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मानव अधिवास किसे कहते हैं

आश्रय मानव की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है, मानव जिस स्थान को अपने आश्रय हेतु चुनकर वहाँ जिन मकानों, घरों, झोपड़ियों आदि का निर्माण करता है, वह उसका 'आवास' या अधिवास कहलाता है। इन्हीं आवासों द्वारा मानवीय बस्तियों का निर्माण होता है। 

आवास के अन्तर्गत सभी प्रकार के आश्रयों को सम्मिलित किया जाता है, चाहे वे घास-फूस की झोपड़ियाँ हों या वृक्षों की टहनियों एवं पत्तियों से बनी कुटिया, मिट्टी या लकड़ी से बना घर हो या ईंट, सीमेण्ट, कांकरीट की बनी इमारत हो या कोई आधुनिक ऊँची अट्टालिका । 

सामान्यतः अधिवासों की तीन विशेषताएँ होती हैं - 

  1. इन अधिवासों में मनुष्य एक सामाजिक प्राणी की भाँति रहता है। 
  2. वह आपस में विचारों एवं वस्तुओं का आदान-प्रदान करता है ।
  3. इन अधिवासों में मकान प्रारम्भिक इकाई होते हैं।
  4. अधिवासों में सम्पर्क हेतु पगडण्डियाँ, गलियाँ एवं सड़कें बनायी जाती हैं ।
मानव अधिवास किसे कहते हैं

मानव की प्राथमिक आवश्यकताएँ रोटी, कपड़ा और मकान हैं। मकान का उपयोग वह अपनी जैविक आवश्यकता 'विश्राम' की पूर्ति मं करता है। ये घर जिस भूखण्ड पर मानव निर्मित करता है, उस भूखण्ड को बस्ती कहते हैं । 

सामान्यतः बस्ती किसी भी प्रकार या आकार के घरों का समूह है। इस बस्ती में सभी प्रकार के घर, उद्योग स्थल, विशाल औद्योगिक कारखाने, मिलें, फैक्ट्रियाँ, सभागार, शिक्षालय, चिकित्सालय, बाजार, धार्मिक एवं राजनीतिक भवन, संचार का साधन समाहित हैं। 

"बस्तियाँ कुछ मकानों अथवा घरों का समूह होती हैं, जहाँ एक ही व्यवसाय अथवा विभिन्न व्यवसाय करने वाले लोग निवास करते हैं।" इन बस्तियों के जन्म एवं विकास को निम्नलिखित कारक प्रभावित करते हैं

  • 1. भूमि का उपजाऊ होना ।
  • 4.प्राकृतिक संसाधनों की सुलभता ।
  • 3. पेय जल की आपूर्ति ।
  • 4. यातायात के साधन ।

उपर्युक्त कारणों से किसी बस्ती का जन्म होता है। प्रारम्भिक काल में बस्ती का विकास कृषि व्यवसाय के साथ होता था। व्यवसाय एवं आकार की दृष्टि से इन बस्तियों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है। 

  • 1. ग्रामीण बस्तियाँ 
  • 2. नगरीय बस्तियाँ 

ग्रामीण बस्तियाँ

जिन बस्तियों में अधिकांश लोगों द्वारा कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, लकड़ी काटना, खनन, शिकार आदि व्यवसाय अपनाया हो जाता है वे हैं, ग्रामीण बस्तियाँ कहलाती हैं। ग्रामीण बस्तियों के मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित हैं।

  • `1. लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि होता है ।
  • 2. मकान स्थानीय भवन सामग्रियों से निर्मित होते हैं ।
  • 3. मकान किसी निश्चित योजनानुसार नहीं बनते ।
  • 4. गाँव के आस-पास समान व्यवसाय के लोगों की बस्तियाँ बस जाती हैं।
  • 5. गाँव के निवासी सहकारिता एवं सहयोग की भावना से कार्य करते हैं।

ग्रामीण बस्तियों के प्रमुख लक्षण 

  • 1. जीविकोपार्जन का मुख्य साधन कृषि, 
  • 2. उपलब्ध स्थानीय भवन निर्माण सामग्री से निर्मित आवास,
  • 3.अनियोजित आवास निर्माण, व्यवसाय या जाति के आधार पर
  • 4.आवासीय नामकरण,

भारत में ग्रामीण बस्तियाँ- भारत में सन् 1991 की जनगणना के अनुसार 84-4 करोड़ जनसंख्या है। इस जनसंख्या का 74-2 प्रतिशत भाग गाँवों में निवास करता है। भारत में लगभग 5-7 लाख गाँव हैं। भारत एक उपमहाद्वीप है । प्रायः भौगोलिक दशाओं के अनुरूप चारों प्रकार की ग्रामीण बस्तियाँ एवं लगभग सभी प्रकार के गाँव प्रतिरूप पाये जाते हैं ।

आपसी सहयोग की भावना अधिक

ग्रामीण बस्तियों के प्रकार

1. सघन बस्तियाँ  - सघन बस्तियों में मकान पास-पास तथा आपस में जुड़े होते हैं व गलियाँ सँकरी होती हैं। ऐसी बस्ती में जनसंख्या का संकेन्द्रण गाँव के केन्द्र की ओर होता है। इनमें मकानों को बनाने की कोई योजना नहीं होती है। 

सघन बस्ती की रचना सुरक्षा, पर्याप्त उपजाऊ कृषि भूमि, भूमिगत जल का अभाव आदि कारणों से होती है। इन गाँवों की जनसंख्या प्रायः अधिक होती है। सघन बस्तियाँ पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक पायी जाती हैं। .

2. संयुक्त बस्तियाँ इसके अन्तर्गत ऐसी ग्रामीण-बस्तियाँ आती हैं, जिनमें एक मुख्य गाँव होता है और उसके निकट उसके ही पुरवे बसे होते हैं। ऐसी ग्रामीण बस्तियाँ गंगा-यमुना के मैदान में हजारों की संख्या में पायी जाती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल, तमिलनाडु व मराठवाड़ा में भी अधिक पायी जाती हैं ।

इन बस्तियों को संयुक्त बस्तियाँ भी कहा जाता है। मुख्य बस्ती से अलग एक या एक से अधिक पुरवे या टोला के स्थापित होने का कारण मुख्य बस्ती का ज्यादा बड़ा आकार, सघन बसाव और स्थान का अभाव हो जाना होता है। ऐसी स्थिति में कुछ लोग गाँव की सीमा पर जाकर मकान बनाकर रहने लगते हैं। धीरे-धीरे वहाँ एक पुरवा  का विकास हो जाता है ।

3. अपखण्डित बस्तियाँ  - 1 अपखण्डित बस्ती में मकान एक दूसरे से पृथक-पृथक कुछ दूरियों पर बने होते हैं, किन्तु सभी घर मिलाकर एक बस्ती का निर्माण करते हैं । 

