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छायावाद से आप क्या समझते हैं - chhayavad kise kahate hain

छायावाद से आप क्या समझते हैं 

उत्तर- छायावादी कविता हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट महत्व रखती है। डॉ. गोविन्दराय शर्मा " के शब्दों में, “आधुनिक हिन्दी साहित्य में छायावाद का महत्वपूर्ण स्थान है। वर्तमान हिन्दी साहित्य की यह एक विशिष्ट प्रवृत्ति है। 

मानव हृदय की अनुभूतियाँ कविता में नवचेतना से अनुप्राणित होकर विविध रूपों में व्यक्त होती हैं, तब कवि अन्तर्मुखी भावात्मक दृष्टिकोण को अपनाता हुआ दृश्यमान जगत् की वस्तुओं में अलौकिक सत्ता का आभास पाकर अपनी अनुभूतियों की विवृत्ति लाक्षणिक एवं प्रतीकात्मक मनोरम शैली में करता है, तब उसकी कविता छायावाद के रूप में हमारे सामने आती है। 

छायावाद में कवि भावानुभूति और उसकी अभिव्यंजना की एक विशिष्ट पद्धति का अनुसरण करता है।” इस काव्यधारा को यह नाम सर्वप्रथम काव्य के रूप में दिया गया, जैसा कि छायावादी कवि पन्त की अरुचि से स्पष्ट होता है कि “छायावाद नाम से मैं सन्तुष्ट नहीं हूँ। 

यह तो द्विवेदी युग के आलोचकों द्वारा नयी कविता के उपहास का सूचक है।”

कालान्तर में 'छायावाद' शब्द साहित्य में विशेष स्थान पा गया। अतएव इसका प्रयोग भी विशेष अर्थ में होने लगा। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है कि “बंगला में प्रतीकात्मक अध्यात्मवादी रचनाओं को छायावादी कहा जाता था। अतः उनके अनुकरण पर हिन्दी साहित्य में ऐसी रचनाओं के लिए छायावाद नाम चल पड़ा।"

महादेवी वर्मा ने इस कविता के नामकरण के विषय में कहा है- “सृष्टि के बाह्याकार पर इतना लिखा जा चुका है कि मनुष्य का हृदय अभिव्यक्ति के लिए रो उठा। 

स्वच्छन्द छन्द में चित्रित उन मानव अनुभूतियों का नाम छाया उपयुक्त ही था और मुझे तो मानव भी उपयुक्त लगता है।” वास्तविकता यह है कि छायावाद नाम एक काव्यधारा विशेष के लिए रूढ़ हो गया है। 

अतः छायावाद नाम को लेकर अधिक ऊहापोह करना अनावश्यक है।

डॉ. रामकुमार वर्मा ने कहा है कि “परमात्मा की छाया आत्मा पर पड़ने लगती है और आत्मा की परमात्मा में, यही छायावाद है।"

 डॉ. नगेन्द्र का विचार है- “छायावाद एक विशेष प्रकार की भाव पद्धति है, जीवन के प्रति एक विशेष भावात्मक दृष्टिकोण है।” डॉ. नगेन्द्र छायावाद को सूक्ष्म का स्थूल के प्रति विद्रोह भी मानते हैं।

छायावाद के चार स्तम्भ

उत्तर - जिस समय द्विवेदी युग समाप्त हो रहा था, उस समय हिन्दी में एक नवीन काव्यधारा जन्म ले रही थी। इस काव्यधारा को छायावाद की संज्ञा से अभिहित किया गया। 

डॉ. गंगाप्रसाद पाण्डेय ने छायावाद की परिभाषा करते हुए लिखा है-“छायावाद नाम से ही उनकी छायात्मकता स्पष्ट है। विश्व की किसी वस्तु में एक अज्ञात सप्राण छाया की झाँकी पाना अथवा उनका आरोप करना ही छायावाद है ।" 

इसी प्रकार डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, “परमात्मा में आत्मा और परमात्मा की छाया पड़ने को ही छायावाद कहते हैं।” पन्त इसे विदेशी स्वच्छन्दतावाद की देन मानते हैं, तो महादेवी इसे व्यक्ति रस में अभिव्यक्ति अभिव्यक्ति तथा इसके रहस्यवाद वाले भाग को सर्वात्मवाद की भावना की देन मानती हैं।

स्वच्छन्द भावों की हिन्दी के प्रमुख छायावादी कवि - जयशंकर प्रसाद छायावाद के अग्रदूत के रूप में हमारे समक्ष आते हैं। ‘प्रेम-पथिक’, ‘कानन कुसुम', 'झरना', 'आँसू', 'लहर' और 'कामायनी' आदि उनकी प्रमुख छायावादी रचना है।

