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अज्ञेय की कविता की व्याख्या - agey ki kavita

सबेरे उठा तो धूप खिली थी कविता

1. उस अनदेखे अरूप ने कहा : हाँ, 
क्योंकि ये ही सब चीजें तो प्यार हैं
यह अकेलापन, यह अकुलाहट, 
यह असमंजस, अकचकाहट, आ अनुभव, 
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय विरह व्यथा, 
यह अन्धकार में जाग कर सहसा पहचानना कि 
जो मेरा है वही ममेतर है
यह सब तुम्हारे पास है 
तो थोड़ा मुझे दे दो-उधारइस एक बार
मुझे जो चरम आवश्यकता है। 
उसने यह कहा, 
पर रात के घुप अँधेरे में 
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूँ 
अनदेखे अरूप को 
उधार देते मैं डरता हूँ : 
क्या जाने यह याचक कौन है ? 

संदर्भ - पूर्ववत्।

प्रसंग - कवि प्रस्तुत पंक्तियों में प्यार की उधारी का अर्थ प्रकट कर रहा है।

व्याख्या - कवि से अंधेरे में वह अरूप कहने लगा कि यह अकेलापन, यह अकुलाहट, असमंजस, अकचकाहट, चिल्लाहट, अनुभव आदि सभी तो प्यार हैं। यही सब मैं तुमसे माँग रहा हूँ। जीवन की निरन्तर जारी रहने वाली खोज यह अन्तर्मन का दुहरापन यह एकांतिक विरह की कहानी यह सभी प्यार है। कवि अंधकार में यह सोचने लगा कि जो मेरा है वही किसी और का भी है मेरा अकेले का इस पर अधिकार नहीं है, इसलिए यह अरूप इसे कुछ समय के लिए ही सही उधार के रूप में माँग रहा है। वह अरूप कहता है कि मुझे इन सभी की अत्यन्त आवश्यकता है।

रहा, क्योंकि वह इस अनदेखे अरूप को कवि रात के घुप अंधेरे में सहमा हुआ चुप उधार देने से डरता है, पता नहीं यह उधार माँगने वाला कौन है! 

विशेष

(1) कवि का वैचारिक प्रवाह दृष्टव्य है। 
(2) अनुप्रास अलंकार दृष्टव्य है। 

2. सबेरे उठा तो धूप खिलकर छा गयी थी। 
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गयी थी। 
मैंने धूप से कहा: मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार
चिड़िया से कहा : थोड़ी मिठास उधार दोगी? 
मैंने घास की पत्ती से पूछा : तनिक हरियाली दोगी
तिनके की नोंक-भर?

संदर्भ - प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ कवि 'अज्ञेय' की कविता 'सबेरे उठा तो धूप खिली थी' से अवतरित है।

प्रसंग - इन पंक्तियों में कवि ने प्रातःकालीन बेला का अत्यन्त सुन्दर वर्णन प्रस्तुत किया है। व्याख्या - कवि कहता है कि एक दिन प्रातः जब वह सोकर उठा तो धूप निकल आई थी। अर्थात् सूर्योदय हो चुका था। पक्षी चहचहाने लगे थे। एक चिड़िया घर आकर अपनी भाषा में गीत सुना गई थी। 

कवि ने यहाँ मानवीकरण करते हुए कहा है कि उन्होंने धूप से कहा कि क्या मुझे कुछ गरमाई उधार दे सकोगी ? और चिड़िया से उसके गीतों की कुछ मिठास उधार माँगी । कवि ने घास की पत्ती से भी कुछ हरियाली उधार माँगी। वह हरियाली की मात्रा को तिनके की नोंक भर बाताता है।

विशेष

(1) अज्ञेयजी का प्रकृति-चित्रण द्रष्टव्य है।
(2) भाषा में चित्रात्मकता है। 
(3) प्रतीक विधान एवं बिम्ब विधान सुन्दर बन पड़ा है। 

3. शंखपुष्पी से पूछा : उजास दोगी-किरण की नोंक-भर ? 
मैंने हवा से माँगा : थोड़ा खुलापन-बस एक प्रश्वास,
लहर से एक रोम की सिहरन-भर उल्लास।
मैंने आकाश से माँगी 
आँख की झपकी-भर असीमता-उधार।

