैविक\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;\u003Cb\u003Eसंसाधन\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E- जैविक संसाधन जीवमंडल से प्राप्त होते हैं, जैसे कि जंगल और जानवर, और वे सामग्री जो उनसे प्राप्त की जा सकती हैं। कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधन को भी इस श्रेणी में शामिल किया गया है क्योंकि वे सड़ने वाले कार्बनिक पदार्थों से बनते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eउदाहरण - वनस्पति\u0026nbsp;- फल, फूल, रेशे, गोंद, रॉल, पत्तियाँ, छालें, लकड़ियाँ, जड़ी-बूटियाँ आदि।\u0026nbsp;जीव-जन्तु\u0026nbsp;- दूध, ऊन, बीट, खाल, सींग, हड्डी, मांस, चर्बी आदि। नभ, थल, जल के सभी जीव-जन्तुओं से प्राप्त वस्तुएँ।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eअजैविक\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E\u003Cb\u003Eसंसाधन\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E- अजैविक संसाधन वे हैं जो निर्जीव, अजैविक पदार्थों से प्राप्त होते हैं। अजैविक संसाधनों के उदाहरणों में भूमि, ताजा पानी, वायु, दुर्लभ-पृथ्वी तत्व और भारी धातुएं शामिल हैं, जैसे सोना, लोहा, तांबा, चांदी, आदि।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eउदाहरण - खनिज, भूमि, मृदा, जल, वायु, सूर्य ताप, प्रकाश आदि।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइसके अतिरिक्त भी प्राकृतिक संसाधनों का वर्गीकरण किया जा सकता है, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित प्रकार हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रकृति एवं उपयोगिता के आधार पर\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;-\u003C\/p\u003E\u003Cdiv\u003E\u003Col\u003E\u003Cli\u003Eसमाप्य संसाधन\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eअसमाप्य संसाधन\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003C\/div\u003E\u003Ch3\u003E\u003Cb\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eसमाप्य संसाधन\u003C\/span\u003E\u003C\/b\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवे प्राकृतिक संसाधन जो उपयोग के पश्चात् समाप्त हो जाते हैं, समाप्य संसाधन कहलाते हैं, साधारणतया खनिज संसाधन इसी श्रेणी में आते हैं, जैसेकोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, नमक आदि को जितना उपयोग में लाते हैं उतना सदा के लिए नष्ट हो जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइनके विपरीत सोना, चाँदी, लौह अयस्क, ताँबा आदि ऐसे खनिज हैं, जिनकी मूल रासायनिक संरचना को जब तक नष्ट नहीं किया जाता, तब तक इनके बार-बार उपयोग किये जाने की सम्भावना बनी रहती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभारत में पाये जाने वाले प्रमुख समाप्य संसाधनों को पुनः दो वर्गों में बाँटा जाता है—(अ) धात्विक खनिज, तथा (ब) अधात्विक खनिज । धात्विक खनिज - लौह अयस्क, मैंगनीज, क्रोमाइट, सीसा, निकल, टंगस्टन, कोबाल्ट, सोना, चाँदी, ताँबा, ऐल्युमिनियम आदि हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eधात्विक खनिजों का पुनः उपविभाजन किया जाता है (अ) लौहयुक्त धात्विक खनिज एवं (ब) अलौह युक्त धात्विक खनिज । जिन धात्विक खनिजों में लौह अंश पाया जाता है, उन्हें लौह युक्त धात्विक खनिज कहते हैं, जिनमें लौह अंश नहीं पाया जाता, उन्हें अलौह धात्विक खनिज कहते हैं ।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअधात्विक खनिज - अभ्रक, चूने का पत्थर, संगमरमर, जिप्सम, डोलोमाइट, पोटाश, नमक, कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम, थोरियम आदि हैं। भारत में इन खनिज निक्षेपों का वितरण बहुत असमान है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eउत्तर भारत का \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mandan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eमैदान \u003C\/a\u003Eखनिजों से पूर्णतः रिक्त है, जबकि दक्षिण भारत का पठार, विशेषत: छोटा नागपुर का पठार, (झारखंड एवं उड़ीसा) खनिजों के विशाल भण्डार हैं। इसलिए यह क्षेत्र “भारत का खनिज हृदय स्थल ” के नाम से जाना जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eछोटा नागपुर का पठार विश्व के प्रमुख खनिज क्षेत्रों में से एक है। इस खनिज क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उद्योगों के मूल आधार खनिज लौह अयस्क एवं कोयला दोनों ही यहाँ एक-दूसरे के निकट पाये जाते हैं, जो औद्योगिक विकास के लिए वरदान है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइसके अतिरिक्त पूर्व में असम तथा पश्चिम में राजस्थान के कुछ भागों में भी खनिज पाये जाते हैं। इस प्रकार सारे \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/peninsula-in-hindi.html\"\u003Eप्रायद्वीप\u003C\/a\u003E में उत्तरी मैदान को छोड़कर खनिजों का निक्षेप पाया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003E\u003Cb\u003Eअसमाप्य संसाधन\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eसौर्यिक ऊर्जा, वायु, जल, भूमि, मृदा, वनस्पतियाँ, कृषि उपजें, चारागाह, जीव-जन्तु आदि असमाप्य संसाधन की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि ये उपयोग के पश्चात् समाप्त नहीं होते, इसलिए इन्हें असमाप्य संसाधन कहते हैं। इनमें से कुछ संसाधन ऐसे हैं, जिनका जीवन चक्र चलता रहता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजल वाष्प-जल बनने की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है इसलिए इसे चक्रीय संसाधन भी कहते हैं। कुछ संसाधनों का उपयोग कर, उसके बीज से उसे पुनः उसी अवस्था में कुछ ही समय में लाया जा सकता है,\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजैसे - वनस्पतियाँ, उपज, वन, जीव-जन्तु। ऐसे संसाधनों को 'नव्यकरणीय संसाधन' कहते हैं । इन सभी प्राकृतिक सम्पदाओं से मानव अन्योन्य क्रियाएँ कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\n  प्राकृतिक संसाधनों को वर्गीकृत करने के विभिन्न तरीके हैं। इनमें उत्पत्ति का\n  स्रोत, विकास का चरण और उनकी नवीकरणीयता शामिल है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eविकास के चरण\u003C\/b\u003E को ध्यान में रखते हुए, प्राकृतिक संसाधनों को निम्नलिखित चार तरीकों से संदर्भित किया जा सकता है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eसंभावित संसाधन \u003C\/b\u003E- संभावित संसाधन वे हैं जिनका भविष्य में उपयोग किया जा\n  सकता है - उदाहरण के लिए, तलछटी चट्टानों में पेट्रोलियम, जो कि ड्रिल आउट और\n  उपयोग में आने तक एक संभावित संसाधन बना रहता है\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eवास्तविक संसाधन \u003C\/b\u003E- वे संसाधन जिनका सर्वेक्षण किया गया है, मात्रा\n  निर्धारित की गई है और योग्य हैं, और वर्तमान में विकास में उपयोग किए जाते हैं,\n  जैसे लकड़ी प्रसंस्करण, और आमतौर पर प्रौद्योगिकी पर निर्भर हैं\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eआरक्षित संसाधन \u003C\/b\u003E- वास्तविक संसाधन का वह भाग जिसे भविष्य में लाभप्रद रूप\n  से विकसित किया जा सकता है\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  \u003Cb\u003Eस्टॉक संसाधन \u003C\/b\u003E- जिनका सर्वेक्षण किया गया है, लेकिन प्रौद्योगिकी की कमी\n  के कारण उपयोग नहीं किया जा सकता है - उदाहरण के लिए, हाइड्रोजन।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन का महत्व\u003C\/span\u003E\n\u003C\/h3\u003E\n\u003Cp\u003E\n  हमारी सभी सामग्री अंततः प्राकृतिक संसाधनों के अंतर्गत आती है। उदाहरण के लिए, कोयला,\n  तेल, मिट्टी, जल, भूमि, खनिज, वन और इमारती लकड़ी और वायु आदि।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पृथ्वी पर प्राकृतिक संसाधनों की भूमिका वास्तव में अनिवार्य है। यही कारण है कि\n  हम सभी के लिए कुछ जवाबदेही होना बहुत महत्वपूर्ण है। हमें अपने पर्यावरण की\n  रक्षा और सम्मान करने की आवश्यकता है। क्योंकि प्रकृति हमे देती है हमसे वह कुछ मांगती नहीं हैं। हमे बस वातावरण को दूषित करने से बचना चाहिए।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\n\u003Cdiv style=\"background-color: #abd1f1; padding: 5px;\"\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E\n  1. \u003C\/b\u003Eप्राकृतिक संसाधन पर्यावरण संतुलन बनाए रखने और जरूरतों को पूरी तरह से\n  संतुष्ट करने में मदद करती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E\n  2. \u003C\/b\u003Eपौधों और जानवरों से औद्योगिक सामग्री और जैविक सामग्री की एक विस्तृत\n  श्रृंखला, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उत्पादन और दवा के निर्माण में उपयोग की\n  जाती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E\n  3 .\u003C\/b\u003E किसी भी देश के विकास के लिए संसाधन महत्वपूर्ण होते हैं। उदाहरण के लिए,\n  ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए, किसी को जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता होती है। और\n  औद्योगिक विकास के लिए हमें खनिज संसाधनों की आवश्यकता होती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E\n  4.\u003C\/b\u003E प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक उपयोग ने सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय\n  समस्याओं को जन्म दिया है। इसके सदुपयोग से विकाश की दर तेजी से बढ़ती हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E5. \u003C\/b\u003Eप्राकृतिक संसाधन निश्चित मात्रा में उपलब्ध हैं और वे गैर-नवीकरणीय हैं,\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E\n  6. \u003C\/b\u003Eबढ़ती जनसंख्या के साथ प्राकृतिक संसाधन दुर्लभ होते जा रहे हैं, इसलिए इनका\n  संरक्षण आवश्यक है। यह हमें और साथ ही हमारी भावी पीढ़ी को प्राकृतिक संसाधनों का\n  पूर्ण उपयोग करने के लिए सशक्त बनाता है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003Cb\u003E\n  7.