मशीनी भाषा क्या है - masini bhasha par prakash daliye।

मशीनी भाषा सामान्य व्यवहार की भाषा से सर्वथा भिन्न होती है। तकनीकी एवं विज्ञान की भाषा में विशिष्ट सूत्र एवं पदार्थों को विशिष्ट किन्तु निश्चित अर्थ में अभिव्यक्त किया जाता है। 

विज्ञान व तकनीकी भाषा स्पष्ट, तर्कसंगत तथा सुगठित होती है। इसमें भाषा वर्गों की दृष्टि से वैज्ञानिक शब्दावली और उसमें प्रयुक्त शब्द विज्ञान के संदर्भ और प्रसंग में परिभाषित तथा एकार्थी होते हैं।

मशीनी भाषा क्या है

हिन्दी भाषा केवल साहित्य और प्रशासन के क्षेत्र में प्रभावी माध्यम नहीं है, बल्कि वह वैज्ञानिक एवं तकनीकी विषयवस्तु को सुगठित रूप में प्रयुक्त करने का सशक्त साधन भी है। हिन्दी में अपने आप से संस्कृत भाषा की शब्दावली के साथ-साथ अनेक विदेशी भाषाओं में प्रयुक्त शब्दावली को भी अपनाया है।

इससे हिन्दी की शब्द सम्पदा अत्यन्त समृद्ध हुई है। इन सब कारणों से हिन्दी में आज विज्ञान, गणित, विधि, दूरसंचार एवं टेक्नोलॉजी एवं अंतरिक्ष से संबंधित अनेक ग्रन्थों का निर्माण हो चुका है।

विशुद्ध वैज्ञानिक ग्रंथों में कल्पना की गुंजाइश नहीं होती है। विज्ञान में वैज्ञानिक सिद्धांत, तथ्य, आविष्कार, प्रयोग, प्रयोग विधि आदि का विवरण ही प्राप्त होता है। वैज्ञानिक साहित्य में तकनीकी शब्दावली की अधिकता होती है। वैज्ञानिक शब्दों में कुछ ठोस वस्तुओं के नाम होते हैं। कुछ क्रियाएँ होती हैं। तो कुछ संकल्पनाओं का बोध कराते हैं।

विज्ञान की नयी-नयी शाखाओं का विकास जिस तेजी से होता है ऐसी स्थिति में अन्य भाषाओं में प्रकाशित होने वाले ग्रंथों के लिए नये पारिभाषिक शब्दों को निर्मित करने की समस्या सामने आती है। शीघ्रता से पारिभाषिक शब्दावली का गठन संभव नहीं होने पर अनुवादक नये शब्द गढ़कर या स्रोत भाषा के शब्दों के अनुकूलन प्रक्रिया से परिवर्तित कर काम चलाते हैं। 

बाद में फिर नये विषयों की शब्दावली निर्मित होती है। इस प्रकार विज्ञान व तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी का प्रयोग निरन्तर बढ़ता जा रहा है। कम्प्यूटर में हिन्दी के प्रयोग वर्तमान समय में कम्प्यूटर की महत्ता और उपयोगिता सर्वविदित है। अब हिन्दी में कम्प्यूटर से कार्य आसानी से किया जा सकता है।

पत्र-पत्रिकाएँ, पुस्तक, अनुवाद आदि का कार्य बड़ी सहजता से कम्प्यूटर के द्वारा हम बहुत ही कम समय में कर सकते हैं। देवनागरी लिपि वैज्ञानिक लिपि है तथा देवनागरी में कम्प्यूटर से काम करना कठिन नहीं है। पूर्णीकृत देवनागरी कम्प्यूटर के आने से मुद्रण, प्रकाशन संप्रेषण और भारतीय भाषाओं में मशीनों के संचालन की समस्या दूर हो गई है। 

भविष्य में हिन्दी के संदर्भ में कम्प्यूटर द्वारा अनुवाद की बहुत अच्छी संभावनाएँ हैं। इस वैज्ञानिक युग में कम्प्यूटर के चमत्कार से सभी परिचित हैं। इसका जन्म और विकास अंग्रेजी भाषी देशों में हुआ। फलतः इसका लाभ अधिकतर अंग्रेजी भाषा को मिला। इसकी तकनीकी शब्दावली भी अंग्रेजी भाषा में है। 

