राष्ट्रीय आय लेखांकन क्या है - National Income Accounting

Post Date : 04 August 2022

संसार के प्रत्येक देश का प्रमुख उद्देश्य आर्थिक विकास करना है। भारत सरीखे विकासशील देशों के लिए तो आर्थिक विकास और भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। आर्थिक विकास में वृद्धि की दर को एक निश्चित समयावधि में राष्ट्रीय आय में वृद्धि के रूप में मापा जाता है। एक देश के विभिन्न वर्षों के राष्ट्रीय आय के आँकड़ों का अध्ययन करके उस देश की आर्थिक प्रगति को समझा जा सकता है। अतः प्रत्येक देश राष्ट्रीय आय से संबंधित आँकड़े तैयार करता है। इसे राष्ट्रीय आय लेखा कहते हैं।

राष्ट्रीय आय लेखांकन क्या है

जिस प्रकार एक व्यक्ति अथवा फर्म अपनी व्यावसायिक स्थिति की जानकारी के लिए लेखा-जोखा रखती है। उसी प्रकार एक देश अपनी सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था की जानकारी के लिए राष्ट्रीय लेखों का निर्माण करता है। सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था के आर्थिक लेखांकन को राष्ट्रीय आय लेखांकन कहा जाता है। राष्ट्रीय लेखांकन का आधार राष्ट्रीय आय है। इस कारण भी इसे राष्ट्रीय आय लेखांकन कहा जाता है। इसको सामाजिक लेखांकन भी कहा जाता है।

राष्ट्रीय आय लेखांकन एक ऐसी धारणा को व्यक्त करता है जिसका संबंध एक देश अथवा समाज में उन समस्त प्रकार की आर्थिक क्रियाओं से होता है जो कि एक निश्चित संस्थागत ढाँचे के अन्तर्गत की जाती हैं। आर्थिक क्रियाओं के सांख्यिकीय वर्गीकरण से संबंधित होने के कारण यह अर्थव्यवस्था के क्रिया-कलाप को स्पष्ट करने में सहायक होता है। 

राष्ट्रीय आय लेखांकन की प्रमुख परिभाषा

पॉल स्टुडेस्की के अनुसार - राष्ट्रीय आय लेखांकन अर्थव्यवस्था के जटिल वित्तीय सौदों की प्रकृति, आकार तथा अर्न्तसंबंधों को निर्धारित करने की एक विधि है। 

फैंकजान के अनुसार - राष्ट्रीय आय लेखांकन वह प्रणाली है जिसके द्वारा सामूहिक आर्थिक क्रियाओं को समझा तथा मापा जा सकता है। 

ऐडे, पीकॉक एवं कूपर के अनुसार - राष्ट्रीय आय लेखांकन एक निर्दिष्ट क्षेत्र की आर्थिक क्रियाओं से संबंधित आँकड़ों की सुसंगठित व्यवस्था है। 

उक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय आय लेखांकन वह प्रणाली है। जिसमें न केवल अर्थव्यवस्था में उत्पादित अंतिम वस्तुओं व सेवाओं का लेखा-जोखा किया जाता है। बल्कि इसमें कुल अंतिम उपभोग व्यय, पूँजी-निर्माण, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार आदि का भी अध्ययन किया जाता है। साथ ही इसमें विभिन्न क्षेत्रों के बीच पाये जाने वाले अर्न्तसंबंधों पर भी विचार किया जाता है। इस प्रकार, राष्ट्रीय आय लेखांकन को एक निश्चित समयावधि में अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में सम्पादित समस्त कार्य-विधियों का लेखा-जोखा कहा जा सकता है।

राष्ट्रीय आय लेखांकन का विकास

राष्ट्रीय आय लेखांकन का विकास सत्रहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड के सर विलियम पेटी तथा फ्रांस के बोयल गिलबर्ट के द्वारा किया गया था। उन दिनों धनी लोग अपनी सम्पत्ति की तुलना एक वर्ष में व्यक्ति को प्राप्त आय के आधार पर करते थे। राष्ट्रीय आय के विचार का उद्भव इसी विचारधारा के आधार पर हुआ। 

