मध्यकालीन चीन का इतिहास - History of Medieval China

राजनीतिक घटना क्रम - ईसा की सातवीं शताब्दी के आरंभ में चीन पर ताड राजवंशों का शासन था इस राजवंश ने चीन को कुशल प्रशासन दिया। राज्यसेवा के लिए पुनः प्रतियोगिता परीक्षाओं की शुरुआत की। धर्म के मामले में उदार नीति अपनाई और वाणिज्य व्यापार को उन्नत बनाया। 

ताड राजवंश के शासन (618-909) ई., के बाद लगभग सात तक सूंड राजवंश ने शासन किया उसके बाद करीब 100 साल तक चीन मंगोलों ने शासन किया। उस समय एशिया और यूरोप के अनेक भागों पर मंगोलों की धाक जम गई थी उनके शासन काल में चीन में विज्ञान और संस्कृति का विकास जारी रही।

मंगोलों के शासन के बाद चीन में लगभग 300 वर्षों तक मिडवंश के राजाओं ने राज किया। सन 1665 में मंचू जाति के लोगों ने चीन पर अधिकार कर लिया। इस जाति के राजा सन् 1911 ई. तक चीन शासन करते रहे, मध्यकालीन चीन के राजनीतिक इतिहास का इतना महत्व नहीं है जितना कि उसकी संस्कृति तथा उपलब्धियों का है। 

वस्तुतः छठी शताब्दी से जबकि चीन पर साम्राज्यवादी अधिपत्य कायम हुआ, उन्नीसवीं शताब्दी तक के लंबे समय के दौरान चीन की सर्वतोमुखी उन्नति प्रायः लगातार होती रही।

कृषि शिल्प, व्यापार और वाणिज्य - इस समय जनता मुख्य रूप से खेती पर निर्भर थी। अधिकांश लोग चाँवल, ज्वार, बाजरा, चाय और गन्ने की खेती करते थे। रेशम का उत्पादन बढ़ा। राजाओं का ध्यान सिचाई के साधनों को विकसित करने पर रहता था। 

बहुत-सी नहरों और बाँधों का निर्माण हुआ। रहट का अविष्कार होने पर उन खेतों में पानी पहुँचाया जा सका जिनका धरातल नहरों के धरातल से ऊँचा था।

मध्यकाल चीन एवं विश्व - हानवंश कि राज्यकाल में भी चीन के विदेशी व्यापार का प्रर्याप्त महत्व था इस काल में पहले की अपेक्षा उसकी अधिक उन्नती हुई चीनी वस्तुएँ विशेष रूप से रेशम चीनी मिट्टी के बर्तनों और कागज की माँग देश में थी चीनी मिट्टी के बर्तनों चीन की वस्तुओं में विशेष स्थान रखते थे।

वे अपनी उत्तम और कलात्मक के लिए प्रसिद्ध थे। चीन का व्यापार वियतनाम, हिन्देशिया, भारत मध्यएशिया, ईरान, बिजेण्टाइन साम्राज्य और अन्य बहुत से देशों के साथ होता था जिस मार्ग से काफिला मध्य एशिया, ईरान और बिजेण्टाइन साम्राज्य तक जाता था। वह बड़ा रेशम मार्ग कहलाता था। चीन के व्यापारिक नगर या तो समुद्र तट पर स्थित थे या व्यापारिक मार्गों पर।

चीन मसाले, चंदन की लकड़ी, हाथी दाँत और बारीक कपड़ों का आयात बड़ी मात्रा में करता था। देश का धन विदेश न जाए इसलिए सूंड शासकों ने कागज के नोट चलाए। वास्तविक मुद्रा के स्थान पर कागज के नोटों का प्रचलन आजकल कई आश्चर्य की बात नहीं, किन्तु जब चीनियों ने कागज के नोटों का प्रचलन शुरु किया तब किसी भी देश में उनका प्रचलन नहीं था। 

पंद्रहवी शताब्दी के पश्चात् मिडवंश के शासकों ने विदेश व्यापार को प्रोतसाहित नहीं किया। उन्होंने अपने देशवासियों को स्वतंत्र रूप से विदेश जाने की अनुमति नहीं दी। विदेशी व्यापार केन्टन बंदरगाह से ही हो सकता था। 

विदेशों से संपर्क स्थापित प्रतिबंध लग जाने से चीन की उन्नति में बाधा पड़ी। मध्ययुग में साधारण व्यक्तियों का जीवन आमतौर पर बहुत कठिनता भरा था। अपना सारा समय खेतों पर काम करने में बिताते थे, उनकी उपज का बड़ा भाग कर वसूल करने वाले अधिकारी ले लेते थे। 

