दलित से आप क्या समझते हैं - dalit se aap kya samajhte hain

आदिकाल से आज तक समाज में मुख्यतः दो वर्ग विशेष रूप से पाए जाते रहे हैं। यहाँ तक कि स्वर्ग लोक में भी दो वर्ग पाए जाते रहे हैं - देवता और दानव। प्रत्येक समाज में भी उच्चता और निम्नता की भावना सदैव व्याप्त रहती है और इसी भावना के परिणामस्वरूप वर्ग विभाजन हुआ है। 

जो सम्पन्न लोग थे वे उच्च वर्ग में सम्मिलित किए गए, उन्हें अभिजात वर्ग कहा गया और जो विपन्न थे उन्हें निर्धन वर्ग, श्रमिक वर्ग, कमजोर वर्ग, पिछड़े वर्ग और दलित वर्ग आदि के नाम से सम्बोधित किया जाता है। दलित वर्ग ऐसे लोगों का वर्ग रहा है जो सदियों से विभिन्न प्रकार की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक निर्योग्यताओं के शिकार रहे हैं। 

दलित से आप क्या समझते हैं ? वर्णन कीजिए। 

यह दलित वर्ग सदैव शोषित और उपेक्षित रहा है। किन्तु आज राजनीतिक दृष्टि से यह वर्ग निरन्तर सशक्त और प्रभुतासम्पन्न होता जा रहा है क्योंकि भारतीय समाज में आज पैरेटो के अभिजात वर्ग के परिभ्रमण के सिद्धान्त की प्रक्रिया क्रियान्वित है। 

सवाल यह है कि दलित कौन है ? और किन कारणों से इन्हें दलित माना जाता है ? यदि हम ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विचार करें तो स्पष्ट होता है कि आर्यों ने अपने में केवल तीन वर्णों का विभाजन किया था जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य का उल्लेख मिलता है। वैदिक काल में ऋग्वेद के अन्तिम चरण में शूद्र वर्ण की रचना की गई जो वास्तव में अनार्य थे। 

इस प्रकार वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत शूद्रों को दलित वर्ग के अन्तर्गत सम्मिलित किया जाता है। इसके पश्चात् ब्राह्मण ग्रन्थों में शूद्रों को दास कहा गया है और इन्हें बहुत निम्न समझा जाता था। इनको तीन वर्णों की सेवा करनी पड़ती थी तथा निन्दनीय और घृणित कार्य करते थे। 

शूद्रों अर्थात् दासों को धार्मिक कार्यों और प्रथाओं में सम्मिलित नहीं किया गया और इन्हें अपवित्र माना गया तथा कालान्तर में ये अस्पृश्य जाति के रूप में समझे जाने लगे और यही दलित कहलाए। आधुनिक दृष्टिकोण में भारतवर्ष में दलितों के सम्बन्ध में यदि विचार किया जाए तो स्वतंत्रता के पूर्व वे लोग दलित कहलाते थे।  

जो शोषित थे, पीड़ित थे, निम्न जाति के थे और उनको सदैव दबाया जाता था। उनसे बेगारी करवाई जाती थी। इनके साथ अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए थे। अनेक निर्योग्यताओं का इन्हें पालन करना पड़ता था। साथ ही साथ इनके साथ अत्याचार, अनाचार, दुर्व्यवहार आदि करके इन्हें प्रताड़ित किया जाता रहा है। 

ये उत्पीड़न तथा प्रताड़ना के सदैव शिकार रहे हैं। इन दलितों के समूह को वर्ग या दलित वर्ग की संज्ञा दी गई। गांधीजी ने इन्हें हरिजन नाम से सम्बोधित किया था, लेकिन बाबा साहेब अम्बेडकर इन्हें दलित वर्ग के ही मानते थे और उन्होंने इन दलितों की मुक्ति के लिए अत्यधिक प्रयास किए थे।

