राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में ग्रीन की देन तथा उसके महत्व पर प्रकाश डालिए।- rajnitik chintan ke itihas mein green ke din tatha uske mahatva ka varnan kijiye

ग्रीन के राजनीतिक दर्शन को योगदान एवं महत्व के बारे में वैपर ने लिखा है कि ग्रीन ने उदारवाद और आदर्शवाद के दोषों का संशोधन किया और उदारवाद को नैतिक तथा सामाजिक रूप प्रदान किया और आदर्शवाद को परिष्कार व परिमार्जन कर उसे सभ्य विचार में बदल दिया।

पुनः वैपर के ही शब्दों में ग्रीन की उपलब्धि यह है कि उसने अंग्रेजों को बेन्थमवाद से अधिक सन्तोषजनक सिद्धान्त दिया, उदारवाद को रुचि वाले विषय के स्थान पर एक विश्वास में बदल दिया, व्यक्तिवाद को नैतिक और सामाजिक आवरण पहना दिया एवं आदर्शवाद को शिष्ट तथा सुरक्षित बना दिया। कम-से-कम अँग्रेज लोग ग्रीन की इस उपलब्धि को तुच्छ नहीं समझेंगे । 

राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में ग्रीन की देन तथा उसके महत्व पर प्रकाश डालिए।

(1) उपयोगितावाद में संशोधन   - ग्रीन का महत्वपूर्ण योगदान, उपयोगितावाद में संशोधन है, बेन्थम के उपयोगितावाद में कुछ गम्भीर दोष हैं, जैसे- व्यक्ति को स्वार्थी बताया गया है और वह कोई कार्य केवल निजी सुख की दृष्टि से ही करता है, 

बेन्थम के उपयोगितावाद में व्यक्ति के नैतिक गुणों का उल्लेख नहीं है, कि उसमें त्याग, बलिदान जैसे श्रेष्ठ गुण भी हैं। बेन्थम ने राज्य के कार्यों की कसौटी केवल सुख और दुःख ही बताई है और वह इसके अलावा राज्य के कार्यों की और कोई सीमा निर्धारित नहीं करता है। 

जे. एस. मिल ने यद्यपि व्यक्ति के 'स्वसम्बन्धी' और 'पर सम्बन्धी'  कार्यों में अन्तर करते हुए कहा कि राज्य को व्यक्ति के केवल ‘पर सम्बन्धी कार्यों में ही हस्तक्षेप करना चाहिए, ऐसा कहकर मिल ने राज्य के कार्यों को सीमित करने का प्रयास किया, ।

परन्तु ग्रीन ने मिल के 'स्वसम्बन्धी' और 'पर सम्बन्धी अन्तर को ही भी स्वीकार नहीं किया, क्योंकि व्यक्ति के ऐसे कार्य नहीं हैं जिनका सम्बन्ध केवल व्यक्ति से है और दूसरों से नहीं है ।

ग्रीन ने बेन्थम और मिल के उपयोगितावाद में संशोधन करते हुए व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक तथा महत्वपूर्ण बाह्य कार्यों तथा आन्तरिक इच्छा से उत्पन्न होने वाले कार्यों में अन्तर किया है। 

इसी अन्तर द्वारा ग्रीन ने कहा कि राज्य अपनी शक्ति का प्रयोग करके, व्यक्ति से बाह्य कार्यों को करा सकता है, परन्तु आन्तरिक इच्छा से उत्पन्न कार्यों को नहीं। 

ग्रीन के इस विचार के बारे में वैपर ने लिखा है कि, "ग्रीन ने व्यक्ति को राज्य की शक्ति के अनुचित प्रयोग के विरुद्ध उससे कहीं अधिक प्रभावशाली संरक्षण दिया जो उपयोगितावाद उसे प्रदान कर सका था।"

(2) उदारवाद का संशोधन  - सेबाइन के अनुसार उदारवादी सिद्धान्त का जो संशोधन 1880 ई. के आगे के दो दशकों में ऑक्सफोर्ड के आदर्शवादियों द्वारा पूर्ण किया गया, उनमें टॉमस हिल ग्रीन कम-से-कम राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में सबसे प्रमुख था । 

ग्रीन की उदारवाद की पुनर्व्याख्या ने अर्थशास्त्र और राजनीति के उस स्पष्ट अन्तर को समाप्त कर दिया जिसके कारण पुराने उदारवादियों ने राज्य को आर्थिक कार्यों में हस्तक्षेप करने से पृथक् रखा था। पुनः सेबाइन के ही शब्दों में ग्रीन से पहले उदारवाद का सामाजिक दर्शन बड़ा संकीर्ण था और वह केवल एक वर्ग (पूँजीपति वर्ग) के हितों का ही प्रतिपादन करता था। 

ग्रीन ने उदारवाद को इतना विस्तृत कर दिया कि उसमें समाज के सभी महत्वपूर्ण हितों का समावेश हो सकता था और समस्त राष्ट्रीय समुदाय की कल्याण साधना हो सकती थी।

(3) आदर्शवाद का संशोधन - आदर्शवादियों (विशेषकर हीगल जैसे आदर्शवादियों) ने राज्य को ईश्वर तुल्य बताकर और व्यक्ति को प्रत्येक दशा में उसकी आज्ञा का पालन करने की बात कहकर, व्यक्ति के हितों को राज्य के लिए बलिदान कर दिया। 