\u003C\/b\u003E वे कृषि, व्यापार, आयात और निर्यात आदि को समृद्ध करके देश के आर्थिक विकास\n  में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003C\/div\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/8941901768900130326\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/natural-resources-in-hindi.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/8941901768900130326"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/8941901768900130326"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/natural-resources-in-hindi.html","title":"प्राकृतिक संसाधन क्या 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ग्रह होने के पीछे पानी ही कारण\n  है। यह सार्वभौमिक विलायक इस ग्रह पर हमारे पास मौजूद प्रमुख संसाधनों में से एक\n  है। जल के बिना जीवन का होना असंभव है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eजल संसाधन\u003C\/b\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जल पृथ्वी पर जीवन का स्रोत है। यह जलमंडल का प्रमुख संघटक है जिसकी संरचना\n  महासागर, सागर, नदियों जल-प्रवाह झीलों और भूतल - जल से मिलकर हुई है जो धरातल जल\n  के साथ प्रवाह करते है| पृथ्वी की सतह\u0026nbsp; का लगभग 70.8% हिस्सा मुख्य रूप\n  से\u0026nbsp; महासागर के रूप में छाया हुआ है। अनुमान लगाया जाता है कि जलमंडल समस्त\n  जल जल का लगभग 1,360 मिलियन क्यूबिक किमी धारण करता है।\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इसका 97% जलभाग महासागर और सागरों के हैं, जहा उच्च लवणता के गुण के चलते मानव\n  उपयोग के लिए जल राशि अनुपयुक्त है। लगभग मात्र 2% जल संसाधन और हिम् छत्रपो में\n  उपलब्ध है जबकि शेष (1%से भी कम) शुद्ध जल के रूप में मानव उपयोग के लिए और अन्य\n  कार्यों के हेतु उपलब्ध हैं।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  महासागर की कुल जलराशि और साफ जल पूरे भुगर्भित इतिहास में बिल्कुल स्थिर रहे हैं\n  किंतु महासागरीय जल और साफ जल के बीच का अनुपात हमेशा जलवायु विषयक स्थितियों के\n  अनुसार बदलता रहता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जब जलवायु ठंडी रहती है तब और सागरों का ज्यादातर जल इनके द्वारा अवशोशित कर लिया\n  जाता है और इस स्थिति में समुद्र के जल के व्यय के आधार पर स्वच्छ जल में\n  वृद्धिहो जाती है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इसी तरह जब जलवायु उष्ण रहती है, तब स्वच्छ जल का व्यय होता है और सागरों के जल\n  की राशि बढ़ती है|समुद्र की सतह धीरे-धीरे बढ़ रही है|जिसका हम उपयोग करते है , वह\n  अनन्त रूप से\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eके मार्फत चक्रण करता झट है। इस चक्रण को हम जलचक्र कहते है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eजल का महत्व\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  हमारे पृथ्वी पर जल अनिवार्य\n  \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/natural-resources-in-hindi.html\"\u003Eप्राकृतिक संसाधन\u003C\/a\u003E\n  है यह न केवल मूव जीवन के लिए अनिवार्य है बल्कि समस्त तरह के जीवन -पशुओ और\n  वनस्पतियों के लिए भी पृथ्वी की 97% साथ जल से आच्छादित है। ज्यादातर पशुओ और\n  पौधों के शरीर मे उनके शरीर का 60-70% भाग जल है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  मनुष्य के जीवन मे जल का महत्वपूर्ण स्थान है मानव के प्राक्कल से ही जहां-जहां\n  जल उपलब्ध थे मानव वासस्थल वहां-वहां थे और ये वहीं-वही थे, जहां आदि मानव ने\n  खास-खास खाद्यान्न ऊगा सके। जल के बिनक न तो व्यक्ति और न ही मानव - समुदाय जीवित\n  रह सकता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    हमारे शरीर की हर एक कोशिका को ठीक से काम करने के लिए पानी की आवश्यकता होती\n    है।\n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eसभी जीवित प्राणियों को जीवित रहने के लिए पानी की आवश्यकता होती है।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    जल हमारे जीवन के लिए आवश्यक है, और जल के बिना पृथ्वी पर कोई जीवन नहीं है।\n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eहमें नदियों, भूजल (कुओं), बारिश आदि जैसे कई स्रोतों से पानी मिलता है।\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    हम पानी का उपयोग पीने, खाना पकाने, सफाई और कई अन्य उद्देश्यों के लिए करते\n    हैं।\n  \u003C\/li\u003E\n\u003C\/ol\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eजल उपयोग\u0026nbsp;\u003C\/b\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  अपने गुणों व लक्षणोंके कारण जल का समस्त सजीवों के लिए बहुउद्देशीय उपयोग है। जल\n  जीवन के लिए आवश्यक है जीवन की अधिसंख्य प्रक्रिया लजीवों में अवस्थित जल में\n  सम्पन्न होती हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  पोषकों के वाहन और शरीर मे उनके वतरण तापमान के नियंत्रण और अपशिष्ट पदार्थों के\n  उत्सर्जन या निष्कर्षण के कार्य जल के द्वारा ही सम्पन्न होते है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eस्वच्छ जल का संकट\u003C\/b\u003E\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  जल की पर्याप्त उपलब्धता के कारण यह अत्यंत कम खर्चीला संसाधन है। अन्य प्राकृतिक\n  संसाधनों की तुलना में जल का इस्तेमाल आश्चर्यजनक यानी विस्मयकारी परिणाम में हुआ\n  करता है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  हाल के वर्षों में पृथ्वी पर वार्षिक रूप ले कुल जल की खपत की मात्रा लगभग 1,000\n  गुना ज्यादा है विश्व के कुल खनिजों के उत्पादन के जिनमे कोयला, पेट्रोलियम ,\n  धात्विक अयस्क और ग़ैरधत्विक खनिज शामिल हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  विश्व स्तर पर जल कुल बहुतायत कोई समस्या नहीं है। समस्या अगर है तो वह है सही\n  स्थान पर सही समय मे तथा सही रूप में जल की उपलब्धता| विश्व स्तर रप जल का वितरण\n  आसमान है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eजल पर विवाद\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  किसी देश की अर्थव्यवस्था व्यापक रूप से उसकी नदियों पर निर्भर करती है। जल\n  संसाधन को लेकर जो समस्याएं उतपन्न होती हैं।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  इनके अलावा जल पर कई तरह के संघर्ष या विवाद भी है। जल की अनिवार्यता और इसके\n  आसमान वितरण के कारण अंत:देशीय अथवा अंतरराष्ट्रीय विवाद उत्पन्न हुआ है। नदी जल\n  बंटवारे से सम्बंधित मुद्दों ने व्यपक रूप से हमारे किसानों को प्रभावित किया है,\n  साथ ही हमारी सरकार को भी विचलित करता रहा है।\u0026nbsp;\n\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/2893807202704247988\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/water-resources-in-hindi.html#comment-form","title":"0 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बताइए"}],"author":[{"name":{"$t":"Unknown"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"16","height":"16","src":"https:\/\/img1.blogblog.com\/img\/b16-rounded.gif"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-8851371781143474500"},"published":{"$t":"2021-09-01T13:25:00.004+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:26:33.226+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"भूमि संसाधन क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eभूमि संसाधन\u003C\/b\u003E: भूमि बहुमूल्य संसाधन है। यह भू मंडल का प्रमुख संघटन है और हवा,जल एवं पेड़-पौधों के अलावा प्राकृतिक वातावरण के प्रमुख घटको में से एक है। इसका स्वरूप समस्त भू-सतह का 1\\5 भाग है, यह लगभग 13,393 मिलियन हेक्टेयर भाग में आच्छादित है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003Eसाथ ही प्रमुख और अन्य जीवों के लिए जरूरी पदार्थो का यह स्रोत है जिसे भूमि ही उपलब्ध कराती है। विविध उद्देश्य जिनके लिए भूमि का इस्तेमाल किया जाता है, कृषि और उधनकृषि (बागवानी) उत्पादन के लिए, ऊर्जा उत्पादन के लिए, मानव निवास और व्यवसायिक उद्देश्यों जंगल इत्यादि भू संसाधनों में शामिल हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eभूमि संसाधन के रूप में: \u003C\/b\u003Eभूमि की धरातलीय परत मिट्टी कहलाती है। भू क्षेत्र का करीब 4\\5 भाग मिट्टी से ढका है। जो विभिन्न समस्तरो में भिन्न-भिन्न है और वनस्पति जगत को समर्पित करने में सक्षम है। यह पृथ्वी के धरातल पर पिंडो का एक समूह है जिसमे सजीव और निर्जीव दोनो रहते है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003Eसाथ ही पेड़-पौधों को आधार देने में भी सहायक है। ऊपरी सिमा हवा है और इसका गहरा जल या चटटानो का बंजर क्षेत्र या हिम इसकी सबसे न्यूनतम सिमा को परिभाषित करना सबसे कठिन है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003Eभू निम्नीकरण और इसके कारण:\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eभू निम्नीकरण का तात्पर्य है मिट्टी की उर्वरता या उत्पादन क्षमता में कमी समस्त आधुनिक क्रियाकलापो के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव मिट्टी पर पड़ता है। भूमि निम्नीकरण चौकाने वाली एक वास्तविक वजह निश्चित रूप से है। क्योंकि मिट्टी एक तरह से मन्द प्रक्रिया है और औसतन वार्षिक अपरदन दर पुनः स्थापन डर से 20 से 100 गुनी से भी अधिक है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003Eभूमि संसाधन बहुत हद तक ज्वालामुखी फटने, भूकंप इत्यादि जैसे आपदाओ है फिर भी भूमि निम्नीकरण की घटना मानव क्रियाकलापो का परिणाम है। क्योकि मानवीय क्रियाकलापों से ही मिट्टी प्रदूषित होती है। वे संघटक या तत्व जो भूमि निम्नीकरण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है निम्नलिखित है:-\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E1. भूमि अपरदन -\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;मृदा अपरदन का मतलब है हवा,जल और मानव क्रियाकलापो द्वारा मृदा की ऊपरी परत की क्षति\u003Cb\u003E\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eमृदा अपरदन का अर्थ है मिट्टी की उर्वरता में कमी क्योकि मिट्टी की ऊपरी परत में ही मिट्टी की उर्वरता की विशिष्टता के लक्षण होते है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E2. लवणता -\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;लवणता का मतलब है मृदा में घुलनशील लवण की उसके संकेन्द्रण की वृद्धि सिंचाई के कमजोर और दोषपूर्ण और बढ़ का जल घुलनशील लवण को मृदा की सतह पर फैला देता है और शुष्क क्षेत्रों में जहा कमजोर व्यवस्था और उच्च तापक्रम ही स्थिति है, जल का शीघ्र वाष्प उत्सर्जन होता है और मृदा की सतह पर सफेद रूप में लवण की परत बिछ जाती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E3. जल जमाव -\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;किसान सामान्यतः अपनी फरमलैंड (कृषिभूमि) के लिए फसलो को अनुकूल नमी उपलब्ध कराने हेतु भारी सिंचाई की व्यवस्था करते है। साथ ही भूमि में गहराई तक घुले लवण को लीच करने हेतु भारी सिंचाई की व्यवस्था करते है। इसके बावजूद अपर्याप्त और सामान्य सिंचाई जल की व्यवस्था के कारण धीरे-धीरे यह निरंतर कॉलम (स्तम्भ) का निर्माण कर लेता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E4. मरुस्थलीकरण -\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eमरुस्थलीकरण भूमि की मन्द प्रक्रिया है जो आगे चलकर मरुस्थल का निर्माण करती है। यह पृथ्वी ग्रह के ऊपर चर्म रोग जैसी स्थिति है जिसमे निम्नीकरण भूमि के धब्बे या टुकड़े पृथक रूप से प्रफुटित होती है फिर धीरे धीरे एकसाथ जुड़ते जाते है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E5.