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मैदान किसे कहते है - mandan kise kahate hain

समस्त भूपटल के लगभग 40% भाग पर मैदानों का विस्तार पाया जाता है। ये द्वितीय प्रकार के उच्चावच हैं । महाद्वीपों या स्थल मण्डल पर मैदान प्रधान स्थल रूप कहे जा सकते हैं। दूसरे शब्दों में, मैदान' शब्द से आशय समतल और निम्न भू-भाग से लिया जाता है। 

मैदान किसे कहते है 

यह भू-भाग स्थल के आधे से अधिक भाग में फैले हैं। मैदान सामान्यतः समुद्र तल से 180 मीटर की ऊँचाई तक पाये जाते हैं । अपवाद की दशा में यह 300 मीटर तक ऊँचे भी हो सकते हैं । जहाँ अधिकांश मैदान समतल होते हैं वहाँ कुछ समतल प्रायः या लहरदार भी हो सकते हैं।

वारसेस्टर के अनुसार, “मैदान भू-तल पर प्रायः समतल एवं सपाट भाग होते हैं, किन्तु कभी-कभी ये लहरदार या टीलों सहित भी हो सकते हैं।"

सीमेन के अनुसार, “समुद्र तल से साधारण ऊँचाई वाले समतल क्षेत्रों को जिनके ढाल न्यूनतम होते हैं, मैदान कहा जाता है ।" 

फिंच व ट्रिवार्था के अनुसार, “समुद्र तल से 150 मीटर या कम ऊँचे समतल भू-भाग को मैदान कहा जा सकता है।"

कोई भी भू-भाग मैदान तभी कहा जा सकता है जबकि उस प्रदेश की स्थानीय भूमि का ऊपरी आकार या ऊँचा-नीचापन कुल 100 फीट से अधिक न हो।

सामान्यतः मैदान (i) समतल भू-भाग होते हैं, (ii) उनकी संरचना एक जैसे अवसादों या पदार्थों से बनी होती है, (iii) ऐसे मैदानों में ढाल का अन्तर ज्ञात करना मोटे तौर पर कठिन रहता है। 

मैदानों की उत्पत्ति एवं वर्गीकरण

मैदानों के अन्य गुणों की भाँति उनकी उत्पत्ति के भी विभिन्न कारण हो सकते हैं। सामान्यतः जहाँ अधिकांश मैदानों की उत्पत्ति समतल स्थापक या बाह्य शक्तियों द्वारा होती है, वहीं अपवाद की दशा में मैदान आन्तरिक शक्तियों के प्रभाव से भी बन सकते हैं। इनका वर्गीकरण मोटे तौर पर निम्न प्रकार से किया जा सकता है :

(A) आन्तरिक शक्तियों से बने मैदान

आन्तरिक शक्तियों से बने अधिकांश मैदानों की पहचान सामान्यतः तटीय भागों के निकट ही होती रही है। इनका विस्तार सँकरी पट्टी में या सीमित क्षेत्रों में होता है। पटल विरूपण से कभी महाद्वीप पर बड़ा भाग नीचे धंसने से या अपरदन के पश्चात् कुछ ऊपर उठने से प्रभावित रहता है। 

ऐसी आन्तरिक शक्तियों से प्रभावित विशाल मैदानों में पश्चिमी साइबेरिया का मैदान, यूराल के पश्चिम का या पूर्वी यूरोप का मैदान एवं मिसीसिपी का मैदान विशेष महत्वपूर्ण हैं । ऐसे मैदान तटीय भाग के निकट भी पाये जा सकते हैं। 

द्वारका (कच्छ के तट के निकट) एवं मुम्बई के निकट आधुनिक भू-वैज्ञानिक काल के निमज्जन के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। कैस्पियन-अरल के मध्य का भाग निमज्जन से इसी भाँति प्रभावित रहा है। 

पोटवार के पठार (पाकिस्तान) से दिल्ली एवं बीकानेर के उत्तरी भाग में कुछ सदियों पूर्व के उत्थान के प्रमाण मिलते हैं (इसी के प्रभाव से पवित्र सरस्वती में पानी घटता गया)।

