परिवीक्षा को परिभाषित कीजिए - pariveeksha ko paribhaashit keejie

Post Date : 17 July 2022

आजकल अपराधियों को सुधारने के लिए प्रचलित तरीकों में से प्रोबेशन या परिवीक्षा प्रणाली को अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जाने लगा है। यह प्रणाली पाश्चात्य जगत् की देन है जिसका प्रारम्भ जॉन आगस्टस ने अमेरिका के बोस्टन नगर में कुछ शराबी अपराधियों को न्यायालय की कार्यवाही स्थगित कराकर तथा उनकी अपने संरक्षण में स्वयं देख-रेख करके किया था।

उनकी इस उदारता तथा सहानुभूति का इन अपराधियों पर अच्छा प्रभाव पड़ा तथा उनके व्यवहार में परिवर्तन तथा आवश्यक सुधार सम्भव हो सका। धीरे-धीरे हल्कं अपराधियों पर यह विशेष नजरबन्दी अधिक लाभकारी सिद्ध होने लगी और प्रोबेशन प्रणाली अपराधी - समुदाय में सामान्यतया प्रचलित हो गई।

परिवीक्षा का प्रारम्भ

प्रोबेशन शब्द लैटिन भाषा के 'probo' अथवा 'probare' से निकला है। जिनके अर्थ ‘मैं सिद्ध करता हूँ, अथवा ‘जाँच करना होते हैं। दूसरे शब्दों में अपराधी के द्वारा अपने आचरण को ठीक कर लेने की किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा जाँच किये जाने और इसे तद्नुसार प्रमाणित या सिद्ध कर देने को ही प्रोबेशन माना जा सकता है।

आजकल इस प्रकार की जाँच अवधि निर्धारित करके प्रायः न्यायालय सामान्य अपराधी को तो जेल भेजना भी कम पसन्द करते हैं तथा प्रथम अपराधी या विशेषकर भावावेश में आ जाने वाले अपराधी को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सुधारने तथा उसे ठीक किये जा सकने की सम्भावना की व्यावहारिकता के आधार पर अन्य किसी प्रकार के दण्ड न देकर उसके सद्व्यवहार के आश्वासन पर उसे स्वतन्त्रता देते हैं और उसे सुधार सकने का पूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। 

यह एक प्रकार से अपराधी को रोगी मानकर उसके उपचार की प्रणाली समझी जा सकती है। यदि वह अपराधी इस अवसर का दुरुपयोग करता है, अपने आश्वासन का पूरी तरह पालन नहीं करता है अथवा देख-रेख के दौरान भी पुनः अपराधी व्यवहार प्रारम्भ कर देता है, तब उसे निर्धारित दण्ड भुगतना ही पड़ता है। क्योंकि तब यह माना जा सकता है कि उसमें सुधार हो सकने की सम्भावना कम है ।

परिवीक्षा की परिभाषाएँ

प्रोबेशन की अवधारणा स्पष्ट करने के लिए विभिन्न विद्वानों ने लगभग मिलती-जुलती हुई परिभाषाएँ दी हैं, इन्हें निम्नलिखित प्रकार से प्रस्तुत किया जा सकता है। 

(1) टप्पन के अनुसार - प्रोबेशन किसी अपराधी के प्रति घोषित की गई सजा को स्थगित कर देना है जिसके दौरान वह व्यक्ति प्रोबेशन अधिकारी को अपने अच्छे आचरण का विश्वास दिलायेगा।

(2) मैबेल ए. इलियट के अनुसार - प्रोबेशन दण्ड देने वाली संस्था से इस शर्त पर कि अपराधी अच्छा व्यवहार करेगा, मुक्ति मिलने को कहते हैं।

( 3 ) सदरलैण्ड के अनुसार - प्रोबेशन दण्ड को टाल देने की अवधि में दोषी समझे गये अपराधी की वह स्थिति है जिसमें अच्छा व्यवहार करने की शर्त पर उसे छोड़ दिया जाता है और उस अवधि में राज्य व्यक्तिगत निरीक्षण के द्वारा उसे अच्छा आचरण बनाये रखने में सहयोग देने का प्रयास करता है। 

(4) टैफ्ट के अनुसार - वयस्क प्रोबेशन एक अपराधी मामले में अन्तिम निर्णय या दण्ड का स्थगन है जिससे उसे अपने व्यवहार को सुधारने और समुदाय के प्रति पुनः अभियोजन करने का एक अवसर प्राप्त हो सके जिसके लिए प्रायः अदालत द्वारा लगाई गई शर्तों और निर्देशन के अनुसार व्यायालय के किसी अधिकारी के संरक्षण में अपराधी को रहना होगा।