प्रसाद जी मुख्य रूप से प्रेम और सौन्दर्य के कवि हैं। उनके काव्य में इन दोनों के मार्मिक चित्र अंकित किए हैं।

प्रसाद के उपरान्त छायावादी कवियों में निराला का प्रमुख स्थान है। 'परिमल', 'अनामिका', 'तुलसीदास', 'कुकुरमुत्ता', 'नये पत्ते' आदि उनके प्रमुख काव्यग्रन्थ हैं। 'निराला' ने छायावाद को नूतन गति प्रदान है। 

भाव, भाषा, छन्द आदि सभी क्षेत्रों में उन्होंने बेजोड़ परिवर्तन उत्पन्न किया है। निराला के बाद सुमित्रानन्दन पन्त का नाम सदैव अमर रहेगा, उन्होंने अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही छायावादी काव्य को कोमलता, सरसता और सुन्दरता प्रदान की है।

'वीणा', 'ग्रन्थि',पल्लव' और 'गुञ्जन' आदि उनकी प्रमुख छायावादी रचनाएँ हैं।

प्रसाद, पन्त, निराला के बाद छायावादी कविता में महादेवी का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। महादेवीजी वेदना को अपने प्रियतम की देन समझकर, उनका पोषण बड़ी सावधानी से करती हैं। वे विरह की आग में जितना अधिक जलती हैं, उतना ही प्रियतम को अपने निकट समझती है

"तू जल जल जितना होता क्षय, वह
समीप आता छलनामय ।” 

प्रसाद, पन्त, निराला और महादेवी जैसे समर्थ सृष्टाओं ने इस काल में जिस काव्यधारा का सृजन किया वह सांस्कृतिक और भावात्मक सम्पन्नता के कारण ही अमूल्य निधि है।

छायावाद की वृहद त्रयी

उत्तर- छायावाद की वृहदत्रयी- कुछ आलोचक प्रसाद, पंत एवं निराला को छायावाद की वृहदत्रयी मानकर प्रसाद को छायावादी का ब्रम्हा, पंत को विष्णु और निराला को महेश (शंकर) स्वीकार करते हैं।

जयशंकर प्रसाद - छायावादी युग के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी, 1889 ई. को उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) में सुँघनी साहू नामक प्रसिद्ध वैश्य परिवार में हुआ था। 

आपके दादाजी का नाम शिवरतन साहू एवं पिताजी का नाम देवी प्रसाद था। आपके दादाजी तथा पिताजी काशी में तम्बाकू का व्यापार करते थे, जिसके कारण इनका परिवार पूरे काशी में सुँघनी साहू के नाम से प्रसिद्ध था। आपकी प्रारंभिक शिक्षा का घर पर ही आरंभ हुई ।

प्रमुख काव्य कृतियाँ - चित्राधार, कानन - कुसुम, झरना, लहर, प्रेम-पथिक, आँसू तथा कामायनी । 

कथा संग्रह - छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आँधी, इन्द्रजाल ।

 उपन्यास - कंकाल, तितली, इरावती ।

सुमित्रानंदन पंत - आपका जन्म अल्मोड़ा (उ.प्र.) के कौसानी नामक गाँव में 20 मई, 1900 को हुआ था। इनके जन्म के कुछ घण्टे पश्चात् ही इनकी माँ चल बसी । आपका पालन-पोषण आपकी दादी ने ही किया। 

आपकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई है। उच्च शिक्षा के लिए आप इलाहाबाद आ गए। 28 दिसम्बर, 1977 को आपका निधन हो गया ।

प्रमुख कृतियाँ- आपके प्रमुख कृतियों में वीणा, उच्छावास, पल्लव, ग्रंथी, गुंजन, लोकायन, मधु ज्वाला, मानसी, वाणी, युगपथ, सत्यकाम आदि प्रमुख हैं।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का जन्म बंगाल की महिषादल रियासत (जिला-मिदनापुर) में 21 फरवरी, 1899 में हुआ था। निराला की शिक्षा हाईस्कूल तक हुई। इनके जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता। 15 अक्टूबर, 1961 उन्होंने अपनी इहलीला समाप्त की। 

प्रमुख कृतियाँ - अनानिमा, परिमल, गीतिका, अनामिका द्वितीय, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते, आराधना, गीतकुंज आदि ।

कहानी संग्रह --लिली, सखी, सुकुल की बीवी, चतुरी चमार आदि । उपन्यास अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरूपमा, कुल्लीभाट, बिल्लेसुर बकरिया, चोटी की पकड़, कालेकारनामे आदि ।

छायावाद की प्रमुख विशेषताएं

उत्तर- छायावादी काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ या विशेषताएँ-