इस विधि से बनने वाले सबसे महत्वपूर्ण मैदान लावा निर्मित हैं। भारत के दक्षिणी पठार एवं पश्चिमी संयुक्त राज्य के लगभग 5-5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले लावा के जमाव के मैदान इस दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण हैं। ये विश्व के विशेष उपजाऊ मैदानों में से भी माने जाते हैं। 

(B) समतल स्थापक या बाह्य शक्तियों से निर्मित मैदान

इस प्रकार के मैदान सभी प्रकार की समतल स्थापक शक्ति के कारकों (नदी, हिमानी, हवा, लहरें, अपक्षय आदि) की कटाव एवं जमाव की क्रियाओं से बनते व विकसित होते रहते हैं। प्रत्येक प्रकार के कारण की अपरदन शक्ति से एक से अधिक प्रकार के मैदान बन सकते हैं।

1. अपरदनात्मक मैदान 
(i) नदियों की अपरदन क्रिया से बने मैदान

नदियाँ, पहाड़ी एवं पर्वतपदीय भाग तक बहुत अधिक कटाव कती रहती हैं। इसी प्रभाव से नदी की घाटी चौड़ी होती जाती है। अत: पहाड़ी भागों की संकरी पट्टीनुमा घाटी एवं अपरदन-चक्र की प्रौढ़ावस्था के उत्तरार्द्ध तक विकसित पेनीप्लेन इसके उत्तम उदाहरण कहे जा सकते हैं। 

कई बार दो पहाड़ी घाटियों के बीच के ऊबड़-खाबड़ भाग को संशोधित कर वहाँ कटाव व जमाव की सम्मिलित क्रिया से भी नदी स्थानीय महत्व का उपजाऊ मैदान बना सकती है। नेपाल एवं भूटान में लघु हिमालय की घाटियों के मैदान ऐसे ही उदाहरण हैं।

(ii) हिमानी के अपरदन से बने मैदान

प्राय: हिमानी समाप्त होने के पश्चात् महाद्वीपीय हिमानी का तल घर्षण क्रिया से समतलप्राय: मैदान में बदल जाता है। उत्तरी अमेरिका का महान झीलों के निकट का प्रदेश पश्चिमी साइबेरिया एवं पूर्वी यूरोप के मैदान के विकास में इन शक्तियों का महत्वपूर्ण हाथ रहा है

(iii) पवन के अपरदन से बने मैदान

पवन शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क प्रदेशों में अपरदन का महत्वपूर्ण कारक है। अतः पथरीले प्रदेशों में इनकी आकृतियाँ अधिक बनती हैं। 

वहाँ पर पवन एवं पानी के सम्मिलित कार्यों से तेज ढालू व समकोणीय घाटियाँ, बजादा, पेडिमेण्ट एवं अपरदन-चक्र के दीर्घ प्रौढ़ावस्था की स्थिति में कटाव निर्मित पेनीप्लेन या लहरदार मैदान मुख्यतः सम्मिलित हैं।

(iv) लहरों के अपरदन से बने मैदान

समुद्र तट के निकट निरन्तर लहरों के अपरदन से वहाँ पर प्रारम्भ में बनी युवावस्था की आकृतियाँ कट-फुटकर नष्ट होती जाती हैं और अन्ततः लहरदार पथरीला मैदान बच रहता है। 

ऐसे अपरदन के मैदान बहुत संकरे एवं लहर के प्रवाह के प्रभाव क्षेत्र तक ही प्रायः भृगु के बाद संकरी पट्टी या प्लेटफार्म जैसे बने होते हैं। सभी तटों के निकट इनका निर्माण होना आवश्यक नहीं है

2. निक्षेपात्मक मैदान 

समतल स्थापक शक्तियाँ जहाँ एक ओर अपरदन का प्रधान साधन हैं वहीं ये शक्तियाँ काटे गये पदार्थों को बहाकर कहीं-न-कहीं अवश्य जमा करती रहती हैं। सभी जमाव की क्रिया से ही कई प्रकार की आकृतियाँ एवं विविध प्रकार से छोटे-बड़े समतल क्षेत्रों का निर्माण होता है। इनमें भी नदियों का जमाव कार्य सबसे महत्वपूर्ण है।