सन्दर्भ - प्रसंग - पूर्ववत्।

व्याख्या - कवि शंखपुष्पी से पूछता है कि क्या किरण की नोंक भर अर्थात् अल्प रूप से उजाला उधार दे सकोगी। कवि कहता है कि मैंने इस प्रातःकालीन बेला में हवा से थोड़ा खुलापन माँगा और दीर्घ शान्ति प्रदान करने वाली श्वास माँगी। कवि ने लहर से भी कुछ प्रसन्नता माँगी । कवि ने आकाश से भी आँख की झपकी भर असीमता उधार माँगी।

4. सबसे उधार माँगा, सब ने दिया। 
यो मैं जिया और जीता हूँ 
क्योंकि यही सब तो है जीवन
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला, 
गन्धवाही मुक्त खुलापन, लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह, 
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का। 
ये सब उधार पाये हुए द्रव्य।

संदर्भ- पूर्ववत्। 

प्रसंग - प्रस्तुत पद्यांश में कवि मानव हृदय की विशेषताओं का साम्य प्रकृति से स्थापित करते हुए उन्हें उधार माँगने की बात कहते हैं।

व्याख्या - कवि प्रकृति को वृहद् सन्दर्भ में देखते हुए सफल व सुखद जीवन के लिये प्रकृति से उसके गुण उधार माँगते हैं और पाते भी हैं वे कहते हैं कि प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं के सहारे ही जी रहा हूँ। जीवन की गर्माहट, मिठास, खूबियाँ, ताजगी, प्रकाश, स्वतन्त्रता, उल्लास, उमंग, जीवन का प्रवाह, ज्ञान, जीवन का विस्तार, भव्यता सब उधार में मिले हैं।

विशेष

(1) प्रकृति व जीवन की साम्यता। 
(2) व्यापक चिन्तन। 
(3) जीवन की व्याख्या। 

5. रात के अकेले अन्धकार में 
सामने से जागा जिसमें 
पार कर मुझसे पूछा था क्यों जी, 
तुम्हारे इस जीवन के 
इतने विविध अनुभव हैं। 
इतने तुम धनी हो, 
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे उधार, 
जिसे मैं सौ गुने सूद के साथ लौटाऊँगा - 
और वह भी सौ-सौ बारी गिन के 
जब-जब आऊँगा ? 
मैंने कहा : प्यार ? उधार ? 
स्वर अकचकाया था, क्योंकि मेरे 
अनुभव से परे था ऐसा व्यवहार। 

संदर्भ - पूर्ववत् ।

प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने प्रकृति के सभी अवयवों से कुछ न कुछ उधार माँगा और जब उससे किसी ने प्यार उधार माँगा तो वह अकचका गया।

व्याख्या - कवि कहता है कि मैंने जिस-जिस से उधार माँगा उस - उसने मुझे उधार दिया। मैं इसी प्रकार अपना जीवन व्यतीत करता रहा क्योंकि प्रकृति से उधार लेकर जीना ही जीवन है। इस जीने में गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला, सुगंधित हवा, खुलापन सभी सम्मिलित हैं। 

कवि कहता है कि इसी समय रात के अंधकार होने पर मैं थोड़ी देर के लिए जागा तो किसी अरूप ने मुझसे कहा कि क्योंकि तुम्हारे इस जीवन के इतने अधिक रूप हैं, बहुत से अनुभव हैं तुम इनकी दृष्टि से बहुत अधिक धनी हो तो क्या तुम मुझे इनमें से थोड़ा-सा प्यार उधार दे सकोगे।  

यदि दे 'सकोगे तो मैं उन्हें सौ गुने ब्याज के साथ उसे वापस कर दूँगा। कवि ने कहा प्यार वह भी उधार ? कविसरूप से ऐसा प्रश्न सुनकर अचकचा उठा क्योंकि प्यार उधार माँगने की बात उसने यहाँ पहली बार किसी के मुँह से सुनी थी।

विशेष

(1) प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। 
(2) भाषा चित्रमय है।

साम्राज्ञी का नैवेद्यदान कविता

1. हे महाबुद्ध ! 
अर्पित करती हूँ तुझे
वहीं वहीं प्रत्येक भरे प्याला जीवन का, 
वहीं वहीं नैवेद्य चढ़ा 
अपने सुन्दर आनन्द - निमिष का, 
तेरा हो 
हे विगतागत, वर्तमान के पद्म कोश । 
हे महाबुद्ध!

