स्वदेशी आंदोलन पर टिप्पणी लिखिए - swadeshi andolan par tippani

बंगाल विभाजन ने असंतोष और अशांति की धधकती आग में घी का काम किया। इससे बंगाल में एक तूफान फूट पड़ा, जो शीघ्र ही सारे देश में फैल गया। फिर उथल-पुथल का जो दौर शुरु हुआ उसमें बहिष्कार और स्वदेशी आंदोलन की नींव पड़ी। 

स्वदेशी आंदोलन पर टिप्पणी

स्वदेशी वस्तुओं का अर्थ है अपने देश का, इसका उद्देश्य देशी उद्योगो को प्रोत्साहन देना था। स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग के साथ विदेशी मालों का बहिष्कार भी किया गया। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में स्वदेशी आंदोलन शुरु हुआ। बड़ी-बड़ी विरोध सभाऍ हुई और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार शुरु हुआ । विदेशी वस्तुओं की दुकानों का पिकेटिंग शुरु हुई और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई।

इस विभाजन का विरोध बंगाल के हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों ने किया। बंगाल में उस दिन शोक दिवस मनाया गया। विभिन्न शहरों में सभाएँ हुई और प्रदर्शन किए गए। विभाजन को समाप्त करने के लिए वंदे मातरम् गान करती हुई मंडलियाँ घूमने लगी। गरम तथा नरम दल दोनों के नेताओं ने मिलकर विभाजन का विरोध किया। सारे देश में रोष फैल चुका था।

स्वदेशी आंदोलन की लहर महाराष्ट्र तक पहुॅची। इसी बीच क्रांतिकारियों ने सशस्त्र आंदोलन भी चलाया 1905 और 1906 के अधिवेशन में स्वदेशी आंदोलन का समर्थन किया । स्वदेशी प्रचार और विदेशी बहिष्कार आंदोलन मे छात्रों की प्रमुख भूमिका रही। इस तरह, 1905 को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का विभाजन बिंदु माना जाता हैं |

लाला लाजपत राय स्वदेशी को देश की मुक्ति का साधन मानते थे। उनका कहना था कि स्वदेशी आंदोलन लोगों में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास तथा पुरुषार्थ की भावना जगाएगा। उनका विश्वास था कि स्वदेशी आंदोलन से यह ज्ञान प्राप्त हो जाएगा कि किस प्रकार हम अपनी पूँजी, अपने संसाधनों, अपने श्रम और अपनी ऊर्जा तथा प्रतिभा का उपयोग धर्म, रंग या जाति का भेदभाव किए बिना कर सकते हैं। उनका विचार था कि स्वदेशी को संयुक्त भारत का साझा धर्म बन जाना चाहिए।

बहिष्कार आंदोलन के बारे में लाला लाजपत राय का कहना था कि - सरकार की प्रतिष्ठा ही प्रमुख वस्तु है और विदेशी बहिष्कार आंदोलन उस प्रतिष्ठा की जड़ों पर ही चोट करता है। उनके शब्दों में - वह भ्रामक वस्तु जिसे वे प्रतिष्ठा कहते हैं, सत्ता से अधिक शक्तिशाली और हम बहिष्कार द्वारा इस पर चोट करना चाहते हैं। हम सरकारी भवनों से अपना मुँह मोड़ना और उसे जनता के झोपड़ों की ओर घुमाना चाहते हैं।

इस बीच सरकार ने दमन का सहारा लिया। उन स्कूलों की मान्यता छीन ली गई तथा सहायता बंद हो गई जहाँ के छात्रों ने बहिष्कार आंदोलन में भाग लिया था। जुलूसों पर लाठी चार्ज होने लगे। सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया। विभिन्न तरीकों से जनता में आतंक फैलाने के प्रयास किए गए। बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा रचित राष्ट्रगीत वंदे मातरम् का गाना भी अपराध घोषित किया गया। राष्ट्रीय समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उनके संपादकों को सजाएँ दी गई। अनेक नेता जेल में बंद कर दिए गए। इसी समय तिलक ने लिखा था- “दमन बस दमन है अगर वही कानून है तो हम शांतिपूर्वक रहकर इसका विरोध करेंगे | अगर यह गैर कानूनी है तो इससे गैर कानूनी ढंग से निपटा जाएगा।" उन्होंने काँग्रेस को नारा दिया- "स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा।