भारत में प्रवेश के समय भी बहुत सी सरकारी नोटिस और बिल अंग्रेजी में आने लगे तथा हिन्दी की प्रगति रुक-सी गई थी। भारत सरकार के राजभाषा विभाग सक्रिय होकर भारतीय वैज्ञानिकों का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया । परिणामत: बिड़ला प्रौद्योगिक तथा विज्ञान संस्थान पिलानी (राजस्थान) और डी. सी. एम प्रॉडक्ट्स ने पहला षीय साफ्टवेयर 'सिद्धार्थ' नाम से निर्मित किया। 

इसमें अंग्रेजी और हिन्दी के साथ तमिल में भी कुंजी-पटल था। तत्पश्चात् आई. आई. टी. कानपुर ने हिन्दी कम्प्यूटर निकाला। फिर तो हैदराबाद से 'लिपि नामक त्रैमासिक कम्प्यूटर भी मार्केट में आ गया । इन दिनों दर्जनों बोर्ड इस दिशा में सक्रियता दिखला रहे हैं। प्राय: ये की-बोर्ड द्विभाषी हैं। 

इससे सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को बहुत लाभ हुआ, क्योंकि हिन्दी के साथ अंग्रेजी भी तो हमारी राजभाषा बनी बैठी है। इन आविष्कारों से दोनों भाषाओं में एक साथ कार्य होने लगे और बाबू तथा टंककों को सुविधा हो गयी। पहले की अपेक्षा अब हिन्दी का व्यवहार अधिक होने लगा।

कम्प्यूटर में हिन्दी के अनुप्रयोग से मुद्रण और प्रकाशन में क्रान्ति सी आ गयी। पहले हाथ से कम्पोजिंग कराया जाता था, काम रुका रहता था। छपाई एक साथ नहीं हो पाती थी। टाइपों के केस बनवाने पड़ते थे। हिन्दी धीरे-धीरे मशीन की दासी होती जा रही थी। सुधार की माँग होती थी। 

अब कम्प्यूटर के जादू से स्क्रीन पर सब कुछ आ जाता है। सीडी में भरा जाता है। जब चाहें और जितना चाहें प्रिंटर पर और फिर फोटो प्रेस पर छाप लिया जाता है।

हिन्दी का कम्प्यूटर की-बोर्ड बहुत विस्तृत है। इसमें नये-पुराने सब के अक्षर प्रतीक होते हैं। विशेषकर संयुक्त अक्षरों की तो कोई कमी नहीं है। संयुक्त अक्षरों में जो तथाकथित सुधार किये गये थे, उनमें संयुक्त अक्षर क्षत-विक्षत् से हो गये थे। संस्कृत के विद्वान और विद्यार्थी सब विक्षुब्ध थे। कम्प्यूटर के आगमन और इस दिशा की वैज्ञानिकता से सभी सन्तुष्ट हो गये।

कम्प्यूटर के अक्षर भी बहुत सुन्दर हैं। अंग्रेजी के अक्षर तो आज भी वैसे ही सीधी रेखा वाले हैं, परन्तु हिन्दी की सीधी रेखा में और टेढ़ी रेखा में सुन्दरता देखते ही बनती है । देवनागरी वर्णमाला का क्रम वैज्ञानिक होने के साथ-साथ कम्प्यूटर के प्रोग्राम में आसानी से सिद्ध होते हैं।

सुन्दर प्रकाशन से हिन्दी पुस्तकों के प्रति पाठक आकर्षित हो रहे हैं तथा इसकी बिक्री भी बढ़ती जा रही है। यह स्वप्न भी देखा जा रहा है कि कम्प्यूटर में किसी पुस्तक का विषय भर दिया जाये तथा फिर अपनी इच्छानुसार इसे सुना सुनाया जाये।

कम्प्यूटर एक भाषा से दूसरी भाषा में आसानी से अनुवाद कर देता है। एक व्यक्ति का भाषण एक साथ पाँच-पाँच भाषाओं में अनुवादित हो जाता है। दुभाषिया अनुवाद की प्रक्रिया से शब्दकोष तैयार होने लगा है। 

सम्पादन और मुद्रण में समय इससे बहुत कम लगता है तथा काम भी सुन्दर और शुद्ध हो जाता है। इन पक्षों को देखकर पाठक समुदाय निरन्तर कम्प्यूटर से आकर्षित होते जा रहे हैं ।

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