भारत में किये गये क्षेत्रीय अध्ययनों के मुख्य विषय - bhaarat mein kiye gaye kshetreey adhyayanon ke mukhy vishay

भारत में अब तक किये गये क्षेत्रीय अध्ययन विभिन्न विषयों पर केन्द्रित रहे हैं। प्रारम्भिक अध्ययन जो अधिकांशतः अर्थशास्त्रियों द्वारा किये गये। उनका मुख्य ध्येय ग्रामीण अर्थव्यवस्था, भू-स्वामित्व, आदिम साम्यवाद, निवास के प्रतिमान, आदि को ज्ञात करना था। 

इनमें हेनरीमेन, पावेल, अल्टेकर, मार्क्स, मुखर्जी, आदि के अध्ययन प्रमुख हैं। बाद के अध्ययन जो समाजशास्त्रियों एवं मानवशास्त्रियों द्वारा किये गये हैं उनमें ग्रामीण सामाजिक संरचना और स्तरीकरण पर भी अनेक अध्ययन हुए हैं। 

 भारत में किये गये क्षेत्रीय अध्ययनों के मुख्य विषय

स्तरीकरण के अन्तर्गत गाँवों में पायी जाने वाली वर्ग व्यवस्था एवं जाति व्यवस्था के अध्ययन किये गये। जाति पंचायत, प्रभु जाति, जजमानी प्रथा, जाति में होने वाले परिवर्तन और नवीन आयामों से सम्बन्धित अध्ययन करने वालों में श्रीनिवास, योगेन्द्र सिंह, आन्द्रे बिताई, घुरिये, मुखर्जी, बेली, मेयर, पीकॉक, वाइजर, लेविस, आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। 

कई विद्वानों ने अपने अध्ययन ग्रामीण राजनीतिक व्यवस्था तक ही सीमित रखे। उन्होंने ग्रामीण शक्ति संरचना, मतदाता व्यवहार, नेतृत्व और गुटों का अध्ययन किया है। इनमें आन्द्रे बिताई, योगेन्द्रसिंह, ऑस्कर लेविस, चौहान, बेखर हेमर, हिचकॉक, ऑरेनस्टीन, बैजनाथ, मेयर, के. एस. माथुर, के. एल. शर्मा, आदि के अध्ययन प्रमुख हैं।

गाँव में होने वाले परिवर्तनों का भी अनेक विद्वानों ने अध्ययन किया है। उन्होंने भूमि सुधार आन्दोलन, जमींदारी उन्मूलन, सामुदायिक विकास योजना और पंचायती राज, नगरीकरण, शिक्षा, यातायात, आदि के प्रभाव और उनसे जनित ग्रामीण परिवर्तनों का अध्ययन किया है।

कुछ विद्वानों ने गाँव का सम्पूर्ण अध्ययन किया है। ऐसे अध्ययनों में दुबे, चौहान, मजूमदार, श्रीनिवास, आदि के अध्ययन उल्लेखनीय हैं।

भारतीय सामाजिक जीवन से सम्बन्धित अनेक अवधारणाओं; जैसे संस्कृतिकरण, सार्वभौमिकरण, लघु समुदाय, कृषक समाज, पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण आदि का परीक्षण करने और उनकी उपादेयता का अध्ययन करने के लिए भी अनेक अध्ययन हुए हैं।

कुछ ऐसे भी अध्ययन हुए हैं जो ग्रामीण विवाह और नातेदारी से सम्बन्धित हैं। इन अध्ययनों में परिवार, विवाह व नातेदारी की प्रकृति और उनमें वर्तमान में होने वाले परिवर्तनों का उल्लेख किया गया है।

उपर्युक्त विषयों के अतिरिक्त भी ग्रामीण समस्याओं, कृषि व्यवस्था, ग्रामीण पुनर्निर्माण, सर्वोदय, हरित क्रान्ति, भूदान, ग्रामदान, आदि से सम्बन्धित भी अनेक अध्ययन हुए हैं, किन्तु ऐसे अध्ययनों की संख्या अभी तक अपेक्षतया कम है।

भारत में क्षेत्र - कार्य दृष्टि क्षेत्रीय अध्ययनों का महत्त्व निम्नांकित तथ्यों से स्पष्ट है -

( 1 ) श्रीनिवास का मत है कि भारतीय ग्रामों के सम्बन्ध में जो कुछ जानकारी पुरानी पुस्तकों एवं उच्च जातियों द्वारा दी गयी है उसे हम सही नहीं मान सकते। वे इस बात को भी स्वीकार नहीं करते कि जो कृति जितनी पुरानी होगी वह उतनी ही विश्वसनीय होगी। 