सन्दर्भ - पूर्ववत्।

प्रसंग - प्रस्तुत कविता में कवि ने प्राचीन जापान की साम्राज्ञी कोमियों के अन्तर्द्वन्द्व के चरम क्षण और अस्तित्त्ववादी जीवन-दर्शन के आधार पर उसका परिहार प्रस्तुत करने का बड़ा ही कलात्मक प्रयत्न किया है। साम्राज्ञी समतावादी, अहिंसक, सत्य, प्रेम, भाईचारे का संदेश देने वाले, मुक्ति के अन्वेषण में मानव जीवन के परम पुरुषार्थ खोजने वाले भगवान बुद्ध की प्रतिमा को अर्पित कर पाने के योग्य कोई भी जागतिक पदार्थ उपयुक्त नहीं मानती। 

उसमें उसे भावनात्मक के स्तर पर हिंसा के दर्शन होते हैं जो कि बौद्ध भावना के सर्वथा विपरीत है। अतः संसार का जो फूल, जो कवि जहाँ, जिस भी रूप से अवस्थित है, उसे उसी रूप में, वहीं पर स्वीकार करने का निवेदन करते हुए, वह भगवान बुद्ध से निवेदन करते हुए, अत्यधिक भावविह्वल स्तरों में कोमियों कहती है। 

व्याख्या - हे महाबुद्ध ! जहाँ कहीं भी जीवन का विकसित स्वरूप विद्यमान है, जीवन के समूचे सुख एवं आनन्द भाव से वह सब आपको वहीं समर्पित है। जीवन का प्याला जहाँ-कहीं भी आनन्द सुख से लबरेज है, सब जगह वह स्वयं ही नैवेद्य के रूप में आपको समर्पित है।

अर्थात् जहाँ-कहीं भी वास्तविक सुख से, आनन्द से पूरित सब प्रकार के प्राणी हैं, पदार्थों का जीवन या जीवन्त स्वरूप विद्यमान है, वह सब आप ही के द्वारा तो प्रदत्त हैं । अतः अलग से आपको कुछ अर्पित करना कोई अर्थ और महत्त्व नहीं रखता। 

जीवन में अपने प्रत्येक सुन्दर और आनन्द-दायक पल को प्रत्येक पदार्थ - प्राणी स्वयं ही समर्पण कर रहा है। अतः पुष्पादि कुछ अर्पित करना प्रयोजन से परे है। आप अपने समग्र व्यक्तित्व एवं कृतित्व में विश्व के भूत और भविष्य तो हैं नहीं, वर्तमान को अपने में अन्तर्निहित किये हुए शत-दल कमल भी हैं। 

भूत, वर्तमान और भविष्य में पुष्प के रूप में जो कुछ भी खिल-खिला रहा है या खिलेगा, वह सब आपका अपना ही व्यक्त स्वरूप और व्यक्तित्व है, फिर वह स्वयं ही आपको समर्पित भी है। अतः मेरे द्वारा दूसरों के पुरुषार्थ से अर्जित, संचित पुष्पाकर्षण तनिक भी महत्व नहीं रखता हैं।

विशेष

(1) भावना और प्रवृत्ति के स्तर पर, बुद्ध के रूप में, जो कुछ भी विश्व में है, उन सबको शाश्वत स्वीकार किया गया है। उसे स्वतः ही सारूपमान और समर्पित भी बताया गया है। 

(2) बौद्ध मत का अहिंसा आदि से सम्बन्धित सैद्धान्तिक पक्ष यहाँ भी स्पष्टतः उजागर है । अस्तित्ववादी और क्षणवादी जीवन-दर्शन भी स्पष्ट है, विशेषतः इन शब्दों में - अपने सुन्दर आनन्द निमिष का।