शहरीकरण -\u0026nbsp;\u003C\/b\u003Eमानव गतिविधियां वनों फसलो वाली और घास स्थलों की भूमि के निम्नीकरण के लिए जिम्मेदार है।उत्पादक क्षेत्र बड़ी तेजी से शहरीकरण के कारण सिमटते जा रहे हैं अर्थात उन्नतिशील,विकासात्मक क्रियाकलाप के कारण जैसे कि मानव-बसव और औधोगिकरण के कारण कृषिगत उत्पादक क्षेत्र तेजी से संकुचित हो रहे है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/8851371781143474500\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/bhumi-sansadhan-kya-hai.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/8851371781143474500"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/8851371781143474500"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/bhumi-sansadhan-kya-hai.html","title":"भूमि संसाधन क्या है?"}],"author":[{"name":{"$t":"Unknown"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"16","height":"16","src":"https:\/\/img1.blogblog.com\/img\/b16-rounded.gif"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-6881434137178145187"},"published":{"$t":"2021-08-31T07:34:00.009+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:26:21.319+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"भूमि क्षरण के कारण क्या है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\n  भूमि पृथ्वी की ठोस सतह है जो स्थायी रूप से पानी से अलग है। भूमि समुद्र तल से\n  ऊपर स्थित है और इसमें मुख्य रूप से चट्टान, रेत, मिट्टी और कभी-कभी \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/what-is-ice.html\"\u003Eबर्फ\u003C\/a\u003E के घटक\n  होते हैं। पूरे इतिहास में मानव गतिविधि का अधिकांश हिस्सा भूमि क्षेत्रों में\n  हुआ है जो कृषि, आवास और विभिन्न \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/09\/natural-resources-in-hindi.html\"\u003Eप्राकृतिक संसाधनों\u003C\/a\u003E का समर्थन करते हैं।\u003C\/p\u003E\n\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003Eभूमि क्षरण क्या है\u003C\/h2\u003E\n\u003Cp\u003E\n  भूमि क्षरण कई ताकतों के कारण होता है, जिसमें चरम मौसम की स्थिति, विशेष रूप से\n  सूखा शामिल है। यह मानवीय गतिविधियों के कारण भी होता है जो मिट्टी की गुणवत्ता\n  और भूमि उपयोगिता को प्रदूषित करता हैं। यह खाद्य उत्पादन, आजीविका और अन्य\n  पारिस्थितिक तंत्र वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और प्रावधान को नकारात्मक रूप से\n  प्रभावित करता है। मरुस्थलीकरण भूमि क्षरण का एक रूप है जिसके द्वारा उपजाऊ भूमि\n  मरुस्थल बन जाती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\n  ये सामाजिक और\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरणीय\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eप्रक्रियाएं दुनिया की कृषि योग्य भूमि और चारागाहों पर\n  दबाव डाल रही हैं जो भोजन और पानी के लिए आवश्यक हैं। भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण\n  मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। जैसे-जैसे भूमि का क्षरण होता है और कुछ\n  स्थानों पर रेगिस्तान का विस्तार होता है, खाद्य उत्पादन कम हो जाता है, जल स्रोत\n  सूख जाते हैं और आबादी अधिक अनुकूल क्षेत्रों में जाने के लिए विवश हो जाती है।\n\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003Eस्वास्थ्य पर मरुस्थलीकरण के संभावित प्रभावों में शामिल हैं:\u003C\/p\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\n  \u003Cli\u003Eकम भोजन और पानी की आपूर्ति से कुपोषण के उच्च खतरे;\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eखाद्य जनित बीमारियाँ जो स्वच्छ पानी की कमी के परिणामस्वरूप होती हैं;\u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003E\n    हवा के कटाव और अन्य वायु प्रदूषकों से वायुमंडलीय धूल के कारण होने वाले श्वसन\n    रोग;\n  \u003C\/li\u003E\n  \u003Cli\u003Eआबादी के पलायन के रूप में संक्रामक रोगों का प्रसार।\u003C\/li\u003E\n\u003C\/ol\u003E\n\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\n"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/6881434137178145187\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/08\/land-degradation-in-hindi.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/6881434137178145187"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/6881434137178145187"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/08\/land-degradation-in-hindi.html","title":"भूमि क्षरण के कारण क्या है?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-746824662992853997"},"published":{"$t":"2021-07-20T08:33:00.012+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:26:13.938+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"वातावरण किसे कहते हैं?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003Eवातावरण को ही\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eकहा जाता हैं। वातावरण\u0026nbsp;ग्रह के चारों ओर गैसों की परतों का एक समूह होता है। गुरुत्वाकर्षण वातावरण को अधिक प्रभावित करता हैं। किसी ग्रह का\u0026nbsp;वातावरण कैसा होगा वहा पाए जाने वाले गैसों पर भी निर्भरत करता हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी का वातावरण लगभग 78% नाइट्रोजन, 21% ऑक्सीजन, 0.9% आर्गन, 0.04% कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों से बना है। अधिकांश जीवों द्वारा श्वसन के लिए ऑक्सीजन का उपयोग किया जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eवातावरण किसे कहते हैं\u003C\/span\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003Eहमारे चारो ओर\u0026nbsp;पाए जाने वाले \u003Cb\u003Eआवरण को ही वरातवरण कहा जाता हैं\u003C\/b\u003E। इसमें सभी तत्व और गैस और जीव जंतु समाहित होते हैं। यह हमें जीवन जीने के लिए कई आवश्यक संसाधन प्रदान करता हैं। जैसे रहने के लिए आवास भोजन उगाने के लिए उपजाऊ भूमि और उधोग के लिए कच्चा माल आदि।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवातावरण\u0026nbsp;किसी ग्रह के चारों ओर पाए जाने वाली\u0026nbsp;गैसों की परतें होती हैं। ये गैसें तापमान और दबाव जैसी अनूठी विशेषताओं से भरी होती\u0026nbsp;हैं। पृथ्वी के वातावरण में निम्न परते पायी जाती हैं - क्षोभमंडल, समतापमण्डल, मध्यमण्डल, आयनमण्डल और बाह्यमण्डल।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eनाइट्रोजन हमारे ग्रह के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते हैं जो पौधों के विकास में काफी लाभप्रद होते हैं।\u0026nbsp;कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग पौधों, शैवाल और साइनोबैक्टीरिया द्वारा प्रकाश संश्लेषण के लिए किया जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवायुमंडल जीवित जीवों को सौर पराबैंगनी विकिरण, सौर हवा और हानिकारक किरणों की\u0026nbsp;क्षति से बचाने में मदद करता है। पृथ्वी के वायुमंडल की वर्तमान संरचना अरबों वर्षों के जैव रासायनिक कारणों का परिणाम\u0026nbsp;है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eवातावरण प्रदूषण\u003C\/span\u003E\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवातावरण प्रदूषण कोई नई घटना नहीं है, फिर भी यह दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है जो मानवता के सामने है, और रोग और मृत्यु का\u0026nbsp;प्रमुख पर्यावरणीय कारण हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण, खनन और अन्वेषण के माध्यम से मनुष्य की गतिविधियाँ वैश्विक पर्यावरण प्रदूषण में सबसे आगे हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eविकसित और विकासशील दोनों देश इस बोझ को एक साथ साझा करते हैं, हालांकि विकसित देशों में जागरूकता और सख्त कानूनों ने उनके पर्यावरण की रक्षा करने में काफी हद तक योगदान दिया है। प्रदूषण की ओर वैश्विक ध्यान के बावजूद, इसके गंभीर दीर्घकालिक परिणामों के कारण प्रभाव अभी भी महसूस किया जा रहा है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eप्रदूषण के प्रकार\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eप्रदूषण विभिन्न प्रकार के प्रदूषण होते हैं, जो या तो प्राकृतिक घटनाओं या मानव निर्मित गतिविधियों के कारण होते हैं। इन्हें आगे निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Col style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cli\u003Eवायु प्रदूषण\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eजल प्रदूषण\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eमिट्टी का