कार्ल मार्क्स का योगदान - राजनीतिक दर्शन

 मार्क्स को अपने चिन्तन में निम्न स्रोतों से सहायता मिली थी

(1) हीगल के दर्शन का प्रभाव - मार्क्स पर हीगल के दर्शन का काफी प्रभाव पड़ा । मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का सिद्धान्त हीगल के द्वन्द्वात्मक तर्क पर आधारित है। मार्क्स ने हीगल के इस विचार को सही बताया कि समाज का विकास द्वन्द्वात्मक रीति

से होता है। परन्तु इन दोनों के निष्कर्ष एक-दूसरे के विपरीत हैं। मार्क्स, हीगल के इस विचार से सहमत नहीं कि सामाजिक विकास या परिवर्तन किसी दार्शनिक सिद्धान्त (आत्मा का सिद्धान्त) द्वारा होता है। हीगल के अनुसार, “जगत में विचार ही अन्तिम सत्य है, परन्तु मार्क्स के अनुसार अन्तिम सत्य भौतिक तत्त्व है।" 

मार्क्स ने अपने ग्रन्थ 'कैपीटल' में लिखा है, "मैंने हीगल के द्वन्द्वात्मक तर्क के सिद्धान्त के सिर के बल पाया (आत्मा के आधार पर) मैंने उसे उल्टा पैरों के बल खड़ा कर दिया (भौतिक आधार पर)। "

(2) फ्रांस के क्रान्तिकारी समाज का प्रभाव - मार्क्स ने क्रान्तिकारी और वर्ग-संघर्ष का सिद्धान्त फ्रांस की समाजवादी विचारधार ग्रहण किया। सेण्ट साइमन तथा फोरियर के विचारों ने मार्क्स को समाजवाद की एक निश्चित व्याख्या प्रदान की। 

लास्की कहता है, “किसी भी पहलू से हम देखें, उसका (मार्क्स का) चिन्तन सामाजिक दर्शन के इतिहास में स्वयं एक युग है उसके विषय में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उसने साम्यवाद को अस्त-व्यस्त रूप में पाया और उसे एक आन्दोलन बना दिया। उसके द्वारा साम्यवाद को दर्शन और गति प्राप्त हुई । ”

(3) ब्रिटिश समाजवादियों और अर्थशास्त्रियों का प्रभाव - एडम स्मिथ व रिकार्डो के आर्थिक दर्शन से मार्क्स ने यह विचार ग्रहण किया कि मूल्य की उत्पत्ति श्रम से होती है। ग्रे के अनुसार,  मार्क्स का मूल्य का सिद्धान्त रिकार्डो के आर्थिक लगान का ही संशोधित रूप है।

(4) औद्योगिक क्रान्ति का प्रभाव - मार्क्स के विचारों पर औद्योगिक क्रान्ति व कारखानों द्वारा बड़े पैमानों पर उत्पत्ति के कारण उत्पन्न विषम परिस्थितियों का बड़ा प्रभाव पड़ा। मशीनों के आने से बेकारी बढ़ी । नगरों का विस्तार हुआ। मजदूरी की दर कम हुई । मजदूरों का शोषण किया जाने लगा। 

मार्क्स ने इन समस्त स्थितियों का अध्ययन किया । उसने इन सामाजिक स्थिति के कारणों व उसे समाप्त करने के लिए जो उपाय बताये हैं, वे साम्यवाद कहलाते हैं ।

(5) व्यक्तिवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया का प्रभाव - मार्क्स के चिन्तन पर उस प्रतिक्रिया का भी प्रभाव पड़ा, जो व्यक्तिवाद के विरुद्ध प्रारम्भ हुई थी । राज्य द्वारा हस्तक्षेप की नीति से समाज दो वर्गों 'हैव्स' और 'हैवनाट्स' में बँट गया। राज्य को विवश होकर आर्थिक कार्यों में हस्तक्षेप करना पड़ा। 

मार्क्स ने भी मजदूरों के शोषण के विरुद्ध नये सामाजिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया । वस्तुतः मार्क्स का साम्यवाद, पूँजीवाद के समस्त दोषों का इलाज है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि मार्क्स के विचार सर्वथा मौलिक नहीं हैं। फिर भी, जैसा कि मैक्सी ने कहा है, उसने प्राचीन विचारकों द्वारा प्रतिपादित विचारों को इस प्रकार रखा है कि उसका समस्त विचार एक नया ही प्रतीत होता है। 