(3) वहीं - वहीं पद में पुनरुक्तिप्रकाश और वीप्सा अलंकार है, जबकि ‘प्याला जीवन का पद में रूपकात्मक योजना है। विशेषण- विपर्यय भी द्रष्टव्य है। सम्बोधन का भाव विनतीपूर्ण और पूर्ण है।

2. हे महाबुद्ध ! 
मैं मन्दिर में आयी हूँ 
रीते हाथ; 
फूल 'मैं ला न सकी। 
औरों का संग्रह 
तेरे योग्य न होता। 
जो मुझे सुनाती
जीवन के विह्वल सुख-क्षण का गीत
खोलती रूप-जगत् के द्वार जहाँ 
तेरी करुणा 
बुनती रहती है 
भव के सपनों, क्षण के आनन्दों के 
रह-सूत्र अविराम
उस भोली मुग्धा को 
कँपती 
डाली से विलगा न सकी।

सन्दर्भ - प्रस्तुत पद्य पंक्तियाँ अज्ञेयजी के 'साम्राज्ञी का नैवेद्यदान' कविता से अवतरित की गई है। 

प्रसंग - इन पंक्तियों में बुद्ध की उपासिका साम्राज्ञी अपने आराध्य के सामने खाली हाथ जाती है क्योंकि वह फूल तोड़कर महाबुद्ध को चढ़ाने का साहस नहीं जुटा सकी, वह महाबुद्ध को सम्बोधित कर कहती है - 

व्याख्या - हे महाबुद्ध ! मैं मन्दिर आई हूँ, खाली हाथ, मैं तुमको अर्पित करने के लिए फूल न ला सकी। अन्य किसी प्रकार संग्रह तेरे योग्य नहीं होता। मैं उस भोली मुग्धा को काँपती डाली से अलग करने का साहस नहीं जुटा पाई। जो मुझे जीवन के आन्दोलित करने वाले सुख के क्षणों का गीत सुनाती है, जो सौन्दर्य जगत् के द्वारा खोलती है। 

ऐसी तेंरी करुणा जो संसार के स्वप्नों को सँझोती है, आनन्ददायक क्षणों के सूत्रों को अविराम गति से मेरा साहस नहीं हो सका कि मैं उस भोली मुग्धा को काँपती डाली से अलग कर सकती। इसलिए हे महाबुद्ध मैं मन्दिर आई हूँ, रीते हाय।

विशेष

(1) महाबुद्ध की उपासिका म्राज्ञी का पुष्प के प्रति जो करुणाजनक भाव है वह महाबुद्ध की प्रकृति से मेल खाते हैं। इसलिए ही वह उस पुष्प को डाल से अलग करने का साहस नहीं जुटा पाती।

(2) करुणा का यह बहुत कोमल स्वरूप है, यह सौन्दर्य के प्रति बहुत कोमल और करुण आस्था है।

(3) जो वस्तु हमें आनन्द और सुख दे अथवा उसका अहसास कराये वह नष्ट करने के लिए नहीं है।

3. उस भोली मुग्धा को
कँपती
डाली से विलगा न सकी।
जो कली मिलेगी जहाँ, खिली, 
जो फूल जहाँ है,
जो भी सुख
जिस भी डाली पर,
हुआ पल्लवित, पुलकित,
मैं उस वहीं पर,
अक्षत, अनाघ्रात, अस्पष्ट, अनाविल,
हे महाबुद्ध !
मैं अर्पित करती हूँ तुझे।

सन्दर्भ - प्रस्तुत पंक्तियाँ अज्ञेयजी के 'साम्राज्ञी का नैवेद्य दान' कविता से अवतरित की गई हैं। 

प्रसंग- इस कविता में कवि अज्ञेय जी ने जापान की साम्राज्ञी के मानसिक द्वन्द्व के माध्यम इ-मत के अहिंसा और करुणा की सुन्दर तथा मार्मिक अभिव्यक्ति की है। साम्राज्ञी रिक्त हाथ से बौद्ध मन्दिर में पहुँचती है और अपने खाली हाथ आने की विवशता बुद्ध प्रतिमा के सामने व्यक्त करती हुई, प्रकृति के प्रांगण में खिले फूल जो सर्वथा अछूते हैं, जहाँ भी हैं, वहीं बुद्ध को समर्पित करते हुए कहती है।