प्रदूषण\u003C\/li\u003E\u003Cli\u003Eध्वनि प्रदूषण\u003C\/li\u003E\u003C\/ol\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइन 4 प्रकार के प्रदूषणों के अलावा, अन्य प्रकार भी\u0026nbsp;मौजूद हैं जैसे प्रकाश प्रदूषण, तापीय प्रदूषण और रेडियोधर्मी प्रदूषण आदि। उत्तरार्द्ध अन्य प्रकारों की तुलना में बहुत दुर्लभ है, लेकिन यह सबसे घातक है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eवायु प्रदूषण -\u003C\/b\u003E पृथ्वी के वायुमंडल में हानिकारक प्रदूषकों रसायन, जहरीली गैसों, कणों, जैविक अणुओं, आदि के मिलने से होता\u0026nbsp;है। ये प्रदूषक काफी हानिकारक होते हैं और कुछ मामलों में, गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eजल प्रदूषण\u003C\/b\u003E तब होता है जब जहरीले प्रदूषक और कण पदार्थ झीलों, नदियों और समुद्रों जैसे जल निकायों में मिला दिए\u0026nbsp;जाते हैं। ये प्रदूषक\u0026nbsp;आम तौर पर अनुचित सीवेज उपचार और तेल रिसाव जैसी मानवीय गतिविधियों द्वारा होती हैं। हालांकि, यूट्रोफिकेशन जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं भी जल प्रदूषण का कारण बन सकती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eमृदा प्रदूषण\u003C\/b\u003E\u0026nbsp;मिट्टी में रसायनों या अन्य मानव निर्मित पदार्थों की उपस्थिति के कारण भूमि के क्षरण कारण मिट्टी की गुणवत्ता नष्ट हो जाती\u0026nbsp;है। जीनोबायोटिक पदार्थ मिट्टी की प्राकृतिक संरचना को बदल देते हैं और इसे नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। ये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eध्वनि प्रदूषण\u003C\/b\u003E का तात्पर्य आसपास में अत्यधिक मात्रा में शोर से है जो प्राकृतिक संतुलन को बाधित करता है। आमतौर पर, यह मानव निर्मित होता है, हालांकि ज्वालामुखी जैसी कुछ प्राकृतिक आपदाएं ध्वनि प्रदूषण में योगदान कर सकती हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/746824662992853997\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/07\/atmosphere.html#comment-form","title":"0 Comments"},{"rel":"edit","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/746824662992853997"},{"rel":"self","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.blogger.com\/feeds\/8967061962470197044\/posts\/default\/746824662992853997"},{"rel":"alternate","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/07\/atmosphere.html","title":"वातावरण किसे कहते हैं?"}],"author":[{"name":{"$t":"Rajesh patel"},"uri":{"$t":"http:\/\/www.blogger.com\/profile\/12426690531717448804"},"email":{"$t":"noreply@blogger.com"},"gd$image":{"rel":"http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail","width":"32","height":"32","src":"\/\/blogger.googleusercontent.com\/img\/b\/R29vZ2xl\/AVvXsEibaWemXB42zGoMaIKeiS1lLwlgsUdkuHIHVsqo5BEu-emdTYIk0VCb5x_43RJ90u4xfNdPMEmdr2gPzknoxzGKGElrCWkTas3Ts-vVzm7LECz7rXDvwX5dlgT96th5_A\/s220\/IMG_20210708_204752_375.jpg"}}],"thr$total":{"$t":"0"}},{"id":{"$t":"tag:blogger.com,1999:blog-8967061962470197044.post-1345564051338387488"},"published":{"$t":"2021-06-05T03:52:00.016+05:30"},"updated":{"$t":"2023-06-24T09:26:07.703+05:30"},"category":[{"scheme":"http://www.blogger.com/atom/ns#","term":"environment"}],"title":{"type":"text","$t":"अपक्षय किसे कहते है?"},"content":{"type":"html","$t":"\u003Cp\u003E\u003Ci\u003Eअपक्षय पृथ्वी की सतह पर चट्टानों और खनिजों के टूटने या घुलने का वर्णन करता है। पानी, बर्फ, अम्ल, लवण, पौधे, जानवर और तापमान में परिवर्तन सभी अपक्षय के कारक हैं।\u003C\/i\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय पृथ्वी की सतह पर चट्टानों और खनिजों के टूटने या घुलने का वर्णन करता है। जल, बर्फ, \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/09\/who-is-called-acid.html\"\u003Eअम्ल\u003C\/a\u003E, लवण, पौधे, जानवर और तापमान में परिवर्तन सभी अपक्षय के कारक हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eएक बार जब एक चट्टान टूट जाती है, तो कटाव नामक एक प्रक्रिया चट्टान और खनिज के टुकड़ों को दूर ले जाती है। पृथ्वी पर कोई भी चट्टान अपक्षय और अपरदन की शक्तियों का विरोध करने के लिए पर्याप्त कठोर नहीं है। साथ में, इन प्रक्रियाओं ने अमेरिकी राज्य एरिज़ोना में ग्रैंड कैन्यन जैसे स्थलों को उकेरा। यह विशाल घाटी 446 किलोमीटर (277 मील) लंबी, 29 किलोमीटर (18 मील) चौड़ी और 1,600 मीटर (1 मील) गहरी है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय और अपरदन लगातार पृथ्वी के चट्टानी परिदृश्य को बदलते हैं। अपक्षय समय के साथ उजागर सतहों को दूर कर देता है। जोखिम की लंबाई अक्सर इस बात में योगदान करती है कि अपक्षय के लिए चट्टान कितनी कमजोर है। चट्टानें, जैसे लावा, जो जल्दी से अन्य चट्टानों के नीचे दब जाती हैं, हवा और पानी जैसे एजेंटों के संपर्क में आने वाली चट्टानों की तुलना में अपक्षय और क्षरण के प्रति कम संवेदनशील होती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eचूंकि यह खुरदरी, तेज चट्टानी सतहों को चिकना करता है, अपक्षय अक्सर मिट्टी के उत्पादन में पहला कदम होता है। अपक्षयित खनिजों के छोटे-छोटे टुकड़े पौधों, जानवरों के अवशेषों, कवक, बैक्टीरिया और अन्य जीवों के साथ मिल जाते हैं। एक ही प्रकार की अपक्षयित चट्टान अक्सर बांझ मिट्टी का उत्पादन करती है, जबकि चट्टानों के संग्रह से अपक्षयित सामग्री खनिज विविधता में समृद्ध होती है और अधिक उपजाऊ मिट्टी में योगदान करती है। अपक्षयित चट्टानों के मिश्रण से जुड़ी मिट्टी के प्रकारों में ग्लेशियल टिल, लोस और जलोढ़ तलछट शामिल हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय को अक्सर यांत्रिक अपक्षय और रासायनिक अपक्षय की प्रक्रियाओं में विभाजित किया जाता है। जैविक अपक्षय, जिसमें जीवित या एक बार रहने वाले जीव अपक्षय में योगदान करते हैं, दोनों प्रक्रियाओं का हिस्सा हो सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयांत्रिक अपक्षय\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयांत्रिक अपक्षय, जिसे भौतिक अपक्षय और पृथक्करण भी कहा जाता है, चट्टानों के उखड़ने का कारण बनता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपानी, तरल या ठोस रूप में, अक्सर यांत्रिक अपक्षय का एक प्रमुख एजेंट होता है। उदाहरण के लिए, तरल पानी चट्टान में दरारों और दरारों में रिस सकता है। यदि तापमान काफी कम हो जाता है, तो पानी जम जाएगा। पानी जमने पर फैलता है। बर्फ तब एक पच्चर के रूप में काम करता है। यह धीरे-धीरे दरारों को चौड़ा करता है और चट्टान को विभाजित करता है। जब बर्फ पिघलती है, तो तरल पानी विभाजन में खोए हुए चट्टान के छोटे-छोटे टुकड़ों को हटाकर अपरदन का कार्य करता है। इस विशिष्ट प्रक्रिया (फ्रीज-पिघलना चक्र) को फ्रॉस्ट अपक्षय या क्रायोफ्रैक्चरिंग कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eतापमान परिवर्तन थर्मल तनाव नामक प्रक्रिया में यांत्रिक अपक्षय में भी योगदान दे सकता है। तापमान में परिवर्तन के कारण चट्टान का विस्तार (गर्मी के साथ) और अनुबंध (ठंड के साथ) होता है। बार-बार ऐसा होने से चट्टान की संरचना कमजोर हो जाती है। समय के साथ, यह टूट जाता है। चट्टानी रेगिस्तानी परिदृश्य विशेष रूप से थर्मल तनाव की चपेट में हैं। रेगिस्तानी चट्टानों की बाहरी परत बार-बार तनाव से गुजरती है क्योंकि तापमान दिन-रात बदलता रहता है। आखिरकार, बाहरी परतें पतली चादरों में बंद हो जाती हैं, एक प्रक्रिया जिसे एक्सफोलिएशन कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eएक्सफोलिएशन बोर्नहार्ड्ट्स के निर्माण में योगदान देता है, जो अपक्षय और क्षरण द्वारा निर्मित परिदृश्यों में सबसे नाटकीय विशेषताओं में से एक है। बॉर्नहार्ट लंबे, गुंबददार, अलग-थलग चट्टानें हैं जो अक्सर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं। सुगरलोफ माउंटेन, ब्राजील के रियो डी जनेरियो में एक प्रतिष्ठित मील का पत्थर है, एक जन्मजात है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदबाव में परिवर्तन भी अपक्षय के कारण छूटने में योगदान कर सकता है। अनलोडिंग नामक एक प्रक्रिया में, अतिव्यापी सामग्री को हटा दिया जाता है। अंतर्निहित चट्टानें, जो अत्यधिक दबाव से मुक्त होती हैं, फिर विस्तार कर सकती हैं। जैसे-जैसे चट्टान की सतह का विस्तार होता है, यह शीटिंग नामक प्रक्रिया में फ्रैक्चरिंग की चपेट में आ जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eएक अन्य प्रकार का यांत्रिक अपक्षय तब होता है जब चट्टान के पास मिट्टी या अन्य सामग्री पानी को अवशोषित करती है। चट्टान की तुलना में अधिक झरझरा मिट्टी, पानी के साथ सूज सकती है, आसपास के अपक्षय, कठोर चट्टान।