दक्कन का पठार कहां है - dakkan ka pathar kise kahate hain

Post Date : 31 October 2022

दक्कन का पठार भारत के  विस्तृत पठार है जो दुनिया के सबसे पुराने स्थल खंड का अवशेष है जो कायांतरित चट्टानों से बना है। पठार तीन ओर पहाड़ी श्रेणियों से घिरा है। उत्तर में विंध्याचल तथा सतपुड़ा की पहाड़ियाँ हैं, जिनके बीच नर्मदा नदी पश्चिम की ओर बहती है।

दक्कन का पठार कहां है

दक्कन का पठार दक्षिणी भारत का एक बड़ा पठार है, और नर्मदा नदी के दक्षिण में पर्वतमालाओं के बीच स्थित है। पठार की औसत ऊंचाई लगभग 600 मीटर हैं। जबकि न्यूनतम ऊंचाई 100 मीटर और अधिकतम ऊंचाई  1,000 मीटर है।

पश्चिमी घाट पूर्वी घाट की अपेक्षा अधिक ऊँचा है। अन्नामलाई पहाड़ी पर अनेमुडि पठार सबसे ऊँची चोटी है।

पठार भारत के तटीय क्षेत्र की तुलना में अधिक शुष्क है। उत्तर में, यह सतपुड़ा और विंध्य पर्वतमाला से घिरा है। दक्कन ने भारतीय इतिहास में पल्लव, सातवाहन, वाकाटक, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों, विजयनगर और मराठा साम्राज्य का निर्माण किया हैं।

दक्कन का पठार कितने राज्यों में है

दक्कन का पठार आठ भारतीय राज्यों में फैला हुआ है जो महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल हैं। 

पठार का ऊपरी भूमि जो उच्च भू-भाग के क्षेत्र हैं, एक त्रिभुज बनाते हैं। जो भारतीय उपमहाद्वीप के समुद्र तट के नीचे की ओर इंगित करने वाले त्रिभुज में निहित है। दक्षिणी भारत में, पठार समुद्र तल से 1,000 मीटर से अधिक ऊंचा है। 

उत्तर में यह ज्यादातर समुद्र तल से लगभग 500 मीटर ऊपर है। दक्कन का पठार बहुत बड़ा है। यहाँ कई जीवों का निवास स्थान मौजूद हैं। इस क्षेत्र मे विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां, जानवर, जलवायु और विभिन्न पारिस्थितिक तंत्र पाया जाता हैं।

दक्कन का पठार एक बड़ा पठार है जो दक्षिण भारत के अधिकांश भाग को कवर करता है। यह आकार में त्रिकोणीय है और तीन पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा हुआ है। पठार लगभग 422,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है जो भारत के भूभाग का 43 प्रतिशत है।

दक्कन का क्षेत्र

भूगोलवेत्ताओं ने वर्षा, वनस्पति, मिट्टी के प्रकार या भौतिक विशेषताओं जैसे सूचकांकों का उपयोग करके दक्कन क्षेत्र को विभिन्न रूप से परिभाषित किया है। 

यह कर्क रेखा के दक्षिण में स्थित प्रायद्वीपीय मैदान है। इसकी बाहरी सीमा उत्तर में विंध्य-कैमूर वाटरशेड के साथ 300 मीटर समोच्च रेखा द्वारा चिह्नित है। इस क्षेत्र को दो प्रमुख भूगर्भिक-भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है: उपजाऊ काली मिट्टी वाले पठार और बंजर लाल मिट्टी वाले पठार।

इतिहासकारों ने दक्कन शब्द को अलग तरह से परिभाषित किया है। आरजी भंडारकर ने दक्कन को गोदावरी और कृष्णा नदियों के बीच के क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया हैं। वही केएम पणिक्कर द्वारा पूरे भारतीय प्रायद्वीप के रूप में परिभाषित किया गया हैं।

दक्कन का पठार भूगोल

दक्कन का पठार क्षेत्र भिन्नता से भरा हुआ है जो गंगा के मैदानों के दक्षिण में स्थित है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के बीच स्थित यह भाग सतपुड़ा पर्वतमाला के उत्तर में एक बड़ा पठार क्षेत्र है। जिसे लोकप्रिय रूप से दक्कन का पठार कहा जाता हैं।

पठार पूर्व और पश्चिम में घाटों से घिरा है, जबकि इसका उत्तरी छोर मे विंध्य पर्वत स्थित है। दक्कन की औसत ऊंचाई लगभग 2,000 फीट (600 मीटर) है। यहा से बहने वाली प्रमुख नदियाँ, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी हैं, जो पश्चिमी घाट से पूर्व की ओर बंगाल की खाड़ी में बहती हैं। 

तमिलनाडु में तिरुवन्नामलाई को अक्सर दक्कन के पठार का दक्षिणी प्रवेश द्वार माना जाता है। पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला बहुत विशाल है और दक्षिण-पश्चिम मानसून की नमी को दक्कन के पठार तक पहुंचने से रोकती है, इसलिए इस क्षेत्र में बहुत कम वर्षा होती है। 

पूर्वी दक्कन का पठार भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर फैला है। इसके जंगल भी अपेक्षाकृत शुष्क हैं, लेकिन वर्षा को बनाए रखने के लिए धाराएँ बनाने का काम करते हैं जो नदियों में प्रवाहित होती हैं।