इसी प्रकार, व्यक्ति की तरह देश की सम्पत्ति की माप एक वर्ष में उत्पादित आय के आधार पर करने लगे। सन् 1776 में इंग्लैण्ड के 'ग्रेगरी किंग' ने इंग्लैण्ड की सकल राष्ट्रीय आय की गणना करने के लिए प्रत्येक सामाजिक और आर्थिक वर्ग के प्रतिव्यक्ति आय व्यय और बचत के अनुमान लगाये। सही अर्थों में गेगरी किंग को ही राष्ट्रीय आय लेखांकन का पितामह कहा जा सकता है। 

जिन्होंने अठारहवीं एवं उन्नीसवीं सदी में इस विषय के विकास के लिए प्रयास किये। परिणामस्वरूप बीसवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा अन्य पश्चिमी देशों में राष्ट्रीय आय लेखांकन का समुचित विकास हो सका।

द्वितीय महायुद्ध के दौरान 'साइमन कुजनेट्स' ने राष्ट्रीय आय लेखांकन को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् राष्ट्रीय आय लेखांकन का तीव्र गति से विकास हुआ। इसी समय अर्न्तराष्ट्रीय मंच पर कुछ संस्थाओं, जैसे  अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ ने राष्ट्रीय आय लेखांकन प्रणाली को सुव्यवस्थित करने में काफी सहयोग दिया। 

सन् 1947 तक अधिक विकसित देशों ने राष्ट्रीय आय लेखांकन प्रणाली के उपयोग की शुरुआत कर दी थी। तत्पश्चात् विश्व के अन्य देशों में भी राष्ट्रीय आय लेखांकन प्रणाली को विकसित करने के प्रयास किये गये। सन् 1960 तक संयुक्त राष्ट्र संघ ने विभिन्न देशों की आर्थिक क्रियाओं का अध्ययन करने के लिए एक प्रमाणित राष्ट्रीय आय लेखांकन प्रणाली का विकास किया।

भारत में राष्ट्रीय आय लेखा प्रणाली का विकास

भारत में स्वतंत्रता के पहले अर्थशास्त्रियों द्वारा राष्ट्रीय आय के अनुमान लगाये गये थे, लेकिन वे पर्याप्त एवं विश्वनीय आँकड़ों के अभाव में सही-सही अनुमान नहीं लगा पाये। इनमें अनुमानों, अवधारणा तथा सामीप्य संबंधी काफी त्रुटियाँ थीं। भारत में सर्वप्रथम राष्ट्रीय आय का मापन कार्य सन् 1867-68 दादाभाई नौरोजी ने किया। 

राष्ट्रीय आय के प्रथम वैज्ञानिक आँकड़े सन् 1931-32 में प्रो. वी. के. आर. वी. राव ने तैयार किये। स्वतंत्रता के पश्चात् सन् 1949 में सरकार प्रो. पी. सी. महालनोविस की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आय समिति का गठन किया जिसमें प्रो. डी. आर. गाडगिल एवं प्रा. वी. के. आर. वी. राव सदस्य थे। राष्ट्रीय आय समिति ने सन् 1948-51अवधि के लिए राष्ट्रीय आय के अनुमान प्रस्तुत किये राष्ट्रीय आय समिति ने अपनी पहली रिपोर्ट सन् 1950 में और अंतिम रिपोर्ट सन् 1954 में दी। 

राष्ट्रीय आय से संबंधित अतिरिक्त सूचनाओं को एकत्रित करने के लिए सन् 1950 में राष्ट्रीय व्यादर्श सर्वेक्षण निदेशालय की स्थापना की गयी। सन् 1955 में राष्ट्रीय आय की गणना का कार्य केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन को सौंप दिया गया। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन ने सन् 1961 में एक लेख 'National Income Statistics Proposal for Revised Series of National Income Estimates for 1956 to 1960' प्रकाशित किया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्रीय आय अनुमानों की निम्न तीन शृंखलाएँ प्रयोग की गयीं।