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eनमक भी हैलोक्लास्टी नामक प्रक्रिया में रॉक मौसम के लिए काम करता है। खारे पानी कभी-कभी चट्टान की दरारों और छिद्रों में मिल जाते हैं। यदि खारे पानी का वाष्पीकरण होता है, तो नमक के क्रिस्टल पीछे रह जाते हैं। जैसे-जैसे क्रिस्टल बढ़ते हैं, वे चट्टान पर दबाव डालते हैं, धीरे-धीरे इसे तोड़ते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहनीकॉम्ब अपक्षय हेलोक्लास्टी के साथ जुड़ा हुआ है। जैसा कि इसके नाम का तात्पर्य है, हनीकॉम्ब अपक्षय नमक क्रिस्टल के विकास से बनने वाले सैकड़ों या हजारों गड्ढों के साथ रॉक संरचनाओं का वर्णन करता है। मधुकोश अपक्षय तटीय क्षेत्रों में आम है, जहां समुद्री स्प्रे लगातार चट्टानों को लवण के साथ बातचीत करने के लिए मजबूर करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहेलोक्लास्टी तटीय परिदृश्य तक ही सीमित नहीं है। नमक ऊपर उठना, भूगर्भीय प्रक्रिया जिसमें भूमिगत नमक गुंबदों का विस्तार होता है, ऊपर की चट्टान के अपक्षय में योगदान कर सकता है। जॉर्डन के प्राचीन शहर पेट्रा में संरचनाएं अस्थिर हो गई थीं और अक्सर नीचे की जमीन से नमक ऊपर उठने के कारण ढह जाती थीं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपौधे और जानवर यांत्रिक अपक्षय के एजेंट हो सकते हैं। एक पेड़ का बीज उस मिट्टी में अंकुरित हो सकता है जो एक टूटी हुई चट्टान में जमा हो गई है। जैसे-जैसे जड़ें बढ़ती हैं, वे दरारों को चौड़ा करती हैं, अंततः चट्टान को टुकड़ों में तोड़ देती हैं। समय के साथ, पेड़ बड़ी चट्टानों को भी तोड़ सकते हैं। यहां तक ​​​​कि छोटे पौधे, जैसे काई, बड़े होने पर छोटी दरारें बढ़ा सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजानवर जो भूमिगत सुरंग बनाते हैं, जैसे कि मोल और प्रेयरी कुत्ते, भी चट्टान और मिट्टी को तोड़ने का काम करते हैं। अन्य जानवर जमीन के ऊपर चट्टान को खोदते और रौंदते हैं, जिससे चट्टान धीरे-धीरे उखड़ जाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eरासायनिक टूट फुट\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eरासायनिक अपक्षय चट्टानों और मिट्टी की आणविक संरचना को बदल देता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eउदाहरण के लिए, हवा या मिट्टी से कार्बन डाइऑक्साइड कभी-कभी कार्बोनेशन नामक प्रक्रिया में पानी के साथ जुड़ जाती है। यह एक कमजोर एसिड पैदा करता है, जिसे कार्बोनिक एसिड कहा जाता है, जो चट्टान को भंग कर सकता है। चूना पत्थर को घोलने में कार्बोनिक एसिड विशेष रूप से प्रभावी है। जब कार्बोनिक एसिड भूमिगत चूना पत्थर से रिसता है, तो यह बड़ी दरारें खोल सकता है या गुफाओं के विशाल नेटवर्क को खोखला कर सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअमेरिकी राज्य न्यू मैक्सिको में कार्ल्सबैड कैवर्न्स नेशनल पार्क में अपक्षय और क्षरण द्वारा बनाई गई 119 से अधिक चूना पत्थर की गुफाएँ शामिल हैं। सबसे बड़े को बड़ा कमरा कहा जाता है। लगभग 33,210 वर्ग मीटर (357,469 वर्ग फुट) के क्षेत्र के साथ, बिग रूम छह फुटबॉल \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mandan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eमैदानों \u003C\/a\u003Eके आकार का है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकभी-कभी, रासायनिक अपक्षय पृथ्वी की सतह पर चूना पत्थर या अन्य चट्टान के बड़े हिस्से को घोलकर एक परिदृश्य बनाता है जिसे कार्स्ट कहा जाता है। इन क्षेत्रों में, सतह की चट्टान को छेद, सिंकहोल और गुफाओं से चिह्नित किया गया है। करास्ट के दुनिया के सबसे शानदार उदाहरणों में से एक है शिलिन, या स्टोन फ़ॉरेस्ट, कुनमिंग, चीन के पास। परिदृश्य से सैकड़ों पतले, नुकीले चूना पत्थर की मीनारें उठती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eएक अन्य प्रकार का रासायनिक अपक्षय उन चट्टानों पर काम करता है जिनमें लोहा होता है। ये चट्टानें ऑक्सीकरण नामक प्रक्रिया में जंग में बदल जाती हैं। जंग पानी की उपस्थिति में ऑक्सीजन और लोहे के परस्पर क्रिया द्वारा निर्मित एक यौगिक है। जैसे-जैसे जंग फैलता है, यह चट्टान को कमजोर करता है और इसे अलग करने में मदद करता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजलयोजन रासायनिक अपक्षय का एक रूप है जिसमें खनिज के रासायनिक बंधन बदल जाते हैं क्योंकि यह पानी के साथ बातचीत करता है। जलयोजन का एक उदाहरण तब होता है जब खनिज एनहाइड्राइट भूजल के साथ प्रतिक्रिया करता है। पानी एनहाइड्राइट को जिप्सम में बदल देता है, जो पृथ्वी पर सबसे आम खनिजों में से एक है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eरासायनिक अपक्षय का एक अन्य परिचित रूप हाइड्रोलिसिस है। हाइड्रोलिसिस की प्रक्रिया में, एक नया घोल (दो या दो से अधिक पदार्थों का मिश्रण) बनता है, क्योंकि चट्टान में रसायन पानी के साथ परस्पर क्रिया करते हैं। कई चट्टानों में, उदाहरण के लिए, सोडियम खनिज पानी के साथ मिलकर खारे पानी का घोल बनाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहाइड्रेशन और हाइड्रोलिसिस फ्लेयर्ड ढलानों में योगदान करते हैं, जो अपक्षय और कटाव से बने परिदृश्य का एक और नाटकीय उदाहरण है। फ्लेयर्ड ढलान अवतल चट्टान संरचनाएं हैं जिन्हें कभी-कभी \"लहर चट्टानों\" के नाम से जाना जाता है। उनका सी-आकार काफी हद तक उपसतह अपक्षय का परिणाम है, जिसमें जलयोजन और हाइड्रोलिसिस परिदृश्य की सतह के नीचे की चट्टानों को दूर कर देते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवित या एक बार रहने वाले जीव भी रासायनिक अपक्षय के एजेंट हो सकते हैं। पौधों के सड़ने वाले अवशेष और कुछ कवक कार्बोनिक एसिड बनाते हैं, जो चट्टान को कमजोर और भंग कर सकते हैं। मैग्नीशियम या पोटेशियम जैसे पोषक तत्वों तक पहुंचने के लिए कुछ बैक्टीरिया रॉक का मौसम कर सकते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eक्वार्ट्ज सहित मिट्टी के खनिज रासायनिक अपक्षय के सबसे आम उपोत्पादों में से हैं। मिट्टी पृथ्वी पर सभी तलछटी चट्टानों में लगभग 40% रसायन बनाती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय\u0026nbsp; स्थैतिक या स्थिर शक्ति है। इसमें वायुमण्डल के विशेष कारकों आदि के कारण पृथ्वी की सतह की चट्टानें टूटती-फूटती अथवा विशेष रासायनिक क्रियाओं के प्रभाव से अपघटित होती रहती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहिण्ड्स के अनुसार, “अपक्षय से तात्पर्य यान्त्रिक विघटन अथवा रासायनिक अपघटन से है जो चट्टानों के सामंजस्य को नष्ट कर देता है।”\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय किसे कहते हैं\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदूसरे शब्दों में, जब चट्टानें बिना स्थान बदले विशेष प्राकृतिक कारकों की क्रिया से अपखण्डित एवं अपघटित होती रहती हैं तो उसे अपक्षय कहा जाता है। ,\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eआर्थर होम्स के अनुसार अपक्षय उन विभिन्न भूपृष्ठीय प्रक्रियाओं का प्रभाव है जो चट्टानों के विनाश एवं विघटन में सहायक होते हैं, बशर्ते कि ढीले पदार्थों का बड़े पैमाने पर परिवर्तन न हो।'\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eस्पार्क के अनुसार, “पृथ्वी की सतह पर प्राकृतिक कारणों द्वारा चट्टानों को अपने ही स्थान पर यान्त्रिक टूटने अथवा रासायनिक वियोजन होने की क्रिया को अपक्षय कहा जाता है।\"\u0026nbsp;\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसविंद्र सिंह के अनुसार, “अपक्षय ताप, वायु, जल तथा प्राणियों का कार्य है जिसके द्वारा यान्त्रिक तथा रासायनिक परिवर्तनों से चट्टानों में टूट-फूट होती रहती है ।\"\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eऐसे प्राकृतिक कारक भौतिक या यान्त्रिक, रासायनिक एवं जैविक क्रियाओं द्वारा अपना कार्य करते रहते हैं।भूतल पर अपक्षय की क्रिया दो रूपों में होती है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(i) अपखण्डन या विघटन\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजब बदलते हुए मौसम एवं वायुमण्डल (ताप, जल व हिमवृष्टि, जल आदि) के प्रभाव से कठोर चट्टानें भी अपनी सन्धियों या फटन तल के सहारे टुकड़ों में टूट-टूटकर छोटे-छोटे कणों एवं बालू में बदलती जाती हैं तो उसे अपखण्डन या भौतिक अथवा यान्त्रिक अपक्षय कहते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(ii) अपघटन\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजब चट्टानों में पाये जाने वाले खनिज या रसायन एवं वायुमण्डल की गैसों के साथ विशेष प्रकार की क्रिया करके चट्टानों को घोलकर या रासायनिक क्रिया द्वारा चूरा एवं अन्य पदार्थों में बदलते रहते हैं तो ऐसी क्रिया को चट्टानों का अपघटन कहते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवह अपक्षय की विशेष दशा है। इसी कारण इसे रासायनिक अपघटन भी कहते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003Eअपक्षय को नियन्त्रित करने वाले कारक\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी भाग में अपक्षय का स्वरूप किस प्रकार का हो अथवा वहाँ भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय में से कौन-सा स्वरूप महत्वपूर्ण हो सकता है, यह मुख्यतः निम्न कारकों एवं उन पर आधारित क्रियाओं का परिणाम होती है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(1) वायुमण्डलीय क्रियाएँ एवं जलवायु\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eसभी प्रकार की वायुमण्डलीय क्रियाओं का आधार प्रधानतः सौर ऊर्जा है। अत: भूतल पर उसकी प्राप्ति, वायुमण्डल का तापमान, उसका दैनिक व मौसमी अन्तर, वायु में नमी व संघनन के रूप, हिम व जलवृष्टि आदि सभी कारक मिलकर भौतिक अपक्षय के लिए आधार बनाते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eउष्ण-कटिबन्धीय शुष्क प्रदेश भौतिक अपक्षय के लिए आदर्श प्रदेश माने जाते हैं। यहाँ दिन में तेज तापमान से चट्टानें आग की भाँति गर्म हो जाती हैं एवं रात्रि के पिले प्रहर में शीतल हो जाती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइससे चट्टानों के खानेज गर्मी में प्रसारित होते एवं शीतल होने पर सिकुड़ते है। ऐसी क्रिया निरन्तर होने से ही चट्टानें टूटती-फूटती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकठोर चट्टानों में भी दरारें व फटन पड़ने लगती है। शीतोष्ण शुष्क प्रदेशों में मामूली नमी एवं शीतकाल के प्रभाव से पानी बर्फ में बदलकर चट्टानों का भौतिक अपक्षय करता है,\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजबकि उष्ण व तर या विशेष आर्द्र प्रदेशों में ऊँचे तापमान वाले जल में अनेक गैसें मिलकर कई प्रकार की चट्टानों, क्षारों व लवणों को घोल लेती हैं। इससे चट्टानों के खनिजों में अपघटन एवं रासायनिक परिवर्तन होने लगता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(2) चट्टानों की संरचना व्यवस्था\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय किसी भी प्रकार से या घटना से हो, उस पर चट्टानों की संरचना एवं खनिज संगठन एवं उसकी सन्धियों के स्वरूप जैसी विशेषताओं का विशेष प्रभाव पड़ता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकठोर चट्टानों में जहाँ रासायनिक क्रियाएँ बहुत सीमित स्तर पर होती हैं, वहीं ऐसी चट्टानों का भौतिक या यान्त्रिक अपक्षय भी चट्टानों की सन्धियों या दरारों के सहारे ही होगा।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eचट्टानें बड़े-बड़े खण्डों में टूटेंगी। मुलायम खनिज वाली अथवा रन्ध्रमय चट्टानों का कणमय विखण्डन या भौतिक अपक्षय भी शीघ्र होगा एवं रासायनिक अपघटन के प्रभाव से भी ऐसी चट्टानें शीघ्र अपना रूप बदलकर एवं घुलकर नष्ट हो जायेंगी।