परिवीक्षा की विशेषताएँ

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि प्रोबेशन प्रणाली एक प्रकार से अपराधी के प्रति उसे सहानुभूति या उदारता है जिसके अन्तर्गत अपराधी दण्ड से बच सकता है, परन्तु कुछ प्रतिबन्धों के मध्य रहना तथा उसका पालन करना पड़ता है। इस प्रकार प्रोबेशन की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं -

(i) प्रोबेशन की स्थिति अपराधी को सजा सुनाने के बाद ही उत्पन्न होती है। 

(ii) निर्धारित दण्ड स्थगित कर दिया जाता है और अपराधी को प्रोबेशन काल में इसे भुगतना नहीं पड़ता है।

(iii) इस काल में अपराधी को मुक्त कर देने के साथ ही एक प्रोबेशन अधिकारी के संरक्षण में उसे रखा जाता है। 

(iv) इस अवधि मे उसके अपने दिये गये आश्वासन के अनुसार उसका व्यवहार अच्छा बना रहता है। 

परिवीक्षा की प्रकृति

प्रोवेशन प्रणाली एक सुधारात्मक कार्यविधि है, जिसमें अपराधी को केवल चेतावनी देकर या दण्ड से भयभीत करके अपने आचरण को सुधारने के लिए विकल्प प्रस्तुत किया जा सकता है। इस प्रणाली का प्रयोग वैसे तो अधिकांशतः वयस्क या प्रौढ़ अपराधियों के ही प्रति किया जाता है। 

परन्तु टप्पन ने बाल तथा किशोर अपराध के निवारण में इसे विशेष प्रकार से उपयोगी बताया है और इस क्षेत्र में प्रारम्भिक प्रयोग कुछ लाभकारी तथा सफल भी सिद्ध हुए हैं।

प्रोवेशन की कार्य प्रणाली में प्रायः गम्भीर अपराधियों या हिंसात्मक दुष्कृत्य, व्यभिचार इत्यादि करने वालों को मुक्त नहीं किया जाता है अथवा जो अभ्यस्त अपराधी हो चुक हैं। जो बार-बार दण्ड भुगतने के आदी हो गयी है तथा जो इस प्रकार के आश्वासन या जमानत से ठीक हो ही नहीं सकते हैं, उनके लिए प्रोवेशन व्यवस्था नहीं अपनाई जाती है।

प्रोवेशन पर छोड़ गये अपराधी को कोई आश्वासन देना पड़ता है या कोई जमानत देनी पड़ती है जो नकद भी हो सकती है अथवा किसी सम्मानित या प्रतिष्ठित व्यक्ति की मौखिक अथवा लिखित जमानत हो सकती है। इसमें उस सदाचरण की शर्त को प्रमुख रूप से स्वीकार करना पड़ता है। 

एडवर्ड जे. हेन्ड्रिक के अनुसार - प्रोबेशन की दशाओं के अन्तर्गत कानून पालन करने वाला व्यवहार, निरीक्षण करने वाले प्रतिनिधि से नियमित सम्पर्क, रोजगार में स्थायित्व, नशीली वस्तुओं से बचाव, कुसंगति से पृथक् रहना, यात्रा तथा विवाह से पूर्व- अनुमति प्राप्त करना, अनावश्यक ऋण से दूर रहना तथा चारी की गई वस्तुओं को वापस लौटाना इत्यादि सम्मिलित हैं।

यदि प्रोवेशनकाल में आचरण, विश्वास दिलाये गये वायदे के विपरीत हो जाता है। तो जमानत जब्त भी हो सकती है तथा अपराधी व्यक्तिपुनः उसी निर्धारित मूल-दण्ड के लिए उत्तरदायी होगा जिसे परिवीक्षाकाल में स्थगित कर दिया गया था। उसे अपने प्रोबेशन अधिकारी से निरन्तर सम्पर्क बनाये रखना पड़ेगा तथा उसे सन्तुष्ट एवं आश्वस्त भी किये रहना होगा कि उसके क्रियाकलाप नियमित तथा व्यवस्थित है।

परिवीक्षा का महत्व 

प्रोबेशन एक वह सुधारात्मक प्रणाली है, जिसके आधार पर अपराधियों में सुधार करने के प्रयास किए जाते हैं। इसका महत्व प्रकट करने हेतु भिन्न-भिन्न अपराधशास्त्रियों ने भिन्न-भिन्न तरह की विचारधाराएँ प्रकट की हैं, मगर उनमें से निम्नलिखित मुख्य हैं -