कहीं-कहीं दो-दो या तीन-तीन मकानों के पुरवे भी पाये जाते हैं । इन सबको मिलाकर एक बस्ती बनती है। अपखण्डित बस्तियों के निर्माण में जाति और धर्म संरचना का विशेष महत्व होता है। गंगा, घाघरा, दोआब, उत्तरी - गंगा के बाढ़ग्रस्त क्षेत्र, सरयू नदी के पार के पश्चिमी मैदानों में और दून घाटी के नहरी क्षेत्र तथा बंगाल के डेल्टा क्षेत्र में पायी जाती हैं।

4. प्रकीर्ण अथवा बिखरी हुई बस्तियाँ  - इनको एकाकी बस्तियाँ भी कहते हैं । इस प्रकार की बस्ती में घर दूर-दूर बने होते हैं और इनके मध्य कृषि क्षेत्र होते हैं। इन बस्तियों का निर्माण बाढ़ के भय, अनुपजाऊ भूमि, सुरक्षा की सुलभता आदि के कारण होता है। 

प्रकीर्ण प्रकार की बस्तियाँ भारत के हिमालय पर्वतीय प्रदेश, मालवा पठार के पश्चिमी क्षेत्र, असम के वन क्षेत्र, उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों, प. बंगाल व बिहार के छोटे-छोट जलाशयों के निकट तथा पश्चिमी घाट पर सतारा से केरल तक की ऊँची भूमि पर पाये जाते हैं।

जनसंख्या के आधार पर ग्रामों का विभाजन एवं वितरण - जनसंख्या के आधार पर इन गाँवों को तीन भागों में विभाजित किया गया है ।

1.500 से कम जनसंख्या वाले गाँव- भारत में इन छोटेछोटे गाँवों की संख्या सर्वाधिक है। भारत के 55 प्रतिशत गाँव इसी वर्ग के हैं अर्थात् 3 लाख गाँव 500 से कम जनसंख्या वाले हैं। इस प्रकार के गाँव भारत के प्रत्येक भाग में पाये जाते हैं। 

यह देश के पहाड़ी व पठारी भागों में, राजस्थान के शुष्क तथा अर्ध शुष्क प्रदेशों में, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, नागालैण्ड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, उड़ीसा के मध्यवर्ती भाग,हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर व मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भाग में छोटे गाँव अधिक पाये जाते हैं। 

2.500 से 2000 तक जनसंख्या वाले गाँव- ये मध्यम आकार के गाँव हैं। देश की ग्रामीण जनसंख्या का 47% भाग इन्हीं गाँवों में निवास करता है। इन गाँवों का वितरण पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, असम और कर्नाटक में अधिक है।

3. 2000 से अधिक जनसंख्या वाले गाँव- भारत की ग्रामीण जनसंख्या का 37% भाग इन बड़े आकार के गाँवों में निवास करता है। बड़े आकार के गाँव भी देश के सभी भागों में मिलते हैं, पर तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और हरियाणा में इनकी संख्या अधिक है।

ग्रामीण बस्तियों के प्रकार का निर्धारण करने वाले कारक- ग्रामीण बस्तियों के प्रकार का निर्धारण निम्नलिखित कारकों द्वारा होता है

1. भौतिक कारक - भूमि की बनावट, अपवहन तन्त्र, भौम जल-स्तर, जलवायु और मृदा बस्तियों के प्रकार निर्धारण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जैसे- राजस्थान ग्रामीण बस्तियों के प्रकार का निर्धारण के मरुस्थलीय क्षेत्रों में तालाब या जलाशय के चारों ओर तथा करने वाले कारक पर्वतीय प्रदेशों में उच्चावच के अनुरूप मकान बनाये जाते हैं। 

2. सांस्कृतिक कारक - भारत में गाँवों की रचना प्राय: जाति या धर्म अथवा जनजातियों के आधार पर हुई। भारत के गाँव में उच्च वर्ग अथवा भू-स्वामित्व वाली जातियों के मकान बस्ती के मध्य में होते हैं और सेवा करने वाले लोगों के मकान उनके चारों ओर बाहर की ओर बने होते हैं। हरिजनों के मकान गाँव की सीमा के किसी एक छोर पर बने होते हैं ।

3. ऐतिहासिक कारक - बाह्य आक्रमणों से बचाव हेतु संहत बस्तियाँ अधिक उपयुक्त होती हैं। इनमें सुरक्षा तथा इकट्ठे रहने की स्थिति बनती है। इसीलिए उत्तरी-पश्चिमी भारत में संहत बस्तियाँ अधिक पायी जाती हैं।

ग्रामीण बस्तियों के प्रतिरूप - बस्ती का प्रतिरूप उसकी आकृति पर आधारित होता है। बस्तियों की आकृति उसमें बने आवासों और मार्गों की स्थिति के क्रम और व्यवस्था के अनुरूप होती है। ये प्रतिरूप ग्रामीण परिस्थिति के अनुसार विभिन्न रूपों में विकसित होते हैं। प्रमुख प्रतिरूप निम्नलिखित हैं

1. रेखीय प्रतिरूप – जब गाँव किसी नदी, नहर या सड़क के किनारे बसा होता है, तो उसका प्रतिरूप रेखीय होता है, क्योंकि इस अधिवास में मकान, नदी, नहर या सड़क के किनारे समानान्तर एक पंक्ति में बने होते हैं। 

2. चौका पट्टी प्रतिरूप - मैदानी भागों में जहाँ पर दो सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती हुई बढ़ जाती हैं, तो इनकी चारों शाखाओं के किनारे चौका पट्टी के रूप का गाँव बस जाता है। आगे

3. अरीय प्रतिरूप — गाँव के लगभग मध्य भाग में एक चौराहा होता है जिससे गाँव के बाहर अन्य गाँवों को मार्ग जाते हैं। इन्हीं मार्गों के सहारे आवासों का निर्माण होता है, जिसे अरीय प्रतिरूप कहते हैं।

4. त्रिभुजाकार प्रतिरूप – इस प्रतिरूप की बस्तियाँ प्रायः रेलवे लाइन, सड़क या नदियों आदि के मिलन-स्थल पर विकसित होती हैं। इनका रूप त्रिभुज के आकार का होता है।

5. तारक प्रतिरूप- इन बस्तियों का विकास उन स्थानों पर होता है, जहाँ कई दिशाओं से सड़के आकर मिलती हैं तथा विभिन्न दिशाओं को जाती हैं। इसके उदाहरण उत्तर प्रदेश के उहाना और मटौना गाँव हैं। 

6. गोलाकार प्रतिरूप - इस प्रकार की बस्तियाँ तालाब, झील या बावड़ी के चारों ओर गोलाकार रूप होती हैं। ग्रामीण बस्तियों के प्रतिरूप में विकसित

7. आयताकार या वर्गाकार प्रतिरूप - आयताकार या वर्गाकार ग्रामीण बस्तियों का विकास अधिकांशतः चौराहों पर होता है।

9. पंखाकार प्रतिरूप - नदियों के डेल्टाई भागों तथा पर्वतपाद प्रदेशों में पंखाकार प्रकार के गाँव पाये जाते हैं। जैसे- महानदी, गोदावरी व कृष्णा नदियों के डेल्टाओं पर बसे गाँव ।