दक्कन की अधिकांश नदियाँ दक्षिण की ओर बहती हैं। पठार का अधिकांश उत्तरी भाग गोदावरी नदी और उसकी सहायक नदिया बहती है, जिसमें इंद्रावती नदी भी शामिल है, जो पश्चिमी घाट से शुरू होकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी की ओर बहती है। 

केंद्रीय पठार का अधिकांश भाग तुंगभद्रा नदी, कृष्णा नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा निकाला जाता है, जिसमें भीमा नदी भी शामिल है, जो पूर्व में भी बहती है।

पठार का सबसे दक्षिणी भाग कावेरी नदी द्वारा बहाया जाता है, जो कर्नाटक के पश्चिमी घाट से निकलती है और दक्षिण की ओर बहते हुए तमिलनाडु में होगेनकल जलप्रपात में गिरता है, और अंत में बंगाल की खाड़ी में मिल जाता है।

दक्कन का पठार के भाग

यह त्रिभुजाकार पठार है, जिसका विस्तार ताप्ती नदी के दक्षिण से पश्चिमी व पूर्वी घाट तक है। इसमें अधिकांश महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के अधिकांश भाग आते हैं।

इस पठार का निर्माण ज्वालामुखी उदगार से निकलने वाले लावा के जमाव से हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 600 मी. है। यहाँ जीवाश्म रहित ग्रेनाइट नीस, बालुका पत्थर, वटज, बेसाल्ट तथा चूना-पत्थर मिलते हैं। 

यहाँ कोयला, मैंगनीज, सोना, लोहा, मोनोजाइट, बॉक्साइड, हीरा तथा अभ्रक आदि खनिज अधिक मिलते हैं इस पठार को दो उप-प्रदेशों में बाँटा गया है।

1. पश्चिमी घाट - इन्हें सह्याद्रि की पहाड़ियाँ भी कहते हैं। इनका विस्तार सागर तट के समानान्तर महाराष्ट्र के ताप्ती नदी घाटी से दक्षिण में कुमारी अन्तरीप तक लगभग 1660 कि.मी. की लंबाई में है। 

इसकी औसत ऊँचाई 1000 मीटर है केरल में स्थित अन्नामलाई की अलाईमुड़ी पर्वत शिखर इसका सर्वोच्च शिखर है जिसकी ऊँचाई 2,700 मी है। दोदाबेटा 2,630 मी, नीलगिरी की मकूती 2,550 मी और महाबलेश्वर 1450 मी ऊँचे पर्वत श्रेणियाँ हैं। 

उत्तर में पश्चिमी घाट को पूर्व–पश्चिम में पार करने के लिए थालघाट तथा भोरघाट दर्रे हैं जिनमें मुंबई से कोलकाता, दिल्ली एवं चेन्नई को रेलमार्ग जाते हैं।

2. पूर्वी घाट - महानदी घाटी से नीलगिरी पहाड़ियों तक लगभग 800 किमी की लंबाई में पूर्वी घाट का विस्तार है इसकी औसत ऊँचाई 760 मी. है। उड़ीसा के कोरापुट जिले में स्थित नेमैगिरि एवं गंजाम जिले में महेन्द्र गिरी 1,500 मीटर से भी ऊँची पर्वत श्रेणी है। 

यहाँ भी प्राचीन वलित पहाड़ियाँ हैं। पश्चिम तथा पूर्वी घाट नीलगिरी पहाड़ियों से मिल गई हैं, तथा महानदी, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियाँ पूर्वीघाट को काट-काटकर पूर्व की ओर प्रवाहित होते हुए अपनी डेल्टाओं में उपजाऊ मैदान की रचना करती है।

नागपुर के पूर्व में फैला छत्तीसगढ़ बेसिन उच्चावच की दृष्टि से असाधारण समरुपता का क्षेत्र है। महानदी तथा इसकी सहायक नदी शिवनाथ यहाँ से प्रवाहित होती है यह बेसिन दक्षिण में ऊँचा होते हुए बस्तर की पहाड़ियों से मिल जाता है जो साल और सागौन के वनों से आच्छादित है यह क्षेत्र दण्डकारण्य के नाम से जाना जाता है। 

प्रायद्वीपीय पठार का एक अवशिष्ट भाग मेघालय में शिलांग पठार के गिरनोर रूप में स्थित है जो 240 कि.मी. लंबा तथा 90 किमी. चौड़ा है। इसके शिखरों की ऊँचाई 1,300 से 1,800 मीटर तक भी 

पठार का महत्व 

  1. भारत के खनिज का 90 प्रतिशत इसी की देन है यहाँ खनिज संपदा का विपुल भंडार है।
  2. यहाँ पर प्राकृतिक वनस्पतियों की बहुलता है। 
  3. जल विद्युत उत्पादन की विशाल संभावनाएँ रखता
  4. प्राचीन तथा कठोर चट्टानों का भूखंड है।
  5. यहाँ स्वास्थ्वर्द्धक पर्यटक स्थल - पंचमढ़ी, महाबलेश्वर, ऊटी आदि है।
  6. विविध उद्योगों की स्थापना क्षेत्र के रूप में महत्वपूर्ण है।
  7. यहाँ लोहा–इस्पात उद्योग, रसायन, इंजीनियरींग उद्योग, सीमेन्ट उद्योगों का विकास हुआ है।