फ्रांसीसी क्रांति के कारण - French Revolution

फ्रांसीसी क्रांति के कारण

फ्रांस की राज्य क्रांति 1789 में हुई थी। यह क्रांति राजतंत्र को समाप्त करने वाली विश्व की प्रथम क्रांति थी। विद्वानों के अनुसार विश्व में क्रांति शब्द का प्रारंभ फ्राँस में ही हुआ। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का नारा भी फ्राँस की ही देन है। फ्राँस में बूर्बो राजवंश था। लुई सोलहवाँ फ्राँस में शासन कर रहा था। वह बड़ा निरंकुश शासक था।

लुई 16वों के दोषपूर्ण नीतियों एवं कार्यों के कारण जनता में असंतोष बढ़ता गया। रानी मेरी अन्त्वानेत अद्वितीय सुन्दरी थी। रानी अपव्ययी, मूर्ख और चाटुकारों से प्रभावित थी। रानी के प्रभाव मे आकार राजा जनता पर तरह-तरह के अत्याचार करने लगा। 

राजा के शोषण व बिचौलियों की दमनकारी नीति से छुटकारा पाने के लिए जनता को क्रांति का सहारा लेना पड़ा। जिस समय अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम का युद्ध लड़ा जा रहा था उसी समय फ्राँस में क्रांति का बीजारोपण हुआ। अमेरिका की क्रांति के बजाय फ्राँस की क्रांति ने विश्व को झकझोर दिया। विश्व का कोई भी देश तटस्थ रह नहीं पाया। 

फ्राँस की राज्यक्रांति के निम्नलिखित कारण थे

1.राजनैतिक कारण

1. निरंकुश एवं स्वच्छाचरी शासन - फ्राँस में एकतंत्र, निरंकुश एवं स्वेच्छाचारी शासन था। राजा का पद वंशानुगत होता था। दैवी अधिकारों के सिद्धांतों के अनुसार शासन करता था। लुई चौदहवाँ कहा करता था मैं ही राज्य हूँ। लुई सोलहवाँ जिसके समय क्रांति हुई थी। कहा करता था कि यह चीज इसलिए कानूनी है क्यों मैं ऐसा ही चाहता हूँ। 

फ्रांसीसी क्रांति के कारण - French Revolution

राजा की कानून बनाता था, वही कर लगाता और युद्ध की घोषण भी करता था। राजा की शक्तियों पर अंकुश लगाने वाली दो संस्थाएँ स्टेट्स जनरल और परलामा था। इन संस्थाओं को बैठक 1664 के बाद से एक बार भी नहीं बुलाया गया था।

2. राज दरबार विलासिता का केन्द्र - राजा पेरिस से 12 मील दूर वर्साय के राजमहल में शान-शौकत के साथ रहता था। रानी मेरी अन्त्वानेत अमोद-प्रमोद में तल्लीन रहती थी। हेजन लिखते हैं कि 'लोग राजदरबार को राष्ट्र की कब्र कहकर पुकारते थे।

3. स्वतंत्रता का अभाव - फ्राँस कई प्रांतों में विभक्त था । भिन्न-भिन्न प्रांतों में भिन्न-भिन्न कानून | एक जगह मुद्रा का चलन तो दूसरी जगह कुछ और।

4. दोषपूर्ण शासन व्यवस्था - कुलीन लोगों के द्वारा उच्च पदों को खरीद लिया जाता था वे जनता से मन माना कर वसूला करते थे। पदों की बिक्री से जनता दुःखी थी।

5. भेदभाव पूर्ण न्याय व्यवस्था - फ्राँस की न्याय व्यवस्था दूषित थी । जन साधारण को छोटे-मोटे अपराध Tके लिए कड़ी से कड़ी सजी दी जाती थी। अपराधों के लिए उच्च वर्ग को सामान्य सजा दीअजाती थी।

2. आर्थिक कारण

1. दोषपूर्ण कर प्रणाली - फ्रॉस की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी । कर की प्रथा अन्यायपूर्ण एवं कठोर थी। मुख्य कर थे- यातायात कर, खेतों की बिक्री कर, नमक कर, मृत्यु कर, ताइथ और पोल टैक्स आदि। भेदभाव पूर्ण कर नीति का कारण ही फ्राँस में सर्वसाधारण जनता में असंतोष था ।

