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निजी क्षेत्र के उद्योग किसे कहते हैं

निजी क्षेत्र से आशय अर्थव्यवस्था के उस क्षेत्र से है जिसमें उत्पादन साधनों पर निजी व्यक्तियों का स्वामित्व होता है तथा वैयक्तिक हितों में संवर्द्धन एवं लाभ-प्राप्ति के उद्देश्य से ही इसका प्रयोग किया जाता है। आज निजी क्षेत्र का अर्थ काफी हद तक परिवर्तित हो चुका है। 

जहाँ 19 वीं शताब्दी तक निजी उद्यम का तात्पर्य ऐसे उद्यम से होता था जिसका स्वामित्व एक या दो व्यक्तियों के हाथों में होता था किन्तु आज इसका तात्पर्य उन उद्यमों से है, जिनका स्वामित्व अनेक शेयरधारकों के बीच विभाजित होता था और उद्यम का संचालन व्यावसायिक प्रबन्धकों द्वारा किया जाता है।

निजी क्षेत्र की विशेषताएं लिखिए

निजी क्षेत्र की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं - 

(1) इस क्षेत्र में सम्पत्तियों पर निजी व्यक्तियों का अधिकार होता है और उन्हें इस बात की स्वतन्त्रता होती है कि वे अपनी सम्पत्ति का उपयोग स्वेच्छा से किसी भी विधि से करें।

(2) निजी क्षेत्र में उत्पादन का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है।

(3) निजी क्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक स्वतन्त्रता होती है।

(4) निजी क्षेत्र में अधिक कार्य की स्वतन्त्रता होने के कारण पूर्ण स्पर्द्धा की स्थिति पायी जाती है। 

(5) इस क्षेत्र में कीमत यन्त्र एक निर्देशक यन्त्र के सदृश होता है जो उत्पादन, उपभोग, वितरण, व्यवसाय, प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन करता है।

(6) निजी क्षेत्र में राज्य का हस्तक्षेप नहीं होता है। अर्थव्यवस्था में अधिकांश निर्णय निजी व्यक्तियों द्वारा लिये जाते हैं ।

भारत में निजी क्षेत्र का उद्गम एवं विकास

भारत में निजी क्षेत्र का उद्गम 1833 में हुआ जबकि ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने एकाधिकारिक व्यापारिक कम्पनी के रूप में कार्य करना बन्द कर दिया । 1833 के चार्टर्ड अधिनियम ने भारत में प्रबन्ध अभिकर्ता प्रणाली की शुरूआत के लिए मार्ग प्रशस्त किया। यद्यपि भारत के नियोजित आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्र को अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया गया है फिर भी निजी क्षेत्र ने भी इसमें पहत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय देश में वर्तमान अधिकांश उद्योग निजी स्वामित्व में ही थे किन्तु 1948 और 1956 की औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र को बड़े और अधिक पूँजी लगाने वाले क्षेत्रों की प्रमुख भूमिका सौंप दी गई। फिर भी निजी क्षेत्र ने अपना विकास जारी रखा हैं।

1991 के पश्चात् सरकार ने पुनः निजी क्षेत्र को अर्थव्यवस्था में मुख्य भूमिका प्रदान करने का निर्णय किया । इसी उद्देश्य से नई औद्योगिक नीति में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित क्षेत्रों की संख्या में कमी की गई। निजी उद्यमियों को प्रोत्साहित करने हेतु अनेक छूटें दी गई हैं तथा ऐसी उम्मीद की जाती है कि शीघ्र ही निजी क्षेत्र अपना अधिकाधिक विस्तार करने में सफल होगा।

भारत में निजी क्षेत्र की संरचना

भारत में निजी क्षेत्र के उद्योगों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है -

(1) असंगठित व्यक्तिगत उत्पादक इकाइयाँ।
(2) छोटे आकार की इकाइयाँ। 
(3) बड़े आकार की इकाइयाँ।

पहली दोनों श्रेणियों की इकाइयों की संख्या तीसरी श्रेणी की इकाइयों की संख्या से कहीं अधिक है लेकिन निजी क्षेत्र में बड़े आकार के उद्योग ही महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान में औद्योगिक इकाइयाँ जिनमें 35 लाख रुपये से अधिक मूल्य की पूंजी का विनियोग किया गया है, की संख्या कुल औद्योगिक इकाइयों की केवल 6.3%, थी, जबकि औद्योगिक क्षेत्र द्वारा प्रदान किये जाने वाले कुल रोजगार में इनका प्रतिशत 60.6% था। 

निजी क्षेत्र की उपलब्धियाँ

भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में निजी क्षेत्र ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। निजी क्षेत्र की कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं - 

(1) बचतों में योगदान - विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में निजी क्षेत्र की बचतों में निरन्तर वृद्धि हुई है। प्रथम पंचवर्षीय योजना में निजी क्षेत्र की कुल बचते 687 करोड़ रुपये थी जो कि योजना के कुल व्यय का 35 1995-96 में निजी क्षेत्र का सकल घरेलू बचतों में योगदान 45,336 करोड़ रुपये था।

