पठार किसे कहते हैं - pathar kise kahate hain

पठार पृथ्वी के महत्वपूर्ण स्थल रूपों में से एक हैं। ये भूमि के 33 प्रतिशत भाग को घेरे हैं। आर्थिक एवं जलवायु की दृष्टि से पठारों का विशेष महत्व प्राचीनकाल से ही बना रहा है। पठार सामान्यतः निकटवर्ती भागों से तेजी से ऊपर उठकर शीर्ष पर पुनः समतल रहते हैं।

अपरदन के प्रभाव से अधिकांश प्राचीन पठार अत्यधिक कटे-फटे एवं छोटे पठारों, ऊँचे-नीचे भागों एवं पहाड़ियों व उप-भागों में बँट जाते हैं, जैसे दक्षिणी भारत का पठार । सामान्यतः पठार खड़े ढाल वाले मेज की तरह के ऊपर उठे ऐसे भाग होते हैं जो कि निकटवर्ती धरातल से 180 मीटर से अधिक ऊँचे होते हैं।

सामान्यतः पठार पर्वतों से नीचे एवं मैदानों से ऊँचे होते हैं जिनकी औसत ऊँचाई 600 मीटर होती है किन्तु यह तथ्य सर्वदा उचित नहीं है क्योंकि अनेक पठार पर्वतों से भी ऊँचे हैं। यही मैदानों के साथ है, उदाहरणार्थ-संयुक्त राज्य अमेरिका का पीडमोण्ट मैदान से भी नीचा है।

होम्स के अनुसार, “पठार निकटवर्ती निम्न क्षेत्रों से अधिक ऊँचे एवं ऊपरी तल पर चौड़े भाग होते हैं।”

प्रिंच व ट्रिवार्था के अनुसार, “पठार सामान्य भूमि या तल से 150 मीटर या अधिक ऊँचाई वाले ऐसे हैं जिनके किनारों पर तेज ढाल होता है।"

वॉरसेस्टर के अनुसार, “पठार ऐसे उच्च-क्षेत्र या प्रदेश हैं जिनका ऊपरी भाग विस्तृत हो जाता है।" 

सविन्द्र सिंह के अनुसार, “भूपटल के वे स्थलखण्ड पठार कहलाते हैं जिनका कम से कम एक ओर का ढाल समीपी सतह या सागर-तट से अधिक ऊँचा एवं खड़े ढाल वाला हो तथा उसका ऊपरी भाग मेज की भाँति सपाट हो।”

विश्व के अधिकांश पठार 600 मीटर ऊँचे हैं, किन्तु कुछ पठार ऐसे भी हैं जो कि उच्च मैदानों से भी नीचे हैं। उदाहरणार्थ, हंगरी का मैदान एवं पश्चिमी संयुक्त राज्य का उच्च मैदान एक हजार मीटर से भी अधिक ऊँचे हैं। तिब्बत, बोलेविया, पामीर का पठार आदि विशेष ऊँचे पठार कई पर्वतमालाओं से भी अधिक ऊँचे हैं।

पठारों का वर्गीकरण

पठार धरातलीय, स्थलीय संरचना, स्थिति एवं उत्पत्ति के आधार पर अनेक प्रकार से विभाजित किये गये हैं। मोटे तौर पर पठारों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जा सकता है

1. उत्पत्ति के आधार पर 

विविध प्रकार से बने पठार प्रारम्भ से सरल संरचना वाले बने रहते हैं। बाद में हवा, हिमानी के अपरदन एवं अपक्षय के निरन्तर प्रभाव से उनमें काट-छाँट होती रहती है। 

इससे उनकी संरचना जटिल होती जाती है। यही नहीं, पठारों के धरातल में संशोधन अनाच्छादन की सम्मिलित क्रियाओं द्वारा होता है । उत्पत्ति के आधार पर बने पठार मुख्यतः अग्र प्रकार के हैं ।

भू संचलन क्रिया से बने पठार

महाद्वीपीय एवं वालनिक (पर्वत निर्माणकारी) शक्तियों के प्रभाव से पृथ्वी की सतह पर महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं इन्ही शक्तियों के प्रभाव से प्रचिन स्थल खणडो  का निर्माण एवं विकास हुआ।