छायावादी कविता बाह्य-सौन्दर्य का नहीं, आन्तरिक सौन्दर्य का उद्घाटन करती है। भाषा में अभिधा के स्थान पर लक्षणा और व्यंजना का अधिक प्रयोग होता है। छायावाद में निम्नलिखित विशेषताएँ या प्रवृत्तियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।

(1) स्वानुभूति-निरूपण

छायावादी कवि वस्तुनिष्ठ न होकर आत्मनिष्ठ थे। उन्होंने वस्तुओं की बाह्य रूपरेखा और ऊपरी रूप गुण को अधिक महत्त्व न देकर वस्तुओं द्वारा अपने हृदय में जमाई गई अनुभूतियों और भावनाओं को ही अधिक महत्त्व दिया है। 

उनके लिए वस्तुओं का मूल्य इस बात पर निर्भर है कि वे उन्हें कितना प्रभावित और अन्तःस्फूर्त करते हैं। उनकी भावात्मक और कल्पनात्मक सत्ता को उन वस्तुओं ने कितना प्रेरित किया है। इस प्रकार छायावाद में व्यक्तिगत भावनाओं की प्रधानता होती है। 

छायावादी कवि समष्टि से निरपेक्ष होकर व्यष्टि में लीन रहता है अथवा वस्तु जगत् को अपनी निजी भावनाओं में रंग देखता है। पूरे छायावादी काव्य में वैयक्तिकता का प्राधान्य दृष्टिगोचर होता है। 

वैयक्तिकता का एक उदाहरण निराला की 'राम की शक्ति-पूजा' नामक काव्य में देखिये -

"घिक् जीवन जो पाता आया हो विरोध।                
धिक् साधन जिसके लिए किया शोध ।।”

(2) शृंगार-भावना 

छायावादी काव्य में शृंगार - भावना की प्रमुखता दिखाई देती है। छायावादी काव्य मुख्यतया शृंगारी - काव्य है, किन्तु उसका शृंगार स्थूल, ऐन्द्रिय शृंगार न होकर अतीन्द्रिय सूक्ष्म शृंगार है। 

यह अतीन्द्रिय शृंगार छायावाद में दो प्रकार से व्यक्त हुआ है- एक तो प्रकृति पर नारी भावों के आरोप के द्वारा और दूसरी नारी के अतीन्द्रिय सौन्दर्य-चित्रण द्वारा छायावाद का शृंगार उपभोग की वस्तु न होकर कौतूहल और विस्मय का विषय है। 

उसकी अभिव्यंजना में स्थूलता व स्पष्टता न होकर कल्पना और सूक्ष्मता का समावेश होता है।

(3) सौन्दर्यानुभूति

छायावाद में शृंगार भावना के साथ-साथ सौन्दर्यानुभूति की भी प्रधानता दृष्टिगोचर होती है। यहाँ सौन्दर्य से अभिप्राय काव्य-सौन्दर्य से न होकर सूक्ष्म आन्तरिक सौन्दर्य से है। छायावादी कवि अतीन्द्रिय सौन्दर्य के उपासक रहे हैं। 

वे प्रकृति के कण-कण में उसी अलौकिक सौन्दर्य की झाँकी के दर्शन करते हैं। बाह्य सौन्दर्य की अपेक्षा आन्तरिक सौन्दर्य के उद्घाटन में उनकी दृष्टि अधिक रमती है। 

सौन्दर्योपासक छायावादी कवियों ने नारीसौन्दर्य को नाना- रंगों का आवरण पहनाकर व्यक्त किया है ।

(4) वेदना और करूणा का आधिक्य 

छायावादी कवि सौन्दर्य - प्रेमी होता है, किन्तु सौन्दर्य की क्षणभंगुरता को देखकर उसका हृदय व्याकुल हो उठता है। 

हृदयगत भावों की अभिव्यक्ति की अपूर्णता, अभिलाषाओं की विफलता, सौन्दर्य की नश्वरता, प्रेयसी की निष्ठुरता, मानवीय दुर्बलताओं के प्रति संवेदनशीलता, प्रकृति की रहस्यमयता आदि अनेक कारणों से छायावादी कवि के काव्य में वेदना और करुणा की अधिकता पायी जाती है। 

प्रसाद, पन्त और महादेवी के काव्य में वेदना और करुणा को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ है। प्रसाद के 'आँसू' में कवि हृदय की वेदना साकार हो उठी है। कवि की करुणा दुर्दिन में आँसू बनकर बरस पड़ती है-

"जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति बन छाई दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई ।।