(2) पूँजी निर्माण - निजी क्षेत्र के अन्तर्गत पूँजी निर्माण में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। सन् 1950-51 में घरेलू क्षेत्र का सकल पूंजी निर्माण में योगदान कुल राष्ट्रीय उत्पादन का 6-9 प्रतिशत था जो 1995-96 में बढ़कर 16.3 प्रतिशत हो गया।

(3) रोजगार सृजन - निजी क्षेत्र के उन गैर-कृषि व्यवसायों की संख्या जो कि 10 या इससे अधिक व्यक्तियों को रोजगार प्रदान करते हैं, वर्ष 1996 में बढ़कर 80-59 लाख हो गई। यह संगठित क्षेत्र में रोजगार का लगभग 30 प्रतिशत भाग है।

(4) छोटी इकाइयों का भारी विस्तार - बड़े पैमाने के संगठित उद्योगों से बाहर ऐसी छोटी-छोटी इकाइयाँ हैं जो बराबर उत्पादन, विकेन्द्रीकरण और यहाँ तक कि निर्यात के मामलों में बहुत योगदान करती रही हैं। कुल पंजीकृत कारखानों में छोटे पैमाने के उद्योगों, जिनका उद्योग निदेशालयों में पंजीकरण हो चुका है, की संख्या 90 प्रतिशत थी और पंजीकृत विनिर्माण क्षेत्र के कुल उत्पादन का 40 प्रतिशत भाग इन्हीं की देन है।

(5) परिसम्पत्तियों की वृद्धि - व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की परिसम्पत्तियों को उनके आकार एवं वितीय क्षमता का अच्छा सूचक माना जाता है। वर्ष 1963-64 में देश के 20 बड़े व्यावसायिक घरानों की कुल परिसम्पत्तियों का मूल्य 1,326 करोड़ रुपये था जो सन् 1996 में बढ़कर 1,08,668 करोड़ रुपये हो गया।

निजी क्षेत्र की सीमाएँ

यद्यपि निजी क्षेत्र का देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण स्थान है फिर भी इसमें कुछ दोष पाये जाते हैं जो इस प्रकार हैं - 

(1) आर्थिक सत्ता का केन्द्रीकरण - निजी क्षेत्र में कुछ बड़े उद्योगपतियों के हाथों में आर्थिक शक्ति का केन्द्रीकरण हो जाता है और इस आर्थिक केन्द्रीकरण के कारण राजनीतिक सत्ता भी प्रभावित हुई है।

(2) वर्ग संघर्ष - निजी क्षेत्र में समाज दो वर्गों में विभक्त हो जाता है-पूँजीपति और श्रमिक वर्ग। दोनों वर्ग अपने हितों की पूर्ति चाहते हैं इसलिये निरन्तर वर्ग-संघर्ष बना रहता है।

(3) आर्थिक साधनों का अपव्यय - प्रतियोगिता निजी क्षेत्र की प्रमुख विशेषता है। निजी क्षेत्र में प्रत्येक उत्पादक अपने प्रतिद्वन्द्वी को बाजार से बाहर करने के लिये विज्ञापन एवं प्रचार पर काफी अपव्यय करता है।

(4) आर्थिक अस्थिरता - आर्थिक अस्थिरता का प्रमुख कारण माँग और पूर्ति का अपूर्ण समायोजन है। निजी क्षेत्र में आवश्यकतानुसार उत्पादन नहीं किया जाता है, बल्कि लाभ की दृष्टि से किया जाता है। फलस्वरूप निजी क्षेत्र में समय-समय पर अधिक उत्पादन या न्यून उत्पादन की समस्याएँ बनी रहती हैं।

(5) अधिक लाभ की भावना - निजी क्षेत्र प्रायः अधिक लाभ की भावना से कार्य करते हैं। अतः ये अनुचित व्यापार नीतियों का अनुसरण करते हुए केवल टन वस्तुओं का उत्पादन करते हैं जिनमें लाभ की दर अधिक होने की सम्भावना होती है। इससे असन्तुलित क्षेत्रीय विकास होता है।

(6) सामाजिक कल्याण की उपेक्षा - निजी क्षेत्र में उत्पादन केवल व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से किया जाता है, उत्पादक सामाजिक कल्याण को ध्यान में नहीं रखता है। 

निजी क्षेत्र मे सुधार

निजी क्षेत्र को प्रभावशाली बनाने के लिए सरकार ने अनेक कदम उठाये हैं

(1) निजी क्षेत्र का विस्तार - इसके लिए अनेक उपाय किये गये हैं। एक तो सार्वजनिक क्षेत्र के लिए अभी तक सुरक्षित 17 उद्योगों को घटाकर 5 कर दिया गया है। शेष 12 उद्योगों को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया 

(2) प्रतियोगिता को बढ़ावा - अर्थव्यवस्था को अधिक बाजारोन्मुख बनाने के उद्देश्य से सरकार ने निजी क्षेत्र को कार्य-संचालन के सम्बन्ध में पर्याप्त छूट देने की व्यवस्था की है।

(3) विश्वव्यापीकरण - निजी क्षेत्र के कार्यकलापों को विश्वव्यापक बनाने के उद्देश्य से भी कई परिवर्तन लाए गए हैं। अर्थात् घरेलू अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ना जिससे यह बाहर की ओर उन्मुख हो सके । इससे निजी क्षेत्र का विस्तार होगा।

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