स्वतंत्रता के पश्चात् नवीन संविधान का निर्माण हुआ हालांकि इसके पूर्व ही सन् 1935 में साइमन कमीशन द्वारा दलित या अस्पृश्य लोगों के लिए अनुसूचित जाति का प्रयोग किया गया। डॉ. अम्बेडकर की मान्यता है कि आदिकालीन भारत में दलितों को भग्न पुरुष या बाह्य जाति माना जाता था और अंग्रेज डिस्प्रेस्ड क्लास कहकर इन्हें पुकारते थे।  

जिसका हिन्दी में तात्पर्य दलित वर्ग होता है। दलित शब्द का प्रयोग अंग्रेजों के द्वारा किया गया था। 1931 की जनगणना में बाह्य जाति के रूप में सम्बोधित किया गया था और महात्मा गांधी ने इन्हें हरिजन के नाम से सम्बोधित किया था। 

अस्पृश्य अथवा अछूत मानी जाने वाली जातियों के नामकरण के सम्बन्ध में प्रारम्भ से ही विवाद चला आ रहा है। आर्थिक दृष्टि से ये जातियाँ अत्यन्त कमजोर रही हैं। मेहनत-मजदूरी करके अपना भरण-पोषण करती रही हैं। इस दयनीय स्थिति के कारण इन्हें अछूत न कहकर दलित कहा जाने लगा। 

आर्य समाज की यह मान्यता थी कि कोई मानव अछूत नहीं होता इसलिए ये अछूत न होकर दलित हैं क्योंकि भारतीय समाज में इन्हें समस्त प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा गया है और दबाकर रखा गया है और इनकी निम्न स्थिति के लिए ये स्वयं उत्तरदायी नहीं हैं। 

बल्कि इनका शोषण करने वाला और इनके साथ दुर्व्यवहार और अत्याचार करने वाला स्वयं भारतीय समाज और समाज के लोग हैं। आज की स्थिति में 1935 के विधान में इन लोगों को कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान करने की दृष्टि से एक अनुसूची तैयार की गई थी।

साधारणतया अनुसूचित जातियों को अस्पृश्य जातियाँ भी कहा जाता है और इनको छुआछूत के आधार पर परिभाषित किया गया है। जिन्हें अछूत, दलित, हरिजन और बाह्य जातियाँ कहा जाता है उन्हें सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से सुविधाएँ दिलाने के लिए इन्हें संविधान की अनुसूची में सम्मिलित किया गया है।

दलितों की प्रमुख समस्याएँ

भारत में दलितों की प्रमुख समस्याओं के सम्बन्ध में यहाँ हम विस्तार से चर्चा करेंगे। भारतीय समाज में पाई जाने वाली अनुसूचित जातियाँ प्राचीन काल से निरन्तर उपेक्षित, शोषित और तिरस्कृत रही हैं। 

भारतीय जाति प्रथा के विकृत अभिशाप ने अनुसूचित जातियों को आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और मानसिक सुविधाओं से वंचित कर दिया तथा इन जातियों के लोगों को पशुवत् और दयनीय जीवन-यापन करने के लिए बाध्य कर दिया था। 

भारत में निवास करने वाली इन आठ करोड़ अनुसूचित जाति के लोग भी भिन्न प्रकार की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक समस्याओं से त्रस्त अपना दयनीय और दरिद्रतापूर्ण जीवन-यापन कर रहे हैं। न तो ये जातियाँ अपने मन- पसन्द काम व व्यवसाय कर सकती हैं न उच्च अध्ययन कर सकती हैं। 

अनेक प्रकार की धार्मिक निर्योग्यताओं की शिकार हैं। इनके स्पर्श मात्र से उच्च जाति के लोग अपने को अपवित्र समझने लगते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर ये प्रवेश नहीं कर सकती हैं। अस्पृश्यता, अपवित्रता और निम्नता आदि से सदैव इन जातियों के लोग शिकार होते रहे हैं। 