जलीय क्रियाओं से विकसित पठार 

बहता हुआ ज जल भूतल पर अपरदन का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। इसके द्वारा ऊँचे भाग घिसकर नीचे होते रहे है। पर्वत कट छाँट कर जटिल व कठीन संरचना वाले पठारों  में बदलते जाते हैं। प्राचीन पठार पहाड़ियों की भांति बनने लगते हैं। उनके कई उप भाग बन जाते हैं। 

भारत विन्ध्य पठार एवं ब्राजील का पठार इसके उदाहरण है। डॉ. छिब्बर का मत है कि विन्ध्य पठार पूरी बलुआ पत्थर निर्मित है। नदियों द्वारा जमा किए गए अवसाद से स्थल भाग ऊंचा होता रहता है जो कलांतर में भुगर्भिक हलचलों के कारण निकट वर्ती क्षेत्र से ऊपर उठ जाता हैं। म्यमार में शान पठार तथा भारत में चेरा पूँजी का पठार ऐसे ही है।

वायु की क्रिया में विकसित पठार 

अर्द्ध शुष्क प्रदेशों या मरुस्थलों के उच्च प्रदेशों का विकास वायु की कटाव क्रिया के कारण उसे समतलप्रायः पठारी बनाते रहते हैं। मरुस्थल के पथरीले भाग इसके उत्तम उदाहरण हैं। सहारा का पठार, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का पथरीला ममस्थल, सऊदी अरब का हमादा शुष्क व पथरीला प्रदेश इसके उदाहरण हैं। 

इसी भांति शुष्क प्रदेशों की बाहरी सीमा पर मरूभूमि की महीन बालू के बराबर जमा होते रहने से उच्च लोयस पठारी भाग का विकास होने लगता है। स्वयं मरुस्थलों में बालू के प्रदेशों का सम्मिलित जमाव भी ऊबड़ खाबड़ पठार जैसे दृश्य विकसित कर देता है। पाकिस्तान के रावलपिण्डी, जिले में पोटवार का पठार एवं चीन में लोयस का पठार वायु विकमित पठार का उदाहरण है।

हिमानी की क्रिया से विकसित पठार

ठण्डे प्रदेशों में बहते हुए बर्फ अर्थात् महाद्वीपीय हिमान की क्रियाओं कटाव व जमाव से असमतल भाग भी समतल प्राय: नीचे पठार की भाँति विकसित हो जाते हैं। मध्य साइबेरिया का अंगारा का पठार एवं पश्चिमी व पूर्वी कनाडा में ऐसे ही पठार पूर्वकालीन हिमयूग के प्रभाव से विकसित होते रहे। लेब्राडोर का पटार एवं भारत में गढ़वाल का पटार दमके उत्तम उदाहरण हैं। 

(v) लावा उदगार से विकसित पठार 

विश्व के कुछ भागों में पैठिक या ताल लावा के बड़े क्षेत्रों में जमाव फेल जाने से भी पठारों का विकास हुआ है इन्हें उत्स्यन्द पठार कहा जाता है। भारत में टकन या दक्षिणी भारत का लावा का या काली मिट्टी का पठार संयुक्त राज्य में कोलम्बिया का पठार इसके उत्तम उदाहरण हैं । ऐसे पटारों के विकास के समय भूमि पर बनी दरारों से लावा निकलकर निचली घाटियों को भर देता है एवं सारा भाग उठे समतलप्राय: पटार की भाँति हो जाता है। 

2. स्थिति के आधार पर

स्थिति के आधार पर पटारों के मुख्यातः निम्नलिखिल प्रकार हैं।

(i) अन्त:पर्वतीय पठार 

जब कोई पठारी भाग चारों ओर से ऊँचे पर्वतों से घिरा हो तो उसे अन्त:पर्वतीय पठार कहते हैं। विश्व के प्रायः सभी महाद्वीपों में ऐसे पठार पाये जा सकते हैं। सबसे अधिक मध्य एशिया में ऐसे पठारी भाग या अन्त बेसिन पाये जाते हैं। 

तिब्बत का पठार विश्व का सबसे ऊँचा अन्त पर्वतीय पठार है। इसी भाँति दक्षिणी अमेरिका का बोलिविया का पठार, उत्तरी अमेरिका का मैक्सिको एवं ग्रेट बेसिन का पठार एवं एशिया के मध्यवर्ती भाग के अन्य आन्तरिक पठार इसके विशेष उदाहरण है। 