2. कर प्रथा - कर वसूल करने का तरीका अन्यायपूर्ण था। कुछ बिचौलिये मन माना कर वसूल करते थे। सरकार को बंधी हुई रकम देते थे।

3. दयनीय आर्थिक स्थिति - राजकोष राजा रानी के ऐशो आराम में समाप्त हो चुका था। लुई सोलहवें के शासनकाल में राज्य का ऋण बढ़कर लगभग 60 करोड़ डॉलर हो गया था।

3. सामाजिक कारण

सामाजिक वर्गीकरण - फ्राँस के समाज में विषमता बहुत थी । व्यक्ति की राजनैतिक व सामाजिक स्थिति से उसके आधार निर्धारित होते थे। 

सामाजिक वर्गीकरण - फ्रांसीसी समाज का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया जा सकता है

1. प्रथम एस्टेट अर्थात पादरी वर्ग - दो वर्ग थे, बड़े पादरी और छोटे पादरी। बड़े पादरियों के पास भूमि का 2/5 भाग था। छोटे पादरी गरीब थे। इन्होंने जनसाधारण की सहायता की।

2. द्वितीय एस्टेट अर्थात् कुलीन वर्ग - सामंत, राजदरबार तथा बड़े-बड़े सरकारी अधिकारी आते थे। सामंत भी दो प्रकार थे - 1. दरबारी सामंत, 2. प्रांतीय सामत। साधारण जनता का शोषण इनका लक्ष्यं था। 

3. तृतीय एस्टेट अर्थात् साधारण जनता - साधारण जनता 95% थे तीसरे वर्ग में सर्वाधिक संख्या किसानों की थी, फ्राँस का सबसे अधिक शोषित वर्ग किसानों का ही था। किसानों को कर न केवल राजा को देना पड़ता था वरन् कुलीनों एवं पादरियों का खर्च उठाना पड़ता था।

मध्यम वर्ग को बुर्जुआ वर्ग कहा जाता था । इनके डॉक्टर, वकील, जज, व्यापारी, बैंकर और सरकारी कर्मचारी इत्यादि आते थे। मध्यम वर्ग के लोगों का फ्राँस में क्रांति कराने में महत्वपूर्ण योगदान था।

4. बौद्धिक कारण

फ्राँस के लेखक, विचारक और दार्शनिक बहुत हद तक क्रांति के उत्तरदायी थे। दर्शनिकों में माटेस्टक्यू रूसो, वाल्टेयर, दिदरों तथा शेक्सपियर के नाम उल्लेखनीय है। इन विचारकों ने फ्राँस की जनता के मस्तिष्क को झकझोर दिया। उनके मन में क्रांति की बीज बोए।

रूसो ने सामाजिक - समझौता पुस्तक में लिखा है- मनुष्य स्वतंत्र जन्म लेता है, किन्तु वह सर्वत्र जंजीरों से जकड़ा हुआ है।

 ब्रिटिश एवं अमेरिकी क्रांतियों का फ्रांसीसियों पर प्रभाव

फ्रांसीसी क्रांति पर ब्रिटिश तथा अमेरिकी क्रांतियों का भी व्यापक प्रभाव पड़ा। इंग्लैंड को देख फ्राँस भी संसदीय शासन पद्धति की करना चाहती थी । स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया। और प्रजातंत्र की सफलता देखी थी।

5. तात्कालिक कारण

फ्राँस की बिगड़ी हुई आर्थिक दशा सुधारने के लिए लुई सोलहवें ने 4 मई, 1789 ई. में स्टेटस जनरल का अधिवेशन बुलाया। फ्राँस की संसद स्टेटस जनरल कहलाती थी। इस समय लोगों में असीम उत्साह और उत्तेजना थी। इस अधिवेशन में सामन्त और पादरी वर्ग ने भाग नहीं लिया। अतः जनसाधारण का तीसरा सदन क्षुब्ध हो उठा। 

चूँकि तीसरा सदन 90% जनता का प्रतिनिधित्व करता था। इसलिए वह मानता था कि उसे अपनी बात कहने और मनवाने का अधिकार है। तृतीय सदन ने अपने अधिकारों को पाने के लिए और तद्नुरूप अधिनियम पारित करवाने के लिए अपने आपको राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया। उन्होंने अन्य दोनों एस्टेट्स (सदनों) को भी राष्ट्रीय सभा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। धीरे-धीरे साधारण पादरी जनसाधारण से सहानुभूतिवश राष्ट्रीय सभा में शामिल होने लगे।