अनुसूचित जाति के लोगों का सदैव से उच्च जातियों के लोगों द्वारा शोषण किया जाता रहा है जिससे इन जातियों के लोगों का समुचित विकास नहीं हो पाया और ये जातियाँ आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक विश्वासों की समस्याओं से आज तक छुटकारा नहीं पा सकी हैं। अनुसूचित जातियों की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं -

(1) आर्थिक समस्याएँ - भारत में जाति-व्यवस्था ने स्वाभाविक रूप से आर्थिक विषमता उत्पन्न की है जिसके परिणामस्वरूप प्राचीन काल से आज तक निम्न जातियाँ अर्थात् अनुसूचित जातियाँ आर्थिक समस्याओं से अत्यधिक ग्रस्त हैं। 

जो जाति जितनी निम्न है उसकी आर्थिक स्थिति उतनी ही दयनीय रही है। क्योंकि जाति व्यवस्था के व्यावसायिक प्रतिबन्ध ने इन जातियों को निम्न और घृणित व्यवसाय करने के लिए सदैव बाध्य किया है। निम्नतम व्यवसायों और उच्च जातियों की सेवाओं में संलग्न रहने के कारण अनुसूचित जातियों की आर्थिक स्थिति सदैव निम्न और दयनीय रही है। इन्हें निर्धनता और दरिद्रता के साये में ही सम्पूर्ण जीवन-यापन करना पड़ता है।

श्रम विभाजन की व्यवस्था में जो उच्च और स्वच्छ व्यवसाय थे उन्हें उच्च जातियों ने अपने लिये सुरक्षित कर लिया था और जो निम्न कार्य तथा व्यवसाय थे उन्हें अनुसूचित जातियों के लिए कर दिया गया जिसे न चाहते हुए भी अनुसूचित जातियों को बाध्य होकर करना पड़ता था। 

अनुसूचित जाति के लोग प्रतिभावान और कार्य में दक्ष होते हुए भी उच्च व्यवसाय और कार्य करने से सदैव वंचित रहे हैं। अनुसूचित जाति के लोगों को खेतों में श्रमिकों के रूप में सदैव सवर्णों ने प्रयोग किया और उनका भरपूर शोषण करते रहे हैं। 

रात-दिन मेहनत करते रहने और खून-पसीना एक करने पर भी आज तक वे आर्थिक दृष्टि से सुरक्षित नहीं हो सके। इन्हें मात्र इतनी मजदूरी मिलती रही है या दी जाती रही है कि ये न तो मर सकें और न ही मोटा हो सकें। अर्थात् मात्र उच्च जातियों की सेवा के लिए जिन्दा रह सकें।

इस प्रकार स्पष्ट है कि भारत में अनुसूचित जातियों के लोगों द्वारा अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए जाते हैं किन्तु उन्हें दरिद्रता का जीवन-यापन करना पड़ता है। इस प्रकार अनुसूचित जाति के लोग प्रबल आर्थिक समस्याओं से ग्रसित हैं।

(2) सामाजिक समस्याएँ  – भारतीय जाति व्यवस्था के परम्परात्मक स्वरूप में अनुसूचित जातियों को अनेक सामाजिक निर्योग्यताओं और समस्याओं का सामना आज तक करना पड़ रहा है। जाति प्रथा के अन्तर्गत संस्कारगत निम्नतम स्थिति जितने भी सामाजिक कष्टों और दुःखों को जन्म दे सकती है।  

वे समस्त समस्याएँ आज भारत के अनुसूचित जातियों के जीवन का अंग बन गई हैं। समाज में इन्हें निम्न समझा जाता है। इन्हें अछूत कहा जाता है। चाण्डाल माना जाता है। यदि इन्हें उच्च जाति के लोग स्पर्श कर लेते हैं या भूल से इन जातियों के लोगों के वस्त्र छू जाते हैं तो स्नान करके वे पवित्र होते हैं। 