8. तीर प्रतिरूप - किसी अन्तरीप के सिरे पर या नुकीले मोड़ पर तीर प्रतिरूप बस्ती विकसित होती है। जैसे- दक्षिण भारत में कन्याकुमारी गाँव ।

10. सीढ़ी प्रतिरूप - पर्वतीय ढलानों पर बसे गाँव सीढ़ीनुमा आकार के होते हैं। ऐसे गाँव हिमालय के पर्वतीय ढालों पर पाये जाते हैं।

9. पंखाकार प्रतिरूप

10. सीढ़ी प्रतिरूप, 

11. मधुछत्ता प्रतिरूप ।


11. मधुछत्ता प्रतिरूप – भारत में टोडा जनजाति के लोग गुम्बदनुमा झोपड़ियों के गाँव बनाते हैं। आन्ध्र प्रदेश के समुद्र तट पर मछुआरों के गाँव भी इसी प्रतिरूप के हैं। इनका आकार मधुमक्खी के छत्तों की भाँति होता है।

नगरीय बस्तियाँ

नगरीय बस्तियाँ द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के व्यवसायों में संलग्न होती हैं अर्थात् नगर के निवासी प्राथमिक व्यवसाय जैसे- कृषि, पशु - चारण, आखेट आदि कार्य, व्यवसाय के रूप में नहीं करते वरन् वे निर्माण उद्योग, परिवहन, व्यापार और वाणिज्य, उच्च सेवाओं तथा प्रशासन के कार्यों को अपने व्यवसाय के रूप में अपनाते हैं । 

इसके अतिरिक्त नगरीय बस्तियाँ उद्योग, व्यापार, प्रशासन, सुरक्षा, तकनीक, संस्कृति तथा मनोरंजन के केन्द्र होती हैं। किसी नगर में कोई एक निर्माण उद्योग ही हो सकता है या कई व्यवसाय भी हो सकते हैं। जैसे- भिलाई, दुर्गापुर, जमशेदपुर, बोकारो आदि लौह इस्पात उद्योग के केन्द्र हैं। नगर का अर्थ उस मानव बस्ती से है, जो अपने क्षेत्र में सर्वाधिक विकसित होती है, 

जिसमें कोई न कोई उद्योग या व्यापार केन्द्रित होता है, जो अपने क्षेत्र में सर्वाधिक जीवन-यापन की सुविधाओं से सम्पन्न होती है, जैसे- परिवहन सुविधाएँ, शिक्षणसंस्थाएँ, अस्पताल आदि की सेवाएँ नगरीय बस्ती में प्राप्त होती हैं। नगरीय बस्ती अपने क्षेत्र की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है।

नगरीय बस्तियों की विशेषताएँ-नगरीय बस्तियों में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं

1.75 प्रतिशत से अधिक लोगों का मुख्य व्यवसाय निर्माण उद्योगों में काम करना, वाणिज्य व व्यापार में लगे रहना तथा विशिष्ट सेवाएँ करना होता है।

2. संहत बस्ती इस प्रकार की बस्ती में मकान एक-दूसरे से सटे हुए होते हैं। इसका कारण सामाजिक व्यवस्था तथा भूमि की उपलब्धता का अभाव होता है।

3. शिक्षा की उपयुक्त एवं पर्याप्त व्यवस्था, चिकित्सा व आमोद-प्रमोद के साधन सुलभ होते हैं। धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक कार्यों की प्रधानता होती है।

4. परिवहन तथा संचार की उत्तम व्यवस्था होती है।

5. प्रशासकीय कार्यों के लिए सरकारी कार्यालयों की व्यवस्था होती है, जैसे- थाना, राजस्व कार्यालय, न्यायालय आदि ।

नगरीय बस्तियों की मान्यता - भारत में नगरीय बस्तियों की मान्यता उन बस्तियों को दी गयी है, जो निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती हों

1. जनसंख्या 5000 या इससे अधिक हो ।

2. उस बस्ती की जनसंख्या का घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी या इससे अधिक हो । 

3. कम से कम 75% से अधिक क्रियाशील पुरुष जनसंख्या कृषि व्यवसाय छोड़कर अन्य व्यवसायों में लगी हो ।

4. वहाँ पर स्थानीय स्वशासन हेतु नगरपालिका या कोई अन्य प्रशासनिक इकाई कार्यरत हो । 

नगरीय बस्तियों के प्रकार 

नगरीय बस्तियाँ उद्यम, आकार एवं जनसंख्या की मात्रा को दृष्टि में रखकर निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित की जाती हैं

 1. अनुमार्ग बस्ती - किसी सड़क के किनारे यात्रियों हेतु कोई एक दो दुकानें व चाय-पान हेतु कुछ होटल व पान की दुकानें होती हैं। फिर रेस्तराँ आदि खुल जाते हैं। मोटर गाड़ियों को जल व तेल भी मिलने लगता है। 

ऐसी बस्ती को अनुमार्ग बस्ती कहते हैं, किन्तु यदि यातायात अधिक बढ़ा तो ऐसी बस्ती एक बड़े कस्बे का रूप धारण कर लेती है। जैसे— छत्तीसगढ़ में रायपुर जिले का अभनपुर । 

2. नगरीय पुरवा या पल्ली - किसी नगर के सन्निकट सड़क मार्ग के सहारे कुछ उप-बस्तियाँ बस जाती हैं। इनमें 20 से 150 तक मनुष्यों की संख्या होती है ।

3. नगरीय गाँव  — नगरीय ग्राम वह बस्तियाँ हैं, जहाँ व्यवसायियों व दुकानदारों की संख्या अधिक एवं कृषक परिवारों की संख्या कम होती है। इनमें 500 तक की जनसंख्या होती है ।

नगरीय गाँव वे हैं, जहाँ कुछ नगरीय सुविधाएँ उपलब्ध हों जैसे—सड़कें, स्कूल, अस्पताल, डाकखाना आदि। संयुक्त राज्य अमेरिका में नगरीय गाँव अधिक हैं।

4. कस्बा –कस्बे की जनसंख्या 500 से 40,000 तक होती है। उत्तर भारत विशेषकर यमुनागंगा, दोआब में बड़े-बड़े कस्बे पाये जाते हैं । इन कस्बों की जनसंख्या 30-35 हजार है। 50,000 जनसंख्या वाली बस्ती को चरम कस्बा माना जाता है।

कस्बे की उत्पत्ति कई सड़कों के मिलन-स्थल व रेलवे स्टेशनों के निकट होती है । यह बस्ती दो भागों में विभाजित होती है— 

(1) निवास क्षेत्र तथा (2) व्यावसायिक क्षेत्र 

निवास क्षेत्र में आवास, स्कूल, अस्पताल, डाकखाना, सिनेमाघर आदि होते हैं और व्यावसायिक क्षेत्र में बाजार, मण्डी, कारखाने आदि होते हैं। 

5. नगर – 50,000 से अधिक जनसंख्या वाली बस्ती को नगर माना जाता है। जब नगर की आबादी 10 लाख हो जाती है, तो इसे 'मिलियन सिटी' (Million City) कहते हैं ।