क्रांति का प्रारंभ - प्रारम्भ में ही राजा तथा संसद के बीच तब टकराव हो गया। 30 को जब सदस्यगण अपने सभागृह में जाने लगे तो राजा ने बैठक भवन को बंद कर दिया । नाराज सदस्यगण पास ही बने टेनिस कोर्ट में चले गए और वहीं उन्होंने शपथ ली। यही टेनिस कोर्ट की शपथ कहलाती है। राजा ने बैठक अवैध घोषित कर दी। 

फ्राँस की राजधानी पेरिस की जनता ने वास्तील (वैस्टाइल) नाम के पुराने जेल खाने पर धावा बोल दिया। रक्षा करने वाले सैनिकों की हत्या कर दी और कैदियों को मुक्त कर दिया। इस प्रकार क्रांति प्रारंभ हो गई। फ्राँस में हर वर्ष 14 जुलाई का दिन राष्ट्रीय त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

क्रांति का प्रसार - वास्तील पतन का प्रभाव नगरों तथा देहात की जनता पर भी पड़ा गाँवों में किसानों ने क्रांति का झंडा फहरा दिया। सामन्ती अभिलेख जला दिए, गोदामों में आग लगा दी। राष्ट्रीय सभा जो अब संविधान सभा कहलाने लगी थी। 

अतः पुरानी सामंती व्यवस्था को दफना दिया गया। राष्ट्रीय सभा ने मानव और नागरिकों के अधिकारों की घोषण की। 27 अगस्त सन् 1789 ई. को संविधान सभा ने मानवाधिकारों की घोषणा की जिसमें निम्नलिखित बातें थी

1. कानून की दृष्टि में सब व्यक्तियों को समानता।
2. सार्वजनिक पदों पर सब नागरिकों के नियुक्त होने का अधिकार।
3. बिना कारण दंड देने या बंदी बनाए जाने से मुक्ति।
4. भाषण व प्रकाशन (प्रेस) की स्वतंत्रता के सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से स्वीकारा गया था।
5. कर का भार सभी वर्गों पर बराबर डालने का निश्चय।
6. सभी को निजी सम्पत्ति रखने का अधिकार।

यूरोप के लिए यह क्रांतिकारी घोषणा अत्यधिक महत्व थी। यूरोप के सभी देशों का शासन उस समय विशेषाधिकारों पर आधारित था।

राजतंत्र का अंत - इस दशा में बहुत से अभिजात वर्ग के व्यक्ति और पादरी भागकर दूसरे देशों में चले गए। उन्होंने वहाँ की सरकारों को क्रांति के विरुद्ध हस्तक्षेप करने के लिए भड़काया। राजा और रानी भी वेश बदलकर फ्राँस से भागना चाहते थे किन्तु जनता ने उन्हें पहचान लिया। उन्हें पकड़कर देशद्रोहियों और बंदियों के रूप में वापिस लाया गया। 

फ्राँस को आस्ट्रिया, प्रशा और सेवाय (इटली) के राजाओं के विरुद्ध लड़ना पड़ा। राजा और रानी पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें 1793 ई. में फाँसी दे दी गई। इसके बाद ब्रिटेन, हालैण्ड, स्पेन और हंगरी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की गई। तब फ्राँस के उग्र दल जैकोबिन्स ने जिसके सदस्य

लोकतंत्र में विश्वास करते थे, अपनी सरकार बनाई । क्रांति-विरोधी शक्तियों को कुचलने के लिए इस ने कठोर कदम उठाए। चौदह महीनों में लगभग 17,000 व्यक्तियों पर मुकदमें चलाए गए और उन्हें फाँसी दे दी गई। इनमें ऐसे भी लोग थे जो निर्दोष थे। 

लोगों ने इसे आतंक का राज्य कहा है। एक नया संविधान बनाया गया किन्तु इस बीच में सेना की शक्ति बहुत बढ़ गई थी। इस कारण फ्राँस के सेनापति नेपोलियन की शक्ति का उदय हुआ। नेपोलियन ने स्वयं को फ्रांसीसी गणराज्य का सम्राट घोषित किया।