(ii) पर्वतपदीय पठार 

जिन पठारों के एक ओर ऊँचे पहाड़ फैले हों एवं उनका बाहरी भाग मैदान या निम्न प्रदेश होता है उन्हें पर्वतपदीय पठार कहते हैं । अप्लेशियन के पूर्व का पीडमोण्ट पठार,कोलोरेडो का पठार (दक्षिणी-पश्चिमी संयुक्त राज्य) एवं दक्षिणी अमेरिका का पेटागोनिया का पठार इसके उत्तम उदाहरण हैं।

(iii) महाद्वीपीय पठार  

ऐसे पठारों की उत्पत्ति पृथ्वी की आन्तरिक गतियों (पटल विरूपण शक्तियों) से होती है। स्पेन का मेसेटा का पठार, सऊदी अरब एवं दक्षिणी भारत के

कहलाता है जैसे–दण्डकारण्य का पठार (आन्ध्र प्रदेश) तट से कुछ ही दूरी पर फैले हैं। इसी भाँति हिन्दचीन का एवं पूर्वी ब्राजील का पठार इसके अन्य उदाहरण हैं।

दक्षिण का पठार इसके छोटे पैमाने पर विकसित महाद्वीपीय पठार हैं। अफ्रीका का पूर्वी पठार एवं पश्चिमी आस्ट्रेलिया का पठार इसके विशेष उदाहरण हैं।

(iv) तटीय पठार 

जब समुद्र तट के किनारे ऊँचे पठारी भाग का विकास हो तो वह तटीय पठार कहलाता है । जैसे दण्ड कारण्य का पठार (आन्ध्रप्रदेश) व तमिलनाडु का पठार दक्षिणी भारत के पूर्वी भाग के हिन्द चीन का एवं पूर्वी ब्राजील का पठार इसके अन्य उदाहरण है।

3. जलवायु के आधार पर इसके अन्तर्गत 

(i) हिम पठार  हिमाच्छादित या ठण्डे प्रदेशों के पठारों में जैसे अण्टार्कटिक एवं ग्रीनलैण्ड का पठार आते हैं। 

(ii) शुष्क पठार शुष्क प्रदेशों के पठारों में मरुस्थलों में स्थित पठार जैसे सऊदी अरब का पठार,पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया का पठार, गोबी का पठारी मरुस्थल एवं मध्य सहारा के पठारी भाग आते हैं । 

(iii) आर्द्र पठार आर्द्र प्रदेशों के पठार अधिक वर्षा वाले उष्ण व उष्ण शीतोष्ण प्रदेशों में पाये जाते हैं। यहाँ बहता जल सारे भू-भाग को काट-छाँट कर उसे विशेष जटिल बना देता है । पूर्वी भारत का शिलांग पठार एवं छोटा नागपुर का पठार, सूडान प्रदेश के पश्चिम का पठार एवं गिनी तट के आर्द्र पठारी भाग इसके विशेष उदाहरण हैं।

4. आकृति के अनुसार 

पठार मुख्यतः निम्नांकित प्रकार के होते हैं 

(i) गुम्बदाकार पठार , 

वलन की क्रिया द्वारा जल मध्य का भाग ऊँचा हो जाता है तथा किनारे के भाग गोलाकार होते हैं तो उन्हें गुम्बदाकार पठार कहा जाता है। ये प्रायः छोटे क्षेत्र में फैले होते हैं। इनका बाह्य रूप गुम्बद के समान गोलाकार होता है। मध्य मिसिसिपी बेसिन में स्थित ओजार्क का पठार, झारखण्ड का पलामू का पठारी भाग इसके उदाहरण हैं ।

(ii) कटा-फटा पठार  

जब कोई पठार जल या वायु की अपरदन क्रिया एव अपक्षय के सम्मिलित प्रभाव से अत्यधिक कट-छंट जाता है तो वह विषम या जटिल रचना वाला बन जाता है तो उसे कटा-फटा या विच्छेदित पठार कहा जाता है। मध्य प्रदेश का पूर्वी पठारी भाग, छोटा नागपुर का पठार, हिन्दचीन का पठार ऐसे ही उदाहरण हैं। प्रायः आर्द्र प्रदेशों में ऐसे पठार पाये जाते हैं ।

