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माखनलाल चतुर्वेदी को एक भारतीय आत्मा क्यों कहा गया है

उत्तर - कविवर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय चेतना के संवाहक ही नहीं, अपितु उसके पोषक और प्रतीक भी थे। उन्होंने अपनी काव्य-यात्रा तब आरम्भ की थी, जब अंग्रेजी सत्ता का मूलोच्छेदन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर क्रान्ति की ज्वाला प्रज्वलित होने लगी थी। 

चतुर्वेदी जी ने प्रज्वलित हो रही क्रान्ति की इस ज्वाला को बड़े ध्यान से देखा। उसका आंकलन और अनुभव किया । उन्होंने देखा कि इसमें समग्र राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान हेतु त्याग-समर्पण की आहुति दी जा रही है। 

इस प्रकार की अनुभूति के प्रतीकात्मक काव्यों का सृजन और प्रकाशन करना चतुर्वेदी जी ने अपना जीवनलक्ष्य समझा ही नहीं, अपितु निर्धारित भी किया। 

इसके महत्व के लिए उन्होंने अतीत का गौरव-गान करना आवश्यक समझा। वर्तमान दशा के दुःखद, उपेक्षित और असहाय पक्षों को उद्घाटित करते हुए इन्हें राष्ट्रोत्थान के लिए रीढ़ स्वरूप चित्रित करने वाले राष्ट्रीय कवियों में कविवर माखनलाल चतुर्वेदी का स्थान अत्यन्त विशिष्ट और अन्यतम है। 

कविवर चतुर्वेदी की राष्ट्रीय काव्यधाराएँ उनकी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक चिन्ह हैं। उनकी राष्ट्रीय-भावनाओं से ओत-प्रोत होने वाली कविताओं का यहाँ समुचित विवेचन किया जा रहा है।

इस प्रकार चतुर्वेदी जी के काव्य के दो पक्ष हैं- (1) परतंत्र भारत के प्रति राष्ट्र प्रेम और (2) स्वातन्त्र्योत्तर भारत के प्रति राष्ट्र-प्रेम ।

(1) आत्मोत्सर्ग की भावना 

 कविवर चतुर्वेदी जी की अधिकतर कविताओं से आत्मोसर्ग की भावना प्रकट होती है। ऐसी कविताएँ उसी काल-परिप्रेक्ष्य में रची-लिखी गई हैं, , 

जो देश की स्वतन्त्रता के लिए बलिपंथियों का बड़े ही स्पष्ट रूप से आह्वान करती हैं। उनकी सुप्रसिद्ध कविता 'पुष्प की अभिलाषा' इसी तथ्य को चरितार्थ करती है

चाह नहीं सुरबालाओं के 
गहनों में गूँथा जाऊँ,
 चाह नहीं प्रेमी-माला में
विंध प्यारी को ललचाऊँ, 
चाह नहीं सम्राटों के शव पर
हे हरि-डाला जाऊँ, 
चाह नहीं देवों के सिर
चढूँ भाग्य पर इठलाऊँ, 
मुझे तोड़ लेना वनमाली,
 उस पथ पर तुम देना फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने 
जिस पथ जावें वीर अनेक ।” '

बलिपंथी' देश की आजादी के सच्चे हिमायती रहे हैं। इस तरह के भाव को चतुर्वेदी जी ने अपनी कविता 'अमर राष्ट्र' में व्यक्त करते हुए कहा है

"सूली का पथ ही सीखा हूँ, 
सुविधा का सदा बचाते आया। 
मैं बलिपंथ का अंगारा हूँ, 
जीवन-ज्वाला जगाते आया ।।” 

(2) क्रान्ति की भावना

देश की स्वतन्त्रता का इतिहास इस बात का साक्षी है कि क्रान्ति की भावना उस समय जन-जन में व्याप्त हो गई थी। सामान्य जन-मानस से लेकर विशिष्ट जन-मानसतक में क्रान्ति की ज्वाला प्रदीप्त होने लगी  थी । जब सामान्य जन की वड़वाग्नि ने बड़े ही अपेक्षित रूप से देश को स्वतन्त्र करने में अपनी काव्य-तरंगों को उछाल दिया था। 

कविवर चतुर्वेदी जी इस तथ्य के पूरे प्रतीक और सटीक सिद्ध होते हैं। उनकी अनेक कविताएँ इसकी पुष्टि करती हैं

आज हिमगिरी भी पुकारे, सिन्धु भी सौ-सौ कर बोले, 
आज गंगा की लहर में प्रलय का व्यापार बोले ।
 हाँ उठे इस, जग उठे रस- राजगिरी- वन काननों में, 
किन्तु प्रतिबिम्बित रहे बल कोटि बल के आननों में।।"