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइसी भाँति जब चट्टानों की सन्धियाँ खड़ी होंगीं तो उन पर ताप परिवर्तन एवं तुषार एवं पाले की क्रिया का विशेष प्रभाव पड़ेगा। ऐसी चट्टानें इन सन्धियों के शीघ्र ढीला होने के साथ-साथ इनका परतों के सहारे अपक्षय होता जायेगा।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(3) भूमि का ढाल\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय में ढाल का विशेष महत्व है। अधिक ढालू चट्टानी भू-भाग पर प्रायः रासायनिक अपक्षय कठिनाई से हो पाता है । भौतिक अपक्षय से विघटित चट्टानें शीघ्र ढाल से फिसलकर पर्वत पदीय क्षेत्र में नुकीली चट्टानों के रूप में इकट्ठी होती जायेंगी।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eतेज ढालू क्षेत्रों में वृहद क्षरण भी ज्यादा होगा। यहाँ पर भौतिक अपक्षय के लिए भीतरी चट्टानें शीघ्र सतह पर आती जायेंगी, जबकि कम ढालू एवं समतलप्रायः क्षेत्रों की ऊपरी परत वहीं बनी रहेगी।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअत: ऐसे भागों की चट्टानों में भौतिक अपक्षय सीमित अवस्था में एवं ऊपरी परत पर ही प्रभावी होगा । यहाँ पर रासायनिक अपक्षय केवल आर्द्र जलवायु होने पर ही सम्भव है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(4) वनस्पति एवं जैव जगत\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eकिसी भी स्थान पर वनस्पति की उपस्थिति का अपक्षय की प्रकृति पर अवश्य प्रभाव पड़ता है। यद्यपि वनस्पति मिट्टी का कटाव रोकती है फिर भी कठोर चट्टानी प्रदेश में जड़ों को जगह ढूँढ़ने के लिए चट्टानों का अपक्षय आवश्यक हो जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवन प्रदेशों में अपक्षय कम एवं चट्टानों का व मिट्टी का संरक्षण अधिक होता है। इसी प्रकार प्राकृतिक जैव जगत भी सीमित मात्रा में भौतिक व रासायनिक अपक्षय में सहायक रहता है। तापमान की समरूपता व पाले का प्रभाव कम रहने से वनस्पति वाले प्रदेशों में अपक्षय सीमित ही रहता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003Eअपक्षय के प्रकार\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय तीन प्रकार का होता है :\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E1.भौतिक या यान्त्रिक अपक्षय।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E2 रासायनिक अपक्षय\u0026nbsp; एवं ।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E3.जैविक अपक्षय।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(1) भौतिक या यान्त्रिक अपक्षय\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eयान्त्रिक अपक्षय में चट्टानों का विघटन अथवा विखण्डन होता है। इससे मजबूत शिलाखण्ड भी निरन्तर यान्त्रिक या भौतिक अपक्षय के प्रभाव से टुकड़ों में एवं बालू में बदलते जाते हैं। यह क्रिया निम्न कारकों द्वारा भूतल पर गतिशील बनी रहती है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E\u0026nbsp;ताप परिवर्तन क्रिया से विघटन\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजिन क्षेत्रों की चट्टानों की संरचना अनेक प्रकार के खनिजों वाली होती है वहाँ दिन में ऊँचे तापमान के कारण ऐसी चट्टानें तेजी से फैलने लगती हैं एवं रात के पिछले पहर में तेजी से तापमान घटने से पुनः तेजी से सिकुड़ने लगती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eबार-बार इस प्रकार फैलने और सिकुड़ने से ऐसी चट्टानें अपनी जोड़ या सन्धि के सहारे टूटती जाती हैं। इस भाँति मुलायम चट्टानें तेजी से चूर्ण रूप में बदल जाती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003Eपाले की दशा का प्रभाव\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eशीतोष्ण प्रदेशों में सर्दियों में रात्रि के तापमान जहाँ हिमांक बिन्दु नीचे पहुंच जाते हैं वहाँ पर भिन्न प्रकार से भौतिक अपक्षय होता है। ऐसे स्थानों पर दिन में पानी ढालू भागों में या सन्धियों के सहारे चट्टानों में प्रवेश कर जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eरात्रि में यही पानी बर्फ में बदल जाता है। बर्फ पानी से ज्यादा जगह घेरती है। अतः पानी से बर्फ में बदलते समय अधिक स्थान के लिए चलानों पर भारी दबाव पड़ता है। इससे चट्टानों के बीच या सन्धियों के बीच दूरी बढ़ती जाती है और चट्टानें टुकड़ों या कणों में टूटती जाती हैं।\u0026nbsp;\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(ii) वर्षा\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eगर्मी के दिनों में सूर्य के अत्यधिक ताप से चलाने गर्म होकर जब इन चट्टानों पर अचानक वर्षा का जल गिरता है तो शैलें ठण्डी होकर सिकुड़ती हैं। इस क्रिया से चट्टाने चटककर भंजित हो जाती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eमरुस्थलीय प्रदेशों में इस तरह की अपक्षय की क्रिया अधिक होती है। संयुक्त राज्य अमेरिका के टेक्सास में यह क्रिया बहुत होती है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(iv) दाब मोचन\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eनिचली चट्टानों का निर्माण ऊपरी दबाव के कारण होता है, किन्तु जब ऊपरी चट्टानों का अपघटन होकर दबाव कम हो जाता है तो निचली चट्टानों में चटकनें पड़ जाती हैं जिससे चट्टानों का विघटन होता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(v) भूस्खलन\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवर्षा काल में पहले से ढीली एकत्रित व अवसादों का ढेर भीग जाने से भारी हो जाता हैं। नवीन मोड़दार पर्वतीय ढालों की मिट्टियाँ अधिक मात्रा में जल सोख लेती हैं। इससे चट्टानों का भार बढ़ जाता है एवं वह तेजी से ढाल के सहारे भारी भार के साथ खिसकती हुई गिरती जाती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eऐसा चट्टानों का गिरता हुआ ढेर अपने साथ मार्ग के रोड़ों एवं भूमि की सतह पर रगड़ खाते हुए और भी चट्टानी पदार्थों को इकट्ठा करता जाता है। ऐसे भूस्खलन से गाँव दब जाते हैं। इसका भी विनाशकारी प्रभाव भूकम्प से कम\u0026nbsp;\u0026nbsp;रूप से ही नहीं, होता।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(2) रासायनिक अपक्षय\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eशैलों का अपक्षय रासायनिक क्रिया से भी होता है। रासायनिक अपक्षय में चट्टानों के खनिजों की संरचना पर जल में घुली विभिन्न गैसों का विशेष प्रभाव पड़ता है। इससे चट्टान के जुड़े हुए कण आपस में ढीले होने लगते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eचट्टानों में पूरी तरह रासायनिक परिवर्तन होने से वे नष्ट भी हो सकती हैं। सामान्यतः रासायनिक क्रिया या अपघटन उष्ण व आर्द्र या तर प्रदेशों में विशेष महत्वपूर्ण रहता है। यह क्रिया निम्न प्रकार से ,) होती\u0026nbsp; है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(i) ऑक्सीकरण या झारण\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपानी में ऑक्सीजन\u0026nbsp; वायुमण्डलीय आई ऑक्सीजन गैस घुली रहती है गैस चट्टानों के खनिजों से संयोग कर उन्हें ऑक्साइड में बदल देती है। यही गैस युक्त पानी उष्ण व अर्धोष्ण प्रदेशों में लौह वाली चट्टानों एवं लोहे के सामान पर तेजी से प्रभाव डालता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजंग लगने की क्रिया इसी कारण होती है। बार-बार पानी व हवा के सम्पर्क में आने से लोहा बदलकर लौह ऑक्साइड बनता जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eलोहा के अतिरिक्त कैल्शियम, पोटेशियम तथा मैग्नीशियम के तत्वों पर भी ऑक्सीजन की क्रिया होती है। चट्टानों का रंग लाल, पीला या भूरा अथवा चॉकलेटी अधिकतर लौह होने से होता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(ii) हाइड्रेशन या जलयोजन\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eचट्टानों के खनिजों में जल के अवशोषण को ही जलयोजन कहा जाता है। विशेष प्रकार की चट्टानों; जैसे बॉक्साइट, फेल्सपार आदि अधिक शीघ्रता से जल सोखती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजल सोखने से इनका भार लगभग दुगुना हो जाता है। इसके अतिरिक्त ऐसी भीगी हुई चट्टानें तेजी से अपघटित होती जाती हैं। कुछ चट्टानें तो भीगकर खिलकर चूरे में बदल जाती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(iii) कार्बोनेशन\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवायुमण्डलीय कार्बन डाइऑक्साइड गैस जल में मिलकर कार्बोनिक अम्ल बनाती है अर्थात् अनेक प्रकार के कार्बोनेट बनते हैं। इसे कार्बोनेशन कहते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eचूना, चाक, डोलामाइट एवं अन्य अधिक कैल्शियम-युक्त चट्टानें पानी व कार्बनडाइ-ऑक्साइड की सम्मिलित क्रिया से तेजी से प्रभावित होती हैं। इससे चूने का कार्बन तत्व बाइ-काबोंनेट में बदल जाता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(iv) विलयन या घोल\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवर्षा एवं झीलों का पानी कई प्रकार से क्षारों,लवणों, कैल्शियम एवं अन्य खनिजों को अपने में घोलता रहता है। इसी कारण अलग-अलग क्षेत्रों के जल का स्वाद अलग-अलग होता है। भारी व हल्का पानी, कड़पानी कई प्रकार से क्षारों,लवणों, कैल्शियमवा व मीठा पानी ऐसे ही घोल लेने की क्रिया का परिणाम है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(v) सिलिका का अपघटित होना\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eचट्टानों से सिलिका का अलग होना ही डिसिलीकेशन कहलाता है । आई प्रदेशों की आग्नेय चट्टानों पर पानी की क्रिया के प्रभाव से उनसे सिलिका एवं अन्य तत्व तेजी से अलग होने लगते हैं। इस क्रिया में सिलिका बालू बच रहती है ।