(ii) सीढ़ीनुमा पठार 

जब किसी पठार का ढाल एक ही दिशा में रुक-रुककर तेज हो जाता है तो सोपान (विशाल सीढ़ियाँ) बनते जाते हैं। अत: इसे सोपान वाले पठार भी कहते हैं । पश्चिमी संयुक्त राज्य का उच्च मैदान वास्तव में सीढ़ीनुमा पठार है । दक्षिणी अफ्रीका का कारु का पठार (छोटा एवं बड़ा कारु) इसके अन्य उदाहरण हैं। भारत में विन्ध्य का पठार इसका स्थानीय उदाहरण है

(iv) सपाट पठार 

जिन पठारों पर बहुत कम उच्चावच होता है, उन्हें सपाट पठार कहते हैं। इसका स्थानीय उदाहरण तिब्बत का पठार है

(v) पुनर्युवनति पठार 

यदि पठार जीर्णावस्था प्राप्त करने के बाद पुन ऊपर उठ जाय तो वह पुनर्युवनित पठार कहलाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में मिसौरी का पठार तथा भारत में राँची का पठार इसके उत्तम उदाहरण हैं।

विश्व के प्रमुख पठार

(1) ग्रीनलैण्ड का पठार

अटलाण्टिक महासागर के उत्तरी भाग में लगभग 21,75,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में हिम से ढका विशाल पठार है, जिसे ग्रीनलैण्ड का पठार कहते हैं । संरचनात्मक दृष्टि से ग्रीनलैण्ड लॉरेन्शियल शील्ड का ही विस्तार है और एक विस्तृत व ऊबड़-खाबड़ पठार है। इसका निर्माण पूर्व कैम्ब्रियन नीस और ग्रेनाइट शैलों से हुआ है । यह उत्तर से दक्षिण 2,650 किलोमीटर लम्बा और पूर्व से पश्चिम अधिकतम 1,200 किलोमीटर चौड़ा है। इसकी तटरेखा 39,310 किलोमीटर लम्बी है ।

(2) अलास्का का पठार

इसे यूकन का पठार भी कहते है, क्योंकि इसका निर्माण यूकन और उसकी सहायक नदियों द्वारा किया गया है । कनाडा की ओर इसकी ऊँचाई लगभग 900 मीटर है। इसके उत्तर की ओर 1,200 मीटर ऊँची अलास्का रेंज है। यहाँ का मुख्य क्षेत्र सीवर्ड प्रायद्वीप है। तटरेखा के समीप अनेक लैगून झीलें पाई जाती हैं। इस पठार का ढाल पश्चिम की ओर है ।

(3) कोलम्बिया का पठार 

यह संयुक्त राज्य अमेरिका के ओरेगन,वाशिंगटन और इडाहो राज्यों के मध्य स्थित है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 4,62,500 वर्ग किलोमीटर है जो लगभग 1,800 मीटर ऊँचा है। इसके मध्य में अनेक क्रियाशील ज्वालामुखी पाये जाते हैं ।

(4) ग्रेट बेसिन का पठार 

यह कोलम्बिया पठार के दक्षिण में कोलोरेडो और कोलम्बिया नदियों के मध्य 5,25,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। इसका विस्तार ओरेगन, नेवादा यूटाह और इडाहो राज्यों में पाया जाता है, यह अन्तःप्रवाह क्षेत्र है, इस भू-भाग की छोटी-छोटी नदियाँ 'साल्ट लेक' में गिरती हैं। इस महान बेसिन के समीपवर्ती भाग के चारों ओर तीव्र ढाल वाले पर्वत स्थिर हैं, जिनके मध्य सीधे खड़े किनारों वाली गहरी घाटियाँ हैं, जिनमें मृत घाटी सबसे अधिक गहरी है

(5) कोलोरेडो का पठार 

यह पठार ग्रेट बेसिन के दक्षिण में स्थित है इसका विस्तार यूटाह और ऐरिजोना राज्यों में पाया जाता है । सम्पूर्ण पठारी भाग 1,500 मीटर से 3,000 मीटर तक ऊँचा है। इस पठार के मध्य कोलोरेडो नदी बहती है, जो संसार की सबसे गहरी घाटी का निर्माण करती है। अतः कोलोरेडो नदी के अनेक खड्ड बन गए हैं, जो विश्व प्रसिद्ध 1.5 किलोमीटर गहरी ग्राण्ड कैनियन खड्ड-घाटी का निर्माण करती है ।