क्रान्ति और नेपोलियन के युद्ध - सन् 1792 ई. से 1815 ई. तक फ्राँस युद्ध में उलझा रहा। इन युद्धों में एक ओर फ्राँस और दूसरी ओर अन्य राष्ट्र थे। इतिहासकारों ने इस अन्तर्राष्ट्रीय गृह युद्ध कहा है। यह क्रांतिकारी फ्राँस और राजतंत्री विचारों के समर्थक देशों के बीच था। 

सन् 1793-96 के मध्य फ्राँसीसी सेनाओं ने संपूर्ण पश्चिम यूरोप पर आधिपत्य कर लिया। अब नेपोलियन माल्टा, मिश्र और सीरिया की ओर बढ़ा तथा इटली से फ्रांसीसियों को बाहर ढकेल दिया गया। इन पर नेपोलियन ने कब्जा किया, फ्राँस को अपना खोया भूखंड मिल गया। नेपोलियन ने 1805 में आस्ट्रिया को 1806 में प्रशा को, 1807 में रूस को परास्त किया। 

नौसेना में ब्रिटेन का मुकाबला फ्राँस नहीं कर सका। लगभग सारे यूरोपीय देशों ने मिलकर 1813 में लिब्जिंग में फ्राँस को परास्त किया। मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने पेरिस पर कब्जा कर लिया । नेपोलियन पराजित हो गया। जून 1815 में वाटरलू के मैदान में भी नेपोलियन की हार हुई। वियेना सम्मेलन में शांति संधियाँ हुई।

क्रांति का परिणाम

1. निरंकुश राजतंत्र का अन्त - निरंकुश तथा अत्याचारी राजतंत्र का अंत हो गया। 

2. लोकतंत्र की स्थापना - फ्रॉस में कुद समय बाद गणतंत्रात्मक लोकतंत्र की स्थापना हो गई । स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व की भावना का प्रचार हुआ।

3. विशेषाधिकारों का अंत - फ्रॉसीसी क्रांति के परिणाम सामंती वर्ग तथा चर्च के अधिकारियों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए।

4. किसानों और मजदूरों का अंत - मजदूरों को उचित मजदूरी मिलने लगी। किसान करों के बोझ से मुक्त हो गए। वे अपने भूमि के स्वामी बन गए।

5. मध्यम वर्ग की उन्नति - वकील, डॉक्टर, शिक्षक, लेखक, व्यापारी तथा दुकानदारों की सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों में प्रतिष्ठा बढी।

6. जन कल्याण के कार्य - जनता के कल्याण के लिए अनेक कानून बनाए गए । अमानवीय दंड व्यवस्था समाप्त कर दी गई।

7. राष्ट्रीय भावना का प्रसार - फ्राँस की क्रांति ने जनता में राष्ट्र के लिए त्याग, बलिदान तथा भक्ति की भावना का संचार किया।

8. राष्ट्रीय एकता की स्थापना - लोगों में एक जुट होकर राष्ट्र के लिए काम करने की भावना का जन्म हुआ। क्रांति ने विषमता को समाप्त करके एकता की स्थापना की।

9. मानवाधिकारों की घोषणा - फ्राँस में मानवाधिकारों की घोषणा की गई। विश्व के अन्य देशों पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा। रुसों, दाँतो, मिराबो और रॉबसपीयर जैसे दार्शनिकों के विचारों का प्रभाव फ्राँस पर पड़ा। 

10. अन्य देशों को क्रान्तिकारियों से प्रेरणा - फ्राँस की क्रांति के कारण स्वरुप अन्य देशों में भी राजतंत्र के विरोध में विद्रोह हुए जैसे 1917 में रूस की जारशाही समाप्त हुई।

फ्राँस की राज्य क्रांति का परिणाम - 1. निरंकुश राजतंत्र का अंत, 2. लोकतंत्र की स्थापना, 3. विशेषाधिकारों का अंत, 4. किसानों और मजदूरों की दशा में सुधार 5 मध्यमवर्ग की उन्नति, 6 जनकल्याण के कार्य, 7. राष्ट्रीय भावना का प्रसार, 8. राष्ट्रीय एकता की स्थापना, 9. मानवाधिकारों की घोषणा, 10. अन्य देशों को क्रांतिकारियों से प्रेरणा। 

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