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महादेवी वर्मा की भाषा शैली की विशेषता बताइए

महादेवी वर्मा के गद्य की भाषा और शैली पर विचार किए बिना उनके गध की विशेषताओं का अध्ययन अधूरा रहेगा।

महादेवी वर्मा के रेखचित्रों में एक प्रकार का कहानीपन होता है। “अतीत के चलचित्र" और "स्मृति की रेखाएँ" में कहानी के तत्व मौजूद है। “पथ के साथी” भी इस गुण से अछूता नहीं रहा है। अपने रेखाचित्रों में महादेवी जी ने कई पात्रों को अमर और जीवंत बना दिया है। 

उन्होंने अपने रेखाचित्रों में 25 पुरुषों-स्त्रियों के चित्र उकेरे हैं। महादेवी के इन पात्रों में अनेकरूपता है और ये निर्जीव पात्र न होकर सजीव ओर सक्रिय है।

महादेवी वर्मा की भाषा शैली की विशेषता बताइए

महादेवी वर्मा ने अपने गद्य को सरल और जीवंत बनाकर प्रस्तुत किया है। उनके गद्य में यथार्थ की प्रखरता भी है काव्य की मधुर धारा भी। वे विवरण में ज्यादा नहीं पड़तीं, बल्कि संकेत से ही बहुत कुछ कह जाती है। जैसे “रामा की कोठरी में महाभारत के अंकुर जमने लगे।” संक्षेप में उनके रेखाचित्रों में सूक्ष्म चित्रण की प्रधानता है। शब्दों के चित्र बना बनकर उन्होंने परोसे हैं।

महादेवी वर्मा ने अपनी साहित्य में हास्य ओर व्यंग्य का भी समावेश किया है। रामा का कुर्ता, साफा, बुंदेलखंडी जूते और गठीली लाठी किसी शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा करते जान पड़ते थे। 

“उनकी अखण्ड प्रतीक्षा और रामा की अटूट उपेक्षा से द्रवित होकर ही कदाचित् हमारी कार्यकारिणी समिति में यह प्रस्ताव नित्य सर्वमत से पास होता रहता था कि कुरते की बाहों में लाठी को अटकाकर खिलौनों का परदा बनाया जावे, डलिया साफे को झूटी से उतारकर उसे गुड़ियों का हिंडोला बनाने का सम्मान दिया जावे और बुंदेलखंडी जूतों को हौज में डालकर गुड्डों के जल-विहार का स्थायी प्रबंध किया जाये,। 

पर रामा अपने अंधेरे दुर्ग में चर्रमई स्वर में डाटते हुए द्वारा को इतनी ऊँची अर्गला से बंद रखता था कि हम स्टूल पर खड़े होकर भी छापा न मार सकते थे।” (अतीत के चलचित्र) इसी प्रकार के अनेक प्रसंग महादेवी जी ने हास्य के पुट के साथ पेश किया है।

महादेवी जी का व्यंग्य भी बहुत पैना होता है। उसमें आक्रोश की ध्वनि भी सुनाई पड़ती है। कवियों की वेशभूषा और उपनामों पर व्यंग्य करती हुई कहती हैं- "किसी के नए सिले सूट की अंग्रेजियत ताम्बूल राग की स्वदेशीयता में रंजित होकर निखर उठी थी। 

किसी का चीनाशुक का लहराता हुआ भारतीय परिधान सिगरेट की धूम रेखाओं में उलझकर रहस्यमय हो रहा था। किसी के सिल्की शैम्पू से धुली सीधी लटों का कृत्रिम कुंचन 1 आज के कवि गुण में अकिंचन और रूप में कायले के समान होकर भी नाम से हीरालाल और उपनाम से शरदेन्दु बन जाते हैं।” (स्मृति की रेखाएँ)।

स्पष्ट रूप में महादेवी वर्मा के हास्य व्यंग्य में विद्रोह की प्रतिध्वनि है। महादेवी की भाषा सहज पर कवित्वपूर्ण है। उनकी भाषा में वक्रता और उक्तिवैचित्र्य तो है पर उलझाव नहीं है। वे अभिधा से ज्यादा व्यंजना से संपृक्त भाषा का उपयोग करती है। भाषा के लालित्य का एक उदाहरण द्रष्टव्य है।

फागुन के गुलाबी जाड़े की वह सुनहली संध्या. सवेरे के पुलक पंखी वैतालिक एक लयवाही उड़ान में अपने-अपन नीड़ों की ओर लौट रहे थे। विरल बादलों के अंतराल से उनपर चलाए हुए सूर्य के सोने के शब्द-बेधी बाण उनकी उन्मद गति में ही उलझ-उलझकर लक्ष्य-श्रष्ट हो रहे थे। (अतीत से चलचित्र)

महादेवी की भाषा में एक लय, संगीत और चित्रात्मकता है। उनका एक-एक वाक्य एक-एक चित्र के समान है। उन्होंने रेखाओं में भावना और कल्पना के रंग भरे हैं और ये रंग शब्दों के माध्यम से ही अभिव्यक्त हुए

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