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भारत माता कविता का अर्थ - सुमित्रानंदन पंत

1.भारतमाता
 ग्रामवासिनी । 
खेतों में फैला है श्यामल 
धूल भरा मैला सा आँचल
 गंगा-यमुना में आँसू जल
 मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी । 

संदर्भ - प्रस्तुत कविता की पंक्तियाँ पन्तजी की प्रसिद्ध रचना भारतमाता से अवतरित है। प्रसंग- इस कविता में कवि ने भारतमाता को प्रतीक मानकर भारतीयों के विषय में अपनी धारणाएँ प्रकट की हैं।

व्याख्या - भारतमाता गाँवों में रहने वाली है (क्योंकि भारत की अधिकांश जनता गाँवों में ही रहती है)। खेतों में आँख की कालिमा की भाँति श्यामलता फैली हुई है ।

मानो वह अनाज से भरा हुआ जन-जीवन के लिए उनका अंचल है और गंगा-यमुना का निर्मल पान ही मानो उसके पवित्र श्रम का जल है।

 वह शील की साकार मूर्ति है और सुख-दुःख में समत्व भाव से रहती है; अर्थात् सुख से न उसे प्रसन्नता होती है और न दुःख से विषाद । 

विशेष - कवि की मातृभक्ति दृष्टव्य है।

2. दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
 अधरों में चिर नीरव रोदन,
 युग-युग के तम से विषण्ण मन, 
वह अपने घर में प्रवासिनी !
तीस कोटि संतान नग्न तन, 
अर्ध क्षुधित, शोषित निरस्त्र जन,
 मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक
तरु तल निवासिनी!

 संदर्भ- पूर्ववत् ।

प्रसंग - भारतमाता को प्रतीक मानकर भारतीयों के विषय में कवि ने अपनी धारणा प्रकट की है।

व्याख्या - उसकी चितवन झुकी हुई है मानो प्रभु के चरणों में नत हो। वह दुःख के क्षणों को हँसते होठों से बिता देती है, अर्थात् दुःख की घड़ियाँ भी हँसकर काट देती है। 

वह तप और संयम में पृथ्वी के मन की सी गम्भीरता लिए हुई है। वह स्वर्ग की कला के समान अद्वितीय है, फिर भी भूमि के पथ पर रहने वाली है। उसके तीस करोड़ पुत्र हैं जिनका दरिद्रता के कारण आधा शरीर नंगा रहता है। 

अन्न और वस्त्र के अभाव में वे पीड़ित हैं। वे अनपढ़ हैं। घास-फँस के घर बनाकर रहते हैं। भारतमाता का मस्तक झुका हुआ है। वह पेड़ों के नीचे निवास करने वाली है। 

विशेष - (1) कवि ने भारतमाता के रूप में एक भारतीय का वास्तविक चित्रण किया है। (2) रूपक अलंकार दृष्टव्य है ।

3. स्वर्ग शस्य पर - पदतल लुंठित,
धरती सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रंदन कंपित अधर मौन स्मित, राहू - ग्रसित
शरदेन्दु हासिनी !

सन्दर्भ- प्रस्तुत अवतरण सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित 'भारतमाता" कविता से उद्धृत है

प्रसंग- इसमें पराधीनताकाल में भारत की जो दुर्दशा थी, उसका भावपूर्ण तथा यथार्थ चित्रण किया गया है।

व्याख्या- कवि वर्णन करते हुए कहता है कि भारत भूमि पर सोने के समान मूल्यवान धान उगता है, फिर भी आम भारतीय नागरिक या खेतिहर कृषक अत्याचारी शासकों एवं शोषकों के चरणों में लोटता है, उनका गुलाम बना रहता है। 

भारत के किसान का मन धरती के समान सहिष्णु और कुंठाग्रस्त है, वह करुण विलाप से काँपता हुआ भी अधरों से मंद हास्य के साथ मौन रहता है। 

शरद्कालीन चन्द्रमा जैसे- राहु से ग्रस्त होने से धूमिल लगता है, उसी प्रकार विदेशी शासकों की नृशंस बर्बरता एवं अन्याय से भारतीयों का भाग्य रूपी चन्द्रमा सदा ग्रसित रहता है। अर्थात् प्राकृतिक सौन्दर्य से संपन्न होने पर भी भारतीयों का जीवन कष्टों से घिरा रहता है ।

विशेष - (1) शब्दावली तत्सम एवं मुक्त छंद का तुकान्त गेयता द्रष्टव्य है, परिकर एवं मानवीकरण अलंकार प्रयुक्त है।

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