उन्हें अपना निर्वाह करने के लिए मजदूरी करनी पड़ती थी। वे किले और महलों के निर्माण में मजदूर के रुप में लगाए जाते थे।

मध्ययुग में बड़ी-बड़ी जमींदरियाँ, बड़े सरकारी या सैनिक अधिकारियों हाथों में आ गई। वे किसानों की उपज का दो तिहाई भाग ते ले लेते थे यदि फसलें खराब हो जाती तो हजारों किसान भूखे मर जाते थे कभी-कभी किसान उनके क्रूर व्यवहार के विरुद्ध विद्रोह कर देते थे। 

चीन के धनी निवासी शानदार कोठियों में भोग विलास का जीवन बिताते थे। वे काम करने से घृणा करते थे। उनकी कुछ विचित्र आदतें भी थी जैसे कि वे ऊँगलियों के नाखून बहुत बढ़ा लेते थे और उन पर चाँदी का पत्तर मढ़वा लेते थे।

कला और विज्ञान के क्षेत्र में चीनियों की उपलब्धियाँ 

जनसाधारण का जीवन बहुत दुखमय होने पर भी मध्यकाल में चीन में मानव ने अनेक क्षेत्रों में उन्नति की। अत्यंत प्राचीन काल में चीन के निवासी चुंबक पत्थर के चुंबकीय गुण जानते थे। 

मध्ययुग में उन्होंने कुतुबनुमा बनाने में इस ज्ञान का प्रयोग किया। इसमें पानी पर तैरती हुई मछली के आकार के लोहे की कील लगाई जाती थी जिसमें चुंबकीय आकर्षण शक्ति होती। इसी काल में चीनियों ने बारुद का अविष्कार किया। 

यह उनकी दूसरी महान उपलब्धि थी ये बारुद को अग्नि औषधि कहते थे और इनका प्रयोग आतिशब जो में करते थे। चीन में बारुद का आविष्कार दसवीं सदी में हुआ। पश्चिमी संसार के निवासियों को बारुद के आविष्कार का ज्ञान लगभग 400 वर्ष के बाद हुआ। 

चीनियों ने ज्योतिष यंत्रों और यांत्रिक धारियों का आविष्कार किया और वे लोहा तथा इस्पात को ढालने के क्रिया भी जान गए। चीनियों ने लोहे की झूलती जंजीरों वाले पुल दसवीं शताब्दी में ही बना लिए थे। उन्होंने पहले पहल छापने की कला का आविष्कार किया प्रारंभिक दिनों में वे जो कुछ छापना चाहते थे उसे लकड़ी के चौखटों पर खोद लेते थे। 

उस पर स्याही लगाकर उसके द्वारा जितनी प्रतियों की आवश्यकता होती थी वे छाप लेते थे। बाद में ग्यारहवीं शताब्दी में वे अलग-अलग अक्षरों को जिस रूप में चाहे लगाने लगे। पहले ये अक्षर पक्की मिट्टी के बनाए गए और फिर धातु के इस आविष्कार के कारण अधिक पुस्तकों को छापना संभव हो गया। बहुत से मनुष्य पुस्तकें खरीद सके। 

ज्ञान के प्रसार के लिए इस आविष्कार का उतना ही महत्व था जितना कि कागज के आविष्कार का। प्राचीन काल से इतिहास गद्य और कविता संबंधी जो साहित्य जमा हो रहा है थ वह समृद्ध हुआ। चीनी लिपि को लिखने के लिए ब्रश, कागज और रेशम के प्रयोग के कारण चित्रकला की काफी उन्नति हुई।

चीन के निवासियों ने इस काल में अनेक पैगोड़े बनवाए जिससे वहाँ की वास्तुकला का अध्ययन किया जा सकता है। बौद्ध धर्म के प्रचार से मूर्तिकला का काफी प्रोत्साहन मिला। संभवतः बौद्ध स्तूप की संकल्पना चीनी वास्तुकला से प्रभावित है।

एक जमाने में चीन में बौद्ध धर्म का इतना प्रचार हो गया कि वही चीन का मुख्य धर्म हो गया था किन्तु कन्फ्यूशियस के धर्म के पुनः स्थापित होने पर बौद्ध धर्म अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय हो गया। धर्म और विशेषकर पूर्वजों की पूजा का इस काल में चीन निवासियों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान बना रहा।

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