1. परम्परागत श्रृंखला - सन् 1948-49 से 1964-65 तक (1948-49 कीमतों के आधार पर)। 

2. संशोधित श्रृंखला - सन् 1975-76 तक अनुमानों के लिए 1960-61 को आधार वर्ष माना गया, लेकिन इसके बाद आधार वर्ष बदलकर 1970-71 कर दिया गया।

3. C.S.O. की नई श्रृंखला - सन् 1980-81 आधार वर्ष वाली नई श्रृंखला के आधार पर 1950-51 से लेकर अब तक के राष्ट्रीय आय अनुमान तैयार किये गये हैं।

अभी तक राष्ट्रीय आय की गणना का आधार वर्ष 1980-81 था, लेकिन 'केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन' द्वारा हाल में राष्ट्रीय आय की गणना की नई श्रृंखला में 1993-94 को आधार वर्ष माना गया है। 1993-94 आधार वर्ष वाली नई श्रृंखला के आधार पर केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन ने वर्ष 1993-94 से लेकर 1997-98 तक के लिए राष्ट्रीय आय से सम्बन्धित आँकड़े प्रस्तुत किये हैं। इस प्रकार वर्ष 1950-51 से लेकर 1992-93 तक के रूप में यथास्थिर रखा है।

केन्द्रीय सांख्यिकीय संगठन प्रतिवर्ष प्रतिव्यक्ति आय तथा राष्ट्रीय आय के अनुमानों पर एक श्वेत-पत्र प्रकाशित कर रहा है। इसे राष्ट्रीय लेखा सांख्यिकीय के नाम से भी जाना जाता है । इस श्वेत-पत्र में भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली आर्थिक क्रियाओं का विस्तृत विवेचन किया जाता है।

राष्ट्रीय आय लेखांकन की विशेषताएँ

राष्ट्रीय आय लेखांकन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नांकित हैं -

1. राष्ट्रीय आय लेखांकन अर्थव्यवस्था की आर्थिक गतिविधियों का लेखा-जोखा तैयार करने की एक विधि है।

2. राष्ट्रीय आय लेखांकन राष्ट्रीय आय की गणना से सम्बन्धित एक क्रमबद्ध सांख्यिकीय विवरणों का समूह होता है। 

3. राष्ट्रीय आय लेखांकन दोहरी लेखा प्रणाली पर आधारित है।

4. राष्ट्रीय आय लेखांकन में सभी आर्थिक क्रियाओं एवं केवल उत्पादक गतिविधियों को ही शामिल किया जाता है, न कि अनुत्पादक गतिविधियों को।

5. राष्ट्रीय आय लेखांकन के अन्तर्गत उत्पादक क्रियाओं को उनके कार्यों के आधार पर विभिन्न भागों एवं क्षेत्रों में बाँटा जाता है।

6. राष्ट्रीय आय लेखांकन के अन्तर्गत आर्थिक क्रियाओं को उत्पादक, सरकारी एवं गृहस्थ क्षेत्र में पुनः बाँटा जाता है तथा इसमें इन तीनों क्षेत्रों के आपसी संबंध को भी स्पष्ट किया जाता है।

7. राष्ट्रीय आय लेखांकन के अन्तर्गत क्षेत्रीय लेखों के आधार पर समस्त अर्थव्यवस्था के लिए विस्तृत सांख्यिकी विवरण तैयार किया जाता है जिसमें राष्ट्रीय आय के सकल राष्ट्रीय उत्पादन, कुल आय एवं कुल अंतिम व्यय के विस्तृत आँकड़े तैयार किये जाते हैं।

8. राष्ट्रीय आय लेखांकन प्रणाली सभी क्षेत्रों के लेखों का जोड़ होती है।