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परिवर्तन कविता की व्याख्या- सुमित्रानंदन पंत

1. खोलता इधर जन्म लोचन,
अभी उत्सव और हास हुलास 
अभी अवसाद अश्रु, उच्छवास! 
अचिरता देख जगत की आप 
शून्य भरता समीर निःश्वास,
डालता पातों पर चुपचाप 
ओस के आँसू नीलाकाश;
सिसक उठता समुद्र का मन,
सिहर उठते उड्गन ।
मुंदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण,

सन्दर्भ - प्रस्तुत पंक्तियाँ पन्त जी की प्रसिद्ध कविता 'परिवर्तन' से है । 

प्रसंग - इन पंक्तियों में कवि ने जीवन की सतत् गतिशीलता पर अपने विचार प्रकट करते हुए यह स्पष्ट किया है कि जन्म और मरण का चक्र पलकों के उत्थान-पतन जैसा ही है।

व्याख्या - इधर जन्म अपनी आँखें खोलता है और उधर मृत्यु उन आँखों को क्षण-क्षण मूँदती रहती है अर्थात् जन्म और मृत्यु जीवन के शाश्वत धर्म हैं। जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु अवश्यम्भावी है बल्कि यों कहना चाहिए कि जन्म का पर्यावसान मृत्यु में ही होता है। 

जो जीवन अभी थोड़ी देर पहले उत्सवों में आनन्द ले रहा था, हँस रहा था और प्रसन्न हो रहा था, उसी में अब दुःख, आँसू और निराशा आ गई है।

ऐसा प्रतीत होता है कि जगत् की नश्वरता देखकर वायु स्वयं ही शून्यता-भरी निःश्वासें ले रही हो और ओस के बहाने नीला आकाश पत्तों पर चुपचाप आँसू गिरा रहा हो । 

लहरों के उत्थान - पतन के समान मानो समुद्र का मन सिसक रहा हो और तारे सिहर रहे हों।

विशेष

(1) जीवन और मृत्यु की अवश्यम्भाविता पर गीता में भी कहा गया है - जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु। 

(2) कवि की उत्प्रेक्षाएँ अत्यन्त भावपूर्ण हैं

अभी उत्सव और हास- हुलास
अभी अवसाद, अश्रु उच्छवास
इन पंक्तियों में यथासंख्य अलंकार है। 

(3) अभी शब्द का प्रयोग जग की अचिरता के भाव को और भी गहरा बना देता है । 

2. आज का दुःख, कल का आह्लाद
और कल का सुख आज का विषाद,
समस्या गूढ़ स्वप्न संसार,
पूर्ति जिसकी उस पार
जगत-जीवन का अर्थ विकास

सन्दर्भ - प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ पन्त जी की प्रसिद्ध कविता 'परिवर्तन' से ली गयी है । प्रसंग-इन पंक्तियों में कवि ने जीवन की अधुनातन मनोवैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की है। 

व्याख्या - बिना दुःख के सब सुख व्यर्थ हैं, अर्थात् बिना दुःख के सुख का कोई मूल्य नहीं । बिना आँसू के, वेदना के, जीवन भार बन जाता है अर्थात् आँसुओं के द्वारा ही वेदना कम होती है। चूँकि संसार में दीनता- दुर्बलता का अस्तित्व है; इसलिए दया, क्षमा और प्यार का यहाँ महत्व माना जाता है। यदि संसार दुर्बल और दीन न हो, तो फिर न तो किसी की दया की आवश्यकता रहे और न क्षमा की ।

संसार में दुःख और सुख चक्र के समान घूमते रहते हैं। आज जो दुःख बना हुआ है कल वही प्रसन्नता में परिणत हो जायेगा, अर्थात् दुःख के द्वारा ही सुख की उत्पत्ति होती है और कल जो सुख बना हुआ था, वह आज दुःख में बदल गया है। 

इसलिए संसार एक गहरी समस्या और गूढ़ स्वप्न स्वरूप बन गया है, जिसकी पूर्ति उस पार है अर्थात् भौतिकता के त्याग करने से ही संसार की उलझी हुई पहेली का ज्ञान हो सकता है। 

जीवन का अर्थ है- गति तथा क्रम का नष्ट हो जाना। कहने का भाव यह है कि गति जीवन है और स्थिरता मृत्यु |

विशेष - उपर्युक्त पंक्तियों में दुःख, मृत्यु और जीवन की अत्याधुनिक और मनोवैज्ञानिक व्याख्या की गई है।

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