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फेमा क्या है - फेमा के प्रमुख प्रावधान

भारतीय रिजर्व बैंक, विदेशी विनिमय व्यवहारों पर उन नीतियों के अन्तर्गत नियन्त्रण करता है जिन्हें केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक की सहमति से तैयार करती है। विदेशी विनिमय प्रबन्धन अधिनियम या फेमा 1999 विदेशी विनिमय नियमन अधिनियम या फेरा के स्थान पर लगाया है। 

फेमा क्या है 

सन् 1993 में जब आर्थिक उदारीकरण अपनाया गया उस समय विश्व अर्थव्यवस्था के अधिक नजदीक आने के उद्देश्य से विदेशी विनिमय और विदेशी व्यापार से सम्बन्धित नियमों में भी महत्वपूर्ण संशोधन किये गये। 

केन्द्रीय सरकार ने फेरा में परिवर्तन करने के लिए एक कार्य दल का गठन किया जिसकी अनुशंसा के आधार पर संसद में विदेशी विनिमय प्रबन्धन अधिनियम बिल 1994 में प्रस्तुत किया। 

इसे लोकसभा में 1999 में तथा राज्यसभा में 8 दिसम्बर, 1999 को पारित कर दिया। यह अधिनियम 1 जून, 2000 से लागू किया गया। इस अधिनियम में कुल 49 धाराएँ हैं तथा यह सात अध्यायों में विभाजित है। 4

फेमा के उद्देश्य

विदेशी विनिमय प्रबन्धन अधिनियम (फेमा) आकार में छोटा है किन्तु एक सारगर्भित दस्तावेज है। इसमें विदेशी विनिमय की व्यवस्थाओं के उल्लंघन करने के लिये अत्यन्त कठोर प्रावधानों की व्यवस्था है। यह अधिनियम सात अध्यायों में विभाजित है तथा इसमें केवल 49 धाराएँ हैं। इस अधिनियम के निम्नलिखित उद्देश्य पाये जाते

(i) भारत में विदेशी पूँजी की प्रविष्टि का नियमन करना । 

(ii) भारत में विदेशियों को रोजगार का नियमन करना । 

(iii) विदेशी विनिमय दर में स्थिरता लाना। 

(iv) विदेशी विनिमय के क्रय-विक्रय पर नियन्त्रण रखना। 

(v) विदेशों को होने वाले भुगतानों का नियमन करना । 

(vi) भुगतान सन्तुलन की विषमता को दूर करना । 

(vii) भारत में पूँजी बर्हिगमन पर रोक लगाना । 

(viii) विदेशी बिलों में होने वाली हेरा-फेरी को रोकना । 

(ix) देश के विनिमय संसाधन का अनुरक्षण करना । 

(x) भारत के विदेशी विनिमय बाजार को सुदृढ़ बनाये रखना । 

(xi) विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित करना ।

 फेमा के प्रमुख प्रावधान

इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं

(1) संक्षिप्त शीर्षक एवं क्षेत्र 

इसके अन्तर्गत निम्न बातें आती हैं - 

(क) इस अधिनियम का नाम विदेशी विनिमय प्रबन्धन अधिनियम,

(ख) यह सम्पूर्ण भारत पर लागू होगा। 1999 होगा ।

(ग) यह उन सभी शाखाओं, कार्यालयों एवं एजेन्सियों पर भी लागू होगा जो कि भारत के बाहर तथा जो भारत के निवासी व्यक्ति के नियन्त्रण में है।

(घ) यह उस तिथि से प्रभावी माना जायेगा जिस तिथि को केन्द्र सरकार राजपत्र में इस आशय की अधिसूचना जारी कर देगी ।

(2) आधारभूत परिभाषाएँ

अधिनियम में कुछ शब्दों की व्याख्या निम्न प्रकार से की गयी है जिसका विवरण इस प्रकार है

(i) निर्णायक अधिकारी – धारा 16 की उपधारा के अन्तर्गत आने वाले अधिकृत अधिकारी से है । 

(ii) अधिकृत व्यक्ति - ऐसा व्यक्ति कोई अधिकृत डीलर, मुद्रा परिवर्तक, अपर बैंकिंग इकाई या अन्य वह व्यक्ति हो सकता है जिसे धारा की उपधारा के अन्तर्गत विदेशी विनिमय या विदेशी प्रतिभूतियों में व्यवहार करने के लिये अधिकृत किया गया हो।

(iii) सभापति - इससे अगर पुनरावेदन न्यायाधिकरण के सभापति से है। (iv) प्रचलित कागजी मुद्रः समें सिक्के तथा बैंक नोट सम्मिलित हैं।

(v) आयात - इससे आशय भारत में वस्तुओं व सेवाओं का लाना है।

(3) विदेशी विनिमय का नियमन एवं प्रबन्धन

इसमें निम्न बातें आती हैं - 

1. विदेशी विनिमय में व्यवहार - इस अधिनियम में दिये गये नियमों एवं विनियमों के अन्तर्गत या रिजर्व बैंक की सामान्य अथवा विशेष अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति

(अ) अधिकृत व्यक्ति के माध्यम के अतिरिक्त कोई विदेशी विनिमय या विदेशी प्रतिभूति किसी अन्य व्यक्ति को न तो हस्तान्तरित कर सकेगा, न ऐसा व्यवहार कर सकेगा ।

(ब) किसी गैर आवासीय व्यक्ति को सामान्य रूप में या उसकी साख के लिये कोई भुगतान नहीं करेगा। (स) अधिकृत व्यक्ति के माध्यम के अतिरिक्त अन्य किसी भी रूप में भारत के बाहर स्थित व्यक्ति के आदेश से या उसकी ओर से कोई भी भुगतान प्राप्त नहीं करेगा ।

2. विदेशी विनिमय पर नियन्त्रण - यदि इस अधिनियम में कोई विपरीत व्यवस्था नहीं की गयी है तो कोई भी भारत में निवासी व्यक्ति विदेश स्थित अचल सम्पत्ति, विदेशी विनिमय एवं विदेशी प्रतिभूतियों का अधिग्रहण, धारण, उन पर स्वामित्व, ग्रहणाधिकार या हस्तान्तरण नहीं कर सकता है ।

3. चालू खाता व्यवहार – कोई भी व्यक्ति चालू खाता व्यवहारों के अन्तर्गत किसी भी अधिकृत व्यक्ति को या उससे विदेशी विनिमय का विक्रय अथवा आहरण कर सकता है। 

4. पूँजी खाता व्यवहार - धारा 6 की उपधारा (2) में यह स्पष्ट किया गया है कि पूँजी खाता व्यवहारों के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति किसी भी अधिकृत व्यक्ति से विदेशी विनिमय आहरित कर सकता है या उसे विक्रय कर सकता है।

5. वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्यात - प्रत्येक निर्यातक के लिये यह आवश्यक है कि वह रिजर्व बैंक या अन्य प्राधिकारी को, निर्धारित विधि से एवं निर्धारित प्रपत्र में सम्पूर्ण निर्यात से सम्बन्धित विवरण, निर्यात किये जाने वाले माल का पूर्ण मूल्य और जहाँ निर्यात करते समय तक माल का मूल्य निश्चित नहीं किया जा सके तो बाजार में प्रचलित वह मूल्य जो कि विदेशों में माल बेचने से प्राप्त होने की आशा हो, को सत्य एवं सही रूप में भरकर प्रस्तुत करें ।

6. विदेशी विनिमय की वसूली एवं प्रत्यावर्तन - यदि इस अधिनियम में कोई विपरीत प्रावधान नहीं है तो रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित विधि एवं निर्धारित समय के भीतर भारत के निवासी किसी भी व्यक्ति को वे सभी कदम उठाने होंगे जिससे कि विदेशी विनिमय की रकम (देय अथवा उपार्जित) को स्वदेश में लाया जा सके ।

(4) अधिकृत व्यक्ति

प्रतिभूतियों में व्यवहार करने के लिये अधिकृत डीलर, मुद्रा परिवर्तक या विदेशी बैंकिंग इकाई या किसी अन्य रूप में,जो भी उचित हो, अधिकृत कर सकता है ।

(5) फेमा की व्यवस्थाओं का उल्लंघन एवं दरार – यदि कोई भी व्यक्ति रिजर्व बैंक द्वारा जारी तथा इस अधिनियम के अन्तर्गत दिये गये नियमों, विनियमों, अधिसूचनाओं, निर्देशों या रिजर्व बैंक के अधिकार क्षेत्र में जारी की गयी शर्तों का उल्लंघन करता है तो ऐसी दशा में -

(i) जहाँ राशि मापन हो तो उस राशि का तीन गुणा अथवा जहाँ राशि मापन योग्य नहीं है तो दो लाख रुपये तक जहाँ दण्ड रिजर्व अपने न्यायिक क्षेत्र में दे सकता है ।

(ii) यदि दर निश्चित कर देने के पश्चात् भी यह उल्लंघन जारी रहता है तो दण्ड राशि चुकाने तक पाँच हजार रुपया प्रतिदिन की दर से दण्ड देय होगा ।

(6) निर्णय एवं पुनर्विचार

इस अधिनियम की धारा 13 के अन्तर्गत उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को जाँच करने के लिये केन्द्र सरकार गजट में अधिसूचना जारी करके निर्धारित प्रारूप में विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति करने के लिये आदेश प्रसारित कर सकती है। ऐसे आदेश का मूल उद्देश्य उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध दण्ड का निर्धारण करना है ।

(7) प्रवर्तन निदेशालय 

केन्द्र सरकार इस अधिनियम की व्यवस्थाओं को बनाये रखने के लिये प्रवर्तन निदेशालय की स्थापना कर सकती है और जितने भी उचित समझे, उतने अधिकारी एवं एक निदेशक की नियुक्ति कर सकती है ।

(8) अन्य प्रावधान

इस अधिनियम में कुछ अन्य प्रावधान निम्न प्रकार हैं

(i) फेमा की समाप्ति, (ii) नियमों को बनाने की शक्ति, (iii) मृत्यु या दिवालिया, (iv) कम्पनियों द्वारा उल्लंघन, (v) निर्देश देने का अधिकार ।

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