1. अपराधियों की मनोवृत्तियों को परिवर्तित करने का एक महत्वपूर्ण साधन - आधुनिक अपराधशास्त्रवेत्ताओं के अनुसार - प्रोबेशन प्रणाली एक ऐसी प्रणाली है, जिसके आधार पर अपराधियों की मनोवृत्तियों में परिवर्तन किया जा सकता है। 

वह समाज के प्रति सहानुभूति की प्रवृत्ति का विकास करता है और दुबारा समाजज-विरोधी कार्य नहीं करता है। अपराधी को विश्वास हो जाता है कि वास्तव में सभी लोग उसके सुधार के पक्ष में हैं।

2. अपराधी को दूषित वातावरण से बचाना - वैसे तो अपराधी को सजा मिलने पर भिन्न-भिन्न तरह के दूषित जेलों के वातावरण में रहना पड़ता है। इसी कारण प्रोबेशनर इन सभी से मुक्ति दिलवाने में योगदान प्रदान करता है।

3. प्रोबेशन चिकित्सा की भी एक विधि है - इनमें अपराधी को एक बीमार व्यक्ति मानकर उसकी चिकित्सा की जाती है ।

4. अनुशासन की भावनाओं का विकास होना - प्रोबेशन व्यवस्था में व्यक्ति को कुछ शर्तों का पालन करना पड़ता है। इससे प्रोबेशनर में अनुशासन की भावनाओं का विकास सम्भव हो पाता है। 

5. अपराधियों में सामंजस्यता का विकास होना - प्रोबेशन व्यवस्था के द्वारा व्यक्ति अपने परिवार और समुदाय में रहता है। अतः परिवार, मित्र, पड़ौस और जिन लोगों के साथ सामंजस्य करना शुरू कर देता है। इससे उसमें व्यवस्थापन के गुण स्वतः ही उत्पन्न होने लगते हैं। जो कि मानव के व्यक्तित्व के विकास हेतु बहुत ही आवश्यक हैं।

6. अपराधी पर अपराधियों का प्रभाव नहीं पड़ता है - अपराधी कानून से बच के आया हुआ होने के कारण यह जानता है कि उसे जीवन निर्माण करने का एक स्वर्ण अवसर मिला है। इसी कारण वह आपराधिक प्रक्रियाओं की ओर ध्यान ही नहीं देता है।

7. आत्मनिर्भरता का गुण उत्पन्न होना - बन्दीगृह से छूटने के पश्चात् अपराधी हर तरह से अपने स्वयं के और अपने परिवार के उत्तरदायित्वों को निभाने हेतु हर तरह से आत्मनिर्भरता के गुणों को उत्पन्न करने का प्रयास करता है। 

यदि उसे इस तरह का अवसर प्रदान न हो तो वह स्वयं को किसी भी तरह से जिन्दगी में न तो सामाजिक प्राणी के रूप में सिद्ध कर सकता है और न ही समस्याओं के समाधान में सफलताएँ ही प्राप्त कर सकता है।

8. अपराधी में क्षतिपूर्ति का गुण उत्पन्न होना - प्रोबेशन एक वह व्यवस्था है, जिसमें अपराधी हर तरह से भिन्न-भिन्न कार्यों को अपनाकर क्षतिपूर्ति करने का गुण इतनी ज्यादा मात्रा में उत्पन्न कर लेता है कि लोग उसे हर तरह से अच्छा नागरिक समझे बिना नहीं रहते हैं।

9. सत्य पथों की ओर अग्रसर होने की प्रेरणाओं का साधन - प्रोबेशन वह व्यवस्था है, जिससे अपराधियों को सत्य पथों की ओर अग्रसर होने की हर तरह की शिक्षाएँ मिलती रहती हैं। वह जीवन में अच्छे सिद्धान्तों, आदर्शात्मक नियमों को ही स्वीकारोक्तियाँ देने लगता है।

10. अपराधों को जनसहयोग मिलना - विद्वानों के कथनानुसार प्रोबेशन की व्यवस्था कानूनी व्यवस्था होने के परिणामस्वरूप जनता अप्रत्यक्ष रूप में अपराधी का हर तरह से सहयोग करने लगती है। जो कि व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है।

11. यह प्रणाली सस्ती प्रणाली है - प्रोबेशन प्रणाली एक सस्ती प्रणाली है। क्योंकि इसके आधार पर अपराधी को सजा मुक्त कर देने पर जो खर्चा उस पर सजा भुगतने के समय पड़ता है। उससे सरकार हर तरह से बच जाती है। इसी कारण इस प्रणाली का उपयोग लगातार बढ़ाता ही चला जा रहा है। 