आदर्शवादियों ने युद्ध का समर्थन करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय के बन्धन को कानून उसने दिया। ग्रीन जो कि स्वयं आदर्शवादी विचारक था, ठुकरा आदर्शवाद के मौजूदा रूप को स्वीकार नहीं किया । ग्रीन ने युद्ध को प्रत्येक दशा में अपूर्ण बताया और अन्तर्राष्ट्रीय कानून व विश्व बन्धुत्व में आस्था प्रकट की।

(4) व्यक्तिवाद का संशोधन  - ग्रीन की एक और महत्वपूर्ण देन, व्यक्तिवाद का संशोधन है। डॉ. वी. पी. वर्मा ने लिखा है कि, "ग्रीन के दर्शन की विशेषता यह है कि उसने व्यक्तिवाद के धरातल को नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टियों से प्रशस्त किया ।” 

उल्लेखनीय है कि ग्रीन से पहले व्यक्तिवाद का आधार उपयोगितावाद था, परन्तु ग्रीन ने व्यक्ति को भौतिक सुख का इच्छुक न मानकर अपनी आत्मा का विकास और समाज का हित करने वाला प्राणी बताया। 

इस प्रकार ग्रीन ने ईसाईयत और यूनानी दर्शन का समन्वय करके, मानव के जीवन का लक्ष्य पूर्णता की प्राप्ति बताया । ग्रीन ने प्राकृतिक अधिकारों का खण्डन करके व्यक्ति के अधिकारों की नई व्याख्या दी ।

(5) आदर्शवाद और व्यक्तिवाद का समन्वय - ग्रीन ने आदर्शवाद और व्यक्तिवाद का मिश्रण किया है। इन दोनों राजनीतिक दर्शनों की अच्छाइयों को लेकर इन्हें एक नवीन राजनीतिक दर्शन के रूप में प्रस्तुत करना ग्रीन की एक महत्वपूर्ण देन है। ग्रीन ने राज्य को साध्य नहीं माना है और न राज्य की सम्प्रभुता को निरंकुश । 

ग्रीन का प्रसिद्ध वाक्य है कि “राज्य का आधार इच्छा है, शक्ति नहीं।" ग्रीन के ऐसे विचारों के कारण ही बार्कर ने कहा है कि, "ग्रीन राज्य की सम्प्रभुता का आदर्शीकरण करने में नहीं फँसा है। वह प्लेटोवादी होने के बजाय अरस्तुवादी अधिक और हीगलवादी होने के बजाय काण्टवादी अधिक है । "

(6) ग्रीन के अन्य महत्वपूर्ण राजनीतिक विचार - ग्रीन ने राजनीतिक चिन्तन को दूसरे महत्वपूर्ण विचार अथवा सिद्धान्त भी प्रदान किये हैं। ग्रीन के स्वतन्त्रता अधिकार, राज्य, सम्प्रभुता, समाप्ति और विश्व बन्धुत्व के बारे में महत्वपूर्ण विचार प्रकट किया है।

(7) ग्रीन का वर्तमानकालीन लेखकों पर प्रभाव - ग्रीन के विचारों का प्रभाव जिन वर्तमान लेखकों पर पड़ा है, उस सम्बन्ध में कोकर ने लिखा है कि, "ग्रीन के अधिक मर्यादित विचारों का अनेक वर्तमानकालीन प्रसिद्ध लेखकों मुख्यतया इटली में बनेडेटो फ्रांस, इंगलैण्ड में सर हेनरी जोन्स, जॉन बॉटसन, जे. एस. मेकेजी, अरनेस्ट कार्कर, हर्नले, फिशर और अमेरिका में प्रो. हॉकिंग और नार्मन बाइल्ड ने अनुकरण किया है।

यह विचारक भी मानते हैं कि राज्य का उद्देश्य ऐसी सामाजिक अवस्थाओं को कायम रखना है जिनमें अच्छे स्वभाव वाले व्यक्ति की नैतिक तथा बौद्धिक उन्नति में कम से कम बाधाएँ हों। व्यक्तिगत सम्पत्ति का अस्तित्व इसलिए है किगी, वैसे-वैसे मनुष्य के बौद्धिक तथा नैतिक विकास में सहायक के रूप में स्वीकार किय, सकें । 

(8) ग्रीन का महत्व - राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में ग्रीन के सिद्धान्तों हों, विचारों का बड़ा महत्व है। बार्कर ने लिखा है कि, “ग्रीन ऊँची उड़ान लेने वाला आदर्शवादी एवं यथार्थवादी है। उसने जिन सामाजिक नीतियों का वर्णन किया है, उनको हम असंगतिपूर्ण मान सकते हैं और उनसे हमारा मतभेद हो सकता है, 

परन्तु जिन सिद्धान्तों का उसने प्रतिपादन किया है, वे अपने अमर सत्य के कारण महत्व से भरपूर हैं। व्यक्ति के मूल्य एवं गौरव का सम्मान, व्यक्ति की स्वतन्त्रता और अधिकारों का संस्मरण व्यक्ति को विशेष परिस्थितियों में राज्य का विरोध करने का अधिकार, युद्ध की अनुपयोगिता, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की कल्पना, विश्व शान्ति और विश्व बन्धुत्व का समर्थन, ग्रीन के इन सब सिद्धान्तों का आज भी उतना ही महत्व और औचित्य है, जितना कि 1879-80 में था, जबकि ग्रीन ने ऑक्सफोर्ड में इन पर अपने व्याख्यान दिये थे।

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि राजनीतिक चिन्तन में ग्रीन के विचारों एवं सिद्धान्तों का अत्यधिक प्रभाव है, महत्व है और राजनीतिक चिन्तन को महत्वपूर्ण देन है।

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