व्याख्या - हे महाबुद्ध तुम्हारी करुणा और अहिंसा की भावना से द्रवित होकर मैं पुष्प नहीं ला सकी, क्योंकि मुझे डाली से उन्हें विलग करना हिंसात्मक लगा। अतः अब जो भी कली अथवा फूल जहाँ भी जिस डाली पर खिला है, खिल रहा है। 

डाली का सुख जहाँ भी जैसा भी पल्लवित और रोमांचित है, वह वहीं, उसी स्थान पर, उसी रूप में समर्पित करती हूँ। वह पुष्प जो अभी तक पूर्ण है, उसे किसी ने न छुआ है, न सूँघा है, न ही स्पर्श किया है। अतः वह अपनी स्वच्छ निर्मलता में डूबा है, वह जहाँ भी है, अपने स्थान पर ही तुझे समर्पित है, तेरी अर्चना में अर्पित है। उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर मेरी अर्चना को सार्थक बनाओ।

विशेष - प्रस्तुत रचना में बौद्ध मत के सिद्धान्त अहिंसा और समता की सहज अभिव्यक्ति हुई है। व्यक्ति के साथ अस्तित्ववादी चेतना भी विद्यमान है। अपने व्यक्तित्व की समग्रता में ही व्यक्ति तथा पदार्थ की, अपने मूल स्थान और परिवेश में ही सफलता तथा सार्थकता है।

घर कविता

1. तुम्हारा घर 
वहाँ है 
जहाँ सड़क समाप्त होती है 
पर मुझे जब 
सड़क पर चलते ही जाना है 
तब वह समाप्त कहाँ होती है ? 
तुम्हारा घर।।

सन्दर्भ - पूर्ववत् ।

प्रसंग - इसमें महाकवि ने दूसरे के घरों की विशेषता बतलाते हुए कहा है किव्याख्या - तुम्हारा घर हमारे घर से सर्वथा पृथक् और अद्भुत है। तुम्हारा घर तो वहाँ पर स्थित है जहाँ सड़क समाप्त होती है लेकिन विडम्बना तो यह है कि सड़क कभी समाप्त नहीं होती है क्योंकि मुझे तो आजीवन सड़क पर चलते ही जाना होता है। फिर जब यह सड़क समाप्त नहीं होती तब तुम्हारा घर कहाँ पर होता है और मैं उसे पा लूँगा।

विशेष - ( 1 ) शब्द सरल और सुस्पष्ट हैं, (2) शैली बोधगम्य है।

2.मेरा घर
दो दरवाजों को जोड़ता
एक घेरा है
मेरा घर
दो दरवाजों के बीच है
उसमें
किधर से भी झाँको
तुम दरवाजे से बाहर देख रहे होंगे 
तुम्हें पार का दृश्य दीख जायेगा
घर नहीं दीखेगा
मैं ही मेरा घर हूँ।
मेरे घर में कोई नहीं रहता।
मैं भी क्या
मेरे घर में रहता हूँ
मेरे घर में
जिधर में भी झाँको..

सन्दर्भ - प्रस्तुत पद्यांश महाकवि 'अज्ञेय विरचित घर कविता से हैं।

प्रसंग - इसमें महाकवि ने अपने घर की अद्भुत विशेषता बतलाते हुए कहा है कि 

व्याख्या - मेरा घर अन्य घरों से अत्यन्त अद्भुत और विशिष्ट है। इसमें दो दरवाजे जुड़े हुए हैं। इसमें ही मेरे घर का पूरा आकार-प्रकार आ जाता है। इस प्रकार मेरा घर दो दरवाजों के बीच में ही स्थित है। इसमें से आप चाहें कहीं से भी झाँकिए, आपको इन दरवाजों से बाहर ही दिखाई देगा। 