6. महानगर — जब नगर की जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो जाती है, तो उसे महानगर कहते हैं। यहाँ प्रादेशिक राजधानी अथवा व्यापारिक मण्डी या औद्योगिक केन्द्र होता है।

7. सन्नगर  - जब कई विस्तृत होते हुए कस्बे परस्पर मिल जाते हैं और मिलकर एक इकाई बन जाते हैं अथवा किसी नगर का इतना विकास हो जाता है कि वह अपनी प्रशासनिक सीमाओं से बाहर फैलकर अन्य कस्बों व ग्रामों को अपने में समाहित कर लेता है तो वह बस्ती सन्नगर कहलाती है। जैसे-दिल्ली, आदि ।

8. विराट या मेगालोपोलिस नगर – ये नगर सन्नगर की भाँति विकसित होते जाते हैं । जब एक सन्नगर अथवा महानगर के औद्योगिक तथा व्यावसायिक केन्द्र विकसित होकर समीपवर्ती नगरों को भी अपने में समाहित कर लेते हैं तथा इनके बीच का क्रम टूटता हुआ दिखायी नहीं देता है तो उस नगरीय बस्ती को विराट नगर कहा जाता है। 

इनकी जनसंख्या 50 लाख से अधिक होती है। मुम्बई ऐसा ही एक विराट नगर है। 

कार्य के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

नगरों का जन्म एवं विकास अनेक कारकों के प्रभावशील होने से होता है तथा प्रत्येक नगर में अनेक प्रकार के कार्यों की उत्पत्ति एवं विकास होते हैं, किन्तु अनेक नगरों की तो स्थापना ही किसी विशिष्ट कार्य को सम्पन्न करने हेतु की जाती है, जैसे- भिलाई, दुर्गापुर आदि । 

किसी-किसी नगर में कोई विशिष्ट कार्य बहुत विकसित हो जाता है और वह नगर उस काम के लिए प्रसिद्ध हो जाता है, जैसे- अहमदाबाद सूती वस्त्र के लिए, कानपुर व आगरा जूता बनाने के लिए प्रसिद्ध हैं। कुछ नगर राजनीतिक व प्रशासनिक कार्यों के लिए विकसित होते हैं 

जैसे— भोपाल, गाँधीनगर आदि । इसका अर्थ यह नहीं कि इन सब नगरों में अन्य कार्य नहीं किये जाते हैं, परन्तु उस प्रमुख कार्य के अतिरिक्त अन्य सभी कार्य वहाँ की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा अर्थव्यवस्था के लिए किये जाते हैं। अतः नगरों का वर्गीकरण उनके प्रमुख कार्यों के आधार पर किया जा सकता है, जो निम्नलिखित हैं

1. औद्योगिक नगर - आधुनिक युग में अधिकांश नगरों का विकास किसी न किसी उद्योग के कारण ही हुआ है । इसके निम्नलिखित कारण होते हैं

(i) कच्चे माल की प्राप्ति ।

(ii) विकसित परिवहन-साधनों की सुलभता ।

(iii) ऊर्जा प्राप्ति की सुविधा ।

(iv) पूँजी व आवश्यक कुशल श्रमिकों की प्राप्ति ।

(v) स्वच्छ जल की प्राप्ति |

उपर्युक्त सुविधाओं के कारण किसी स्थान पर कोई एक उद्योग बड़े पैमाने पर स्थापित किया जाता तद्नुसार वहाँ अनेक अन्य सहायक उद्योग विकसित होते जाते हैं, क्योंकि उनके विकास में संसाधन प्राप्ति का आकर्षण होता है। 

इससे साधारण गाँव भी विकसित होकर एक औद्योगिक नगर का रूप धारण कर लेता है, जैसेभिलाई, जमशेदपुर, कानपुर, गाजियाबाद आदि । > वर्गीकरण 1. औद्योगिक नगर, 2. प्रशासनिक नगर,

2. प्रशासनिक नगर - जब किसी नगर का विकास केवल प्रशासनिक कार्यालयों की स्थापना के कारण होता है, तो उसे प्रशासनिक नगर कहा जाता है। ऐसा देशों व प्रान्तों अथवा राज्यों की राजधानियों के निर्माण से सम्भव होता है। जिला मुख्यालय बनने पर भी कोई कस्बा नगर का रूप धारण कर लेता है। जैसे- चण्डीगढ़, गाँधीनगर, भोपाल, नई दिल्ली आदि ।

3. व्यापारिक नगर  - व्यापारिक नगरों का विकास उन स्थानों पर होता है, जहाँ परिवहन की सुविधाएँ होती हैं। इन नगरों का प्रमुख कार्य अपने क्षेत्र के उत्पादन को एकत्र कर माँग वाले क्षेत्रों में भेजना तथा दूसरे बाह्य स्थानों के माल को मँगाकर अपने क्षेत्र में वितरित करने का होता है। व्यापारिक नगरों का विकास निम्नलिखित चार क्षेत्रों में होता है 

(i) ग्रामीण क्षेत्र के मध्य किसी सड़क या रेल मार्ग के निकट, जैसे- हापुड़।

(ii) सड़कों या रेल-मार्गों व वायु मार्गों के मिलन स्थल पर, जैसे- कानपुर, नागपुर, आगरा आदि ।

(iii) जलमार्ग-पत्तन पर, जैसे- विशाखापट्टनम, सूरत, कोचीन ।

(iv) पर्वत व मैदान के मिलन स्थलों पर तथा मरुस्थलों के सिरों पर, जैसे- हरिद्वार, काठगोदाम, देहरादून, जोधपुर तथा बीकानेर आदि ।

4. परिवहन नगर  - इन नगरों का विकास दो या दो से अधिक सड़कों, रेल मार्गों वायु-मार्गों अथवा जल-मार्गों के मिलने पर होता है। परिवहन नगरों का प्रमुख कार्य माल उतारना व चढ़ाना तथा वाहन बदलना होता है। जैसे- मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, कानपुर व नागपुर आदि ।

5. खनिज केन्द्र - जिन स्थानों पर कोई खनिज पदार्थ उपलब्ध होता है, वहाँ ये नगर विकसित हो जाते हैं । इन नगरों का प्रमुख कार्य खनिजखोदना, खनिजों को संशोधित करना तथा परिवहन सुविधाएँ जुटाना होता है। जैसे- डिगबोई, रानीगंज, झरिया, धनबाद, बोकारो, भिलाई आदि ।

6. सुरक्षा केन्द्र - सैनिक प्रशिक्षण तथा अन्य सैनिक सम्बन्धित कार्यों हेतु छावनियाँ बनायी जाती हैं। इन सबकी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नगर विकसित हो जाते हैं, जैसे- मेरठ, फतेहगढ़, झाँसी, बीना, अम्बाला, नागपुर आदि ।

7. शिक्षा केन्द्र  - शिक्षा - सुविधा के कारण अनेक नगर विकसित हो जाते हैं जैसे—अलीगढ़, वाराणसी, पन्त नगर, खड़गपुर, पिलानी आदि ।