(5) अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम 

छायावाद में अज्ञात सत्ता के प्रति कवि के हृदयगत प्रेम की अभिव्यक्ति पायी जाती है। इस अज्ञात सत्ता को कवि कभी-कभी प्रेयसी या प्रियतम के रूप में, तो कभी चेतन-प्रकृति रूप में देखता है। 

छायावाद की यह अज्ञात सत्ता निःसन्देह 'ब्रह्म' से भिन्न है। छायावादी कवि सृष्टि के कण-कण में इसी अज्ञात सत्ता की झलक देखता है। 

(6) नारी के प्रति नवीन- भावना 

छायावाद में शृंगार और सौन्दर्य का सम्बन्ध मुख्यतया नारी से है। इन कवियों का नारी के प्रति दृष्टिकोण भिन्न प्रकार का है। रीतिकालीन नारी की तरह छायावाद की नारी अतृप्त वासना की पूर्ति का साधन मात्र नहीं है। 

वह इस पार्थिव जगत् की स्थूल नारी न होकर भाव जगत् की सुकुमार देवी है। उसने नारी को प्रेयसी के रूप में ही अपनाया है। प्रसाद जी ने इस नारी का अत्यन्त सुकुमार एवं कोमल चित्र निम्न पंक्तियों में अंकित किया है- 

“नारी तुम केवल श्रद्धा हो,                       
विस्वास रजत पग नभ-तल में ।                     
पीयूष - स्रोत-सी बहा करो                           
जीवन के सुन्दर समतल में ।।" 

(7) मानवतावाद 

छायावादी कविता में मानवता के प्रति विशेष आग्रह दृष्टिगोचर होता है। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द द्वारा प्रचलित मानवतावाद, रविन्द्रनाथ टैगोर द्वारा प्रचलित विश्व-बन्धुत्व की भावना, महात्मा गाँधी द्वारा प्रचलित मानवतावाद - इन सबक प्रभाव छायावादी कविताओं में देखा जा सकता है। 

प्रसाद में मानव मात्र की समानता विश्व - बुन्धुत्व, करुणा के भाव सर्वत्र व्याप्त है।

(8) प्रकृति का मानवीकरण 

छायावादी कवियों की सूक्ष्म, अमाँसल और अतिन्द्रिय सौन्दर्य - भावना के प्रकाशन। का माध्यम स्थूल नारी नहीं है। प्रकृति को ही चेतन मानकर उसका चित्रण किया गया है 

(9) जीवन-दर्शन

छायावादी कवियों ने जीवन के प्रति भावात्मक दृष्टिकोण को अपनाया है। इसका मूल-दर्शन सर्वात्मवाद है। उसमें जड़-चेतन सम्पूर्ण जगत् मानव-चेतना से स्पंदित दृष्टिगोचर होता है। 

व्यक्तिगत भावुकता और कल्पना के साथ-साथ छायावाद में मानव-प्रेम, प्रकृति प्रेम, करुणा, उदारता आदि भावनाओं की प्रचुरता पायी जाती है। इस प्रकार छायावाद में मानव-कल्याण एवं विश्व - बन्धुत्व का सन्देश अन्तर्हित रहता है।

(10) अभिव्यंजना शैली में क्रान्ति 

छायावादी कवियों ने अपने हृदय के सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों को व्यक्त करने के लिए लाक्षणिक, प्रतीकात्मक शैली को अपनाया है। उन्होंने भाषा में अभिधा के स्थान पर लक्षणा और व्यंजना का अधिक प्रयोग किया है।

(11) नवीन - अलंकार 

छायावादी कवियों ने अलंकार-विधान में पर्याप्त परिवर्तन किया है। अभी तक 'मूर्त्त' की उपमा दी जाती थी, किन्तु छायावादी कवियों ने 'मूर्त्त' के लिए 'अमूर्त्त' उपमानों का सफल प्रयोग किया है। विशेषण- विपर्यय और मानवीकरण इस युग की आलंकारिक विशेषताएँ हैं।

(12) नवीन छन्द 

छायावादी युग में विभिन्न प्रकार के छन्द सामने आये। कहीं-कहीं पर तो दो-दो विभिन्न प्रकार के मात्रिक छन्दों को मिलाकर नवीन छन्द बनाये गये। कहीं-कहीं पर अतुकान्त छन्द तथा मुक्त छन्दों का भी प्रयोग किया गया है। मुक्त छन्द छायावादी कवियों की विशेषकर निराला की महत्वपूर्ण देन है।

उपसंहार - छायावाद ने हिन्दी साहित्य को जो कुछ दिया है, वह हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। छायावादी कविता अपने मुक्त वैशिष्ट्य के कारण अमर है तथा वह मानव-मात्र को विश्व - मंगल का सदैव संदेश देती रहेगी।

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