काँग्रेस में दो दल 

  1. नरमदल ( नरमपंथी ) 
  2. गरम दल ( उग्रपंथी )

स्वदेशी आंदोलन के पूर्व ही काँग्रेस में दो दल हो चुके थे - नरमदल एवं गरमदल । काँग्रेस के पुराने शांतिपूर्ण तथा वैधानिक ढंग से अपनी मांगों को पूरा कराना चाहते थे। ऐसे लोग नरमदल के समर्थक कहलाएँ । इनमें दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, गोपालकृष्ण गोखले आदि नेता थे। इसके विपरीत दूसरे वर्ग (युवक वर्ग) में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय तथा विपिन चन्द्र पाल प्रमुख थे। अरविन्द घोष तथा खुदीराम बोस भी गरमदल के समर्थक थे।

बाल गंगाधर तिलक को उनके राजद्रोही लेखों और भाषणों के लिए 18 महीने की कड़ी सजा मिली। इस राष्ट्रवादी ने प्रचार कार्य के उद्देश्य से गराठी में केसरी नामक पत्र निकाला तथा राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत करने के लिए गणपति तथा शिवाजी उत्सवों का फिर से आयोजन करना शुरू किया। उन्होंने धार्मिक आयोजनों के माध्यम से भारतीयों से एक जुट होने का आह्वान किया। इसी क्रम में बंगाल में लोगों ने काली पूजा की प्रथा आरंभ की।

राजनीतिक अधिकार प्राप्त करने के तरीकों में नरमपंथियों एवं गरमपंथियों में काफी मतभेद था । इस संबंध में तिलक का यह विचार था - "अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता है। नरम पंथी समझते हैं कि अधिकार सरकार को बातों से प्रभावित करके प्राप्त किए जा सकते हैं। जबकि हम समझते हैं कि केवल भारी दबाव डालकर ही इन्हें प्राप्त किया जा सकता है।" नरम पंथी संघर्ष के लिए जनता, खासकर युवकों को आगे लाए । यही उनकी एक प्रमुख देन थी।

काँग्रेस का नेतृत्व नरम दल के ही हाथों में रहा। 1907 में काँग्रेस का अधिवेशन सूरत में हुआ। वहाँ नरमदल और गरमदल वाले आपस में टकरा गए । फलतः 1916 तक गरमदल वाले अपना कार्यक्रम अलग चलाते रहे। उस वर्ष दोनों दलों ने फिर मिलकर एक साथ काम करने का निश्चय किया।

क्रांतिकारी आंदोलन

कॉंग्रेस के गरमदल वालों में एक वर्ग ऐसा भी था जो बलपूर्वक अंग्रेजी राज्य को समाप्त करना चाहता था। वे संवैधानिक आदोलनों में कतई विश्वास नहीं करते थे। उनका विश्वास था कि ब्रिटिश अधिकारियों को आतंकित करके वे पूरी सरकारी तंत्र का मनोबल तोड़ सकेंगे और इस तरह स्वतंत्रता प्राप्त कर लेंगे। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए वे किसी भी साधन का प्रयोग उचित समझते थे।

क्रांतिकारी आंदोलनों के संगठन मुख्यतः बंगाल, महाराष्ट्र तथा पंजाब में थे। ये क्रांतिकारी संगठन बदनाम सरकारी अधिकारियों, मजिस्ट्रेटों तथा सरकारी गवाहों का उग्र विरोध करते थे। वे अपने आंदोलन को चलाने के लिए ब्रिटिश शासन का खजाना को लूटकर धन एकत्र करते थे तथा अंग्रेजों के हथियार लूटते थे इनके द्वारा मुजफ्फरपुर के बदनाम जज किंग्सफोर्ड की बग्घी पर 30 अप्रैल, 1908 को बम फेंका। दुर्भाग्य से उस गाड़ी में दो महिलाएँ थी जो मुजफ्फरपुर के एक वकील पिंगल केनेडी की पत्नी और पुत्री थी। 