इस प्रकार देखने पर आपको दूर के सारे दृश्य दिखाई देंगे। लेकिन कोई घर नहीं दीख पायेगा। इस प्रकार के इस अद्भुत घर में मैं ही रहता हूँ। इस प्रकार मेरे घर का मेरे सिवाय और कोई सदस्य नहीं है। इस तरह मेरे घर में मैं ही रहता हूँ। चाहे कहीं से देखिये, मैं ही दिखलाई पहूँगा। 

विशेष

(1) खड़ी बोली भाषा की शब्दावली यथास्थान प्रयुक्त है।
( 2 ) सम्पूर्ण अंश भावप्रद और रोचक है। 
(3) शैली बोधगम्य है।
(4) चित्रोपमता नामक काव्य-गुण विद्यमान है। 

3. दूसरों के घर 
भीतर की ओर खुलते हैं। 
रहस्यों की ओर
जिन रहस्यों को वे खोलते नहीं 
शहरों में होते हैं
दूसरों के घर
दूसरों के घरों में
दूसरों के घर
दूसरों के घर हैं।

सन्दर्भ - प्रसंग- पूर्ववत् ।

व्याख्या - कवि कहता है कि दूसरों के घर भीतर की ओर खुलते हैं अर्थात् दूसरों के घरों में हो रहे क्रिया-कलाप बाहर वाले व्यक्ति के लिए गोपनीय रहते हैं, रहस्यमयी होते हैं। इन रहस्यों को घर के लोग कभी उजागर नहीं करते। वास्तव में दूसरों के घरों में झाँकने की प्रवृत्ति उनके रहस्यों को उजागर करने की प्रवृत्ति शहरों में अधिक पायी जाती है। 

जो घर वास्तव में रहस्यों में लिपटे रहते हैं वे भी अन्य दूसरे घरों में झाँकने की प्रवृत्ति रखते हैं। कवि कहता है कि उन्हें इस प्रवृत्ति का त्याग करना चाहिए क्योंकि वे भी दूसरों के घर हैं। 

विशेष – 

(1) 'घर' मानव की सहज गतिशीलता का प्रतीक है।
(2) शब्द सरल और सुस्पष्ट हैं।
(3) शैली बोधगम्य है।

4. घर,
है कहाँ जिनकी हम बात करते हैं
घर की बातें
सबकी अपनी है
घर की बातें
कोई किसी से नहीं करता जिनकी बातें होती हैं
वे घर नहीं हैं।

सन्दर्भ - पूर्ववत्।

प्रसंग - इसमें महाकवि ने घर के सच्चे स्वरूप और वैशिष्ट्य को प्रकाश में लाते हुए कहा है किव्याख्या - घर जितने भी हम देखते हैं, वे वास्तव में घर के सच्चे अर्थ रूप में नहीं दिखाई देते हैं। इस प्रकार जिस घर की हम बात करते हैं वह घर कहाँ है ? अर्थात् नहीं है। घर के विषय में हम जितनी भी बातें करते हैं वे सभी सबकी अलग-अलग होती हैं। घर की जो वास्तविक बातें होती हैं।

उनकी चर्चा कोई किसी से नहीं करता है, अर्थात् सभी लोग घर की बातों को गुप्त और छिपाकर रखते हैं, इस प्रकार हम जो भी बातें करते हैं वे घर की नहीं होती है, वे तो घर से बाहर की होती है। 

विशेष

(1) घर के अद्भुत वैशिष्ट्य को प्रकाश में लाने का प्रयास सराहनीय है। 
(2) भाषा सरल और सपाट है।

5. घर, 
मेरा कोई है नहीं, 
घर मुझे चाहिए ? 
घर के भीतर प्रकाश हो, 
इसकी भी मुझे चिंता नहीं हैं।
प्रकाश के घेरे के भीतर मेरा घर हो, 
इसी की मुझे तलाश है। 
ऐसा कोई घर आपने देखा है ? 