परिवीक्षा से हानियाँ या दोष

प्रोबेशन से समाज को कई तरह से हानियाँ भी हो सकती हैं। इससे समाज में कई तरह के दोष भी उत्पन्न होने लगते हैं, उनमें से निम्नलिखित मुख्य हैं -

1. भयंकर अपराधियों को भी मुक्तदान - राजनैतिक दबाव के कारण कभी-कभी भयंकर अपराधियों को भी प्रोबेशन के आधार पर छोड़ दिया जाता है। इससे समाज को फिर से व्यर्थ की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे अपराधी बजाय सुधरने के और भी ज्यादा मात्रा में बिगड़ते ही हैं।

2. आदती अपराधियों में वृद्धि सम्भव - यह बात सत्य है कि अपराध का कारण समाज की भिन्न-भिन्न तरह की परिस्थितियाँ होती हैं। अतः केवल अपराधी को छोड़ने से अपराध में कमी न हो सकेगी। हकीकत तो यह है कि अपराधों को रोकने हेतु भिन्न-भिन्न तरह की परिस्थितियों में उत्पन्न दोषों को समाप्त करना चाहिए। 

यदि केवल प्रोबेशन के आधार पर ही अपराधियों को छोड़कर अपराध की दर की कमी की आशा रखते हैं जो यह हमारी मूर्खता ही होगी, कोई विवेकपूर्ण बात नहीं। इससे तो अपराधी बार-बार छूटते रहेंगे और अन्त में आदतन अपराधी ही बनते रहेंगे।

3. प्रोबेशन अधिकारी में कमी होना - प्रोबेशन की सम्पूर्ण व्यवस्था प्रोबेशन अधिकारी की योग्यता पर ही निर्भर करती है। मगर आजकल के जमाने में तो ऐसे प्रोबेशन अधिकारियों की कमी है, जो अपराधियों में सुधार करने हेतु अपना सर्वस्व इसी प्रक्रिया में ही लगा दे। इससे भी अपराधी और भी अधिक मात्रा में अपराधों की ओर अग्रसर होंगे।

4. प्रोबेशन के बारे में पूर्ण सूचनाएँ एकत्रित न करना - आजकल के जमाने में प्रोबेशन की व्यवस्था को लागू करने से पहले प्रोबेशन की स्थिति की जाँच-पड़ताल करना भी जरूरी होता है। मगर ऐसा न होने के परिणामस्वरूप गलत अपराधियों को कानून के शिकंजे से मुक्ति मिलने लगती है।

परिवीक्षा और पैरोल में अन्तर

परिवीक्षा एवं पैरोल दोनों का सम्बन्ध अपराधियों के सुधार से है। परिवीक्षा एवं पैरोल में मौलिक अन्तर निम्नांकित हैं -

(i) परिवीक्षा अपराधी घोषित होने के बाद की अवस्था है। जबकि पैराल में अपराधी को सजा का कुछ भाग काटना होता है।

(ii) परिवीक्षा में अपराधी को दण्ड नहीं दिया जाता है। जबकि पैरोल में अपराधी को दण्ड दिया जाता है।  

(iii) परिवीक्षा न्यायालय द्वारा स्वीकृत किया जाता है। जबकि पैरोल में अपराधी का निरीक्षण प्रशासकीय बोर्ड के द्वारा किया जाता है।

(iv) दण्ड की दृष्टि से परिवीक्षा की अपेक्षा पैरोल में दण्ड की मात्रा ज्यादा रहती है। 

(v) परिवीक्षा अपराधी पर कोई एहसान नहीं होता है। जबकि पैरोल अपराधी पर एक प्रकार से एहसान है। दोनों इस आशा से दिए जाते हैं कि अपराधी भविष्य में उत्तम आचरण करेगा। 

(vi) परिवीक्षा में अपराधी का व्यक्तिगत निरीक्षण किया जाता है जबकि पैरोल में अपराधी का गहन निरीक्षण नहीं किया जाता है।

(vii) पैरोल में परिवीक्षा की अपेक्षा बॉण्ड, जमानत या हिरासत का अधिक महत्व है। संक्षेप में परिवीक्षा में अपराधी को सजा सुनाई जाती है, अपराधी सजा नहीं भुगतता है, जबकि पैरोल में अपराधी को सजा का कुछ भाग भुगतान होता है। तब अपराधी को छोड़ा जाता है।