बम के कारण दोनों की मृत्यु हो गई। विद्रोहियों और अंग्रेजी सैनिकों के बीच युद्ध का दृश्य चाकी ने वहीं आत्महत्या कर ली पर खुदीराम बोस पकड़े गए और उन्हें फॉसी की सजा दे दी गई। इस घटना के दो महीने बाद ही कलकत्ता में एक बहुत बड़ी क्रांतिकारी योजना का पता लगा जिसमें अरविंद घोष और अन्य युवक गिरफ्तार कर लिए गए। यह घटना सामान्यतः अलीपुर षडयंत्र केस के नाम से प्रसिद्ध है। 

इसमें कनाई लाल और सत्येंद्र को फॉसी की सजा मिली। अरविंद घोष छोड दिए गए। लेकिन क्रांतिकारियों के हौंसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने पुनः दिल्ली में एक राजकीय जुलूस में हाथी पर जाते हुए वायसराय हार्डिंग पर बम फेंका जिसमें वह घायल हो गया। पंजाब के सरदार अजीतसिंह भाई परमानंद बालमुकुंद और लाला हरदयाल ने क्रांतिकारियों को संगठित किया।

महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों में श्याम कृष्ण वर्मा, विनायक दामोदर सावरकर और गणेश सावरकर प्रमुख थे क्रांतिकारी आंदोलन के संगठन भारत के बाहर यूरोप और अमेरिका में भी चले। इनमें सबसे प्रमुख संगठन गदर पार्टी था। गदर का अर्थ विद्रोह होता है। इन संगठनों ने भारत के क्रांतिकारियों के लिए धन जमा किए तथा भारत में चोरी-छिपे हथियार भी भेजने के प्रयास किए।

दमन और सुधार

क्रांतिकारियों से घबराकर सरकार ने जबरदस्त दमनकारी उपायों से काम लिया। यह दमन बंगाल, महाराष्ट्र, पंजाब और तमिलनाडु तेज था। 1906 में राजद्रोह सभा कानून बनाया गया। इसके अनुसार सार्वजनिक शांति में बाधा पहुँचाने वाली सभाओं पर प्रतिबंध लगाया गया। 

1910 में भारतीय प्रेस अधिनियम बनाया गया। इसके अनुसार विद्रोह भड़काने वाली सामग्री छापने पर समाचार पत्रों के संपादकों को सजा देने के लिए अधिकारियों को व्यापक अधिकार दिए गए। 

अनेक पत्र-पत्रिकाऍ बंद कर दी गई। अनेक नेता कैद कर लिए गए। कुछ को निर्वासित कर दिया गया। सरदार भगत सिंह केसरी में दो लेखों के प्रकाशन के कारण लोकमान्य तिलक को बर्मा के मांडले जेल में भेज दिया गया। 

राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के साथ-साथ सरकार ने सुधार नीति भी अपनाई। इसी उद्देश्य से 1909 में मोर्ले-मिंटो सुधारों की घोषणा की गई।

मार्ले-मिंटो सुधार

1909 में मार्ले-मिंटो एक्ट पास किया गया। इस एक्ट द्वारा भारतीयों को कुछ राजनीतिक सुविधाएँ प्रदान की गई। केन्द्रीय तथा प्रांतीय विधायी परिषदों के सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई। 

साथ ही कुछ और निर्वाचित सदस्यों की भी व्यवस्था की गई। पर इन निर्वाचित सदस्यों का निर्वाचन जमींदारों एवं चैंबर्स ऑफ कॉमर्स द्वारा किया जाता था, जनता द्वारा नहीं। मुसलमानों को खुश करने के उद्देश्य से उनके लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था भारत के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हुई। 

यह व्यवस्था बाँटो और राजकरो की साम्राज्यवादी नीति के तहत अँग्रेजों के एक सोची-समझी चाल थी। इसके परिणामस्वरूप हिन्दुओं और मुसलमानों में कटुता बढ़ती गई और अंततोगत्वा 1947 में भारत का विभाजन होकर रहा।

नरम पंथी नेताओं ने मार्ले-मिंटो सुधारों का पूरी तरह समर्थन नहीं किया। उन्होंने अलग निर्वाचन क्षेत्र का विरोध किया पर उन्होंने इन सुधारों को लागू करने में सरकार का साथ देने का फैसला किया। लेकिन गरमपंथियों ने इन सुधारों का कड़ा विरोध किया। 