सन्दर्भ व प्रसंग - पूर्ववत्।

व्याख्या - कवि का स्वयं के विषय में यह कहना है कि उसका अपना कोई घर नहीं है। उसे वैसा ही घर चाहिए, जिसके अन्दर अच्छा प्रकाश हो। लेकिन इसकी भी उसे तनिक भी चिन्ता नहीं है। इसके स्थान पर तो उसे ऐसा घर चाहिए जो प्रकाश के घेरे के भीतर स्थिर हो। ऐसे ही घर की उसे खोज है। उसे ठीक ऐसा ही घर चाहिए। आपने क्या ऐसा घर देखा है ? अगर देखा है तो उसे अवश्य बतला दीजिए।

चाँदनी जी लो कविता

1. शरद चाँदनी
बरसी
अँजुरी भर कर पी लो
ऊँघ रहे हैं तारे
सिहरी सरसी
ओ प्रिय कुमुद ताकते
अनझिप
क्षण में
तुम भी जी लो ।
सींच रही है ओस
हमारे गाने
धनु कुहासे में
झिपते
चेहरे पहचाने
खम्भों पर बत्तियाँ
खड़ी है सीठी
ठिठक गये हैं मानो
पल छिन
आने जाने ।

संदर्भ - प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ कवि अज्ञेय की कविता 'चाँदनी जी लो' से अवतरित हैं। 

प्रसंग - इन पंक्तियों में कवि ने शरद् ऋतु की पूर्णिमा की चाँदनी के विषय में सुन्दर वर्णन किया है।

व्याख्या - कवि कहता है कि शरद् ऋतु में पूर्णिमा का धवल चाँद निकल आया है मानो वह चाँदनी बरसा रहा हो, ऐसा मन करता है उसे अपनी अँजुरी (दोनों हथेलियों को ऊपर की ओर जोड़ने से बनने वाला गड्ढा) जिसमें पानी या कोई वस्तु भरत हैं) में लेकर पी लिया जाए। तारे इस ठंडी रात में ऊँघते हुए प्रतीत होते हैं। कवि कहता है कि हे प्रिय ! कुमुद के फूल चंद्र को ताकते हुए लगते हैं। ऐसे पलों में तुम भी जी लो अर्थात् कुछ आनन्द प्राप्त कर लो।

ऐसा लगता है जैसे रात्रि के इस प्रहर में ओस मेरे गीत गा रही हो शहर का इस रात्रि में यह हाल है कि घने कुहरे के कारण चेहरे पहचानने में नहीं आ रहे हैं। खम्भों की बत्तियाँ सीढ़ी सी खड़ी हुई हैं। मानो सभी पल - छिन ठिठक गये हों।

विशेष

(1) प्रकृति के प्रति कवि का असीम अनुभव द्रष्टव्य है। 
(2) चित्रमयी भाषा है।

2. ठिठक गये हैं मानो
पल-छिन
आने-जाने
उठी ललक
हिय उमगा
अनकहनी
अलसानी
जगी लालसा
मीठी
खड़े हो ढंग
हो हाथ
पाहुन मन-भाने,
ओ प्रिय रहो साथ
भर-भर कर अँजुरी
पी लो
बरसी
शरद चाँदनी
मेरा
अन्तः स्पन्दन
तुम भी क्षण-क्षण जी लो !

संदर्भ-प्रसंग - पूर्ववत्। शरद् ऋतु की सुंदर रात्रि में कवि के मन में किस प्रकार की कल्पनाएँ उठ रही हैं उन्हीं का वर्णन है ।

व्याख्या - कवि कहता है कि शरद् ऋतु की इस धवल रात्रि में ठंड के कारण मानो पल - छिन रुक गये हैं। ऐसा सुंदर वातावरण देखकर मन में ललक जाग्रत हो उठी है, मन उमंगने लगा है।

हे प्रियतम तुम हाथों में हाथ डालकर मेरे निकट खड़ी रहो, मन भावन परिदृश्य है हम कुछ कही अनकही आपस में कहें। हे प्रिय, मेरे साथ रहो और यह जो चाँदनी बरस रही है उसे अँजुरी भर-भर कर पी लो।

शरद ऋतु की जो यह चाँदनी बरस रही है, मेरा अंतः स्पंदन कह रहा है कि ऐसे अवसर का तुम भी लाभ उठा लो, हर क्षण प्रसन्न होकर व्यतीत करो। 