 चतुर्वेदी जी की अपनी काव्य-साधना एक महान् लक्ष्य और साध्य क्रान्ति के उन्मेष से देश की स्वतन्त्रता और देशोत्थान का सुखद स्वरूप स्थापित करने का रहा। 

इस दिशा में वे पूरे योग्य दिखाई देते हैं। क्योंकि उनकी क्रान्तिकारी कविताओं की धार बड़ी तीखी और पैनी है। इस प्रसंग में उनकी एक कविता 'जवानी' के कुछ अंश दिए जा रहे हैं।

"आग अंतर में लिए पागल जवानी। 
कौन कहता है कि तू विधवा हुई, खो आज पानी ।।
 चल रही है घड़ियाँ चले हिम पे सितारे 
चल रही है साँस फिर तू ठहर जाए 
दो सदी पीछे कि तेरी लहर आए 
पहन ले नर- मुंडमाला, उठ स्वमुण्ड सुमेरु कर ले 
धानियों की-सी पहन वाली आज धानी 
आग अंतर में लिए पागल जवानी ।” 

यह लक्षितव्य है कि इनकी क्रांतिवादी कविताओं के उद्वेग किसी तत्त्व को भी मसलकर रख देने के लिए पर्याप्त दिखाई देते हैं, यथा

"टूटता-जुड़ता समय भूगोल आया, 
साथ में मणियाँ समेट खगोल आया, 
क्या जले बारूद हिम के प्राण पाए, 
क्या मिला जो कि प्रलय के सपने न आए,
 घरा यह तरबूज है दो फांक कर दे, 
चढ़ा दे स्वातंत्र्य प्रभु पर अमर पानी।" 
" चूड़ियाँ बहुत हुई कलाइयों पर प्यारी ! भुजदण्ड सजा दो, 
तीन-कमानों से शृंगार दो, जरा जिरह बख्तर पहना दो ।”
 "मुझको स्वाँग बनाने का अवकाश नहीं है साथी, 
क्या साजूं शृंगार कि उसमें सब कुछ स्वाद नहीं है।" 

(3) स्वातंत्र्योत्तर भारत के प्रति राष्ट्र-प्रेम

कविवर चतुर्वेदी जी ने न केवल देश की आजादी लिए अपने राष्ट्र प्रेम का प्रदर्शन किया, अपितु आजादी के बाद उत्पन्न हुए शत्रु-संकट, विषमताहिंसा आदि की समाप्ति के लिए भी किया, जैसे

1. शत्रु - दमन हेतु आह्वान 

भारत की स्वतन्त्रता खतरे में पड़ गई, क्योंकि उस पर चीन ने आक्रमण कर दिया। इसके लिए महाकवि ने देशवासियों से रक्तदान का आह्वान किया था -

“आओ आज हिमालय ने नित्त महामौन को तोड़ पुकारा,
रक्त चाहिए, रक्त चाहिए, बहने दो बलि-पंथी धारा ।” " 

2. ऐक्य की भावना 

आजादी के बाद परस्पर एकता के अभाव को देखकर महाकवि ने एकता के भावों को प्रदर्शित करने वाली काव्य-रचनाएँ की

"मंदिर में या चाँद चमकता, मसजिद में मुरली की तान ।
मक्का हो, चाहे वृन्दावन, होते आपस में कुर्बान ।।”

3. स्वार्थपरता के प्रति व्यंग्योक्ति

कविवर चतुर्वेदी जी ने आजाद भारत में उत्पन्न हुई स्वार्थपरता पर तीखा व्यंग्य - प्रहार करना अपना काव्य-धर्म समझा। इसके लिए उन्होंने अपनी बेबाक पंक्तियों को यों प्रस्तुत किया

"दस वर्षों से शिशु शासन पर हम बूढ़े बैठे ऐसे, 
मीठी कुरसी, मीठे रुपये, मीठे सपने कैसे-कैसे ?”

उपर्युक्त राष्ट्रीय भावों से उद्दीप्त कविताओं का उल्लेख करने के उपरान्त हम यह निष्कर्ष दे रहे हैं कि कविवर चतुर्वेदी निःसन्देह अत्युच्च कोटि के राष्ट्रीय भाव-धाराओं के जनक हैं। 

उनकी समस्त राष्ट्रीय - कविताएँ न केवल तत्कालीन परिप्रेक्ष्य में अत्योपयोगी रहीं, अपितु आधुनिक युग में भी तथावत् महत्त्वपूर्ण और अपेक्षित सिद्ध होती हैं।

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