मुस्लिम नेताओं ने भी अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था की निंदा की। 1909 के कॉंग्रेस अधिवेशन में एक प्रतिनिधि ने कहा कि- "अलग निर्वाचन क्षेत्र का अर्थ पूरे भारत का ही विभाजन है और यह बंगाल के विभाजन से भी अधिक खतरनाक है। 

मुस्लिम सांप्रदायिकता का जन्म

आंदोलन को दबाने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राजनीति में हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता की बीज बोने की नीति अपनाई। फट डालो और शासन करो, रोमनों का पुराना सूत्र अँग्रेजों ने इस सूत्र का पालन रोमनों की तुलना में अधिक सफलता से किया। 

उन्होंने मुसलमान नेताओं को सलाह दी कि उनका कल्याण हिन्दुओं से अलग रहने में ही है। उनके प्रयासों से मुस्लिम समाज में एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हुआ जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को हिन्दुओं का आंदोलन बताने लगा और काँग्रेस से अलग रहने लगा।

मुस्लिम लीग की स्थापना 

सरकार के प्रोत्साहन से आगा खाँ के नेतृत्व में मुसलमानों का एक शिष्टमंडल अक्टूबर 1906 में शिमला में तत्कालीन वायसराय लार्ड मिटो से मिला। आगा खाँ एक धार्मिक नेता थे। वे काफी धनी व्यक्ति थे और प्रायः यूरोप में ही रहते थे। 

शिष्ट मंडल में उनके साथ ढाका के नवाब सलीमुल्लाह थे। फलतः तीन महीने के भीतर 30 दिसंबर 1906 को मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। आगा खाँ उसके प्रमुख सूत्रधार थे। मुस्लिम लीग के निम्नलिखित उद्देश्य थे। 

1. भारत के मुसलमानों में ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी की भावना जागृत करना तथा सरकार के प्रति कोई गलतफहमी हो तो उसे दूर करना।

2. भारतीय मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों और हितों की रक्षा करना और सन् 1858 ई. के बाद भारत में ब्रिटिश नीतियाँ और प्रशासन उनकी समस्याओं के समाधान के लिए सम्मान के साथ सरकार के समक्ष उपस्थित करना। 

3. अन्य समुदायों के प्रति किसी प्रकार के विरोध की भावना को रोकना। 

1909 में मार्ले-मिंटो सुधार के अनुसार मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई, जिससे सांप्रदायिकता को और भी बढ़ावा मिला। फिर भी अधिकाधिक मुसलमान राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होते रहे। 

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अलहिलाल और मौलाना मुहम्मद अली ने अंग्रेजी में कॉमरेड तथा उर्दू में हमदर्द का प्रकाशन शुरु किया। इससे मुस्लिम समाज में चेतना आई। 

प्रथम विश्व युद्ध के समय मुसलमान भी बड़ी संख्या में ब्रिटिश विरोधी संघर्ष में शामिल हुए। सर सैयद अहमद खाँ ने सरकार और मुसलमानों के मध्य सौहार्द्र पूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयत्न किया। 

काँग्रेस लीग समझौता

1913 में मुस्लिम लीग ने भी अपना उद्देश्य स्वराज्य प्राप्ति घोषित किया। इसी समय मुहम्मद अली जिन्ना लीग में शामिल हुए और उन्होंने राष्ट्रीय एकता कायम करने की चेष्टा की। 1916 में काँग्रेस और लीग में एक समझौता हो गया, जो लखनऊ पैक्ट के नाम से प्रसिद्ध है। 

काँग्रेस-लीग योजना तैयार हुई, जिसके अनुसार काँग्रेस ने मुसलमानों के पृथक निर्वाचन को स्वीकार किया और मुस्लिम अल्पसंख्यक प्रांतों में मुसलमानों के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व देने के निर्णय को स्वीकार कर लिया। फिर काँग्रेस और लीग दोनों ने मिलकर सरकार से माँग करने का निर्णय किया कि