(i) नदियों की निक्षेप क्रिया द्वारा मैदान की रचना

नदियाँ मध्यवर्ती घाटी एवं तटीय या मुहाने के भाग में कई प्रकार से मैदान का निर्माण करती हैं। 

जब ये पहाड़ी भाग से निचले मैदानी भाग में प्रवेश करती हैं तो नदी अपने साथ लाये मोटे कणों वाले कंकड़, पत्थर आदि का जमाव पर्वत तटीय प्रदेश में करती हैं अत: यहाँ पर भाबर के विषम व ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र एवं जलोढ़ पंख नामक लहरदार मैदान बनते हैं।

 इसकी आकृति पंखे जैसी बाहर की ओर फैली होती है । जलोढ़ पंख के आगे नदी में जल अधिक होने, महीन पदार्थों के जमाव के साथ-साथ दलदली मैदान या तराई क्षेत्र का विकास होता है। हिमालय के निचले ढालों पर ऐसे ही छोटे व संकरे मैदानी भाग मिलते हैं। 

मुख्य गंगा-यमुना व सिन्धु-सतलज का मैदान नदियों द्वारा प्रतिवर्ष बाढ़ के समय बार-बार अपनी घाटी में दूर-दूर तक बारीक अवसाद या काँप बिछाने से उपजाऊ एवं विशाल बाढ़ के मैदान का निर्माण होता है।

नदी के मार्ग में आई झीलों के भरने से भी झील के उपजाऊ मैदान का निर्माण होता है। पहाड़ी भाग में महीन काँप के संकरी पट्टीनुमा जमाव से संकरी मैदानी पट्टियाँ बनती हैं। जहाँ नदी सागर में गिरती है, वहाँ कई नदियाँ त्रिकोणाकार डेल्टा बनाती हैं। 

यहाँ डेल्टाई भाग में अत्यन्त समतल उपजाऊ मैदानों का निर्माण हो जाता है; यथा गंगा, सिन्धु,नील, मिसीसिपी पो एवं ह्वांगहो आदि नदियों के मुहानों पर डेल्टाई मैदान निर्मित हुए हैं। अत: डेल्टा अधिक समतल, सरल एवं उपजाऊ मैदान होते हैं। 

(ii) हिमानी के निक्षेप से बने मैदान

हिमानी अपने साथ सतह पर व तली (पेंदे) में मोरेन बहाकर ले जाती है। ये मोरेन बर्फ पिघलने के साथ ही जमा होते जाते हैं। अत: जहाँ बर्फ एवं जल मिलकर जमाव कार्य करते हैं 

वहाँ महीन जमाव के मैदान (टिल मैदान) एस्कर व ड्रमलिन सहित लहरदार मैदान एवं अन्तिम हिमोढ़ से बाहर बर्फ के जल के बहाव से अवसादों के जमा होने से अवक्षेप के मैदान की रचना होती है ।

उत्तरी यूरोप एवं उत्तरी अमेरिका में प्लीस्टोसीन हिमाच्छादन के कारण निर्मित मैदान विस्तृत क्षेत्र मिलते हैं।

(iii) पवन के निक्षेप से बने मैदान

पवन की गति शुष्क प्रदेशों में जहाँ भी निरन्तर कम रहती है वहाँ कम ढालू व लहरदार बालू के मैदान की रचना होती रहती है। इसी प्रकार जिन प्रदेशों में छोटे-छोटे टीले पाये जाते हैं वहाँ पर लहरदार व टीले युक्त ऊबड़-खाबड़ मैदान पाये जाते हैं। 

राजस्थान में चुरू व शेखावाटी के क्षेत्र में ऐसे ही रेतीले जमाव से लहरदार मैदान बनते हैं। मरुस्थलीय प्रदेशों की सीमा या उसके बाहरी भाग में पवन द्वारा जमा की गई महीन बालू से उपजाऊ लोयस के मैदान का निर्माण होता है। चीन का पीला मैदान इसका आदर्श उदाहरण है।