8. स्वास्थ्य केन्द्र  — अनेक नगरों का विकास उनकी उत्तम जलवायु व रमणीक दृश्यावली के कारण होता है, जैसे- शिमला, नैनीताल, दार्जिलिंग, मसूरी, श्रीनगर, माउण्ट आबू, उटकमण्ड, पचमढ़ी आदि ।

9. धार्मिक केन्द्र — कुछ नगर इसलिए विकसित हो जाते हैं कि उनके स्थान का कोई न कोई धार्मिक महत्व होता है। वहाँ पर धार्मिक महत्व से संबंधित व्यवसाय भी विकसित हो जाते हैं। जैसे - मथुरा, काशी (वाराणसी), गया आदि ।

10. निवास नगर - महानगरों में जनसंख्या के दबाव को कम करने के लिए उनके निकट अनेक नगर निवास नगरों के रूप में विकसित होते हैं जैसे- दिल्ली के निकट गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गाँव आदि ।

नगरों के प्रतिरूप लगभग वही होते हैं, जो ग्रामीण बस्तियों के होते हैं। इनका वर्णन ग्रामीण बस्ती प्रतिरूपों के रूप में किया जा चुका है।

भारत में नगरीय बस्तियों का वितरण

भारत में नगरीय बस्तियों का वितरण सर्वत्र एक जैसा नहीं है। यहाँ कुछ क्षेत्रों में नगर की सघनता पायी जाती है, तो कुछ क्षेत्रों में अत्यल्प नगरीय बस्तियाँ पायी जाती हैं। इस दृष्टि से भारत को निम्नलिखित नगरीय जनसंख्या के क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है - 

  • 1. उत्तरी भारत का विशाल मैदान,
  • 2. गुजरात प्रदेश,
  • 3. महाराष्ट्र व पूर्वी आन्ध्र प्रदेश,
  • 4. गोदावरी - कृष्णा डेल्टा,
  • 5. दक्षिण भारत के नगरीय क्षेत्र,
  • 6. मध्यवर्ती उच्च भाग के नगरीय क्षेत्र ।

1. उत्तरी भारत का विशाल मैदान - यह मैदान सतलज-गंगा - ब्रह्मपुत्र नदियों का मैदान है, जिसमें भारत के सर्वाधिक नगर पाये जाते हैं। इस क्षेत्र को अग्रलिखित चार उपभागों में विभाजित किया जाता है— 

(i) कोलकाता का पृष्ठ प्रदेश - इसे हुगली - दामोदर नदियों का बेसिन तथा छोटा नागपुर का पठार क्षेत्र भी कहते हैं। यह क्षेत्र भारत का महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्र है। यही क्षेत्र नगरीय जनसंख्या का भी सबसे बड़ा क्षेत्र है। इस क्षेत्र का सर्वप्रमुख केन्द्र कोलकाता पत्तन है। 

अन्य नगर जमशेदपुर, आसनसोल, गया, दुर्गापुर, हावड़ा हुगली, राँची, डाल्टनगंज, खड़गपुर, वर्तमान, राउरकेला, सिन्द्री, चित्तरंजन और बोकारो हैं।

(ii) मध्य गंगा का मैदानी प्रदेश - पटना से कानपुर तक इस क्षेत्र में चीनी उद्योग, कागज, सीमेण्ट, रासायनिक उर्वरक एवं सूती वस्त्र उद्योग केन्द्रित हैं। प्रमुख नगर पटना, मुजफ्फरपुर, मुंगेर, भागलपुर, गोरखपुर, फैजाबाद, जौनपुर, वाराणसी व इलाहाबाद हैं।

(iii) गंगा का ऊपरी मैदान या ऊपरी गंगा बेसिन - यह भाग देहरादूनदिल्ली से कानपुर-लखनऊ तक विस्तृत है । इस क्षेत्र में चीनी उद्योग, सूती वस्त्र, कागज, दियासलाई एवं रासायनिक उद्योग केन्द्रित हैं। इस क्षेत्र के प्रमुख नगर लखनऊ, कानपुर, रामपुर, सहारनपुर, देहरादून, अलीगढ़, बरेली, मथुरा, आगरा, मेरठ व दिल्ली हैं ।

(iv) पंजाब का मैदानी प्रदेश - इस क्षेत्र में होजरी का सामान, ऊनी वस्त्र, इंजीनियरिंग उद्योग, खेल का सामान और अन्य निर्माण उद्योग केन्द्रित हैं। प्रमुख नगर चण्डीगढ़ (भारत का सुनियोजित आधुनिकतम नगर), लुधियाना, अमृतसर, अम्बाला, फिरोजपुर, होशियारपुर, गुरदासपुर, करनाल तथा हिसार हैं।

2. गुजरात प्रदेश – इस प्रदेश में अधिकांश सूती वस्त्र उद्योग के केन्द्र हैं। प्रमुख नगर अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत, काठियावाड़, भडौंच, भावनगर, राजकोट, जामनगर तथा काँडला पत्तन हैं। द्वारिका प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थस्थल है। 

3. महाराष्ट्र व पूर्वी आन्ध्र प्रदेश - यह प्रदेश मुम्बई पत्तन का पृष्ठ प्रदेश है जो नागपुर, अमरावती, जलगाँव, मुम्बई, रत्नागिरि, बेलगाँव, धारवाड़, वेलगिरि, हैदराबाद और चाँदा नगरों की परिधि से घिरा है। इस क्षेत्र का सर्वप्रमुख नगर मुम्बई है, जो भारत के पश्चिमी तट का सबसे प्रमुख बन्दरगाह है। यहाँ अनेक प्रकार के उद्योग-धन्धों का विकास हुआ है। अन्य प्रमुख नगर सतारा, नासिक, अकोला, कोल्हापुर, कर्नल, औरंगाबाद, अहमदनगर, पुणे, शोलापुर आदि हैं।

4. गोदावरी - कृष्णा डेल्टा प्रदेश - इस प्रदेश का प्रमुख नगर विशाखापट्टनम है। ये नौसैनिक केन्द्र, जलयान निर्माण उद्योग तथा इस्पात उद्योग का केन्द्र है तथा इस क्षेत्र का प्रमुख पत्तन है। अन्य नगरों का विकास कृषि उत्पादों पर आधारित है। प्रमुख नगर विजयवाड़ा, मसूलीपट्टनम, काकीनाड़ा, गुन्टूर, राजमहेन्द्र व वाल्टेयर हैं।

5. दक्षिण भारत के नगरीय क्षेत्र - इस क्षेत्र में चेन्नई से बंगलौर तक यदि एक रेखा खींच दी जाय तो इस रेखा के दक्षिण का क्षेत्र आता है। जहाँ वायुयान, टेलीफोन, रेल डिब्बे, विद्युत् उपकरण एवं चमड़े का सामान बनाने कें केन्द्र हैं। 

प्रमुख नगर बंगलौर, चेन्नई, मैसूर, तिरुअनन्तपुरम्, मदुराई, कोयम्बटूर, सेलम, पाण्डिचेरी, तूतीकोरन हैं। कोजीकोड एवं कोचीन नवीन विकसित पत्तन हैं।