1. विधायी परिषदों में अधिकांश सदस्यों का निर्वाचन होना चाहिए ।

2. इन विधायी परिषदों को पहले से अधिक शक्ति दी जानी चाहिए ।

3. वायसराय की कार्यकारिणी में कम से कम आधे सदस्य भारतीय हो। 

प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव 

1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा। इस युद्ध का प्रभाव भारत के राष्ट्रीय आंदोलन पर भी पड़ा। ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि इंग्लैण्ड राष्ट्रीयता और लोकतंत्र की रक्षा के लिए युद्ध में सम्मिलित हो रहा है। 

युद्ध छिड़ने पश्चात् ब्रिटिश सरकार के भारत सचिव मांटेग्यू ने घोषणा की कि युद्ध के बाद धीरे-धीरे भारत में उत्तरदायित्वपूर्ण शासन स्थापित किया जाएगा। भारतीय जनता इससे अत्यधिक प्रभावित हुई । अतः सबने युद्ध में सरकार को पूरा सहयोग किया।

गरमदल और नरम दल में मेल

जून 1914 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक मांडले जेल से छूटकर भारत आए। इसी वर्ष आयरिश महिला श्रीमती एनी बेसेंट काँग्रेस में शामिल हुई। श्रीमती एनी बेसेंट ने गरमदल और नरमदल में मेल कराने का प्रयास शुरु किया। 

गरमदल और नरमदल में मेल हो गया। श्रीमती एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक के कारण भारतीय राजनीति के जीवन में एक नई हलचल शुरु हुई।

होमरूल आंदोलन

1916 में लोकमान्य तिलक ने महाराष्ट्र में होमरूल लीग की स्थापना की। इसी वर्ष श्रीमती ऐनी बेसेंट ने मद्रास में अखिल भारतीय होमरूल की स्थापना की। तिलक ने होमरूल आंदोलन का प्रचार अपने समाचार पत्र मराठा द्वारा किया। 

श्रीमती एनी बेसेंट ने समाचार पत्रों द्वारा इस आंदोलन का व्यापक प्रचार किया। शीघ्र ही यह आंदोलन सारे देश में फैल गया। होमरूल आंदोलन का उद्देश्य जनता के स्वशासन की भावना का प्रचार करना था। इसकी कार्य पद्धति शांतिमय और अहिंसात्मक थी और इसमें सरकारी कानूनों को तोड़ने या उसका विरोध करने का स्थान हीं था। इसका लक्ष्य था। प्रचार द्वारा सरकार पर अपनी माँगों का प्रभाव डालना। 

आंदोलन का आरंभ और प्रचार 

होमरूल आंदोलन का तीव्र गति से प्रचार हुआ, जिससे एक दो वर्षों के अंदर ही इसकी काफी प्रगति हुई। तिलक एवं एनी बेसेंट के नेतृत्व में यह आंदोलन लखनऊ के साथ-साथ महाराष्ट्र, पंजाब व कर्नाटक तक फैल गया। जनता मे स्वशासन प्राप्ति के लिए राजनीतिक चेतना उत्पन्न करने इस आंदोलन को आश्चर्यजनक सफलता मिली।

आंदोलन का दमन

इस आंदोलन की प्रगति देखकर सरकार को घबराहट हुई और उसने इसके दमन का निश्चय किया। तिलक को राजनीतिक कार्यकलाप बंद करने का आदेश दिया गया तथा श्रीमती एनी बेसेंट को नजरबंद कर लिया गया। उनका पत्र न्यू इंडिया जब्त कर लिया गया। 

तिलक के आंदोलन करने की धमकी देने पर सरकार ने श्रीमती एनी बेसेंट को छोड़ दिया। उसी समय भारत सचिव मांटेग्यू ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की, जिसमें कहा गया कि भारतीयों को धीरे-धीरे उत्तरदायी शासन सौंपा जाएगा। 

इस घोषणा से होमरूल आंदोलन कुछ शिथिल पड़ गया। भारतीय राष्ट्रीयता के विकास में इस आंदोलन का महत्वपूर्ण स्थान है। एक संविधानिक एवं प्रचारात्मक आंदोलन होने के कारण भारतीय जनजीवन इससे विशेष रूप से प्रभावित हुए।

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