(6) मैक्सिको का पठार

यह पठार पश्चिमी सियरामाद्रे और पूर्वी सियरामाद्रे पर्वत-श्रेणियों के मध्य स्थित है। इसके पूर्व में लावा निर्मित पठार पाये जाते हैं। इन पठारों को नदियों में अनेक स्थान पर काट दिया है जिसके परिणामस्वरूप अनेक गहरी कन्दराओं का निर्माण हो गया। यहाँ पर ज्वालामुखी प्रवाह की कठोर शैलें पाई जाती हैं । इसे ज्वालामुखी पठार भी कहते हैं ।

(7) चियापास का पठार 

चियापास का पठार दक्षिणी मैक्सिको में प्रशान्त महासागर के तट पर स्थित है। इस पठार के दक्षिण-पश्चिम में तेहुआन्टेपेक की खाड़ी और पूर्व में ग्वाटेमाला, उत्तर में तबास्को और पश्चिम में वेराक्रज और ओकस्का स्थित हैं । यह उपजाऊ शीतोष्ण पठार है।

(8) बाजील का पठार 

दक्षिणी अमेरिका के मध्य पूर्वी भाग में ब्राजील का पठार त्रिभुजाकार रूप में विस्तृत है। उत्तर-पूर्व में केप राक से प्रारम्भ होकर दक्षिण में रियो ग्रेडो डी सुल तक इसका विस्तार है। उत्तरी पार्श्व लम्बी संकरी घाटियों से कट-छंट गया है और पश्चिमी पार्श्व में मदेरिया तथा पराग्वे नदियों की घाटियाँ हैं। 

पठार का मध्य पूर्व भाग अत्यन्त कठोर वलित चट्टानों से निर्मित होने के कारण अभी तक क्षय से बचा हुआ है। यह पठार खनिज सम्पदा के दृष्टिकोण से अत्यन्य धनी है।

(9) बोलिविया का पठार 

बोलिविया राज्य में एण्डीज पर्वतमाला में एक ऊँचे उठे हुए पठार के सादृश्य है जिसके दोनों ओर ऊँची श्रेणियाँ हैं। पश्चिम की ओर पेरु की मध्यवर्ती पर्वतमाला का भाग है, जो दक्षिण में चिली की ओर चली जाती है तथा पूर्व में पेरु की कार्डिलेरा डेकटाबाया का भाग है, जो अविच्छिन्न रूप में है। यह पठार 800 किलोमीटर लम्बा है और 128 किलोमीटर चौड़ा है। इसकी औसत चौड़ाई 3,110 मीटर है।

(10) मेसेता का पठार 

स्पेन में आइबेरियन प्रायद्वीप पर मेसेता का पठार स्थित है, जिसकी सीमाएँ ऐतिहासिक कासिल शासन के बराबर हैं। इस पठार की औसत ऊँचाई लगभग 610 मीटर है। यह चारों ओर पर्वतों से घिरा है।

(11) तिब्बत का पठार 

यह पठार हिमालय पर्वत के उत्तर और क्युनलुन पर्वत के दक्षिण में 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसके पूर्व में सीक्यांग और पश्चिम में हिन्दुकुश में तथा कराकोरम की श्रेणियाँ स्थित हैं।

(12) मंगोलिया का पठार

यह चीन के उत्तरी मध्य भाग में मंगोलिया गणराज्य में स्थित है। यह एक शुष्क पठार मंगोलिया के पूर्वी भाग में स्थित है, जो बहुत ऊँचा-नीचा है। इसके पूर्व की ओर वृहत् खिंगन श्रेणी का दक्षिण भाग स्थित है। मिनशान तथा होलान पर्वत इसके मध्य में स्थित । इसका पूर्वी भाग पूर्णतः मरुस्थलीय है।

(13) युन्नान-इण्डोचीन का पठार

दक्षिणी एशिया के पूर्वी प्रायद्वीप पर यह पठारी प्रदेश स्थित है। इसके अन्तर्गत म्यांमार का शान प्रदेश, दक्षिणी-पश्चिमी चीन तथा थाईलैण्ड, वियतनाम तथा लाओस देश सम्मिलित हैं। इस पठार पर कठोर प्राचीन शैलें पाई जाती हैं। 