मुख्य अर्द्ध-मरुस्थलीय भागों के निचले भागों में जल के बहाव की क्रिया एवं जल के निरन्तर वाष्पीकरण से भूमि का क्षार सतह के निकट निचले भागों में इकट्ठा होता जाता है। अत: वहाँ खारे या नमकीन दलदल एवं नमकीन एवं अनुपजाऊ समतल भाग पाये जाते हैं। 

शेखावाटी व बीकानेर (राजस्थान) में एवं कालाहारी (दक्षिणी अफ्रीका में) के पूर्वी भाग में ऐसे छोटे-छोटे मैदान पाये जाते हैं। राजस्थान में इन्हें 'सर' कहते हैं। इनके आस-पास बस्तियाँ भी बस जाती हैं क्योंकि निकट के गहरे कुओं में पीने योग्य जल मिल जाता है।

सागर तट के निकट बहते जल एवं लहरों के सम्मिलित जमाव से बलुई मैदान पाये जाते हैं। इनकी चौड़ाई एक-डेढ़ किलोमीटर तक हो सकती है।

मैदानों का महत्व 

मैदान मानव के लिए हमेशा से ही आकर्षण स्थल रहे हैं। विश्व की प्राचीनतम सभ्यता का विकास नदियों की उपजाऊ व समतल घाटियों में ही हुआ। मानव के आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास मैदानी प्रदेशों में ही आदर्श रूप में मिलते हैं।

 मैदान कहीं भी हो; तट के निकट, नदी घाटी या डेल्टा क्षेत्र में या महाद्वीपों के मध्य; जहाँ भी मैदान है, जल मिलता है, आबादी का घनत्व बढ़ता ही जायेगा। मैदानों का निम्न प्रकार से मानव के लिए विशेष महत्व है :

(i) प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के पोषक व विकास स्थल बने रहे हैं

(ii) महानगरों के जन्मदाता

विश्व के सभी महानगर मैदानी प्रदेशों में ही पाये जाते हैं । 85% नगरीय जनसंख्या मैदानों में ही केन्द्रित है।

(iii) सघन कृषि के केन्द्र

मैदान अपने उपजाऊपन के लिए विशेष प्रसिद्ध हैं अतः यहाँ पर उन्नत किस्म की कृषि, व्यावसायिक पशुपालन, बागान कृषि एवं उन्नत व्यवसायों का विकास व प्राथमिक व्यवसाय तेजी से बढ़ते रहे हैं। देश का सबसे अधिक सिंचित क्षेत्र भी यहीं पाया जाता है । 

(iv) उद्योग-धन्धों का विकास

मैदान सघन आबाद होते हैं। यहाँ के निवासी अधिक धनी होते हैं। अतः यहाँ पर तेजी से कृषि एवं शिल्प पर आधारित अनेक प्रकार के कुटीर, लघु व बड़े उद्योग, बहुमूल्य वस्तुओं के शिल्प आदि की निरन्तर माँग रहने से विकास होता रहता है।

(v) व्यापार, व्यापारिक मार्ग, परिवहन एवं संचार का उत्तम 

विकास कृषि एवं उद्योगों के विकास, सघन आबादी, बढ़ती हुई वस्तुओं की माँग के कारण मैदानी भागों में रेल, सड़क एवं वायुमार्गों का तेजी से व उत्तम विकास होता रहा है। 

भारत में भी उत्तरी मैदान में व्यापार की मण्डियाँ एवं आधुनिक परिवहन संचार सेवाओं का जाल बिछा हुआ है ।

(vi) विश्व के सभी मैदान सभी देशों में उष्ण, अझैष्ण एवं शीतोष्ण प्रदेशों में सघन आबाद हैं । यहाँ पर ग्रामीण एवं नगरीय दोनों ही प्रकार की जनसंख्या आनुपातिक दृष्टि से सबसे अधिक पाई जाती है।

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