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसिलिका-युक्त चट्टानों से जब गैस मिला उष्ण जल क्रिया करता है तो ऐसी चट्टानों का अधिकांश भाग घुल जाता है। इसे ही सिलिका का पृथक् या अलग होना भी कहते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(3) जैविक अपक्षय\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी की सतह पर वनस्पति, अनेक प्रकार के जन्तु एवं मानव कई विधियों से भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय की क्रिया में सहायक रहे हैं। इसमें निम्न सहायक होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(i) वनस्पति\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eवनस्पति वायुमण्डल से गैसें व नमी ग्रहण करती है । पौधों की जड़ें भूमि के नीचे निरन्तर भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय की क्रिया करती रहती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपौधों की जड़ें निरन्तर पौधों के बढ़ने के साथ-साथ मोटी होकर अधिक स्थान घेरती हैं। इससे चट्टानें चौड़ी होने लगती हैं एवं धीरे-धीरे वे पानी से क्रिया कर टूटती व चूरा बनती जाती हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजड़ों के द्वारा आसपास की मिट्टी से भोजन ग्रहण की क्रिया चलती रहती है। इस क्रिया में विविध रासायनिक शृंखला द्वारा चट्टानों का रासायनिक अपक्षय होता जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(ii) जीव-जन्तु\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eपृथ्वी की सतह पर अनेक प्रकार के प्राणी या जन्तु पाये जाते हैं। इनमें से कई जमीन में गड्ढा बनाकर अथवा बिल बनाकर रहते हैं। चूहे, साँप, बिच्छू, नेवला, दीपक, गीदड़,कुत्ता आदि ऐसे ही जीव हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइससे संगठित मिट्टी व चट्टानें ढीले कणों में सतह के निकट जा जाती हैं। ऐसी चट्टानों को बहता जल, हवा आदि आसानी से बहाकर ले जा सकते हैं। खेत उपजाऊ बनाने के लिए केंचुए एवं कुछ अन्य भूमि के नीचे रहने वाले जीव मिट्टी से रासायनिक क्रिया करते हैं, मिट्टी खाते रहते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभूगोलविद् होम्स का मत है कि,प्रति एकड़ मिट्टी में एक लाख पचास हजार केंचुए हो सकते हैं, जो एक वर्ष की अवधि में दस-पन्द्रह टन चट्टानों को उत्तम किस्म की मिट्टी बनाकर उसे धरातल के निम्न भाग से सतह पर लाते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस प्रकार जन्तुओं व प्राणियों से रासायनिक क्रिया सीमित किन्तु उपयोगी तथा भौतिक अपक्षय बड़े पैमाने पर रहता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(iii) मानव\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eयद्यपि मानव भी एक प्राणी है, किन्तु वह भूतल पर सर्वव्यापी है। उसने अपने द्वारा खोजे गए औजारों, मशीनों एवं तकनीक द्वारा पृथ्वी की सतह पर आश्चर्यजनक गति से परिवर्तन किये हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eवह भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय का आज सबसे अधिक प्रभावी एवं चौंकाने वाला कारक बन गया ।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003Eअपक्षय का प्रभाव\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eअपक्षय का प्रभाव निम्न प्रकार से समझा जा सकता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E(1) अपक्षय की क्रिया से चट्टानें ढीली हो जाती हैं और वे विघटित व वियोजित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटकर अन्ततः चूर्ण में बदल जाती हैं जिससे मिट्टी का निर्माण होता है जो मानव जीवन का आधार है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E(2) अपक्षय अपरदन में सहयोगी होता है क्योंकि इसके द्वारा चट्टानों को तोड़-फोड़कर ढीला कर दिया जाता है जिन्हें अपरदन के कारक सरलता से परिवहित कर लेते हैं ।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजब ये पदार्थ ढोए जाते हैं तो अन्य पदार्थों को रगड़कर एवं आपस में टकराकर छोटा करते जाते हैं जिससे अपरदन को गति मिलती है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E(3) अपक्षय द्वारा चट्टानों की टूट-फूट होती रहती है जो अपरदन के कारकों द्वारा बहकर अन्यत्र जमा भी करायी जाती है। इससे धरातल समतल हो जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E(4) अपक्षय से चट्टानों में विघटन के कारण धीरे-धीरे खनिज पदार्थ ऊपर आ जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E(5) अपक्षय विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियों के निर्माण में सहयोगी होता है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/1345564051338387488\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/06\/weathering-kise-kahate-hain.html#comment-form","title":"0 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जिसमें मिट्टी की सामग्री को हवा या पानी जैसे प्राकृतिक बलों द्वारा पहना और ले जाया जाता है। एक समान प्रक्रिया, अपक्षय, चट्टान को तोड़ता या घुलता है, लेकिन इसमें गति शामिल नहीं होती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपरदन, निक्षेपण के विपरीत है, भूगर्भीय प्रक्रिया जिसमें मिट्टी के पदार्थ जमा होते हैं, या एक भू-भाग पर निर्मित होते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअधिकांश क्षरण तरल पानी, हवा या बर्फ (आमतौर पर ग्लेशियर के रूप में) द्वारा किया जाता है। यदि हवा धूल भरी है, या पानी या हिमनद बर्फ कीचड़युक्त है, तो कटाव हो रहा है। भूरा रंग इंगित करता है कि चट्टान और मिट्टी के टुकड़े द्रव (वायु या पानी) में निलंबित हैं और एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा रहा है। इस परिवहन सामग्री को तलछट कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअनाच्छादन की सम्पूर्णता में अपरदन एक महत्वपूर्ण कड़ी है। भूतल पर विविध प्रकार से एकत्रित रोड़े, पदार्थ या पदार्थों का ढेर निरन्तर गतिशील शक्तियों द्वारा काट-छाँटकर अन्यत्र बहाया या परिवहित किया जाता है। ऐसा परिवहित पदार्थ आगे चलकर अनुकूल दशाओं में बराबर जमा या निक्षेपित होता जाता हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयद्यपि अपक्षय एवं गतिशील अपरदन दोनों ही स्वतन्त्र क्रियाएँ हैं फिर भी अपक्षय द्वारा एकत्रित पदार्थ अन्ततः शक्तियों अर्थात् नदी, हिमानी, हवा आदि द्वारा अपरदन एवं परिवहन (बहाव) द्वारा अन्य प्राकृतिक दशाओं के अनुसार अन्य भागों में ले जाकर जमा (निक्षेपित) कर दिया जाता है ।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस प्रकार मोटे तौर पर कटाव का अर्थ पदार्थों को काटना, काटे गए पदार्थों को बहाना एवं बहते पदार्थों को जमा करना सभी क्रिया का सम्मिलित स्वरूप है । इसे ही तकनीकी दृष्टि से अपरदन कहते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eदूसरे शब्दों में, चट्टानों के अपघर्षण, क्षरण तथा परिवहन के सामूहिक रूप को अपरदन कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअपरदन के लिए कई गतिशील शक्तियाँ जिम्मेदार हैं। इनके प्रमुख कारक या अभिकर्ता नदियाँ, भूमिगत जल, हवा या पवन, हिमानी एवं समुद्रतटीय लहरें आदि हैं ।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइनके द्वारा अपरदित पदार्थों परिवहन अनेक प्रकार से होता रहता है। कुछ पदार्थ तैरते हुए बहते हैं, कुछ पानी व हवा में झूलते रहते हैं, कुछ रगड़ खा-खाकर पेंदे की रेत की भाँति बहते हैं\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eकिन्तु भारी चट्टाने पानी में ढाल के साथ लुढ़कती जाती । इसके अतिरिक्त, कई रासायनिक घोल के रूप में पानी में घुल कर बहते हैं। इस प्रकार सभी अपरदन एवं परिवहन व जमाव के कारकों में बहते हुए जल का प्रभाव सबसे महत्वपूर्ण एवं सर्वव्यापी रहा है ।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eयद्यपि इसका प्रभाव मरुस्थलीय एवं बर्फीले प्रदेशों में सीमित हो जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003Eअपरदन के रूप\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eअपरदन की क्रिया चट्टानों पर विविध प्रकार से प्रभाव डालती है। अत: गतिशील शक्तियों एवं अपरदन के कारकों के अनुसार विविध प्रकार की चट्टानों एवं उनकी संरचना पर भिन्न-भिन्न प्रकार से अपरदन की क्रिया होती रहती है। यह मुख्यतः निम्न प्रकार से प्रभावी रहती है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(i) अपघर्षण\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eजब अपरदन के कारण (नदी, हवा, हिमानी आदि) अपक्षय से एकत्रित या ढीली संरचना वाली चट्टानों के पदार्थों को अपरदन द्वारा बहाते हैं तो ऐसे पदार्थ चट्टानों से रगड़ खा-खाकर बहते जाते हैं। इसे ही अपघर्षण कहते हैं।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस क्रिया से पदार्थ और भी अधिक कटते या अपरदित होते रहते हैं। साथ ही ढीली चट्टानों व कणों की इस क्रिया द्वारा उठाकर अपने साथ ले जाये जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(ii) सन्निघर्षण\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eइसमें हवा, नदी एवं लहरों द्वारा विशेष रूप से बहाये गये पदार्थ आपस में टकराकर, रगड़ खा-खाकर टुकड़े-टुकड़े अथवा चूरे में बदलते जाते हैं। इसके साथ-साथ अपघर्षण की क्रिया भी होती रहती है। इससे नुकीले पत्थर गोल बनते जाते हैं और इनसे धीरे-धीरे बालू व मिट्टी बनती रहती है।