इन भाग पर सालबिन, सीक्यांग, मीकांग, मीनाम आदि नदियाँ प्रवाहित होती हैं, जिन्होंने इसे कटे-फटे पठार के रूप में परिवर्तित कर दिया है और गहरी व संकीर्ण घाटियाँ बना दी हैं । पठार के मध्य भाग में चूना पत्थर की शैलें भी पाई जाती हैं।

(14) ईरान का पठार 

ईरान का लगभग आधा भाग पठारी है। इसे एशिया माइनर का पठार या ईरान का मध्यवर्ती पठार भी कहते हैं। इसकी औसत ऊँचाई 900 से 1,500 मीटर के मध्य है। इस अन्तःपर्वतीय पठार की संरचना अनेक आन्तरिक बेसिनों से हुई है। 

तृतीय कल्प के पूर्व यहाँ झील थी, जो सूखकर बेसिन बन गई। पठार पर लावायुक्त मिट्टी व अनेक खनिज पदार्थ पाये जाते हैं । तेहरान इसी भाग में स्थित है।

(15) अरब का पठार

यह दक्षिण-पश्चिम एशिया में स्थित है। इस पठार में पूर्व में फारस की खाड़ी, दक्षिण में अरब सागर, पश्चिम में लाल सागर और उत्तर-पश्चिम में स्थित हैं। इस पठार का ढाल दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है। यह पठार प्राचीन कठोर शैलों से निर्मित भूमध्य है। 

शुष्क होने के कारण पत्थरों की टूट-फूट से यहाँ पर मोटी बालू बन गई है, जिसके बड़े-बड़े टीले यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होते हैं। 

(16) अनातोलिया का पठार

टर्की में पोन्टिक एवं टारस श्रेणियों के मध्य एजियसे आर्मीनिया गाँठ तक अनातोलिया का पठार विस्तृत है, इसे टर्की का पठार भी कहते हैं। यह रदार है। इसकी औसत ऊँचाई 800 मीटर है। इसके बीच-बीच में ज्वालामुख निक्षेप के कारण अनेक उभरी जा कृतियाँ निर्मित हो गई हैं। ।

(17) दकन का पठार 

यह पठार दक्षिण भारत में स्थित है। यह प्राचीन शैल • निर्मित है और प्राचीन भूखण्ड गोण्डवानालैण्ड का अंग है। इसे तीन ओर से प्राचीन पर्वत-श्रेणियों ने घेर इसके पूर्व में पूर्वाधाट और पश्चिम में पश्चिम घाट की श्रेणियाँ हैं। इसके उत्तर में विंध्याचल और सतपुड़ा की श्रेणियाँ है।

(18) अबीसीनिया का पठार 

यह पठार पूर्वी अफ्रीका के इथियोपिया एवं सोमालिया में विस्तृत है। जुरासिक में टशियरी युग तक यह अनेक भूगर्भिक हलचलों से प्रभावित हुआ इसी के परिणामस्वरूप यहाँ पर दरार घाटी का निर्माण हुआ है। यह दरार घाटी दक्षिण में रुडोल्फ झील से प्रारम्भ होती है। इस भाग में स्टेकोनी, अवाया, अबूसा आदि झीलें हैं ।

(19) दक्षिणी अफ्रीका का पठार

इस पठार के अन्तर्गत दक्षिण अफ्रीका केप राज्य, नेटाल, बसूतोलैण्ड का भाग आता है । यह पठार लगभग समतल है । इस पठार की औसत ऊँचाई केन्द्रीय भाग को छोड़कर हर स्थान पर 1,200 मीटर से अधिक है । पठार के पश्चिमी, दक्षिणी एवं पूर्वी भागों का ढाल केन्द्रोन्मुख है।

(20) मेडागास्कर का पठार 

मेडागास्कर द्वीप अफ्रीका के दक्षिण-पूर्व में हिन्द महासागर में स्थित है। इस द्वीप का मध्यवर्ती भाग पठारी है, जो मेडागास्कर या मैलागासी के पठार के नाम से विख्यात है। इस पठार की औसत ऊँचाई 1,000 से 1,500 मीटर के मध्य है।

(21) ऑस्ट्रेलिया का पठार 

आस्ट्रेलिया के लगभग आधे पश्चिमी भाग में आस्ट्रेलिया का पठार विस्तृत है। यह भौमिकीय संरचना और उच्चावच की दृष्टि से लगभग एक-सा है यहाँ पर आग्नेय शैलें पाई जाती हैं। इसकी सामान्य ऊँचाई 180 से 600 मीटर के मध्य है। 