6. मध्यवर्ती उच्च प्रदेश - इस क्षेत्र को निम्नलिखित चार उपक्षेत्रों में विभाजित किया जाता है(i) अरावली क्षेत्र - यहाँ पर प्रशासनिक केन्द्र हैं, जो पहले रियासतों की राजधानियाँ थीं। प्रमुख नगर जयपुर, अजमेर, चित्तौड़, बूँदी व उदयपुर हैं।

(ii) अरावली पर्वत के पूर्वी क्षेत्र - ये नगर भी पूर्ववर्ती रियासतों की राजधानियाँ थीं, जो अब प्रशासनिक इकाइयाँ तथा कुछ उद्योगों के केन्द्र हैं। प्रमुख नगर ग्वालियर, झाँसी, कोटा, उज्जैन, इन्दौर, भोपाल व रतलाम हैं। 

(iii) अरावली पर्वत के पश्चिमी क्षेत्र - ये नगर भी प्राचीन रियासतों की राजधानियाँ थीं। प्रमुख नगर जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर तथा नागौर हैं। ये सभी मरुस्थलीय प्रदेश में स्थित हैं।

(iv) विन्ध्याचल क्षेत्र - इसमें जबलपुर, रीवा, सागर, कटनी तथा सतना प्रमुख नगर हैं। 

भारत में नगरीयकरण की प्रवृत्तियाँ

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, यहाँ प्राचीनकाल से नगरों का विकास हुआ है। भारत में हड़प्पा व मोहन जोदड़ो (अब पाकिस्तान में ) जैसे नगर ईसा से 2500 वर्ष पूर्व विकसित हुए थे। तदन्तर कुरुक्षेत्र, द्वारिका, इन्द्रप्रस्थ, हस्तिनापुर, राजगिरि, साँची, पाटलीपुत्र तथा वाराणसी आदि नगर विकसित हुए। नगरों के 

था, बल्कि ये मुख्यत: प्रशासकीय धार्मिक केन्द्र रहे। इन केन्द्रों में बाजार की भी अत: यहाँ व्यापार तथा कुटीर उद्योगों का विकास हुआ था । 

भारत में आर्थिक आधार पर बड़े नगरों की स्थापना एवं विकास 19 वीं व 20 वीं शताब्दी में ही हुआ और इन्हीं शताब्दियों में प्राचीन नगरों का अधिक विकास हुआ तथा उनके आकार में वृद्धि हुई। भारत में प्रथम जनगणना (सन् 1881) के अनुसार नगरीय जनसंख्या केवल 9.3 प्रतिशत ही थी । 

सन् 1921 तक अर्थात् 40 वर्षों के दौरान नगरीय जनसंख्या बढ़कर 11-18% हो गयी, परन्तु सन् 1921 के बाद नगरीय जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ी कि भारत में वर्ष 1921 को जनसांख्यिकीय विभाजक के रूप में माना जाने लगा।

नगरीयकरण के मन्द गति का कारण औद्योगिक विकास की गति का मन्द होना था। सन् 1931 के बाद नगरीयकरण की वृद्धि दर में निरन्तर वृद्धि होती गयी तथा सन् 1961 के बाद नगरीय जनसंख्या में तीव्र गति से वृद्धि होने लगी, जैसा कि उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट होता है

सन् 1921 के बाद नगरीय जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के निम्नलिखित कारण रहे -

  • 1. परिवहन साधनों का तीव्र एवं अधिक विकास
  • 2. आधुनिक उद्योगों की स्थापना ।
  • 3. रक्षा उद्योगों का विकास ।
  • 4. नवीन योजनाओं के अनुसार देश की प्रगति होना ।
  • 5. स्वास्थ्य तथा अन्य सेवाओं में वृद्धि |
  • 6. नगरीय उच्च जीवन का आकर्षण ।

सन् 1961 के बाद नगरीयकरण की तीव्र वृद्धि का कारण रोजगार की तलाश तथा नगरों में काम की प्राप्ति एवं सुरक्षा की भावना अधिक रही है। इसीलिये भारत में सन् 1961 में जहाँ नगरीय जनसंख्या 7-89 करोड़ थी, वह सन् 2001 में बढ़कर 28.53 करोड़ हो गयी। 

तीव्र नगरीकरण के परिणाम 

नगरीकरण की तीव्र प्रकृति के कारण नगरों में कई समस्याएँ उत्पन्न हो गयी हैं, जो निम्नलिखित हैं

(i) गंदी बस्ती एवं आवास की समस्या – नगरीकरण की प्रकृति से उत्पन्न सर्वाधिक जटिल समस्या गंदी बस्ती है। 

जनसंख्या की निरंतर वृद्धि से नगरों में भारी भीड़ बढ़ी है, जिससे आवासों की कमी हो गयी है । महानगरों में तो यह समस्या और भी विकराल है। बहुत से लोग फुटपाथ में जीवन-यापन करने को मजबूर हैं। 

झुग्गी झोपड़ियाँ और गंदी बस्तियाँ तेजी से बढ़ती जा रही हैं। इन बस्तियों में निम्न वर्ग विशेष कर मजदूर रहते हैं। 

इनके पास इतना धन नहीं होता कि वे अपना मकान बना सकें या किराये पर मकान ले सके। वे तो जहाँ जगह मिलती है वहाँ अपनी झोपड़ी बना लेते हैं। इनकी बस्तियाँ सुविधा विहीन होती हैं। झोपड़ियाँ छोटी-एवं बेतरतीब होती हैं। 

यहाँ सड़कों, स्वास्थ्य सेवाओं एवं मनोरंजन की सेवाओं का नितांत अभाव होता है। विद्युत् पेयजल एवं जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं होती । फलतः चारों तरफ गंदगी का वातावरण होता है। मच्छर मक्खियों की भरमार रहती है परिणामतः इन बस्तियों में रहने वाले लोग अधिकतर कुपोषण एवं विभिन्न खाली छोटी बीमारियों से ग्रस्त रहते हैं । 

(ii) तीव्र नगरीकरण के कारण पर्यावरण प्रदूषण बढ़ा है, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी हो गयी है ।

(iii) यातायात व्यवस्था नगण्य रह गयी है ।

(iv) उपभोक्ता वस्तुओं का अभाव हो जाता है । आवश्यक वस्तुओं के लिए कभी-कभी लम्बी लाइन लगानी पड़ती है ।

(v) सभी को काम न मिल पाने के कारण नगरों में अशान्ति का वातावरण बना है।

(vi) नगरों का सौन्दर्य अधिक जनसंख्या बसाव एवं भारी यातायात के कारण नष्ट होता जा रहा है। समस्याओं का निवारण

गंदी बस्तियों का उन्मूलन एवं गंदगी निवारण – तीव्र नगरीकरण के फलस्वरूप शहरों में गंदी बस्तियाँ बढ़ती जा रही हैं। गंदी बस्तियों के बाढ़ को रोकने के लिए निम्न उपाय अपनाया जाना चाहिए-