उनकी धारणा है कि हमें पुरानी पुस्तकों के विचार का मूल्यांकन वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर करना चाहिए। इसके लिए ग्रामीण अध्ययन आवश्यक हैं। श्रीनिवास मानते हैं कि वर्तमान समाज का अनुभवाश्रित अध्ययन हमें वर्ण, जाति, संयुक्त परिवार और हिन्दूवाद से सम्बन्धित नये अर्थ प्रदान करेंगे।

वर्तमान में पायी जाने वाली सामाजिक संस्थाओं का गहन क्षेत्रीय सर्वेक्षण हमें भूतकाल की सामाजिक संस्थाओं को समझने में योग देंगे तथा भविष्य के इतिहासकारों को भी ग्रामीण जीवन से सम्बन्धित वैज्ञानिक तथ्य उपलब्ध करा सकेंगे। 

श्रीनिवास ऐतिहासिक तथ्यों को क्षेत्र कार्यकर्त्ताओं द्वारा संकलित किये गये तथ्यों की तरह सही, वैज्ञानिक और समृद्ध नहीं मानते। स्पष्ट है कि क्षेत्रीय अध्ययन हमें भारतीय समाज के बारे में प्राप्त ऐतिहासिक ज्ञान की सच्चाई का दिग्दर्शक कराएँगे एवं हम वास्तविक स्थिति से अवगत हो सकेंगे।

(2) डॉ. दुबे का मत है कि ग्रामीण जीवन से सम्बन्धित अध्ययनों से प्राप्त तथ्य हमें ग्रामीण जीवन के बारे में सही विश्वसनीय जानकारी दे पायेंगे।

(3) क्षेत्रीय अध्ययनों के द्वारा हम गाँवों में आने वाले परिवर्तनों की गति, दिशा, प्रकृति, शृंखला, परिवर्तन के वाहक एवं कारक, परिवर्तन के प्रति समुदाय का दृष्टिकोण जानने तथा परिवर्तन का मूल्यांकन और भविष्यवाणी करने में समर्थ हो सकेंगे। 

वर्तमान समय में ग्रामीण जीवन को अनेक कारकों; जैसे जमींदारी उन्मूलन, पंचायती राज, सामुदायिक विकास योजना, समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम, नगरीकरण, औद्योगीकरण, यातायात के नवीन साधन, आधुनिकीकरण आदि ने बहुत प्रभावित किया है और वे परिवर्तन के दौर में हैं। क्षेत्रीय अध्ययनों द्वारा हम घटित होने वाले नवीन परिवर्तनों को ज्ञात कर सकेंगे।

( 4 ) क्षेत्रीय अध्ययन के दौरान हम अध्ययन की विभिन्न विधियों और तकनीक का प्रयोग कर उनकी परिशुद्धता का पता लगा सकते एवं उनका मूल्यांकन कर सकते हैं। 

ऐसे अध्ययनों में हम ऐसी विधियाँ निर्धारित करने में सफल हो सकते हैं जिनके द्वारा भारतीय ग्रामों का अध्ययन सुगमता से किया जा सके। देसाई का मत है कि  भारतीय ग्रामीण समाज परीक्षण के लिए एक विशाल प्रयोगशाला प्रस्तुत करता है।

(5) क्षेत्रीय अध्ययन कर हम प्रशासकों एवं योजना निर्माताओं को क्षेत्रीय योजना निर्माण में सहायता प्रदान कर सकते हैं। कोई भी योजना उस समय तक सफलतापूर्वक लागू नहीं की जा सकती जब तक वह लोगों की आवश्यकताओं, आकांक्षाओं, मूल्यों और संस्कृति के अनुरूप नहीं हो। 

क्षेत्रीय अध्ययन ग्रामीण जीवन से सम्बन्धित सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करेंगे। इससे समाज कल्याण की योजना बनाने व उन्हें लागू करने में प्रशासकों एवं सरकार को सहायता मिल सकेगी।

(6) विभिन्न विद्वानों ने भारतीय समाज से सम्बन्धित अनेक अवधारणाएँ; जैसे संस्कृतिकरण, पश्चिमीकरण, लघु समुदाय, कृषक समाज, गुट, सार्वभौमिकरण, स्थानीयकरण, आदि प्रस्तुत की हैं। इन अवधारणाओं की उपादेयता और उनमें पायी जाने वाली कमियों को ज्ञात करने के लिए आवश्यक है कि अनेक क्षेत्रीय अध्ययन किये जायें। 

इन अध्ययनों से प्राप्त तथ्यों के आधार पर इन अवधारणाओं को हम और अधिक स्पष्टता और निश्चितता प्रदान कर सकते हैं। ये अवधारणाएँ हमें ग्रामीण अध्ययन के लिए एक ढाँचा  प्रदान करेंगे और हम प्राप्त तथ्यों का सरलता से वर्गीकरण एवं विश्लेषण कर पायेंगे।

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