पठारों का महत्व

पठार अनेक प्रकार से मानव जीवन एवं उसके क्रियाकलापों को प्रभावित करते रहते हैं। यह प्रभाव प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के कहे जा सकते हैं । 

(i) जलवायु में संशोधन

उष्ण प्रदेशों में ऊँचे पठारी भाग असहनशील जलवायु को सुधार कर उसे सुखद बना देते हैं। पूर्वी अफ्रीका एवं मैक्सिको का पठार ऊँचाई के कारण ही विशेष उपयोगी बन सके हैं। ऐसे ऊँचे पठारी भागों में अनेक भ्रमण के या पर्यटन केन्द्र भी विकसित हो जाते हैं। 

शीतशीतोष्ण प्रदेशों के पठार एवं बहुत ऊँचे पठार मानव बसाव के लिए उपयोगी नहीं हैं, अत: वह निर्जन पाये जाते हैं। 

(ii) खनिजों की अधिकता

विश्व के प्राचीन पठारों में कई स्थानों पर अनेक बहुमूल्य धातु व अधातु खनिज एवं शक्ति के साधन पाये जाते हैं । ब्राजील का पठार, दक्षिणी भारत का पठार, दक्षिणी-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया का पठारी भाग अनेक प्रकार के धातु व अधातु खनिजों के भण्डार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इसी भाँति नाइजीरिया एवं सऊदी अरब के पठारी भाग की सीमा पर खनिज तेल के विशाल भण्डार पाये जाते हैं ।

(iii) पशु-पालन एवं कृषि

एशिया के अधिकांश पठारी भाग यहाँ के जाने-माने पशुपालन के प्रदेश रहे हैं। आज भी यहाँ अब स्थायी एवं विकसित डेयरी व्यवसाय तथा माँस उद्योग हेतु पशु पाले जाते हैं। पैटागोनिया एवं ऑस्ट्रेलिया के पठारी भाग भेड़ पालन में, पूर्वी अफ्रीका एवं ब्राजील का पठार माँस हेतु पशु-पालन में विशेष प्रसिद्ध हैं। 

मैक्सिको व ब्राजील का पठार पेय पदार्थों व फलों के लिए, सूडान के गिनी तट का पठारी भाग कोको, रबड़, उष्ण कटिबन्धीय फलों की कृषि के लिए, दक्षिणी भारत का लावा का पठार गन्ना व कपास के लिए एवं हिन्दचीन का पठार चावल की कृषि के लिए विशेष प्रसिद्ध होते जा रहे हैं। 

(iv) जनसंख्या की विरलता

पठारी भागों का धरातल ऊबड़-खाबड़ होता है, ऊँचे पठारों की जलवायु अधिक ठण्डी होती है। शुष्क प्रदेशों के पठार प्रायः संसाधन-विहीन होते हैं। इसी कारण अधिकांश पठारों की मानव भरण-पोषण क्षमता सीमित ही रहती है। 

अतः विश्व के अधिकांश पठारी भाग कम बसे या प्रतिकूलता बढ़ने पर निर्जनप्राय: हैं जैसे बोलिविया व तिब्बत का पठार ठण्ड के कारण,मध्य सहारा एवं पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया शुष्कता के कारण निर्जनप्रायः हैं।

(v) वनस्पति की विविधता 

विश्व के सामान्य से आर्द्र जलवायु वाले पठारों पर अनेक प्रकार की उपयोगी वनस्पति पाई जाती है। यहाँ पर अनेक प्रकार के वन एवं विस्तृत घास के मैदान पाये जाते हैं । 

सूडान, सवाना व पूर्वी अफ्रीका का पठार, पैटागोनिया एवं पूर्वी ऑस्ट्रेलिया का बेसिन उच्च प्रदेश विश्व-प्रसिद्ध घास के मैदान हैं । ये पशु-पालन के लिए प्रसिद्ध हैं। 

अफ्रीका, भारत, पूर्वी ब्राजील के पठारी भागों पर अनेक प्रकार की उपयोगी लकड़ियों के वन पाये जाते हैं। भारत की सागौन दक्षिण के पठार पर ही पायी जाती है। 

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