भारत के उत्तरी मैदान का वर्णन कीजिए - northern plains of india

भारत का उत्तरी मैदान उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी से बना है। यह मिट्टी अत्यंत महीन कणों से निर्मित है इसलिए इसे जलोढ़ पंक कहते हैं। अरावली पर्वत इस प्रदेश में जल विभाजन का कार्य करता है जो इस मैदान को दो नदी तंत्रों में विभाजित करता है।

भारत के उत्तरी मैदान का वर्णन कीजिए

1. पश्चिमी मैदान - इस मैदान में सिंधु एवं उसकी सहायक नदियाँ सतलज, रावी, व्यास, चिनाब और झेलम प्रवाहित होती है। इस मैदान का अधिकांश भाग पाकिस्तान में है। शेष भाग हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तरी व पश्चिमी राजस्थान में फैला है।

यह चौरस मैदान है। समुद्र सतह से उनकी ऊँचाई 210 मीटर से 250 मीटर तक है । यहाँ मिट्टी के टीले पाए जाते हैं जिन्हें भूड़ कहते हैं। इनके बीच की नीची भूमि को तल्ली कहते हैं। वर्षा ऋतु में जलभर जाने पर यह झील का रूप धारण कर लेते हैं जिसे ढांढ कहते हैं।

दो नदियों के मध्य की भूमि दोआब कहलाती है। पंजाब के उत्तर-पश्चिम भाग को पारी दोआब, पूर्वी भाग को विस्त दोआब, दक्षिण भाग को मालवा का मैदान तथा शेष भाग को हरियाणा का मैदान कहते हैं।

2. पूर्वी मैदान - पूर्वी मैदान में गंगा यमुना और इनकी सहायक नदियाँ प्रवाहित होती है। इस मैदान का विस्तार उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल के राज्यों में लगभग 375 लाख वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में है। यह अधिक नम तथा निम्न भूमि वाला मैदान है। नदियों द्वारा बहाकर लाई गई मिट्टी के निक्षेप के आधार पर इस मैदान को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है।

भाभर - शिवालिक श्रेणियों के बाद दक्षिणी ढलानों पर नदियों द्वारा लाई गई कंकरीली बलुई मिट्टी के निक्षेप को भाभर कहते हैं। यह लगभग 8 कि.मी. चौड़ी पट्टी में फैला हुआ है। यह मैदान कम नमी होने के कारण अधिक उपजाऊ नहीं है।

तराई - यह भाभर पट्टी दक्षिण क्षेत्र का मैदान है यहाँ पर जलधाराएँ पुनः धरातल पर प्रगट होती है मैदान में ढाल की कमी के कारण जगह-जगह पर दलदल का निर्माण हो जाता है।

बांगर - यह उत्तरी मैदान का वह भाग है जहाँ नदियों द्वारा प्राचीनतम संग्रहित पुरानी मिट्टी के निक्षेप से बने ऊँचे मैदान है। वर्षा ऋतु में नदियों की बाढ़ का जल यहाँ पहुँच पाता है। इस मैदान में चूना युक्त कंकरीली मिट्टी होती है जिससे आर्द्रता कम होती है। पंजाब और उत्तर प्रदेश में बांगर भूमि का विस्तार अधिक है।

खादर - खादर नवीन काँप मिट्टी के निक्षेप से निर्मित निचले मैदानी भाग हैं जो वर्षाकाल में बाढ़ग्रस्त हो जाते हैं। यहाँ प्रतिवर्ष बाढ़ का जल नवीन कॉप मिट्टी की पतली परत जमा कर देता है। काँपयुक्त भूमि पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में विस्तृत रूप से है।

उत्तरी मैदान का महत्व - 

  1. इसका विस्तार देश के कुल क्षेत्रफल का 1/3 भाग है।
  2. भारत की 45 प्रतिशत जनसंख्या इस मैदान पर निवास करती है।
  3. यह विश्व का सबसे बड़ा उपजाऊ तथा समृद्ध प्रदेश है।
  4. इस मैदान में सदा प्रवाहिनी नदियाँ बहती है।
  5. उत्तम जलवायु के कारण व्यापार एवं उद्योग धंधों का केन्द्र है।
  6. यहाँ यातायात के साधनों का जाल बिछा हुआ है।
  7. यह मैदान भारतीय इतिहास संस्कृति, धर्म, राजनीति का केन्द्र बिन्दु रहा है।

3. प्रायद्वीप पठार - यह संसार का सबसे प्राचीनतम भू-भाग है। इसका विस्तार 16 लाख वर्ग किमी में है तथा इसकी औसत ऊँचाई 610 मी. है। इस पठार की आकृति त्रिभुजाकार है। 

इसके उत्तर में विंध्याचल,कैमूर, सतपुड़ा, अजंता, महादेव, मैकाल तथा राजमहल की पहाड़ियाँ हैं। इसके पूर्व में पूर्वीघाट तथा पश्चिम में पश्चिमी घाट श्रेणी है। पठार के दक्षिण भाग में नीलगिरी की पहाड़ियाँ हैं, तथा आगे दक्षिण में अन्नामलाई इलाइचीं पहाडियाँ है।

प्रायद्वीप पठार का विस्तार दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, पश्चिमी आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक व तमिलनाडू राज्यों में भी है। इस भूखण्ड की रचना अत्यंत प्राचीन कठोर आग्नेय शैलों से हुई है। 

भू-वैज्ञानिकों के अनुसार यह पठार मुख्य प्लेटों (भू-खंडों) में से एक है। इसे भारतीय प्लेट (गोंडवाना लेंड) भी कहा जाता है यह पठार पूर्व कैम्ब्रियन महाकल्प में निक्षेपित अवसादों के समुद्र सतह से ऊपर उठ जाने से बना है नर्मदा और सोन नदी घाटियाँ सम्पूर्ण पठार को दो असमान भागों में विभक्त कर देती है1. मालवा का पठार, 2. दक्कन का पठार।

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