इनके हाथ का छुआ उच्च जाति के लोग न जल ग्रहण करते हैं, न खाना खाते हैं। खान-पान, रहन-सहन, सहवास आदि सभी निर्योग्यताओं की अनुसूचित जातियों के लोग शिकार बने हैं। 

डॉ. घुरिए के अनुसार महाराष्ट्र की अनुसूचित जाति 'महार' के सदस्यों के लिए यह आवश्यक था कि वे घर के बाहर हर समय अपने गले में एक बर्तन लटकाए रखे जिससे आवश्यकता पड़ने पर वे उसमें थूक सकें क्योंकि जमीन पर थूकना वर्जित था। 

ब्राह्मण के सामने आ जाने पर हर महार को काँटेदार टहनी से अपने पैर के निशान को मिटाकर दूर लेटना पड़ता था ताकि उसकी प्रतिछाया ब्राह्मण पर न पड़े और वे अपवित्र न हो जायें। इसी प्रकार तमिलनाडु की एक अनुसूचित जाति के लोग दिन में बस्ती में निकल नहीं सकते थे। 

रात में ही वे अपने कपड़े आदि धोने के लिए बस्ती से निकलते थे। प्रसिद्ध समाज सुधारक ठक्कर बापा के सामने भी इन अनुसूचित जातियों के लोग बहुत समझाने-बुझाने पर आए थे। इस प्रकार सामाजिक दृष्टिकोण से भारत की अनुसूचित जातियों के लोग हीन - भावना से सदैव ग्रस्त रहे हैं जिसके कारण वे समाज में अपने मान-सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा की कल्पना तक नहीं कर सकते थे।

(3) शैक्षणिक समस्याएँ - शिक्षा के सन्दर्भ में भारतीय समाज में एक मात्र सूचक है साक्षरता दर, जिसका अनुमान प्रत्येक दशक में जनगणना से लगाया जाता है। अनुसूचित जातियों अर्थात् दलितों में शिक्षा का प्रचार और प्रसार बहुत कम रहा है।

बिहार, म. प्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लोगों में शिक्षा के प्रति रुचि बहुत कम रही है। इसके साथ ही साथ इन दलित वर्ग के लोगों के लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था की गई है और इनमें व्याप्त निर्योग्यताओं को दूर कर उनके साथ आज समान व्यवहार किया जा रहा है। 

किन्तु अभी भी शैक्षिक दृष्टिकोण से इनमें शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है। वर्तमान समय में शिक्षा के प्रति दलितों का लगाव बढ़ा है और इनमें शैक्षणिक विकास होना प्रारम्भ हुआ है। आज लगभग सभी अनुसूचित जातियों अर्थात् दलित जातियों के परिवार के लोग शिक्षा की ओर उन्मुख हुए हैं।

(4) राजनैतिक समस्याएँ - भारत की अनुसूचित जातियों को राजनीति के क्षेत्र से स्वतंत्रता के पूर्व सदैव पृथक् रखा गया था। इन जातियों को किसी भी प्रकार का राजनीतिक अधिकार नहीं था। 

ये सेवक मात्र होते थे। न तो इन्हें किसी प्रशासनिक और सार्वजनिक पद पर नियुक्त किया गया था और न इन्हें अच्छी नौकरी दी जाती थी, निम्न कार्यों के लिए नियुक्त किया जाता था और इनसे काम कराया जाता था । न तो अनुसूचित जाति के लोग वोट दे सकते थे और न राजनीतिक कार्यों में भाग ले सकते थे। 

इनके लिए राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश एक प्रकार से वर्जित था। किन्तु आज संवैधानिक दृष्टि से अनुसूचित जाति के लोगों को राजनैतिक संरक्षण प्रदान किया गया है।