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(iii) जलदाब क्रिया\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eयह जल की एक भौतिक क्रिया है। इसका प्रभाव मुख्यतः बहते जल एवं लहरों के कार्य में देखा जा सकता है अर्थात् यह क्रिया केवल नदी द्वारा सम्भव है। इसमें पानी के भारी दबाव से विशेषकर जब दबाव एक स्थान विशेष पर क्रियाशील हो तो चट्टानें टूटती जाती हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजैसे कि भंवर की या तेज दाबपूर्ण बहाव की क्रिया से अथवा लहरों का गुफाओं में फंसकर छोटे-छोटे छिद्रों द्वारा तेज दबाव से बाहर निकलते समय चट्टानों के छेद को बड़ा करने जैसी क्रिया इसके प्रमुख उदाहरण हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(iv) अपवाहन\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eअपवाहन की क्रिया का मुख्य कारक वायु है, जबकि नदी हिमानी एवं लहरों पर ले जाया गया अवसाद परिवहन कहलाता है। वायु या हवा भौतिक अपक्षय या कटाव द्वारा एकत्रित बालू को एक स्थान से उड़ाकर अन्य स्थान पर बहा ले जाती है\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजबकि अन्य कारक पदार्थों या अवसादों को भूमि पर अपने साथ बहाकर या परिवहित करके ले जाते हैं। दोनों ही दशाओं में अपक्षय से एकत्रित या अपरदित पदार्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाए जाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch3\u003E(v) जमाव या निक्षेप\u0026nbsp;\u003C\/h3\u003E\u003Cp\u003Eधरातल पर अपक्षय एवं अपरदन से प्राप्त जो पदार्थ बहाकर या परिवहन एवं अपवाहन द्वारा अन्य स्थान पर ले जाया जाता है, उसे कहीं न कहीं तो अवश्य जमा होना ही है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजमाव की इस क्रिया को ही निक्षेप या निक्षेपण भी कहते हैं । निक्षेप एवं परिवहन कई दशाओं एवं नियमों की सीमाओं में कम-ज्यादा, धीमी गति या तेज गति से होता रहता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eसामान्यत: सभी अपरदन के कारक ऊपरी भागों से पदार्थ ला-लाकर निचले भागों में जमा करते रहते हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण कारक या अभिकर्ता बहता जल है। इसके लिए जमाव का सार्वभौम तल \u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2022\/04\/mandan-kise-kahate-hain.html\"\u003Eमैदान \u003C\/a\u003Eएवं सागर तट है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eइस प्रकार अपरदन, परिवहन एवं जमाव या निक्षेपण की क्रियाओं से अनेक प्रकार की भूतल की आकृतियाँ बनती व बिगड़ती तथा संशोधित होती रहती हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/4630310610019397944\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/06\/erosion-kya-hota-hai.html#comment-form","title":"0 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है। जैसे कार्बन चक्र, ऑक्सीजन चक्र, नाइट्रोजन चक्र आदि।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपारिस्थितिकी जीव विज्ञान की एक शाखा है जो जीवित जीवों और उनके\u0026nbsp;\u003Ca href=\"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/11\/paryavaran-kise-kahate-hai.html\"\u003Eपर्यावरण\u0026nbsp;\u003C\/a\u003Eके साथ उनके संबंधों की जांच करती है। पारिस्थितिक चक्र, पानी, खनिज, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और कार्बन, जैसे पदार्थ, पानी, हवा और मिट्टी के बीच विभिन्न रूपों में परिवर्तन, प्रकृति में निरंतर संचलन है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवों के रहने की जगह का क्षेत्र, महासागरों की एक हजार मीटर की गहराई और समुद्र तल से छह हजार मीटर की ऊंचाई वाले वातावरण को जीव विज्ञान में जीवमंडल कहा जाता है। जीवमंडल पानी, हवा और मिट्टी से बना है और जीवित चीजों के लिए रहने की जगह है। जैविक रूप से, इस क्षेत्र में रहने वाले जानवरों को जीव कहा जाता है और सभी पौधों को वनस्पति कहा जाता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजीवमंडल में, जीवित प्राणी जीवित चीजों का एक समूह बनाते हैं। ये जीवित समूह भौतिक पर्यावरण के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करते हैं, दूसरे शब्दों में, निर्जीव वातावरण के साथ उनका संबंध। पारिस्थितिकी तंत्र जीवन का एक समुदाय है, और जीवित चीजों के तीन समूह हैं: उत्पादक, उपभोक्ता और विघटनकर्ता। निर्माता प्रकाश संश्लेषक जीव हैं। उपभोक्ता आमतौर पर मांसाहारी और शाकाहारी होते हैं। विघटनकारी बैक्टीरिया और कवक से बने होते हैं। निर्माता प्रकाश संश्लेषण करते हैं, उपभोक्ता सांस लेते हैं, डीकंपोजर कार्बनिक अवशेषों को विघटित करते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eपारिस्थितिक तंत्र एक ऊर्जा और खाद्य श्रृंखला है और इसका मुख्य स्रोत सूर्य है। ऊर्जा और पदार्थ पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर एक चक्र बनाते हैं। प्रकृति में जीवन को बनाए रखने के लिए, कुछ महत्वपूर्ण पदार्थों को उनके उपभोग की दर से पुन: उत्पन्न किया जाना चाहिए। नाइट्रोजन सभी जीवित चीजों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक जीवित वस्तु को नाइट्रोजन को जैविक या अकार्बनिक के रूप में प्रदान करना चाहिए। इसी तरह, पानी सभी जीवित चीजों के लिए एक अनिवार्य पदार्थ है। इन पदार्थों का एक चक्र होना चाहिए। सरल शब्दों में, पारिस्थितिक चक्र एक घटना है कि जीवों द्वारा प्रकृति में उपयोग किए जाने वाले कई पदार्थ पुन: प्रयोज्य हो जाते हैं और यह प्रक्रिया बनी रहती है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहालांकि, पारिस्थितिक चक्र विभिन्न मार्गों, विशेष रूप से मानवीय हस्तक्षेपों से प्रतिकूल रूप से प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, \u003Ca href=\"https:\/\/alfa-education.blogspot.com\/2021\/06\/jansankhya-vitran.html\"\u003Eजनसंख्या \u003C\/a\u003Eमें तेजी से वृद्धि, प्रौद्योगिकी के विकास, शहरीकरण और उद्योग की प्रगति ने समाजों की पानी की मांग को बढ़ा दिया है। पानी का अति प्रयोग, शहरीकरण और जनसंख्या वृद्धि, उद्योग में पानी का बढ़ता उपयोग, नए बांध और नहरें, वनस्पतियों का विनाश सभी ऐसे कारक हैं जो पानी के पारिस्थितिक चक्र को बाधित करते हैं।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/4796771069017786167\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/blog-post_578.html#comment-form","title":"0 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का 3 \/10 भाग है और इसे स्थलमंडल कहते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Ch2 style=\"text-align: left;\"\u003E\u003Cb\u003E\u003Cspan style=\"font-size: large;\"\u003Eभूमि किसे कहते हैं\u003C\/span\u003E\u003C\/b\u003E\u003C\/h2\u003E\u003Cp\u003Eमृदा भूमि का वह ऊपरी सतह है, जिसमें खनिज व अन्य ऑर्गेनिक पदार्थ मिलते हैं। और जिस पर पेड़ पौधे उग सकते हैं, या उगाए जा सकते हैं। मृदा कहलाते हैं।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003E\u003Cb\u003Eभूमि क्षरण के कारण\u003C\/b\u003E\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eभूमि क्षरण तेज वर्षा आंधी तथा तूफान से मिट्टी की ऊपरी सतह कुछ ही दिनों में बहा ले जाती है। जबकि इसके बनने में बहुत अधिक समय लगता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eअतः मिट्टी की रक्षा करना बहुत आवश्यक है, भूमि क्षरण - जल और हवा दोनों से होता है।\u0026nbsp;\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eजल द्वारा भूमि क्षरण - जहां वनस्पति क्षेत्र अविरल तथा अपर्याप्त है। और आसपास भी सघन वन नहीं होते वहां की भूमि जल्द ही उड़ जाते है। वर्षा जल भरने के साथ ही मिट्टी भी बह जाती है। यदि तेज वर्षा होती है, तो यह अधिक शीघ्र होता है।\u003C\/p\u003E\u003Cp\u003Eहवा द्वारा भूमि क्षरण - वायु के तेज प्रवाह से भी भूमि क्षरण होता है। तेज हवा अपने साथ मिट्टी के छोटे-छोटे कणों को भूमि से उठाकर बहुत दूर ले जाती है। तथा वहां से पुनः वायु वेग के साथ तूफान के रूप में बहुत दूर उड़ जाते हैं। जिससे भूमि का क्षरण होता रहता है।\u003C\/p\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/8701027685898239593\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/blog-post_78.html#comment-form","title":"0 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के साथ बातचीत करते हैं। इसमें जैविक (जीवित) और अजैविक (निर्जीव) दोनों घटकों और उस प्रणाली के भीतर होने वाले विभिन्न संबंधों और प्रक्रियाओं को शामिल किया गया है।\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003Eपारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख तत्वों में शामिल हैं:\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E1. जैविक घटक: ये एक पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर जीवित जीव हैं, जिनमें पौधे, जानवर, कवक, बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव शामिल हैं। वे विभिन्न पारिस्थितिक संबंधों, जैसे शिकार, प्रतिस्पर्धा, पारस्परिकता और सहजीवन के माध्यम से एक दूसरे के साथ बातचीत करते हैं।\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E2. अजैविक घटक: ये किसी पारिस्थितिकी तंत्र के निर्जीव कारक हैं, जैसे सूरज की रोशनी, तापमान, पानी, हवा, मिट्टी, खनिज और पोषक तत्व। ये अजैविक कारक पारिस्थितिकी तंत्र की विशेषताओं और गतिशीलता को आकार देने और जैविक घटकों के वितरण और व्यवहार को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E3. ऊर्जा प्रवाह: पारिस्थितिक तंत्र खाद्य श्रृंखलाओं और खाद्य जालों के माध्यम से एक जीव से दूसरे जीव तक ऊर्जा के प्रवाह पर निर्भर करते हैं। उत्पादक (जैसे पौधे) प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से सूर्य के प्रकाश को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं, जिसे बाद में उपभोक्ताओं (जैसे शाकाहारी और मांसाहारी) में स्थानांतरित कर दिया जाता है क्योंकि वे अन्य जीवों को खाते हैं। डीकंपोजर मृत कार्बनिक पदार्थों को तोड़ते हैं और पोषक तत्वों को पुन:चक्रित करके पारिस्थितिकी तंत्र में वापस लाते हैं।\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E\u003Cbr \/\u003E\u003C\/div\u003E\u003Cdiv\u003E4. पोषक तत्व चक्र: कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस और अन्य जैसे पोषक तत्व पारिस्थितिकी तंत्र के माध्यम से चक्रित होते हैं। डीकंपोजर कार्बनिक पदार्थों को तोड़ने, पोषक तत्वों को जारी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जिन्हें पौधों और अन्य जीवों द्वारा ग्रहण किया जा सकता है। पोषक तत्वों का यह चक्र पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता और उत्पादकता के लिए आवश्यक 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पारिस्थितिक प्रक्रियाओं और सेवाओं का अध्ययन करने के लिए महत्वपूर्ण है, जिसमें पोषक तत्व चक्र, जल शुद्धिकरण, जलवायु विनियमन, आवास प्रावधान और जैव विविधता संरक्षण शामिल हैं। यह मानव और प्राकृतिक दुनिया दोनों की भलाई के लिए पारिस्थितिक तंत्र के संतुलन और स्वास्थ्य को बनाए रखने के महत्व पर भी प्रकाश डालता है।\u003C\/div\u003E"},"link":[{"rel":"replies","type":"application/atom+xml","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/feeds\/6099626669912373267\/comments\/default","title":"Post Comments"},{"rel":"replies","type":"text/html","href":"https:\/\/www.questionmug.com\/2021\/05\/ecosystem.html#comment-form","title":"0 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