(i) गरीब एवं मजदूर वर्ग के लिए कम कीमतों पर सुविधायुक्त आवास की व्यवस्था की जानी चाहिए।  वैसे राष्ट्रीय आवास-नीति के तहत “सभी को आवास” कार्यक्रम के अंतर्गत हर वर्ष 20 लाख अतिरिक्त मकानों के निर्माण को सुलभ करने का प्रस्ताव है और ऐसा करते समय आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों, निम्न आय वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों की जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। 

बीस लाख मकानों में से 7 लाख शहरी क्षेत्रों में तथा शेष 13 लाख ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए जाएगे।

(ii) बाहर से अस्थायी रूप से आने वाले मजदूरों को कम किराये पर मकान उपलब्ध कराया जाय एवं झुग्गी-झोपड़ी बनाने पर प्रतिबंध गाया जाय।अंतर्गत हर वर्ष 20 लाख अतिरिक्त मकानो

(iii) छोटे-छोटे नगरों का विकास किया जाए ।

(iv) नगरीय सुविधाओं को गाँवों तक विकसित किया जाए।

(v) ग्रामीणों को सुरक्षा प्रदान की जाय, जिससे भय के कारण वे नगरों की ओर न भागें । 

(vi) उद्योगों की स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में की जाय (लघु व कुटीर उद्योगों को बढ़ावा ) । 

(vii) गाँवों में स्वास्थ्य एवं शिक्षा की समुचित सुविधा उपलब्ध करायी जाय ।

भारत – अनेकता में एकता

प्राचीन काल से ही भारत एक सभ्य एवं सुसंस्कृत देश रहा हैकई ताकतों ने भारतीय संस्कृति पर आक्रमण किये पर आज भी वह अमर है। अनेक विदेशी सांस्कृतिक धाराएँ आईं जो भारतीय संस्कृति में आत्मसात हो गईं । इसके व्यक्तित्व निर्माण में भौतिक तथा मानवीय तत्वों का योगदान रहा है ।

भारत 8°–4' से 37° -6' उत्तरी अक्षांश तथा 68°-7' से 97°–6' पूर्वी देशान्तर तक विस्तृत है। उत्तर से दक्षिण तक इसकी कुल लम्बाई 3214 किमी तथा पूर्व से पश्चिम चौड़ाई 2933 किमी है। इसकी स्थलीय सीमा का विस्तार 15200 किमी एवं तटरेखा का विस्तार 6100 किमी है। 

विश्व में भारत ही ऐसा देश है जिनके नाम पर महासागर का नाम हिन्द महासागर रखा गया है। इस विशाल देश की भौगोलिक विशेषताओं में उच्चावच, जलवायु, प्राकृतिक वनस्पति, प्रजातियों, धर्म व संस्कृति आदि में विविधता पायी जाती है, जिसका विवरण इस प्रकार है

1. धरातलीय विभिन्नता - भारत में अत्यधिक धरातलीय विभिन्नता पायी जाती है। उत्तर में विश्व की सर्वोच्च चोटी हिमालय पर्वत है, जिसकी उत्पत्ति कुछ ही करोड़ वर्ष पूर्व हुई है, जबकि दक्षिण में अति प्राचीन शैल युक्त प्रायद्वीपीय पठार स्थित है। 

इन दोनों स्थल भागों के मध्य में सतलज-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान विस्तृत है। प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी एवं पश्चिमी भागों में तटीय मैदान पाये जाते हैं, जो अपेक्षाकृत नवीन हैं।

2. जलवायु में विभिन्नता - कर्क रेखा भारत के मध्य से होकर गुजरती है, जो भारत को उष्ण एवं उपोष्ण कटिबन्धों में विभाजित करती है। कर्क रेखा के उत्तरी भागों में ग्रीष्म ऋतु में तापमान अत्यधिक ऊँचा रहता है, जबकि शीतकाल में तापमान अत्यन्त कम हो जाता है। कहीं-कहीं तापमान हिमांक से नीचे पहुँच जाता है। इसके विपरीत दक्षिणी भाग में तापमान में ज्यादा विभिन्नता नहीं पायी जाती है। 

इसी प्रकार वर्षा के वितरण में भी अत्यधिक विभिन्नता परिलक्षित होती है। पूर्व से पश्चिम की ओर वर्षा की मात्रा घटती जाती है। जहाँ उत्तरी-पूर्वी भाग में स्थित चेरापूँजी में विश्व की सर्वाधिक वर्षा (लगभग 1080 सेमी) होती है। वहीं उत्तरीपश्चिमी भाग में स्थित थार के मरुस्थल में वर्षा का वार्षिक औसत 10 सेमी से भी कम रहता है।

3. वनस्पति में विभिन्नता - भारत के उत्तर में हिमालय से दक्षिण में कन्याकुमारी तक, पूर्व में असम की पहाड़ियों से पश्चिम में राजस्थान के थार मरुस्थल तक मिट्टी, वर्षा, तापमान आदि में विभिन्नता पायी जाती है, अत: वनस्पतियों में पर्याप्त विभिन्नता पायी जाती है।

 प्रायद्वीपीय पठार के आन्तरिक भागों में पतझड़ वन थार के मरुस्थल में कँटीली झाड़ियाँ, हिमालय पर्वतीय क्षेत्र के कोणधारी वन तथा पश्चिमी घाट एवं असम में सदाबहार वन पाये जाते हैं।

4. कृषि में विभिन्नता - वनस्पति की भाँति फसल उत्पादन में भी विभिन्नता पायी जाती है। विभिन्न स्थानों में यहाँ विश्व की लगभग सभी प्रकार की फसलें ली जाती हैं। जैसे-चावल, गेहूँ, तिलहन, केला, सब्जियाँ, रबर, गर्म मसाले, चाय, सिनकोना, नारियल आदि जो भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

5. प्रजातियों व जातियों में विभिन्नता - विश्व में पायी जाने वाली 7 प्रजातियों में से 6 प्रजातियाँ किसी न किसी रूप में भारत में पायी जाती हैं। ये प्रजातियाँ हैं- निग्रीटो, आद्य आस्ट्रेलियाई, मंगोलॉयड, मेडितरेनियन, डिनारिक्स एवं नार्डिकस हैं । उत्तर भारत में गौर वर्ण एवं लम्बे कद, मध्य भारत में गेहुँआ रंग एवं मध्यम कद के तथा दक्षिण भारत में गहरे चमकीले रंग एवं नाटे कद के लोग पाये जाते हैं।

आर्यों ने प्राचीन समय में कर्म के आधार पर समाज को चार वर्णों या जातियों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र में विभाजित किया था। कालान्तर में यह जाति व्यवस्था कर्म के बजाय जन्म से मानी जाने लगी ।

6. भाषा एवं बोली – भाषा विचारों को व्यक्त करने का एक माध्यम है। भारत में भाषाओं एवं बोलियों में अत्यधिक विभिन्नता पायी जाती है। भारत में लगभग 200 भाषाएँ तथा 1652 से अधिक बोलियाँ बोली जाती हैं। भाषा में व्याप्त इसी भिन्नता के कारण 1 नवम्बर, सन् 1956 को भारत में प्रान्तों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर किया गया ।