दलितों या अनुसूचित जातियों की समस्याओं के निराकरण के उपाय 

भारत में व्याप्त दलितों को विविध समस्याओं के निराकरण के लिए स्वतंत्रता के पश्चात् निरन्तर प्रयास किया जा रहा है। संवैधानिक संरक्षण और व्यवस्था के साथ-साथ अनेक कल्याणकारी कार्यक्रमों को लागू करके इनके विकास का निरन्तर प्रयास किया जा रहा है। 

स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा 'अनुसूचित जाति कल्याण विकास निगम के द्वारा विविध प्रकार की सुविधाओं को उपलब्ध कराके इनकी समस्याओं को हल करने का प्रयास किया जा रहा है। 

आज अनेक योजनाओं तथा जिला हरिजन कल्याण समितियों द्वारा भी दलितों या अनुसूचित जाति के लोगों को उनके विकास तथा उत्पीड़न के विरुद्ध उनकी सहायता के लिए पूर्ण प्रयत्न किया जा रहा है। दलितों (अनुसूचित जातियों) के कल्याण और विकास के लिए तथा इनकी विभिन्न समस्याओं के निवारण के लिए किए जाने वाले प्रयासों को हम निम्न प्रकार से स्पष्टतः समझ सकते हैं -

(1) सवैधानिक व्यवस्थाएँ - स्वतंत्रता के पश्चात् निर्मित भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों की समस्याओं और निर्योग्यताओं को दूर करने के लिए विविध वैधानिक व्यवस्थाएँ की गई हैं जिनमें से निम्नलिखित व्यवस्थाएँ उल्लेखनीय हैं-

(i) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, वंश, जाति, लिंग, जन्म, स्थान अथवा इनमें से किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। 

इनमें से किसी भी आधार पर कोई भी नागरिक दुकानों, भोजनालयों, होटलों तथा सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश के सम्बन्ध में किसी भी अंश में राज्यों द्वारा पोषित या साधारण जनता के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, घाटों, सड़कों या सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग के बारे में किसी निर्योग्यताओं, निवर्तन या शर्त के अधीन नहीं होगा।

(ii) संविधान के अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्य के अधीन नौकरियों या पदों पर नियुक्ति के बारे में समस्त नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी। धर्म, वंश, जाति, लिंग, स्थान, निवास आदि के आधार पर कोई भी नागरिक सरकारी पद के लिए अपात्र नहीं माना जाएगा और न कोई भेदभाव किया जाएगा।

(iii) संविधान के अनुच्छेद 17 के अन्तर्गत अस्पृश्यता का अन्त कर दिया गया है तथा अस्पृश्यता को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है।

(iv) संविधान के अनुच्छेद 29 के अनुसार कोई भी नागरिक वंश, जाति, धर्म और भाषा आदि के आधार पर किसी भी सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्था में प्रवेश से वंचित नहीं किया जाएगा।

(v) संविधान के अनुच्छेद 46 के अनुसार राज्य जनता के कमजोर और दलित वर्गों तथा अनुसूचित जातियों को आर्थिक और शिक्षा सम्बन्धी सभी सुविधाएँ देने की व्यवस्था करेगा जिससे वे अधिक उन्नति कर सकें। इसी अनुच्छेद में सामाजिक अन्याय और शोषण से भी इनके संरक्षण की व्यवस्था की गई है।

(vi) संविधान के अनुच्छेद 330, 332 और 334 के द्वारा संसद तथा राज्यों के विधानमण्डलों में 20 वर्ष तक इन्हें प्रतिनिधित्व की विशेष सुविधा दी गई है।

(vii) संविधान के अनुच्छेद 164 में अनुसूचित जातियों के कल्याण तथा हितों की रक्षा के उद्देश्य से राज्यों में सलाहकार परिषदों और पृथक् विभागों की स्थापना की गई है और केन्द्र सरकार में एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की गई है।