हम लास्की के कथन को पहले ही उद्धृत कर चुके हैं कि ." मार्क्स ने साम्यवाद को अस्त-व्यस्त रूप में पाया और उसने उसे एक आन्दोलन बना दिया। उसके द्वारा साम्यवाद को एक दर्शन और गति प्राप्त हुई । ”

कार्ल मार्क्स का योगदान

मार्क्स की महानता पर विभिन्न और परस्पर विरोधी विचार व्यक्त किए जाते । समाजवादियों के लिए वह एक देवता तुल्य है तो पूँजीवादियों के लिए सबसे बड़ा पिशाच, लेकिन इससे मार्क्स की महानता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता हैं। 

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि सम्पूर्ण मानवीय इतिहास में ऐसा कोई विचारक नहीं हुआ, जिसके विचारों ने मानव जाति के इतने बड़े भाग को प्रभावित और अनुप्राणित किया हो, और उनके सामाजिक जीवन में इतने गहरे, दूरगामी और आमूल परिवर्तन कर दिए हों, जिसने कि मार्क्स के विचारों ने किए हैं। 

मार्क्स का नाम विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय है और उसकी रचनाएँ सम्पूर्ण विश्व के करोड़ों व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाती हैं। मार्क्स की राजनीतिक विचारों के क्षेत्र में अपनी कई विशिष्ट दोनों के कारण चिरस्मरणीय है। उसकी प्रमुख देन निम्नलिखित हैं

वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन - मार्क्स वैज्ञानिक समाजवाद और साम्यवाद की विचारधाराओं का प्रबलतम प्रवर्तक और समर्थक है। मार्क्स प्रथम समाजवादी नहीं था और मार्क्स के पूर्व भी रॉबर्ट ओवनए एफ. डी. सारिस, चार्ल्स किंग्सले, डॉ. हाल, प्रूधो और सेण्ट साइमन, आदि समाजवादी विचारक हुए हैं, किन्तु इन लेखकों द्वारा प्रतिपादित समाज प्लेटो की 'रिपब्लिक' और थामस मूर की 'यूटोपिया'  की भाँति काल्पनिक था। 

किन्तु मार्क्स द्वारा प्रतिपादित समाजवाद एक काल्पनिक विचारधारा न होकर विधिवत् रूप से प्रस्तुत एक व्यावहारिक दर्शन है जिसमें विद्यमान विश्व की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को परिवर्तित करने का एक व्यावहारिक मार्ग भी बताया गया है। 

इस प्रकार समाजवाद को वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक रूप प्रदान करने का श्रेय मार्क्स को ही प्राप्त है। इस सम्बन्ध में लुईस वाशरमैन ने ठीक ही लिखा है कि "मार्क्स ने समाजवाद को एक षड्यन्त्र के रूप में पाया और उसे एक आन्दोलन के रूप में छोड़ा। समाजवाद ने उससे एक दर्शन और दिशा प्राप्त की।” 

इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धान्त - इतिहास की आर्थिक व्याख्या का सिद्धान्त सामाजिक अध्ययन के क्षेत्र में उसकी एक बहुत बड़ी देन है। इतिहास की आर्थिक व्याख्या को अपूर्ण मानते हुए भी हमें स्वीकार करना होगा कि समस्त सामाजिक संस्थाओं में आर्थिक तत्व के महत्व का प्रतिपादन करते हुए उसने सामाजिक अध्ययन की एक बहुत बड़ी सेवा की है । 

वैधानिक और राजनीतिक संस्थाओं तथा विद्यमान आर्थिक व्यवस्था को अन्तर्निर्भरता के प्रतिपादन ने उसे 19वीं सदी का सर्वाधिक महत्वपूर्ण सामाजिक दार्शनिक बना दिया है ।

आर्थिक गतिविधियों का व्यापक अध्ययन - आर्थिक गतिविधयों और जीवन के अन्य क्षेत्रों पर उसके प्रभावों का जैसा अध्ययन मार्क्स ने किया है, वैसा अन्य किसी ने भी नहीं किया। मार्क्स पहला विचारक था जिसने व्यापार-चक्र, अतिउत्पादन और बेरोजगारी के मध्य सम्बन्ध स्थापित किया। 