7. धर्म की विभिन्नता – भारत में विभिन्न धर्मों के अनुयायी रहते हैं। भारत सरकार की धर्म निरपेक्षता की नीति से यहाँ विश्व के अनेक धर्मों का विकास हुआ। यहाँ की कुल जनसंख्या में से लगभग 67-25% हिन्दू, 25.41% मुस्लिम, 2·60% ईसाई, 2.12% सिक्ख, 0-82% बौद्ध, 0.59% जैन एवं शेष 1-21% अन्य धर्मों के अनुयायी हैं। इस प्रकार धार्मिक दृष्टि से भारत में विभिन्नताएँ पायी जाती हैं।

8. सांस्कृतिक विभिन्नता - उपर्युक्त तथ्यों के अनुसार भारत में सांस्कृतिक भिन्नताएँ स्पष्टतः परिलक्षित होती हैं। अलग-अलग प्रदेशों में निवास करने वाले लोगों के रहन-सहन, वेश-भूषा, रीति-रिवाज, लोक कला, संगीत एवं नृत्य शैली, मूर्तिकला एवं वस्तुकला आदि बातों में अत्यधिक विविधता दिखाई देती है। अनेकता में एकता

भारत विशाल क्षेत्रफल में फैला हुआ है, फलस्वरूप इसकी धरातलीय स्वरूप में विभिन्नता स्वाभाविक है। इसके साथ ही जलवायु, वनस्पति, कृषि पद्धति, प्रजाति, भाषा, धर्म, संस्कृति आदि में भिन्नता परिलक्षित होती है। फिर भी सम्पूर्ण भारत एक राष्ट्र है, जो निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट है1. विशिष्ट भौगोलिक व्यक्तित्व - भारत के विशिष्ट भौगोलिक व्यक्तित्व की सटीक व्याख्या प्राचीन ग्रन्थ 'विष्णु पुराण' के निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट है

उत्तरंयत हिमाद्रेश्चैव, समुद्रस्य दक्षिणम् । 
वर्ष तत् भारत नाम: भारती यत्र सन्ततिः ॥

अर्थात्– ‘पृथ्वी के उस प्रदेश को जो कि उत्तर में हिमालय से दक्षिण में सेतुबन्ध (हिन्द महासागर) तक फैला है एवं जिसमें भारतीय सन्तति (सन्तान) बसती है, भारत या भारतवर्ष कहा जाता है।' 

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि भारत के उत्तर में गगनचुम्बी हिमालय पर्वत, पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर. एवं दक्षिण में हिन्द महासागर सम्पूर्ण भारत को विशिष्ट भौगोलिक व्यक्तित्व प्रदान करते हैं ।

2. मानसूनी जलवायु की सर्वव्यापकता - देश के सम्पूर्ण भू-भाग में मानसूनी जलवायु का प्रभाव परिलक्षित होता है। इसीलिए ग्रीष्मकाल में लगभग सभी क्षेत्रों में वर्षा होती है और शीतकाल सामान्यतः शुष्क होता है।

मानसून की सर्वव्यापकता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि “भारतीय कृषि को मानसून का जुआ" कहा जाता है अर्थात् सभी भारतवासियों पर मानसूनी जलवायु का प्रभाव समान रूप से पड़ता है।

3. भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि - कृषि भारत के सम्पूर्ण भाग का एक महत्वपूर्ण आधारभूत व्यवसाय है। देश के अधिकांश हिस्सों में सभी लोगों द्वारा परम्परागत दृष्टिकोण से कृषि की जाती है। प्रमुख फसल के रूप में चावल एवं गेहूँ का उत्पादन किया जाता है। चावल का उपयोग प्राचीन काल से पूजा आदि कार्यों में 'अक्षत्त' के नाम से होता रहा है। -

4. राजनैतिक एकता- प्राचीन काल से ही भारतीय राजाओं की इच्छा चक्रवर्ती सम्राट बनकर सम्पूर्ण भारत पर राज्य करने की रही है। राजसूय यज्ञ एवं अश्वमेघ यज्ञ भी इसी राजनैतिक एकता की पहचान थे। 

सम्राट अशोक, समुद्रगुप्त, अकबर जैसे महाराजाओं ने सम्पूर्ण भारत पर अपनी सत्ता स्थापित कर देश की एकता को मजबूत बनाया। अंग्रेजों के शासनकाल में देश की राजनैतिक एकता सुदृढ़ हुई, जो कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् आज तक विद्यमान है।

5. सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकता - प्रो. डोडवैल ने भारतीय संस्कृति की विशेषता के बारे में अपना विचार इस प्रकार व्यक्त किया है- “भारतीय संस्कृति एक विशाल महासागर के समान है, जिसमें अनेक दिशाओं से विभिन्न जातियाँ और धर्म रूपी नदियाँ आकर विलीन होती हैं ।”

प्रो. डोडवैल का यह कथन भारत की सांस्कृतिक एवं सामाजिक एकता को प्रदर्शित करता है, हमारे देश में प्राचीनकाल से विभिन्न जातियों के आगमन एवं अनेक सभ्यताओं के सम्पर्क से भारतीय संस्कृति समृद्ध होती गई एवं उसकी मूल आत्मा में कोई अन्तर नहीं आ पाया । महाकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने उपर्युक्त तथ्यों को निम्नलिखित पंक्तियों में सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है

हेथाय आर्य, हेथाय अनार्य, हेथाय द्राविड़ चीन ।
शक, हूण, ढल, पाठान, मोगल, एक देह हलो लीन ॥

अर्थात् यहाँ आर्य हैं, अनार्य हैं, यहाँ द्रविड़ और चीनी भी हैं । शक, हूण, मुगल, पठान और न जाने कितनी अन्य जातियों के लोग यहाँ आये और इस देश की देह में मिलकर उसी में मानो लीन हो गये। यही कारण है कि भारत में विभिन्न विचारों का सुन्दर समन्वय हुआ है और हमारी संस्कृति एक मिली-जुली संस्कृति कही जाती है।

6. सर्व धर्म समभाव की भावना - यद्यपि, भारत में प्राचीनकाल से ही विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग निवास करते हैं, परन्तु सभी धर्मों के अनुयायी दूसरे धर्म के प्रति आदर की भावना रखते हैं। इसीलिए जब भारतीय मुसलमान, ईरान, इराक या सऊदी अरब जाता है तो वह स्वयं को विदेशी महसूस करता है, जबकि दिल्ली व लखनऊ के हिन्दुओं को वह अपने अधिक निकट पाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि यहाँ के लोगों में सभी धर्मों के प्रति समभाव की भावना पायी जाती है ।

निष्कर्षतः भारत जैसे- विशाल देश में धरातलीय स्वरूप में भिन्नता, जलवायु, वनस्पति, आदि तत्वों में विभिन्नता ऊपरी तौर पर दिखायी पड़ती है। वास्तव में भारत की विभिन्नता एवं एकता के तत्व परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं, अतः अनेकता में एकता भारत की विशेषता है।

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