(viii) भारतीय सरकार ने अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम 1955 पारित करके अनुसूचित जातियों पर थोपी गई परम्परागत निर्योग्यताओं को समाप्त कर दिया है। सन् 1976 में इस अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम में संशोधन करके उन व्यक्तियों के लिए कठोर दण्ड का प्रावधान किया है जो अपने किसी कार्य और व्यवहार से अस्पृश्यता को प्रोत्साहन देता है।

इस प्रकार वैधानिक आधार पर अनुसूचित जातियों की समस्त प्रकार की निर्योग्यताओं और उन पर लगाए गए समस्त परम्परागत प्रतिबन्धों और निषेधों को समाप्त कर दिया गया है। आज अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिए अनेक कल्याणकारी कार्य शासन और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किए जा रहे हैं।

(2) स्वयंसेवी प्रयास - अनुसूचित जातियों की दयनीय दशा को देखकर प्रत्येक सहृदय व्यक्ति द्रवित हो जाता है। महात्मा गाँधी ने अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य किया है। अनुसूचित जातियों की समस्याओं का निवारण उनके राजनैतिक कार्यक्रमों का अंग रहा है। 

महात्मा गाँधी ने अनुसूचित जातियों को मन्दिर में प्रवेश दिलाया उनके साथ बैठकर प्रार्थना की परम्परा प्रारम्भ की। आज अनेक स्वयंसेवी संगठन अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए निरन्तर प्रयत्न कर रही हैं। 

अखिल भारतीय स्तर के इन महत्वपूर्ण स्वयंसेवी और स्वैच्छिक संगठनों में हरिजन सेवक संघ दिल्ली, भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी नई दिल्ली, हिन्दू स्वीपर सेवक समाज नई दिल्ली, रामकृष्ण मिशन, भारतीय आदिम जाति सेवक संघ नई दिल्ली, हरिजन आश्रम इलाहाबाद, भारतीय समाज उन्नति मण्डल भीलवंडी,ठक्कर बापा आश्रम नुमाखण्डी उड़ीसा, भारत सेवक समाज पुणे तथा सामाजिक कार्य और शोध केन्द्र तिलोनिया राजस्थान आदि उल्लेखनीय हैं। 

यह स्वयंसेवी संगठन विभिन्न विचार गोष्ठियों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अन्य विविध योजनाओं के द्वारा अनुसूचित जातियों के उत्थान के लिए निरन्तर प्रयत्नशील हैं। सरकार अनुसूचित जातियों के बीच कार्य कर रही इन स्वैच्छिक संगठनों को सहायता देती है और अराजकता के अनुसार अनुदान प्रदान करती है। पिछले दशक से विश्व हिन्दू परिषद भी इस दिशा में विशेष रचनात्मक और उल्लेखनीय कार्य कर रही है ।

(3) कल्याणकारी योजनाएँ - अनुसूचित जातियों की समस्याओं के निराकरण के लिए सरकार समय-समय पर विभिन्न योजनाएँ लागू करके सुविधाएँ प्रदान करती रही है। अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारें आपस में मिलकर दोनों विशेष ध्यान देती हैं। 

अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं में विभिन्न कार्यक्रम प्रारम्भ किये जाते रहे हैं। छठवीं पंचवर्षीय योजनाओं में अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए ₹269.19 करोड़ व्यय किए गए। इन योजनाओं के मध्य ₹600 करोड़ अनुसूचित जातियों के विकास को संघटक योजनाओं के लिए विशेष केन्द्रीय सहायता प्रदान की गई है।

भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था के अन्तर्गत केन्द्र में एक आयुक्त की नियुक्ति की गई है जिसके अधीन उपायुक्त नियुक्त किए गए हैं। अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए एक आयोग का गठन किया गया था जिसमें एक अध्यक्ष और चार सदस्य थे। 

अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए प्रत्येक प्रकार की सलाह देने के लिए केन्द्रीय स्तर पर एक सलाहकार बोर्ड की स्थापना की गई है।

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