विशेष

(1) कवि का प्रकृति वर्णन अत्यन्त सुंदर है।
(2) भाषा चित्रमयी है।
(3) रूपक अलंकार है।

दूर्वाचल कविता

1. पार्श्व गिरि का नम्र-चीड़ों में; 
डगर चढ़ती उमंगों-सी। 
बिछी पैरों में नदी, ज्यों दर्द की रेखा। 
विहग - शिशु मौन नीड़ों में 
मैंने आँख भर देखा। 
दिया मन को दिलासा -पुनः आऊँगा 
भले ही बरस - दिन- अनगिन युगों के बाद। 
क्षितिज ने पलक-सी खोली 
तमक कर दामिनी बोली
अरे यायावर, रहेगा या?

संदर्भ - प्रस्तुत पद्यावतरण अज्ञेय द्वारा रचित कविता दूर्वाचल से उदधृत किया गया है। प्रसंग-उपर्युक्त पंक्तियों में अज्ञेयजी ने बताया है कि मनुष्य क्षण भर प्रकृति का सामीप्य पाकर प्रसन्न होता है । वह इस सुख को पुनः पाना चाहता है, मगर आज के संघर्ष भरे समय में यह संभव नहीं हो पाता है।

व्याख्या - पर्वत के पार्श्व में नम्र चीड़ के पेड़ उगे हुए हैं। हमारे मन में जैसे उमंगें उठती हैं। उसी प्रकार नदी में उमंगों के समान ही लहरें उठ रही हैं। वह उमंगों के समान डगर चढ़ रही है। नदी पैरों को स्पर्श कर रही है। मनुष्य का जीवन संघर्ष से मुक्त है अर्थात् उसके अन्तर्मन में उठने वाली पीड़ा दर्द की रेखा के समान उभरने लगती है।

घोंसले में पक्षियों के बच्चे खामोश, मौन बैठे हुए वह उन्हें आँख भर देखता है। अपने मन को दिलासा देता है ? सान्त्वना देता है कि मैं पुनः आऊँगा, भले ही कितने दिनों अथवा बरसों के बाद आऊँ।

आज मनुष्य अपने संघर्ष भरे जीवन से कुछ समय को मुक्त होना चाहता है और इस मुक्ति के लिए वह प्रकृति की गोद में कुछ क्षणों का सुख पाना चाहता है, उसे कुछ क्षणों की मुक्ति और सुख मिलता है। लेकिन वह इस सुख को दुबारा पाना चाहता है, परन्तु इस व्यस्त कारोबारी दुनिया में यह संभव नहीं हो पाता है।

कवि के यह कहने पर कि मैं यहाँ पुनः आऊँगा, चाहे कितने समय पश्चात् ही क्यों न आऊँ। इस पर क्षितिज ने अपनी पलकें खोलीं और बिजली तमक कर बोलती है अर्थात् प्रकृति व्यंग्य भरा प्रश्न करती है कि अरे यायावर, क्या यह तुझे याद रहेगा, अर्थात् आज व्यस्तता आदमी की इतनी बढ़ चुकी है कि वह प्रकृति के सान्निध्य से बहुत दूर चला गया है।  

जब वह इस संघर्षशील जीवन से छुटकारा पाने के लिए समीप आता है उसे कुछ शांति मिलती है वह पुनः आने का प्रश्न करता है, तब प्रकृति उस पर व्यंग्य करती है कि अरे यायावर क्या तुझे पुनः आना याद रहेगा अर्थात् उसके पुनः प्रकृति सुख पाने का निश्चित समय नहीं है।

विशेष

(1) औद्योगीकरण के विस्तार ने मनुष्य की जिंदगी को किस कदर मशीनी बना दिया है कि वह प्रकृति से बहुत दूर चला गया है। प्राकृतिक मानव का आज के युग में प्रकृति से कट जाना स्वयं प्रकृति को दुःखी और आश्चर्यचकित करता है।

(2) कवि ने इन पंक्तियों में मानव-मन की पीड़ा और उसकी मजबूरी को उभारा है। 

(3) कवि की प्रकृति यायावरी है अर्थात् प्रकृति भी उसे उसी रूप में सम्बोधन देती है।

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