उसने ही यह अनुभव किया कि राष्ट्र की खुशहाली का एकमात्र साधन व्यापार नहीं है और यन्त्रीकरण के परिणामस्वरूप अनेक दोष उत्पन्न होंगे। 

उसने ही सर्वप्रथम यह अनुभव किया कि उद्योगों के यन्त्रीकरण का प्रभाव राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा और औद्योगीकरण तथा उद्योगों के स्थानीयकरण के परिणामस्वरूप श्रमिक वर्ग में वर्गीय चेतना का तीव्रता के साथ विकास होगा।

पूँजीवाद के सम्बन्ध में अन्तर्दृष्टि- इसके अलावा यद्यपि हम समाजवाद की अवश्यम्भावना को स्वीकार नहीं करते और हम यह मानते हैं कि पूँजीवाद का अन्त समाजवाद से नितान्त भिन्न एक सामाजिक व्यवस्था को जन्म दे सकता है, लेकिन यह मानना ही होगा कि पूँजीवाद के महत्वपूर्ण विकासों को पहले से देख लेने में मार्क्स ने उस सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि का परिचय दिया है, जिसका उसके समकालीन विचारकों में अभाव ही दिखता है। 

मार्क्स ने बिलकुल सही रूप में इस बात का प्रतिपादन किया कि यद्यपि पूँजीवाद का परिणाम उत्पादन में वृद्धि होगा, किन्तु पूँजीवाद अपने विद्यमान स्वरूप में अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता। 19वीं सदी का अबाधित पूँजीवाद अब भूत की वस्तु बन गया है और 20वीं सदी का पूँजीवाद उससे बहुत अधिक भिन्न है।

श्रमिक वर्ग में वर्गीय चेतना और एकता को जन्म - इन सबके अतिरिक्त मार्क्स की यदि कोई बड़ी देन है तो वह है श्रमिक वर्ग में वर्गीय चेतना और एकता को जन्म देना, उसकी स्थिति में सुधार करना, पूँजीपतियों के सम्मुख उनकी स्थिति को सबलता प्रदान करना और उन्हें पूँजीवाद के विरुद्ध अन्तिम संघर्ष के लिए तैयार करना। 

"पूँजीवाद का अन्त और साम्यवाद का आगमन अवश्यम्भवी है।" "विश्व के मजदूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए केवल जंजीरें हैं और पाने के लिए समस्त विश्व पड़ा है।" मार्क्स की ये बातें निरपेक्ष सत्य नहीं हैं और उनकी आलोचना की जा सकती है, लेकिन यह एक तथ्य है कि मार्क्स के इन नारों ने श्रमिक वर्ग में वर्गीय चेतना उत्पन्न करने में अद्वितीय सफलता प्राप्त की है। 

मार्क्स ने समाजवाद के सैद्धान्तिक विवेचन के अतिरिक्त 'प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ' का निर्माण कर श्रमिक वर्ग को संगठित भी किया। मार्क्स तथा उसकी विचारधारा का महत्व इस बात में है कि वह पूर्णतया शोषित वर्ग के कल्याण हेतु समर्पित है और इसी बात ने उसे महान व्यक्ति बना दिया है। 

इसाह बर्लिन के अनुसार, “19वीं सदी में ऐसे अनेक सामाजिक आलोचक और और क्रान्तिकारी हुए हैं, जिन्हें मार्क्स की तुलना में कम मौलिक, कम हिंसक या कम कट्टर सिद्धान्तवादी नहीं कहा जा सकता लेकिन इनमें से किसी ने भी एकनिष्ठ होकर अपने आपको एक ही किसी ऐसे तात्कालिक व्यावहारिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित नहीं किया जिसके लिए कोई भी त्याग महान नहीं हो सकता।”

वेपर ने मार्क्स के सम्बन्ध में लिखा है, "अपने सन्देश की शक्ति और भावी साम्यवादी आन्दोलन पर अपने प्रभाव के आधार पर विश्व के महान राजनीतिक विचारकों के किसी भी संग्रह में मार्क्स का स्थान पूर्णतया सुरक्षित है।

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